राग भैरों
सूर्योदय से पहले का राग, सतर्क-गम्भीर।
भैरव सुबह से पहले का राग है, सबसे शुरुआती घड़ी का सुर। एक तरह की awe इसके स्वर में बैठी है, ब्रह्म-मुहूर्त की हलकी ठंडक और निःशब्दता की।

नाम का सम्बन्ध शिव के "भैरव" स्वरूप से है, और स्वर का गाम्भीर्य उसी की प्रतिध्वनि है। ग्रंथ में भैरव की रचनाएँ अंग ग्यारह-सौ-छब्बीस के क़रीब से शुरू होती हैं।
"ना हम हिंदू न मुसलमान ॥" भैरों M5
इस राग के सब अंग
इस राग के शबद
हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।
महला 1 (9)
- तुझ ते बाहरि किछू न होइ ॥अंग 1125
- गुर कै सबदि तरे मुनि केते इंद्रादिक ब्रहमादि तरे ॥अंग 1125
- नैनी द्रिसटि नही तनु हीना जरि जीतिआ सिरि कालो ॥अंग 1125
- भूंडी चाल चरण कर खिसरे तुचा देह कुमलानी ॥अंग 1126
- सगली रैणि सोवत गलि फाही दिनसु जंजालि गवाइआ ॥अंग 1126
- गुर कै संगि रहै दिनु राती रामु रसनि रंगि राता ॥अंग 1126
- हिरदै नामु सरब धनु धारणु गुर परसादी पाईऐ ॥अंग 1127
- जगन होम पुंन तप पूजा देह दुखी नित दूख सहै ॥अंग 1127
- आतम महि रामु राम महि आतमु चीनसि गुर बीचारा ॥अंग 1153
महला 3 (23)
- जाति का गरबु न करीअहु कोई ॥अंग 1127
- जोगी ग्रिही पंडित भेखधारी ॥अंग 1128
- जा कउ राखै अपणी सरणाई ॥अंग 1128
- मै कामणि मेरा कंतु करतारु ॥अंग 1128
- सो मुनि जि मन की दुबिधा मारे ॥अंग 1128
- राम नामु जगत निसतारा ॥अंग 1129
- नामे उधरे सभि जितने लोअ ॥अंग 1129
- गोविंद प्रीति सनकादिक उधारे ॥अंग 1129
- कलजुग महि राम नामु उर धारु ॥अंग 1129
- कलजुग महि बहु करम कमाहि ॥अंग 1129
- दुबिधा मनमुख रोगि विआपे त्रिसना जलहि अधिकाई ॥अंग 1130
- मनमुखि दुबिधा सदा है रोगी रोगी सगल संसारा ॥अंग 1130
- दुख विचि जंमै दुखि मरै दुख विचि कार कमाइ ॥अंग 1130
- सबदु बीचारे सो जनु साचा जिन कै हिरदै साचा सोई ॥अंग 1131
- मनमुख आसा नही उतरै दूजै भाइ खुआए ॥अंग 1131
- कलि महि प्रेत जिन॑ी रामु न पछाता सतजुगि परम हंस बीचारी ॥अंग 1131
- मनसा मनहि समाइ लै गुर सबदी वीचार ॥अंग 1132
- बाझु गुरू जगतु बउराना भूला चोटा खाई ॥अंग 1132
- हउमै माइआ मोहि खुआइआ दुखु खटे दुख खाइ ॥अंग 1132
- मेरी पटीआ लिखहु हरि गोविंद गोपाला ॥अंग 1133
- आपे दैत लाइ दिते संत जना कउ आपे राखा सोई ॥अंग 1133
- तिनि करतै इकु चलतु उपाइआ ॥अंग 1154
- गुर सेवा ते अंम्रित फलु पाइआ हउमै त्रिसन बुझाई ॥अंग 1155
महला 4 (7)
- हरि जन संत करि किरपा पगि लाइणु ॥अंग 1133
- बोलि हरि नामु सफल सा घरी ॥अंग 1134
- सुक्रितु करणी सारु जपमाली ॥अंग 1134
- सभि घट तेरे तू सभना माहि ॥अंग 1134
- हरि का संतु हरि की हरि मूरति जिसु हिरदै हरि नामु मुरारि ॥अंग 1134
- ते साधू हरि मेलहु सुआमी जिन जपिआ गति होइ हमारी ॥अंग 1135
- सतसंगति साई हरि तेरी जितु हरि कीरति हरि सुनणे ॥अंग 1135
महला 5 (67)
- सगली थीति पासि डारि राखी ॥ असटम थीति गोविंद जनमा सी ॥1॥अंग 1136
- ऊठत सुखीआ बैठत सुखीआ ॥अंग 1136
- वरत न रहउ न मह रमदाना ॥अंग 1136
- दस मिरगी सहजे बंधि आनी ॥अंग 1136
- जे सउ लोचि लोचि खावाइआ ॥अंग 1136
- जिनहि उपाए तिस कउ पीर ॥1॥अंग 1137
- आगै दयु पाछै नाराइण ॥अंग 1137
- कोटि मनोरथ आवहि हाथ ॥अंग 1137
- लेपु न लागो तिल का मूलि ॥अंग 1137
- खूबु खूबु खूबु खूबु खूबु तेरो नामु ॥अंग 1137
- साच पदारथु गुरमुखि लहहु ॥अंग 1138
- सतिगुरु सेवि सरब फल पाए ॥अंग 1138
- अपणे दास कउ कंठि लगावै ॥अंग 1138
- स्रीधर मोहन सगल उपावन निरंकार सुखदाता ॥अंग 1138
