नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: जो लोग सदा-स्थिर प्रभू (के प्यार) में मस्त रहते हैं। जिनकी जीभ पर आत्मिक जीवन देने वाला नाम टिका रहता है। झूठ की मैल उनके अंदर रक्ती भर भी नहीं होती। वह लोग पवित्र नाम (जपते हैं)। आत्मिक जीवन देने वाले नाम का स्वाद चखते हैं। सिफतसालाह की बाणी में मस्त रहते हैं। और (लोक-परलोक में) इज्जत कमाते हैं। 3। गुणवान (सेवक) गुणवान (सेवक) को मिल के (नाम-सिमरन की सांझ बना के) प्रभू-नाम का लाभ कमाता है। गुरू के बताए हुए रास्ते पर चल के नाम में जुड़ के आदर पाता है। गुरू की बताई हुई कार कर के उसके सारे दुख दूर हो जाते हैं; हे नानक ! प्रभू का नाम उसका (सदा का) मित्र बन जाता हहै। 4। 5। 6।
भैरउ महला 1 ॥ हिरदै नामु सरब धनु धारणु गुर परसादी पाईऐ ॥ अमर पदारथ ते किरतारथ सहज धिआनि लिव लाईऐ ॥1॥ मन रे राम भगति चितु लाईऐ ॥ गुरमुखि राम नामु जपि हिरदै सहज सेती घरि जाईऐ ॥1॥ रहाउ ॥ भरमु भेदु भउ कबहु न छूटसि आवत जात न जानी ॥ बिनु हरि नाम को मुकति न पावसि डूबि मुए बिनु पानी ॥2॥ धंधा करत सगली पति खोवसि भरमु न मिटसि गवारा ॥ बिनु गुर सबद मुकति नही कब ही अंधुले धंधु पसारा ॥3॥ अकुल निरंजन सिउ मनु मानिआ मन ही ते मनु मूआ ॥ अंतरि बाहरि एको जानिआ नानक अवरु न दूआ ॥4॥6॥7॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 1॥ (जैसे दुनिया वाला धन-पदार्थ इन्सान की शारीरिक आवश्यक्ताएं पूरी करता है। वैसे ही) परमात्मा का नाम हृदय में टिकाना सब जीवों के लिए (आत्मिक आवश्यक्ताएं पूरी करने के लिए) धन है (आत्मिक जीवन का) सहारा बनता है। (पर यह धन) गुरू की कृपा से मिलता है। आत्मिक जीवन देने वाले इस कीमती धन की बरकति से कामयाब जिंदगी वाले बना जाता है। आत्मिक अडोलता के ठहराव में टिके रह के सुरति (प्रभू-चरणों में) जुड़ी रहती है। 1। हे मन ! परमात्मा की भक्ति में जुड़ना चाहिए। हे मन ! गुरू के बताए हुए जीवन राह पर चल कर परमात्मा का नाम हृदय में सिमर। (इस तरह) शांति वाला जीवन गुजारते हुए परमात्मा के चरणों में पहुँचा जाता है। 1। रहाउ। (परमात्मा का नाम-सिमरन के बिना) भटकना। प्रभू से दूरी। डर-सहम कभी समाप्त नहीं होता। जनम-मरण का चक्कर बना रहता है। (सही जीवन की) समझ नहीं पड़ती। प्रभू का नाम सिमरन के बिना कोई व्यक्ति (माया की तृष्णा से) खलासी नहीं प्राप्त कर सकता। (विकारों के पानी में) गोते खा-खा के आत्मिक मौत सहेड़ लेता है। विषियों से भी तृप्ति नहीं होती। 2। हे मूर्ख (मन !) (निरी) माया की खातिर दौड़-भाग करते हुए आप अपनी इज्जत गवा लेगा। (इस तरह) आपकी भटकना समाप्त नहीं होगी। हे अंधे (मन !) गुरू के शबद (के साथ प्यार करने) के बिना (माया की तृष्णा से) कभी निजात नहीं मिलेगी। यह दौड़-भाग बनी रहेगी। सुरति का बिखराव बना रहेगा। 3। जो मन उस प्रभू के साथ लग जाता है जो माया के प्रभाव से परे है और जिसकी कोई खास कुल नहीं। मायावी फुरनों के प्रति उस मन का चाव-उत्साह ही समाप्त हो जाता है। हे नानक ! वह मन अपने अंदर के सारे संसार में एक परमात्मा को ही पहचानता है। उस प्रभू के बिना कोई और उसको नहीं सूझता। 4। 6। 7।
