राग भैरों
सूर्योदय से पहले का राग, सतर्क-गम्भीर।
भैरव सुबह से पहले का राग है, सबसे शुरुआती घड़ी का सुर। एक तरह की awe इसके स्वर में बैठी है, ब्रह्म-मुहूर्त की हलकी ठंडक और निःशब्दता की।

नाम का सम्बन्ध शिव के “भैरव” स्वरूप से है, और स्वर का गाम्भीर्य उसी की प्रतिध्वनि है। ग्रंथ में भैरव की रचनाएँ अंग ग्यारह-सौ-छब्बीस के क़रीब से शुरू होती हैं।
“बेद कतेब इफतरा भाई दिल का फिकरु न जाइ ।” भैरों M5