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अंग 1164

अंग
1164
राग भैरों
राग: भैरों · रचयिता: Bhagat Naam Dev Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
नामे हरि का दरसनु भइआ ॥4॥3॥
भगत नामदेव महाराष्ट्र के संत थे, तेरहवीं-चौदहवीं सदी के। पंढरपुर के विट्ठल-मन्दिर से जुड़े, मगर बाद में पंजाब आ कर बसे, और गुरुदासपुर के पास उनकी समाधि है।

हिन्दी अर्थ: (उस स्वै-स्वरूप में) मुझ (नामे) को परमात्मा का दीदार हुआ। 4। 3।
मै बउरी मेरा रामु भतारु ॥
रचि रचि ता कउ करउ सिंगारु ॥1॥
भले निंदउ भले निंदउ भले निंदउ लोगु ॥
तनु मनु राम पिआरे जोगु ॥1॥ रहाउ ॥
बादु बिबादु काहू सिउ न कीजै ॥
रसना राम रसाइनु पीजै ॥2॥
अब जीअ जानि ऐसी बनि आई ॥
मिलउ गुपाल नीसानु बजाई ॥3॥
उसतति निंदा करै नरु कोई ॥
नामे स्रीरंगु भेटल सोई ॥4॥4॥
नामदेव की वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं। आदि ग्रंथ में उनकी छियासठ रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।

हिन्दी अर्थ: (मैं अपने प्रभू-पति की नारि बन चुकी हूँ) प्रभू में पति है और मैं (उसकी खातिर) कमली हो रही हूँ। उसको मिलने के लिए मैं (भगती और भले गुणों के) सुंदर-सुंदर श्रृंगार कर रही हूँ। 1। अब जगत बेशक मुझे बुरा कहे जाए (ना मेरे कान ये निंदा सुनने की परवाह करते हैं; ना मेरा मन निंदा सुन के दुखी होता है)। मेरा तन। मेरा मन मेरे प्यारे प्रभू के हो चुके हैं। 1। रहाउ। (कोई निंदा करता रहे) किसी के साथ झगड़ा करने की आवश्यक्ता नहीं। जीभ से प्रभू के नाम का श्रेष्ठ अमृत पीना चाहिए। 2। अब हृदय में प्रभू के साथ जान-पहचान करके (मेरे अंदर) ऐसी हालत बन गई है कि मैं लोगों की निंदा से बेपरवाह हो के अपने प्रभू को मिल रही हूँ। 3। कोई मुझे अच्छा कहे। चाहे कोई बुरा कहे (इस बात की मुझै परवाह नहीं रही)। मुझे नामे को (लक्ष्मी का पति) परमात्मा मिल गया है। 4। 4।
कबहू खीरि खाड घीउ न भावै ॥
कबहू घर घर टूक मगावै ॥
कबहू कूरनु चने बिनावै ॥1॥
जिउ रामु राखै तिउ रहीऐ रे भाई ॥
हरि की महिमा किछु कथनु न जाई ॥1॥ रहाउ ॥
कबहू तुरे तुरंग नचावै ॥
कबहू पाइ पनहीओ न पावै ॥2॥
कबहू खाट सुपेदी सुवावै ॥
कबहू भूमि पैआरु न पावै ॥3॥
भनति नामदेउ इकु नामु निसतारै ॥
जिह गुरु मिलै तिह पारि उतारै ॥4॥5॥
भगत नामदेव महाराष्ट्र के संत थे, तेरहवीं-चौदहवीं सदी के। पंढरपुर के विट्ठल-मन्दिर से जुड़े, मगर बाद में पंजाब आ कर बसे, और गुरुदासपुर के पास उनकी समाधि है।

हिन्दी अर्थ: कभी (कोई जीव ऐसी मौज में है कि उसको) खीर। खंड। घी (जैसे स्वादिष्ट पदार्थ) भी अच्छे नहीं लगते; पर कभी (उससे) घर-घर के टुकड़े मंगवाता है (कभी उसको मँगता बना देता है। और वह घर-घर टुकड़े माँगता फिरता है)। कभी (उससे) कचरे फलुरवाता है। और (उनमें से) दाने चुनवाता है। 1। हे भाई ! जिस हालत में परमात्मा (हम जीवों को) रखता है उसी हालत में (अमीरी की अकड़ और गरीबी की घबराहट से निर्लिप) रहना चाहिए। ये बात बताई नहीं जा सकती कि परमात्मा कितना बड़ा है (हमारे दुखों-सुखों का भेद वही जानता है)। 1। रहाउ। कभी (कोई मनुष्य इतना अमीर है कि वह) सुंदर घोड़े नचाता है (भाव। कभी उसके पास इतनी सुंदर चाल वाले घोड़े हैं कि चलने के वक्त। मानो। वह नाच रहे हैं)। पर कभी उसके पैरों को जूती (पहनने के लिए) भी नहीं मिलती। 2। कभी किसी मनुष्य को सफेद बिछौने वाले पलंघों पर सुलाता है। पर कभी उसको जमीन पर (बिछाने के लिए) पराली भी नहीं मिलती। 3। नामदेव कहता है- प्रभू का एक नाम ही है जो (इन दोनों हालातों से अछोह रख के) पार लंघाता है। जिस मनुष्य को गुरू मिलता है उसको प्रभू (अमीरी की आकड़ और गरीबी की घबराहट) से पार उतारता है। 4। 5।
हसत खेलत तेरे देहुरे आइआ ॥
भगति करत नामा पकरि उठाइआ ॥1॥
हीनड़ी जाति मेरी जादिम राइआ ॥
छीपे के जनमि काहे कउ आइआ ॥1॥ रहाउ ॥
लै कमली चलिओ पलटाइ ॥
देहुरै पाछै बैठा जाइ ॥2॥
जिउ जिउ नामा हरि गुण उचरै ॥
भगत जनां कउ देहुरा फिरै ॥3॥6॥
नामदेव की वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं। आदि ग्रंथ में उनकी छियासठ रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।