भैरउ महला 1 ॥ जगन होम पुंन तप पूजा देह दुखी नित दूख सहै ॥ राम नाम बिनु मुकति न पावसि मुकति नामि गुरमुखि लहै ॥1॥ राम नाम बिनु बिरथे जगि जनमा ॥ बिखु खावै बिखु बोली बोलै बिनु नावै निहफलु मरि भ्रमना ॥1॥ रहाउ ॥ पुसतक पाठ बिआकरण वखाणै संधिआ करम तिकाल करै ॥ बिनु गुर सबद मुकति कहा प्राणी राम नाम बिनु उरझि मरै ॥2॥ डंड कमंडल सिखा सूतु धोती तीरथि गवनु अति भ्रमनु करै ॥ राम नाम बिनु सांति न आवै जपि हरि हरि नामु सु पारि परै ॥3॥ जटा मुकटु तनि भसम लगाई बसत्र छोडि तनि नगनु भइआ ॥ राम नाम बिनु त्रिपति न आवै किरत कै बांधै भेखु भइआ ॥4॥ जेते जीअ जंत जलि थलि महीअलि जत्र कत्र तू सरब जीआ ॥ गुर परसादि राखि ले जन कउ हरि रसु नानक झोलि पीआ ॥5॥7॥8॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 1॥ (विकारों से और विकारों से पैदा हुए दुखों से) खलासी कोई मनुष्य परमात्मा के नाम का सिमरन किए बिना नहीं पा सकता। ये मुक्ति (खलासी) गुरू की शरण पड़ के प्रभू-नाम में जुड़ने से ही मिलती है। (जो मनुष्य प्रभू का सिमरन नहीं करता तो) यज्ञ-हवन। पुन्य-दान। तप-पूजा आदि कर्म करने से शरीर (फिर भी) दुखी ही रहता है दुख ही सहता है। 1। परमात्मा का नाम जपने से वंचित रह के मनुष्य का जगत में जनम (लेना) व्यर्थ हो जाता है। जो मनुष्य विषियों का जहर खाता रहता है। विषियों की नित्य बातें करता रहता है और प्रभू सिमरन से खाली रहता है। उसकी जिंदगी बेकार बनी रहती है वह आत्मिक मौत मर जाता है और सदा भटकता रहता है। 1। रहाउ। (पण्डित संस्कृत) पुस्तकों के पाठ और व्याकरण आदि (अपने विद्यार्थियों आदि को) समझाता है। तीनों वक्त (हर रोज) संध्या कर्म भी करता है। पर। हे प्राणी ! गुरू के शबद के बिना उसको (विषियों के जहर से) खलासी बिल्कुल नहीं मिल सकती। परमात्मा के नाम से वंचित हो के वह विकारों में फसा रह के आत्मिक मौत सहेड़ लेता है। 2। (जोगी हाथ में) डंडा और खप्पर पकड़ लेता है। ब्राहमण चोटी रखता है। जनेऊ और धोती पहनता है। (योगी) तीर्थ-यात्रा और धरती-भ्रमण करता है। (पर इन कामों से) परमात्मा के नाम सिमरन के बिना (मन को) शांति नहीं आ सकती । जो मनुष्य हरी का नाम सदा सिमरता है। वह (विषौ-विकारों के समुंद्र से) पार लांघ जाता है। 3। जटाओं का जूड़ा कर लिया। शरीर पर राख मल ली। तन पर से कपड़े उतार के नंगा रहने लग पड़ा। पिछले किए कर्मों के संस्कारों में बंधे हुए के लिए (यह सारा आडंबर) निरा बाहरी धार्मिक लिबास ही है। प्रभू का नाम जपे बिना माया की तृष्णा से मन तृप्त नहीं होता। 4। (पर। हे प्रभू ! जीवों के कुछ वश नहीं है) पानी में धरती में आकाश में जितने भी जीव बसते हैं सबमें आप स्वयं ही हर जगह मौजूद है। हे नानक ! जिस जीव को प्रभू गुरू की कृपा से (विषौ-विकारों से) बचाता है वह परमात्मा के नाम का रस बड़े स्वाद से पीता है। 5। 7। 8।
रागु भैरउ महला 3 चउपदे घरु 1 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ जाति का गरबु न करीअहु कोई ॥ ब्रहमु बिंदे सो ब्राहमणु होई ॥1॥ जाति का गरबु न करि मूरख गवारा ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: रागु भैरउ महला 3 चउपदे घरु 1 सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! कोई भी पक्ष (ऊँची) जाति का मान ना करना। (‘जाति’ के आसरे ब्राहमण नहीं बना जा सकता) (दरअसल) ब्राहमण वह मनुष्य है जो ब्रहम (परमात्मा) के साथ गहरी सांझ पा लेता है। 1। हे मूर्ख ! हे गवार ! (ऊँची) जाति का मान ना कर।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जो लोग सदा-स्थिर प्रभू (के प्यार) में मस्त रहते हैं।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।