Lulla Family

अंग 1126

अंग
1126
राग भैरों
राग: भैरों · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
साच सबद बिनु कबहु न छूटसि बिरथा जनमु भइओ ॥1॥ रहाउ ॥
तन महि कामु क्रोधु हउ ममता कठिन पीर अति भारी ॥
गुरमुखि राम जपहु रसु रसना इन बिधि तरु तू तारी ॥2॥
बहरे करन अकलि भई होछी सबद सहजु नही बूझिआ ॥
जनमु पदारथु मनमुखि हारिआ बिनु गुर अंधु न सूझिआ ॥3॥
रहै उदासु आस निरासा सहज धिआनि बैरागी ॥
प्रणवति नानक गुरमुखि छूटसि राम नामि लिव लागी ॥4॥2॥3॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: परमात्मा की सिफतसालाह से वंचित रह के (माया के मोह से। जम के जाल से) आप कभी बचा नहीं रह सकेगा। आपकी जिंदगी व्यर्थ चली जाएगी। 1। रहाउ। हे प्राणी ! आपके शरीर में काम (जोर डाल रहा) है। क्रोध (प्रबल) है। अहंकार है। मल्कियतों की तमन्ना है। इन सबकी बहुत ज्यादा पीड़ा उठ रही है (इन विकारों में डूबने से आप कैसे बचे।)। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा का भजन कर। जीभ से (सिमरन का) स्वाद ले। इन तरीकों से (इन विकारों के गहरे पानी में से सिमरन की) तारी लगा के पार हो जा। 2। हे प्राणी ! (सिफतसालाह के प्रति) आपके कान बहरे (ही रहे)। आपकी बुद्धि तुच्छ हैं गई है (थोड़ी-थोड़ी बात पर आपे से बाहर हैं जाना आपका स्वभाव बन गया है)। सिफतसालाह का शांत-रस आप समझ नहीं सका। अपने मन के पीछे लग के तूने कीमती मनुष्य-जन्म गवा लिया है। गुरू की शरण ना आने के कारण आप (आत्मिक जीवन के प्रति) अंधा ही रहा। आपको (आत्मिक जीवन की) समझ ना आई। 3। (हे प्राणी !) नानक विनती करता है (और आपको समझाता है कि) जो मनुष्य गुरू के बताए हुए रास्ते पर चलता है वह (विकारों के फंदों से) मुक्ति पा लेता है। प्रभू के नाम में उसकी सुरति टिकी रहती है। वह (दुनिया में विचरता हुआ भी दुनिया से) उपराम रहता है। आशाओं से निर्लिप रहता हहै। अडोलता की समाधि में टिका रह के वह (दुनिया से) निर्मोह रहता है। 4। 2। 3।
भैरउ महला 1 ॥
भूंडी चाल चरण कर खिसरे तुचा देह कुमलानी ॥
नेत्री धुंधि करन भए बहरे मनमुखि नामु न जानी ॥1॥
अंधुले किआ पाइआ जगि आइ ॥
रामु रिदै नही गुर की सेवा चाले मूलु गवाइ ॥1॥ रहाउ ॥
जिहवा रंगि नही हरि राती जब बोलै तब फीके ॥
संत जना की निंदा विआपसि पसू भए कदे होहि न नीके ॥2॥
अंम्रित का रसु विरली पाइआ सतिगुर मेलि मिलाए ॥
जब लगु सबद भेदु नही आइआ तब लगु कालु संताए ॥3॥
अन को दरु घरु कबहू न जानसि एको दरु सचिआरा ॥
गुर परसादि परम पदु पाइआ नानकु कहै विचारा ॥4॥3॥4॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 1॥ (हे अंधे जीव ! अब बुढ़ापे में) आपकी चाल बेढबी हैं चुकी है। आपके हाथ-पैर निढाल हैं चके हैं। आपके शरीर की चमड़ी पर झुरड़ियां पड़ रही हैं। आपकी आँखों के आगे अंधेरा होने लग पड़ा है। आपके कान बहरे हैं चुके हैं। पर अभी भी अपने मन के पीछे चल के तूने परमात्मा के नाम के साथ सांझ नहीं डाली। 1। हे (माया के मोह में) अंधे हुए जीव ! तूने जगत में जन्म ले के (आत्मिक जीवन के असली लाभ के तौर पर) कुछ भी नहीं कमाया। बल्कि तूने मूल भी गवा लिया (जो पहले कोई आत्मिक जीवन था वह भी नाश कर लिया। क्योंकि) तूने परमात्मा को अपने हृदय में नहीं बसाया। और तूने गुरू द्वारा बताए हुए कर्म नहीं किए। 1। रहाउ। (हे अंधे जीव !) आपकी जीभ प्रभू के प्यार की याद में नहीं भीगी। जब भी बोलती है फीके बोल ही बोलती है। आप सदा भले लोगों की निंदा में व्यस्त रहता है। आपके सारे काम पशुओं वाले होए हुए हैं। (इस तरह रहने से) ये कभी भी अच्छे नहीं हैं सकेंगे। 2। (पर जीवों के भी क्या वश।) आत्मिक जीवन देने वाले श्रेष्ठ नाम के जाप का स्वाद उन विरले लोगों को आता है जिन्हें (परमात्मा स्वयं) सतिगुरू की संगति में मिलाता है। मनुष्य को जब तक सिफतसालाह का रस नहीं आता तब तक (ये ऐसे काम करता रहता है जिनके कारण) इसको मौत का डर सताता रहता है। 3। नानक यह विचार की बात कहता है कि गुरू की कृपा से जो मनुष्य सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के दर पर ही टिका रहता है और परमात्मा के बिना किसी और का दरवाजा किसी और का घर नहीं तलाशता वह सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल कर लेता है। 4। 3। 4।
