जउ गुरदेउ बुरा भला एक ॥ जउ गुरदेउ लिलाटहि लेख ॥5॥ जउ गुरदेउ कंधु नही हिरै ॥ जउ गुरदेउ देहुरा फिरै ॥ जउ गुरदेउ त छापरि छाई ॥ जउ गुरदेउ सिहज निकसाई ॥6॥ जउ गुरदेउ त अठसठि नाइआ ॥ जउ गुरदेउ तनि चक्र लगाइआ ॥ जउ गुरदेउ त दुआदस सेवा ॥ जउ गुरदेउ सभै बिखु मेवा ॥7॥ जउ गुरदेउ त संसा टूटै ॥ जउ गुरदेउ त जम ते छूटै ॥ जउ गुरदेउ त भउजल तरै ॥ जउ गुरदेउ त जनमि न मरै ॥8॥ जउ गुरदेउ अठदस बिउहार ॥ जउ गुरदेउ अठारह भार ॥ बिनु गुरदेउ अवर नही जाई ॥ नामदेउ गुर की सरणाई ॥9॥1॥2॥11॥
नामदेव की वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं। आदि ग्रंथ में उनकी छियासठ रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।
हिन्दी अर्थ: अच्छे-बुरे सब से प्यार करता है। गुरू को मिल के ही माथे के अच्छे लेख उघड़ते हैं। 5। अगर गुरू मिल जाए तो शरीर (विकारों में पड़ के) छिॅजता नहीं (भाव। मनुष्य विकारों में प्रवृक्त नहीं होता। और ना ही उसकी सक्ता व्यर्थ जाती है); ऊँची जाति आदि के माण वाले मनुष्य गुरू की शरण आए बँदे पर दबाव नहीं डाल सकते। जैसे कि वह देहुरा नामदेव की तरफ पलट गया था जिसमें से उसे धक्के दे के निकाल दिया गया था; गुरू की शरण पड़े गरीब की रक्षा के लिए रॅब खुद पहुँचता है जैसे कि नामदेव की कुल्ली बनी थी। ईश्वर स्वयं सहाई होता है जैसे कि बादशाह के डरावे देने पर पलंग दरिया में से निकलवा दिया। 6। अगर गुरू मिल जाए तो अठारह तीर्थों का स्नान हो गया (जानो)। शरीर पर चक्कर लग गए समझो (जैसे बैरागी द्वारिका जा के लगाते हैं)। बारह ही शिव-लिंगों की पूजा हो गई समझो; उस मनुष्य के लिए सारे जहर भी मीठे फल बन जाते हैं। 7। अगर गुरू मिल जाए तो दिल के संसे मिट जाते हैं। जमों से (ही) खलासी हो जाती है। संसार-समुंद्र से मनुष्य पार लांघ जाता है। जनम-मरन से बच जाता है। 8। अगर गुरू मिल जाए तो अठारह स्मृतियों के बताए कर्म-काण्ड की आवश्यक्ता नहीं रह जाती। सारी बनस्पति ही (प्रभू-देव की नित्य भेट होती दिखाई दे जाती है)। सतिगुरू के बिना और कोई जगह नहीं (जहाँ मनुष्य जीवन का सही रास्ता पा सके)। नामदेव (और सब आसरे-सहारे छोड़ के) गुरू की शरण पड़ा है। 9। 1। 2। 11।
भैरउ बाणी रविदास जीउ की घरु 2 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ बिनु देखे उपजै नही आसा ॥ जो दीसै सो होइ बिनासा ॥ बरन सहित जो जापै नामु ॥ सो जोगी केवल निहकामु ॥1॥ परचै रामु रवै जउ कोई ॥ पारसु परसै दुबिधा न होई ॥1॥ रहाउ ॥ सो मुनि मन की दुबिधा खाइ ॥ बिनु दुआरे त्रै लोक समाइ ॥ मन का सुभाउ सभु कोई करै ॥ करता होइ सु अनभै रहै ॥2॥ फल कारन फूली बनराइ ॥ फलु लागा तब फूलु बिलाइ ॥ गिआनै कारन करम अभिआसु ॥ गिआनु भइआ तह करमह नासु ॥3॥ घ्रित कारन दधि मथै सइआन ॥ जीवत मुकत सदा निरबान ॥ कहि रविदास परम बैराग ॥ रिदै रामु की न जपसि अभाग ॥4॥1॥
भगत नामदेव महाराष्ट्र के संत थे, तेरहवीं-चौदहवीं सदी के। पंढरपुर के विट्ठल-मन्दिर से जुड़े, मगर बाद में पंजाब आ कर बसे, और गुरुदासपुर के पास उनकी समाधि है।