- बन महि पेखिओ त्रिण महि पेखिओ ग्रिहि पेखिओ उदासाए ॥अंग 1139
- निकटि बुझै सो बुरा किउ करै ॥अंग 1139
- जिसु तू राखहि तिसु कउनु मारै ॥अंग 1139
- तउ कड़ीऐ जे होवै बाहरि ॥अंग 1140
- बिनु बाजे कैसो निरतिकारी ॥अंग 1140
- हउमै रोगु मानुख कउ दीना ॥अंग 1140
- चीति आवै तां महा अनंद ॥अंग 1141
- बापु हमारा सद चरंजीवी ॥अंग 1141
- निरवैर पुरख सतिगुर प्रभ दाते ॥अंग 1141
- सतिगुरु मेरा बेमुहताजु ॥अंग 1142
- नामु लैत मनु परगटु भइआ ॥अंग 1142
- नमसकार ता कउ लख बार ॥अंग 1142
- मोहि दुहागनि आपि सीगारी ॥अंग 1143
- चितवत पाप न आलकु आवै ॥अंग 1143
- अपणी दइआ करे सो पाए ॥अंग 1143
- नामु हमारै अंतरजामी ॥अंग 1144
- तू मेरा पिता तूहै मेरा माता ॥अंग 1144
- सभ ते ऊच जा का दरबारु ॥अंग 1144
- रोवनहारी रोजु बनाइआ ॥अंग 1145
- संत की निंदा जोनी भवना ॥अंग 1145
- नामु हमारै बेद अरु नाद ॥अंग 1145
- निरधन कउ तुम देवहु धना ॥अंग 1146
- संत मंडल महि हरि मनि वसै ॥अंग 1146
- रोगु कवनु जां राखै आपि ॥अंग 1146
- तेरी टेक रहा कलि माहि ॥अंग 1147
- प्रथमे छोडी पराई निंदा ॥अंग 1147
- सुखु नाही बहुतै धनि खाटे ॥अंग 1147
- गुर मिलि तिआगिओ दूजा भाउ ॥अंग 1147
- सभ ते ऊचा जा का नाउ ॥अंग 1148
- जिसु सिमरत मनि होइ प्रगासु ॥अंग 1148
- लाज मरै जो नामु न लेवै ॥अंग 1148
- गुर सुप्रसंन होए भउ गए ॥अंग 1149
- करण कारण समरथु गुरु मेरा ॥अंग 1149
- मनु तनु राता राम रंगि चरणे ॥अंग 1149
- नामु लैत किछु बिघनु न लागै ॥अंग 1150
- आपे सासतु आपे बेदु ॥अंग 1150
- भगता मनि आनंदु गोबिंद ॥अंग 1150
- भै कउ भउ पड़िआ सिमरत हरि नाम ॥अंग 1151
- पंच मजमी जो पंचन राखै ॥अंग 1151
- निंदक कउ फिटके संसारु ॥अंग 1151
- दुइ कर जोरि करउ अरदासि ॥अंग 1152
- सतिगुर अपुने सुनी अरदासि ॥अंग 1152
- परतिपाल प्रभ क्रिपाल कवन गुन गनी ॥अंग 1153
- जिसु नामु रिदै सोई वड राजा ॥अंग 1155
- कोटि बिसन कीने अवतार ॥अंग 1156
- सतिगुरि मो कउ कीनो दानु ॥अंग 1157
- जो पाथर कउ कहते देव ॥अंग 1160
- जल महि मीन माइआ के बेधे ॥अंग 1160
- जब लगु मेरी मेरी करै ॥अंग 1160
- सतरि सैइ सलार है जा के ॥अंग 1161
- सभु कोई चलन कहत है ऊहां ॥अंग 1161
- किउ लीजै गढु बंका भाई ॥अंग 1161
- गंग गुसाइनि गहिर गंभीर ॥अंग 1162
भगत कबीर जी (13)
- इहु धनु मेरे हरि को नाउ ॥अंग 1157
- नांगे आवनु नांगे जाना ॥अंग 1157
- मैला ब्रहमा मैला इंदु ॥अंग 1158
- मनु करि मका किबला करि देही ॥अंग 1158
- गंगा कै संगि सलिता बिगरी ॥ सो सलिता गंगा होइ निबरी ॥1॥अंग 1158
- माथे तिलकु हथि माला बानां ॥अंग 1158
- उलटि जाति कुल दोऊ बिसारी ॥अंग 1158
- निरधन आदरु कोई न देइ ॥अंग 1159
- गुर सेवा ते भगति कमाई ॥अंग 1159
- सिव की पुरी बसै बुधि सारु ॥अंग 1159
- सो मुलां जो मन सिउ लरै ॥अंग 1159
- अगम द्रुगम गड़ि रचिओ बास ॥अंग 1162
- कोटि सूर जा कै परगास ॥अंग 1162
भगत नामदेव जी (12)
- रे जिहबा करउ सत खंड ॥अंग 1163
- पर धन पर दारा परहरी ॥अंग 1163
- दूधु कटोरै गडवै पानी ॥ कपल गाइ नामै दुहि आनी ॥1॥अंग 1163
- मै बउरी मेरा रामु भतारु ॥अंग 1164
- कबहू खीरि खाड घीउ न भावै ॥अंग 1164
- हसत खेलत तेरे देहुरे आइआ ॥अंग 1164
- जैसी भूखे प्रीति अनाज ॥अंग 1164
- घर की नारि तिआगै अंधा ॥अंग 1164
- संडा मरका जाइ पुकारे ॥अंग 1165
- सुलतानु पूछै सुनु बे नामा ॥अंग 1165
- जउ गुरदेउ त मिलै मुरारि ॥अंग 1166
- आउ कलंदर केसवा ॥अंग 1167
भगत रविदास जी (1)
- बिनु देखे उपजै नही आसा ॥अंग 1167