भैरउ महला 1 ॥
सगली रैणि सोवत गलि फाही दिनसु जंजालि गवाइआ ॥
खिनु पलु घड़ी नही प्रभु जानिआ जिनि इहु जगतु उपाइआ ॥1॥
मन रे किउ छूटसि दुखु भारी ॥
किआ ले आवसि किआ ले जावसि राम जपहु गुणकारी ॥1॥ रहाउ ॥
ऊंधउ कवलु मनमुख मति होछी मनि अंधै सिरि धंधा ॥
कालु बिकालु सदा सिरि तेरै बिनु नावै गलि फंधा ॥2॥
डगरी चाल नेत्र फुनि अंधुले सबद सुरति नही भाई ॥
सासत्र बेद त्रै गुण है माइआ अंधुलउ धंधु कमाई ॥3॥
खोइओ मूलु लाभु कह पावसि दुरमति गिआन विहूणे ॥
सबदु बीचारि राम रसु चाखिआ नानक साचि पतीणे ॥4॥4॥5॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 1॥ हे भाई ! सारी रात कामादिक विकारों की नींद में रहता है। (इन विकारों के संस्कारों के) फंदे आपके गले में पड़ते जाते हैं। सारा दिन माया कमाने के धंधों में गुजार देता है। एक छिन एक पल एक घड़ी आप उस परमात्मा के साथ सांझ नहीं डालता जिसने यह सारा संसार पैदा किया है। 1। हे मन ! आप माया के मोह का भारी दुख सह रहा है (यदि आप प्रभू सिमरन नहीं करता तो इस दुख से) कैसे निजात पाएगा। (दिन-रात माया की खातिर भटक रहा है। बता। जब पैदा हुआ था) कौन सी माया अपने साथ ले कर आया था। यहाँ से चलने के वक्त भी कोई चीज साथ ले के नहीं जा सकेगा। परमात्मा का नाम जप। यही है आत्मिक जीवन के गुण पैदा करने वाला। 1। रहाउ। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने के कारण आपका हृदय-कवल प्रभू की याद से उल्टा (बेमुख) होया हुआ है। आपकी समझ तुच्छ हुई पड़ी है। (माया के मोह में) अंधे हुए मन (की अगुवाई) के कारण आपके सिर पर माया के जंजालों की गठड़ी बंधी पड़ी है। जनम-मरन (का चक्कर) सदा आपके सिर के ऊपर टिका हुआ है। प्रभू का नाम सिमरन के बिना आपके गले में मोह के फंदे पड़े हुए हैं। 2। अकड़-भरी आपकी चाल है। आपकी आँखें भी (विकारों में) अंधी हुई पड़ी हैं। परमात्मा की सिफत-सालाह की ओर ध्यान देना आपको अच्छा नहीं लगता। वेद-शास्त्र पढ़ता हुआ भी (आप) त्रिगुणी माया के मोह में फसा हुआ है। आप (मोह में) अंधा हुआ पड़ा है। और माया की खातिर ही दौड़-भाग करता है। 3। हे ज्ञान-हीन जीव ! बुरी मति के पीछे लग के आप वह आत्मिक जीवन भी गवा बैठा है जो पहले आपके पल्ले था (यहाँ जन्म ले कर और) आत्मिक लाभ तो तूने क्या कमाना था। हे नानक ! जिन लोगों ने सिफतसालाह की बाणी को मन में बसा के प्रभू-नाम (के सिमरन) का स्वाद चखा। वह उस सदा-स्थिर प्रभू (की याद) में मस्त रहते हैं। 4। 4। 5।
भैरउ महला 1 ॥
गुर कै संगि रहै दिनु राती रामु रसनि रंगि राता ॥
अवरु न जाणसि सबदु पछाणसि अंतरि जाणि पछाता ॥1॥
सो जनु ऐसा मै मनि भावै ॥
आपु मारि अपरंपरि राता गुर की कार कमावै ॥1॥ रहाउ ॥
अंतरि बाहरि पुरखु निरंजनु आदि पुरखु आदेसो ॥
घट घट अंतरि सरब निरंतरि रवि रहिआ सचु वेसो ॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 1॥ ऐसा दास दिन-रात गुरू की संगति में रहता है (भाव। गुरू को अपने मन में बसाए रखता है)। परमात्मा (के नाम) को अपनी जीभ पर बसाए रखता है। और प्रभू के प्रेम में रंगा रहता है। वह दास सदा सिफत-सालाह के साथ सांझ डालता है (निंदा आदि किसी) और (बल) को नहीं जानता। प्रभू को अपने अंदर बसता जान के उसके साथ सांझ डाले रखता है। 1। मेरे मन में तो (परमात्मा का) ऐसा दास प्यारा लगता है जो स्वैभाव (स्वार्थ) खत्म करके बेअंत प्रभू (के प्यार) में मस्त रहता है और सतिगुरू के द्वारा बताए हुए कर्म करता है (उन पद्चिन्हों पर चलता है जो सतिगुरू ने डाले हुए हैं)। 1। रहाउ। (मुझे वह दास प्यारा लगता है जो) उस अकाल पुरख को (सदा) नमस्कार करता है जो सारे संसार का आदि है। (उस दास को परमात्मा) अंदर-बाहर हर जगह व्यापक दिखाई देता है। उस प्रभू पर माया का प्रभाव नहीं पड़ सकता। (उस सेवक को) वह सदा-स्थिर प्रभू हरेक शरीर में एक-रस सब जीवों के अंदर मौजूद प्रतीत होता है। 2।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “परमात्मा की सिफतसालाह से वंचित रह के (माया के मोह से।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।