नित नित लेहु न छीजै देह ॥ अंत कालि जमु मारै ठेह ॥1॥ ऐसा दारू खाहि गवार ॥ जितु खाधै तेरे जाहि विकार ॥1॥ रहाउ ॥ राजु मालु जोबनु सभु छांव ॥ रथि फिरंदै दीसहि थाव ॥ देह न नाउ न होवै जाति ॥ ओथै दिहु ऐथै सभ राति ॥2॥ साद करि समधां त्रिसना घिउ तेलु ॥ कामु क्रोधु अगनी सिउ मेलु ॥ होम जग अरु पाठ पुराण ॥ जो तिसु भावै सो परवाण ॥3॥ तपु कागदु तेरा नामु नीसानु ॥ जिन कउ लिखिआ एहु निधानु ॥ से धनवंत दिसहि घरि जाइ ॥ नानक जननी धंनी माइ ॥4॥3॥8॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: (हे भाई ! यह तैयार हुआ कुश्ता) अगर आप सदा खाता रहे। तो इस तरह मनुष्य-जनम से नीचे की जूनियों में जाया जाता। ना ही अंत के समय मौत (का डर) पटक के मारता है। 1। हे मूर्ख जीव ! ऐसी दवाई खा। जिसके खाने से आपके बुरे कर्म (सारे) नाश हैं जाएं। 1। रहाउ। (हे गवार जीव !) दुनिया का राज धन-पदार्थ और जवानी (जिनके नशे ने आपकी आँखों के आगे अंध्धेरा किया हुआ है) यह सब कुछ अस्लियत की परछाईयां हैं। जब सूरज चढ़ता है तो (अंधेरा दूर हो के) असली जगह (प्रत्यक्ष) दिख जाती है। (आप जवानी का। मशहूरी का। नाम का। उच्च जाति का मान करता है। प्रभू के दर पर) ना शरीर। ना नाम। ना ऊँची जाति कोई भी कबूल नहीं। क्योंकि उसकी हजूरी में (ज्ञान का) दिन चढ़ा रहता है। और यहाँ दुनिया में (माया के मोह की) रात हुई रहती है। 2। (हे गवार जीव !) दुनिया के पदार्थों के स्वादों को हवन की लकड़ी बना। माया की तृष्णा को (हवन के लिए) घी और तेल बना; काम और क्रोध को आग बना। इन सबको इकट्ठा कर (और जला के हवन कर दे)। यह है हवन। यही है यज्ञ। यही है पुराण आदिकों के पाठ। जो कुछ परमात्मा को भाता है उसको सिर-माथे पर मानना – 3। हे प्रभू ! (आपके चरणों में जुड़ने के लिए उद्यम आदि) तप (जीव के करणी-रूप) कागज़ है। आपके नाम का सिमरन उस कागज़ पर लिखी राहदारी है। यह खजाना। ये लिखा हुआ परवाना जिस किसी व्यक्ति को मिल जाता है वे लोग प्रभू के दर पर पहुँच के धनवान दिखते हैं। हे नानक ! ऐसे व्यक्ति को पैदा करने वाली माँ (बहुत) भाग्यशाली है। 4। 3। 8।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: मलार महला 1 ॥ (जैसे) सफेद पंखों वाली (कूँज मीठे) बोल बोलती है (वैसे) है बहन ! (आपका भी सुंदर रंग है। बोल भी मीठे हैं। आपके नैन-नक्श भी तीखे हैं) आपका नाम लंबा है। आपके नेत्र काले हैं (भाव। हे जीव-स्त्री ! आपको परमात्मा ने सुंदर तीखे नैन-नक्शों वाला सुंदर शरीर दिया है। पर जिस ने ये दाति दी है) तूने कभी उस मालिक के दर्शन भी किए हैं (कि नहीं) । 1। मैं (कुँज) आपकी दी हुई ताकत से (आपके दिए हुए पंखों से) उड़ती हूँ। और उड़ के आसमान में पहुँचती हूँ (भाव। हे प्रभू ! अगर मैं जीव-स्त्री इन सुंदर अंगों का इस सुंदर शरीर का मान भी करती हॅँ तो भी ये सुंदर अंग आपके ही दिए हुए हैं। ये सुंदर शरीर आपका ही बख्शा हुआ है)। सारी ताकतों के मालिक प्रभू है हे वीर ! (उस दाते की मेहर से) मैं पानी में। धरती में। पहाड़ों में। दरियाओं के किनारे (जिधर भी) देखती हूँ। वह मालिक हर जगह में मौजूद है। 2। हे वीर ! जिस (मालिक) ने यह शरीर बना के इसके साथ यह सुंदर (तीखे नैन-नक्श वाले) अंग दिए हैं। (माया की) बहुत सारी तृष्णा भी उसी ने लगाई है। भटकने की चाहत भी उसी ने ही (मेरे अंदर) पैदा की है। जब वह मालिक मेहर की नजर करता है। तब मैं (माया की तृष्णा से) धीरज पाती हूँ (मैं भटकने से हट जाती हूँ)। और जैसे-जैसे वह मुझे अपने दर्शन करवाता हूँ। वैसे-वैसे मैं दर्शन करती हूँ। 3। (हे वीर !) ना यह शरीर सदा साथ निभेगा। ना ही ये सुंदर अंग ही सदा कायम रहेंगें। यह तो हवा पानी आग आदि तत्वों का मेल है (जब तत्व बिखर जाएंगे। शरीर गिर जाएगा)। हे नानक ! जब मालिक की मेहर की निगाह होती है। तब गुरू पीर का पल्ला पकड़ के मालिक-प्रभू को सिमरा जा सकता है। तब यह शरीर उस सदा-स्थिर मालिक में लीन रहता है (तब यह सुंदर ज्ञान-इन्द्रियाँ भटकने से हट के प्रभू में टिकी रहती हूँ)। 4। 4। 9।
