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अंग 1128

अंग
1128
राग भैरों
राग: भैरों · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
इसु गरब ते चलहि बहुतु विकारा ॥1॥ रहाउ ॥
चारे वरन आखै सभु कोई ॥
ब्रहमु बिंद ते सभ ओपति होई ॥2॥
माटी एक सगल संसारा ॥
बहु बिधि भांडे घड़ै कुम॑ारा ॥3॥
पंच ततु मिलि देही का आकारा ॥
घटि वधि को करै बीचारा ॥4॥
कहतु नानक इहु जीउ करम बंधु होई ॥
बिनु सतिगुर भेटे मुकति न होई ॥5॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: इस गुमान-अहंकार से (भाईचारिक जीवन में) कई बुराईयाँ आरम्भ हो जाती हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! हरेक मनुष्य यही कहता है कि (ब्राहमण। क्षत्रिय। वैश्य व शूद्र ये) चारों ही (अलग-अलग) वर्ण हैं। (पर। ये लोग यह नहीं समझते कि) परमात्मा की ज्योति-रूप असल से ही सारी सृष्टि पैदा होती है। 2। हे भाई ! (जैसे कोई) कुम्हार एक ही मिट्टी से कई किस्मों के बर्तन घड़ लेता है। (वैसे ही) यह संसार है (परमात्मा ने अपनी ही ज्योति से बनाया है)। 3। हे भाई ! पाँच तत्व मिल के शरीर की शक्ल बनती है। कोई ये नहीं कह सकता कि किसी (एक वर्ण) में बहुत तत्व हैं। और किसी (दूसरे वरण) में थोड़े तत्व हैं। 4। नानक कहता है- (चाहे कोई ब्राहमण है। चाहे कोई शूद्र है) हरेक जीव अपने-अपने किए कर्मों (के संस्कारों) का बँधा हुआ है। गुरू को मिले बिना (किए हुए कर्मों के संस्कारों के बँधनों से) मुक्ति नहीं होती। 5। 1।
भैरउ महला 3 ॥
जोगी ग्रिही पंडित भेखधारी ॥
ए सूते अपणै अहंकारी ॥1॥
माइआ मदि माता रहिआ सोइ ॥
जागतु रहै न मूसै कोइ ॥1॥ रहाउ ॥
सो जागै जिसु सतिगुरु मिलै ॥
पंच दूत ओहु वसगति करै ॥2॥
सो जागै जो ततु बीचारै ॥
आपि मरै अवरा नह मारै ॥3॥
सो जागै जो एको जाणै ॥
परकिरति छोडै ततु पछाणै ॥4॥
चहु वरना विचि जागै कोइ ॥
जमै कालै ते छूटै सोइ ॥5॥
कहत नानक जनु जागै सोइ ॥
गिआन अंजनु जा की नेत्री होइ ॥6॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 3॥ हे भाई ! जोगी। गृहस्ती। पण्डित। भेषों वाले साधू – ये सभी अपने-अपने (किसी) अहंकार में (पड़ कर प्रभू की याद से) गाफिल हुए रहते हैं। 1। हे भाई ! जीव माया के (मोह के) नशे में मस्त हो के प्रभू की याद से गाफिल हुआ रहता है (और। इस के आत्मिक जीवन की राशि-पूँजी को कामादिक लूटते रहते हैं)। पर जो मनुष्य (प्रभू की याद की बरकति से) सचेत रहता है। उसको कोई विकार लूट नहीं सकता। 1। रहाउ। हे भाई ! सिर्फ वह मनुष्य सचेत रहता है जिसको गुरू मिल जाता है। वह मनुष्य (सिमरन की बरकति से) कामादिक पाँचों वैरियों को अपने वश में करे रखता है। 2। हे भाई ! सिर्फ वह मनुष्य सचेत रहता है। जो परमात्मा के गुणों को अपने मन में बसाता है। वह मनुष्य (विकारों से) अपने आप को बचाए रखता है। वह मनुष्य और पर जोर-जबरदस्ती नहीं करता। 3। हे भाई ! सिर्फ वह मनुष्य (माया के मोह की नींद से) सचेत रहता है जो सिर्फ परमात्मा के साथ गहरी सांझ डालता है। जो माया (के मोह) को त्यागता है। और अपने असले-प्रभू के साथ जान-पहचान बनाता है। 4। हे भाई ! (कोई ब्राहमण हो क्षत्रिय हो वैश्य हो व शूद्र हो) चारों वरणों में कोई विरला (माया के मोह की नींद से) सचेत रहता है (किसी खास वर्ण का कोई लिहाज़ नहीं)। (जो जागता है। वह) आत्मिक मौत से बचा रहता है। 5। नानक कहता है-वह मनुष्य माया के मोह की नींद से जागता है जिसकी आँखों में आत्मिक जीवन की सूझ का सुरमा पड़ा होता है। 6। 2।
भैरउ महला 3 ॥
जा कउ राखै अपणी सरणाई ॥
साचे लागै साचा फलु पाई ॥1॥
रे जन कै सिउ करहु पुकारा ॥
हुकमे होआ हुकमे वरतारा ॥1॥ रहाउ ॥
एहु आकारु तेरा है धारा ॥
खिन महि बिनसै करत न लागै बारा ॥2॥
करि प्रसादु इकु खेलु दिखाइआ ॥
गुर किरपा ते परम पदु पाइआ ॥3॥
कहत नानकु मारि जीवाले सोइ ॥