हिन्दी अर्थ: मैं बड़े चाव से आपके अंदर आया था। पर (चुँकि ये लोग ‘मेरी जाति हीनड़ी’ समझते हैं। इन लोगों ने) मुझे नामे को भगती करते को (बाँह से) पकड़ कर (मन्दिर में से) उठा दिया। 1। (लोग) मेरी जाति को बड़ी नीच (कहते हैं)। हे प्रभू ! मैं छींबे (धोबी) के घर क्यों पैदा हो गया। 1। रहाउ। मैं अपनी कंबली ले के (वहाँ से) वापस चल पड़ा। और (हे प्रभू !) मैं आपके मन्दिर के पिछली तरफ जा के बैठ गया। 2। (पर प्रभू की आश्चर्यजनक लीला हुई) ज्यों-ज्यों नामा अपने प्रभू के गुण गाता है। (उसका) मन्दिर (उसके) भगतों की खातिर। (उसके) सेवकों की खातिर फिरता जा रहा है। 3। 6।
भैरउ नामदेउ जीउ घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जैसी भूखे प्रीति अनाज ॥
त्रिखावंत जल सेती काज ॥
जैसी मूड़ कुटंब पराइण ॥
ऐसी नामे प्रीति नराइण ॥1॥
नामे प्रीति नाराइण लागी ॥
सहज सुभाइ भइओ बैरागी ॥1॥ रहाउ ॥
जैसी पर पुरखा रत नारी ॥
लोभी नरु धन का हितकारी ॥
कामी पुरख कामनी पिआरी ॥
ऐसी नामे प्रीति मुरारी ॥2॥
साई प्रीति जि आपे लाए ॥
गुर परसादी दुबिधा जाए ॥
कबहु न तूटसि रहिआ समाइ ॥
नामे चितु लाइआ सचि नाइ ॥3॥
जैसी प्रीति बारिक अरु माता ॥
ऐसा हरि सेती मनु राता ॥
प्रणवै नामदेउ लागी प्रीति ॥
गोबिदु बसै हमारै चीति ॥4॥1॥7॥
भगत नामदेव महाराष्ट्र के संत थे, तेरहवीं-चौदहवीं सदी के। पंढरपुर के विट्ठल-मन्दिर से जुड़े, मगर बाद में पंजाब आ कर बसे, और गुरुदासपुर के पास उनकी समाधि है।

हिन्दी अर्थ: भैरउ नामदेउ जीउ घरु 2 सतिगुर प्रसादि॥ जैसे भूखे मनुष्य को अन्न प्यारा लगता है। जैसे प्यासे को पानी की आवश्यक्ता होती है। जैसे कोई मूर्ख अपने परिवार पर आश्रित हो जाता है। वैसे ही (मुझ) नामे का प्रभू के साथ प्यार है। 1। (मेरी) नामदेव की प्रीति परमात्मा के साथ लग गई है। (उस प्रीति की बरकति से। नामदेव) किसी बाहरी भेष आदि को अपनाए बिना ही बैरागी बन गया है। 1। रहाउ। जैसे कोई नारि पराए मनुष्य के साथ प्यार डाल लेती है। जैसे किसी लोभी मनुष्य को धन प्यारा लगता है। जैसे किसी विषयी बँदे को स्त्री अच्छी लगती है। वैसे ही नामे को परमात्मा मीठा लगता है। 2। पर असल सच्चा प्यारा वह है जो प्रभू सवयं (किसी मनुष्य के हृदय में) पैदा करे। उस मनुष्य की मेर-तेर गुरू की कृपा से मिट जाती है। उसका प्रभू से प्रेम कभी टूटता नहीं। हर वक्त वह प्रभू-चरणों में जुड़ा रहता है। (मुझ नामे पर भी प्रभू की मेहर हुई है और) नामे का चित्त सदा कायम रहने वाले हरी-नाम में टिक गया है। 3। जैसे माता-पुत्र का प्यार होता है। वैसे मेरा मन प्रभू ! (-चरणों) के साथ रंगा गया है। नामदेव विनती करता है- मेरी प्रभू के साथ प्रीति लग गई है। प्रभू (अब सदा) अब मेरे चित्त में बसता है। 4। 1। 7।
घर की नारि तिआगै अंधा ॥
नामदेव की वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं। आदि ग्रंथ में उनकी छियासठ रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।

हिन्दी अर्थ: अंधा (पापी) अपनी पत्नी का त्याग कर देता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

नामदेव के बारे में परम्परा कहती है कि उनके स्पर्श से एक मन्दिर का दरवाज़ा घूम कर उनकी ओर हो गया। आदि ग्रंथ में उनकी कई रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(उस स्वै-स्वरूप में) मुझ (नामे) को परमात्मा का दीदार हुआ।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।