हिन्दी अर्थ: भैरउ बाणी रविदास जीउ की घरु 2 सतिगुर प्रसादि॥ (पर। पारस प्रभू के चरण छूने आसान काम नहीं। क्योंकि वह इन आँखों से नहीं दिखाई देता। और) उसको देखे बिना (उस पारस-प्रभू के चरण छूने की) तमन्ना पैदा नहीं होती। (इस दिखाई देते संसार के साथ ही मोह बना रहता है।) और। और यह जो कुछ दिखाई देता है यह सब नाश हो जाने वाला है। जो मनुष्य प्रभू के गुण गाता है। और। प्रभू का नाम जपता है। सिर्फ वही असल जोगी है और वह कामना-रहित हो जाता है। 1। जब कोई मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरता है तो उसका मन प्रभू में परच जाता है; जब पारस-प्रभू को वह छूता है (वह। मानो। सोना हो जाता है)। और। उसकी मेर-तेर समाप्त हो जाती है। 1। रहाउ। (नाम-सिमरन वाला) वह मनुष्य (असल) ऋषि है। वह (नाम की बरकति से) अपने मन की मेर-तेर मिटा लेता है। और उस प्रभू में समाया रहता है जिसका कोई खास शरीर नहीं। (जगत में) हरेक मनुष्य अपने-अपने मन का स्वभाव बरतता है (अपने मन के पीछे चलता है। पर नाम-सिमरन वाला मनुष्य अपने मन के पीछे चलने के जगह। नाम की बरकति से) करतार का रूप हो जाता है। और। उस अवस्था में टिका रहता है जहाँ कोई डर-भय नहीं। 2। (जगत की सारी) बनस्पति फल देने के लिए खिलती है; जब फल लगता है फूल दूर हो जाता है। इसी तरह दुनिया की रोजाना की किरत-कार ज्ञान की खातिर है (प्रभू में परचने के लिए है। उच्च-जीवन की सूझ के लिए है)। जब ऊँचे-जीवन की समझ पैदा हो जाती है। तो उस अवस्था में पहुँच के किरत-कार का (मायावी-उद्यमों का) मोह मिट जाता है। 3। समझदार स्त्री घी की खातिर दही मथती है (वैसे ही जो मनुष्य नाम जप के प्रभू-चरणों में परचता है वह जानता है कि दुनिया का जीवन-निर्वाह। दुनिया की किरत-कार प्रभू-चरणों में जुड़ने के लिए ही है। सो। वह मनुष्य नाम की बरकति से) माया की किरत-कार करता हुआ ही मुक्त होता है और सदा वासना-रहित रहता है। रविदास यह सबसे ऊँचे वैराग (की प्राप्ति) की बात बताता है; हे भाग्य-हीन ! प्रभू आपके हृदय में ही है। आप उसको क्यों याद नहीं करता। 4। 1।
नामदेव की वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं। आदि ग्रंथ में उनकी छियासठ रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।
हिन्दी अर्थ: नामदेव॥ हे (सुंदर जुल्फों वाले) कलंदर प्रभू ! हे सुंदर केशों वाले प्रभू ! आप अब्दालनी फकीरों वाला पहरावा पहन के (आया है); आईए। (स्वागत है। आ। मेरे हृदय-मस्जिद में आ बैठ)। रहाउ। (हे कलंदर ! हे केशव ! आप आ। आप) जिस ने (सात) आसमानों को कुल्ला (बना के अपने) सिर पर पहना हुआ है। जिसने सात पातालों को अपनी खड़ावें (बना के) पहनी हुई हैं। हे कलंदर-प्रभू ! सारे जीव-जंतु आपके बसने के लिए निवास-स्थान (घर) हैं। हे धरती के रक्षक ! आप इस तरह का बना हुआ है। 1। (हे कलंदर -प्रभु !) छप्पन करोड़ (मेघ माला) आपका चोग़ा है। सोलह हज़ार आलम आपका धोती है ; हे केशव ! सारी वनस्पती आपका सलोतर है। और सारा संसार आपकी सहणकी (मिट्टी की रकेबी) है । 2। (हे कलंदर प्रभू ! आ। मेरी मस्जिद में आ) मेरा शरीर (आपके लिए) मस्जिद है। मेरा मन (आपके नाम की बाँग देने वाला) मुल्ला है। और (आपके चरणों में जुड़ा रह के) अडोलता की नमाज़ पढ़ रहा है। हे सारे जगत के मालिक निरंकार ! बीबी लक्ष्मी के साथ आपका निकाह हुआ है (भाव। यह सारी माया आपके चरणों की ही दासी है)। 3। (हे कलंदर प्रभू !) मुझे भगती करते को तूने मन्दिर में से निकलवाया। (आपको छोड़ के मैं और) किस के आगे दिल की बातें करूँ। (हे भाई !) नामदेव का मालिक-परमात्मा हरेक जीव के अंदर की जानने वाला है। और सारे देशों में व्यापक है। 4। 1।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
भगत नामदेव महाराष्ट्र के संत थे, तेरहवीं-चौदहवीं सदी के। पंढरपुर के विट्ठल-मन्दिर से जुड़े, मगर बाद में पंजाब आ कर बसे। उनकी वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।