ऐसा बूझहु भरमि न भूलहु कोइ ॥4॥3॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 3॥ हे भाई ! परमात्मा जिस मनुष्य को अपने चरणों में जोड़े रखता है। वह मनुष्य सदा-स्थिर हरी-नाम में जुड़ा रहता है। वह मनुष्य सदा कायम रहने वाला हरी-नाम हासिल करता है। 1। हे भाई ! (कोई मुश्किल आने पर आप परमात्मा को छोड़ कर) किसी और के आगे तरले ना करते फिरो। परमात्मा के हुकम में ही जगत बना है। उसके हुकम में ही हरेक घटना घटित हो रही है। 1। रहाउ। हे प्रभू ! ये सारा जगत आपके ही आसरे है। (जब आप चाहे) यह एक छिन में नाश हैं जाता है। इसको पैदा करते हुए (आपको) समय नहीं लगता। 2। हे भाई ! (परमात्मा ने) मेहर करके (जिस मनुष्य को यह संसार) ये तमाशा सा ही दिखा दिया है। वह मनुष्य गुरू की कृपा से सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल कर लेता है। 3। नानक कहता है- (हे भाई !) वह (परमात्मा) ही (जीवों को) मारता है और जिंदा रखता है। इस तरह (अस्लियत को) समझो। और। कोई भी भटकना में पड़ कर गलत रास्ते पर ना पड़ो। 4। 3।
भैरउ महला 3 ॥
मै कामणि मेरा कंतु करतारु ॥
जेहा कराए तेहा करी सीगारु ॥1॥
जां तिसु भावै तां करे भोगु ॥
तनु मनु साचे साहिब जोगु ॥1॥ रहाउ ॥
उसतति निंदा करे किआ कोई ॥
जां आपे वरतै एको सोई ॥2॥
गुर परसादी पिरम कसाई ॥
मिलउगी दइआल पंच सबद वजाई ॥3॥
भनति नानकु करे किआ कोइ ॥
जिस नो आपि मिलावै सोइ ॥4॥4॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 3॥ हे सखी ! मैं (जीव-) स्त्री हूँ। करतार मेरा पति है। मैं वैसा ही श्रृंगार करती हूँ जैसे खुद करवाता है (मैं अपने जीवन को उतना ही सुंदर बना सकती हूँ। जितना वह बनवाता है)। 1। हे सखी ! मैं अपना तन अपना मन सदा कायम रहने वाले मालिक प्रभू के हवाले कर चुकी हूँ। जब उसकी रजा होती है मुझे अपने चरणों में जोड़ लेता है। 1। रहाउ। किसी की की हुई उस्तति अथवा निंदा का अब मेरे पर कोई असर नहीं पड़ता। हे सखी ! जब (अब मुझे निश्चय हो गया है कि) एक परमात्मा ही सबमें बैठा प्रेरणा कर रहा है (उस्तति करने वालों में भी वही। निंदा करन वालों में भी वही)। 2। हे सखी ! गुरू की कृपा से (मेरे अंदर प्रभू-पति के लिए) प्यार की कसक बन गई है। अब मैं उस दया के श्रोत प्रभू को पूर्ण खिड़ाव आनंद के साथ मिलती हूँ। 3। नानक कहता है- (हे सखी !) कोई और जीव उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। जिस जीव को वह प्रभू स्वयं ही अपने चरणों में जोड़ लेता है। 4। 4।
भैरउ महला 3 ॥
सो मुनि जि मन की दुबिधा मारे ॥
दुबिधा मारि ब्रहमु बीचारे ॥1॥
इसु मन कउ कोई खोजहु भाई ॥
मनु खोजत नामु नउ निधि पाई ॥1॥ रहाउ ॥
मूलु मोहु करि करतै जगतु उपाइआ ॥
ममता लाइ भरमि भोुलाइआ ॥2॥
इसु मन ते सभ पिंड पराणा ॥
मन कै वीचारि हुकमु बुझि समाणा ॥3॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 3॥ हे भाई ! असल मौनधारी साधू वह है जो (अपने) मन की दुविधा मिटा देता है। और दोचिक्तापन (मेर-तेर) मिटा के (उस मेर-तेर की जगह) परमात्मा को (अपने) मन में बसाता है। 1। हे भाई ! अपने इस मन को खोजते रहा करो। मन (की दौड़-भाग) की पड़ताल करते हुए परमात्मा का नाम मिल जाता है। यह नाम ही (मानो) धरती के नौ खजाने हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! (जगत रचना के) आदि मोह को बना के करतार ने जगत पैदा किया। जीवों में ममता चिपका के (माया की खातिर) भटकना में डाल के (उसने स्वयं ही) गलत रास्ते पर डाल दिया। 2। हे भाई ! यह मन (के मेर-तेर ममता आदि के संस्कारों) से ही सारा जनम-मरण का सिलसला बनता है। मन के (सही) विचारों से परमात्मा की रज़ा को समझ के जीव परमात्मा में लीन हो जाता है। 3।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “इस गुमान-अहंकार से (भाईचारिक जीवन में) कई बुराईयाँ आरम्भ हो जाती हैं।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।