मलार महला 3 चउपदे घरु 1 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ निरंकारु आकारु है आपे आपे भरमि भुलाए ॥ करि करि करता आपे वेखै जितु भावै तितु लाए ॥ सेवक कउ एहा वडिआई जा कउ हुकमु मनाए ॥1॥ आपणा भाणा आपे जाणै गुर किरपा ते लहीऐ ॥ एहा सकति सिवै घरि आवै जीवदिआ मरि रहीऐ ॥1॥ रहाउ ॥ वेद पड़ै पड़ि वादु वखाणै ब्रहमा बिसनु महेसा ॥ एह त्रिगुण माइआ जिनि जगतु भुलाइआ जनम मरण का सहसा ॥ गुर परसादी एको जाणै चूकै मनहु अंदेसा ॥2॥ हम दीन मूरख अवीचारी तुम चिंता करहु हमारी ॥ होहु दइआल करि दासु दासा का सेवा करी तुमारी ॥ एकु निधानु देहि तू अपणा अहिनिसि नामु वखाणी ॥3॥ कहत नानकु गुर परसादी बूझहु कोई ऐसा करे वीचारा ॥ जिउ जल ऊपरि फेनु बुदबुदा तैसा इहु संसारा ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: मलार महला 3 चउपदे घरु 1 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! यह सारा दिखाई देता संसार निरंकार स्वयं ही स्वयं है (परमात्मा का अपना ही स्वरूप है)। परमात्मा स्वयं ही (जीवों को) भटकना के द्वारा गलत राह पर डालता है। (सारे काम) कर कर के करतार स्वयं ही (उन कामों को) देखता है। जिस (काम) में उसकी रजा होती है (हरेक जीव को) उस (काम) में लगाता है। जिस सेवक से अपना हुकम मनवाता है (उसको हुकम मीठा लगवाता है। आज्ञा में चलाता है)। उसको वह यही इज्जत बख्शता है। 1। हे भाई ! (परमात्मा) खुद ही अपनी मर्जी जानता है। (उसकी रज़ा को) गुरू की मेहर से समझा जा सकता है। (जब प्रभू की रज़ा की समझ आ जाती है। तब) यह माया वाली बिरती परमात्मा (के चरणों) में जुड़ती है। और दुनिया की किरत-कार करते हुए ही अपने अंदर से स्वै भाव खत्म कर लिया जाता है। 1। रहाउ। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर प्रभू की रज़ा समझने की जगह। पण्डित निरे) वेद (ही) पढ़ता रहता है। और। पढ़ के (उनकी) चर्चा ही (औरों को) सुनाता रहता है। ब्रहमा। विष्णू। शिव (आदि देवताओं की कथा-कहानियां ही सुनाता रहता है। इसका नतीजा यह होता है कि) यह त्रैगुणी माया जिसने सारे जगत को भटका रखा है। (गलत राह पर डाला हुआ है। उसके अंदर) जनम-मरण (के चक्कर) का सहम बनाए रखती है। हाँ। जो मनुष्य (गुरू की शरण आ के) गुरू की मेहर से एक परमात्मा के साथ गहरी सांझ डालता है। उसके मन में से (हरेक) फिक्र दूर हो जाता है। 2। हे प्रभू ! हम जीव निमाणे मूर्ख बेसमझ हैं। आप खुद ही हमारा ध्यान रखा कर। हे प्रभू ! (मेरे पर) दयावान हो। (मुझे अपने) दासों का दास बना ले (ताकि) मैं आपकी भगती करता रहूँ। हे प्रभू ! आप मुझे अपना नाम खजाना दे। मैं दिन-रात (आपका) नाम जपता रहूँ। 3। नानक कहता है- हे भाई ! आप गुरू की कृपा से ही (सही जीवन-मार्ग) को समझ सकते हैं। (जो मनुष्य समझता है। वह जगत के बारे अपने) ख्याल इस प्रकार बनाता है जैसे पानी के ऊपर झाग है बुलबुला है (जो जल्द ही मिट जाता है) वैसे ही यह जगत है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई ! यह तैयार हुआ कुश्ता) अगर आप सदा खाता रहे।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।