भैरउ महला 5 घरु 1 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ सगली थीति पासि डारि राखी ॥ असटम थीति गोविंद जनमा सी ॥1॥ भरमि भूले नर करत कचराइण ॥ जनम मरण ते रहत नाराइण ॥1॥ रहाउ ॥ करि पंजीरु खवाइओ चोर ॥ ओहु जनमि न मरै रे साकत ढोर ॥2॥ सगल पराध देहि लोरोनी ॥ सो मुखु जलउ जितु कहहि ठाकुरु जोनी ॥3॥ जनमि न मरै न आवै न जाइ ॥ नानक का प्रभु रहिओ समाइ ॥4॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5 घरु 1 सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! (आपकी यह बात कच्ची है कि) परमात्मा ने और सारी तिथियां एक तरफ रख दीं। और (भाद्रों वदी) अष्टमी तिथि को उसने जनम ले लिया। 1। भटकना के कारण गलत रास्ते पर पड़े हुए हे मनुष्य ! आप ये कच्ची बातें कर रहा है (कि परमात्मा ने भादरों वदी अष्टमी को कृष्ण-रूप में जन्म लिया)। परमात्मा जन्म-मरण से परे है। 1। रहाउ। हे भाई ! पंजीरी बना के आप छुपा के (अपनी ओर से परमात्मा को कृष्ण-मूर्ति के रूप में) खिलाता है। हे रॅब से टूटे हुए मूर्ख ! परमात्मा ना पैदा होता है ना मरता है। 2। हे भाई ! आप (कृष्ण-मूर्ति को) लोरी देता है (अपनी ओर से परमात्मा को लोरी देता है। आपका यह काम) सारे अपराधों (का मूल है)। जल जाए (आपका) वह मुँह जिससे आप कहता है कि मालिक-प्रभू जूनियों में आता है। 3। वह ना पैदा होता है ना मरता है। ना आता है ना जाता है। हे भाई ! नानक का परमात्मा सब जगह व्यापक है।4। 1।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ तब उसको किसी किस्म का कोई (मौत आदि का) डर नहीं व्याप सकता; वह उठते-बैठते हर वक्त आत्मिक आनंद में रहता है। हे भाई ! जब कोई मनुष्य ऐसा समझ लेता है (कि परमात्मा ही सबका रखवाला है) 1। हे भाई ! हम जीवों का रखवाला एक मालिक-प्रभू ही है। हमारा वह मालिक सब जीवों के दिल की जानने वाला है। 1। रहाउ। तब वह मनुष्य निश्चिंत हो के सोता है निश्चिंत हो के जागता है। हे भाई ! (जब कोई मनुष्य यह समझ लेता है कि परमात्मा ही सब जीवों का रक्षक है। तब मनुष्य हर समय ये कहने लग जाता है कि हे स्वामी !) आप प्रभू ही हर जगह मौजूद है। 2। वह मनुष्य अपने घर में (भी) सुखी बसता है। वह घर से बाहर (जा के) भी आनंद पाता है। हे नानक ! कह-गुरू ने जिस मनुष्य के हृदय में (ये) उपदेश दृढ़ कर दिया (कि परमात्मा ही हम जीवों का रखवाला है।) 3। 2।
भैरउ महला 5 ॥ वरत न रहउ न मह रमदाना ॥ तिसु सेवी जो रखै निदाना ॥1॥ एकु गुसाई अलहु मेरा ॥ हिंदू तुरक दुहां नेबेरा ॥1॥ रहाउ ॥ हज काबै जाउ न तीरथ पूजा ॥ एको सेवी अवरु न दूजा ॥2॥ पूजा करउ न निवाज गुजारउ ॥ एक निरंकार ले रिदै नमसकारउ ॥3॥ ना हम हिंदू न मुसलमान ॥ अलह राम के पिंडु परान ॥4॥ कहु कबीर इहु कीआ वखाना ॥ गुर पीर मिलि खुदि खसमु पछाना ॥5॥3॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! ना मैं (हिन्दू के) व्रतों का आसरा लेता हूँ। ना मैं (मुसलमान के) रमज़ान के महीने (में रखे रोज़ों का)। मैं तो (सिर्फ) उस परमात्मा को सिमरता हूँ जो आख़ीर में रक्शा करता है। 1। मेरा तो सिर्फ वह है (जिसको हिन्दू) गोसाई (कहता है और जिसको मुसलमान) अल्लाह (कहता है)। हे भाई ! (आत्मिक जीवन की अगुवाई के संबंध में) मैंने हिन्दू और मुसलमान दानों से नाता खत्म कर लिया है।1। रहाउ। मैं ना तो (मुसलमानों की तरह) काबे का हज करने जाता हूँ। ना ही मैं (हिंदूओं की तरह) तीर्थों की यात्रा करने जाता हूँ। मैं तो (सिर्फ) परमात्मा को सिमरता हूँ। किसी और दूसरे को नहीं। 2। हे भाई ! मैं ना (हिन्दुओं की तरह वेद-) पूजा करता हूँ। ना (मुसलमान की तरह) नमाज़ पढ़ता हूँ। 3। हे भाई ! (आत्मिक जीवन की अगुवाई के लिए) ना हम हिन्दू (के मुथाज) हैं। ना ही मुसलमान (के मुथाज) हैं। हमारे ये शरीर हमारे ये प्राण (उस परमात्मा) के दिए हुए हैं (जिसको मुसलमान) अल्लाह (कहता है। जिसको हिन्दू) राम (कहता है)। 4। हे कबीर ! कह- (हे भाई !) मैं तो ये बात खोल के बताता हूँ कि मैं अपने गुरू-पीर को मिल के अपने पति-प्रभू के साथ गहरी सांझ (नज़दीकी) बना रखी है। 5। 3।
भैरउ महला 5 ॥ दस मिरगी सहजे बंधि आनी ॥ पांच मिरग बेधे सिव की बानी ॥1॥ संतसंगि ले चड़िओ सिकार ॥ म्रिग पकरे बिनु घोर हथीआर ॥1॥ रहाउ ॥ आखेर बिरति बाहरि आइओ धाइ ॥ अहेरा पाइओ घर कै गांइ ॥2॥ म्रिग पकरे घरि आणे हाटि ॥ चुख चुख ले गए बांढे बाटि ॥3॥ एहु अहेरा कीनो दानु ॥ नानक कै घरि केवल नामु ॥4॥4॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! (संत जनों की सहायता से। साध-संगति की बरकति से) आत्मिक अडोलता में टिक के मैं दसों हिरनों (इन्द्रियों) को बाँध के ले आया (वश में कर लिया)। अचूक निशाने वाले गुरू-शबद के तीरों से मैंने पाँच (कामादिक) हिरन (भी) भेद लिए। 1। हे भाई ! संत जनों को साथ ले के मैं शिकार खेलने निकल पड़ा (साध-संगति में टिक के मैं कामादिक हिरनों को पकड़ने की तैयारी कर ली)। बिनां घोड़ों के बिना हथियारों के (वह कामादिक) हिरन मैंने पकड़ लिए (वश में कर लिए)। 1। रहाउ। हे भाई ! (साध-संगति की बरकति से। संतजनों की सहायता से) विषौ-विकारों का शिकार खेलने वाला स्वभाव (बिरती मेरे अंदर से) दौड़ के बाहर निकल गई। (जिस मन को पकड़ना था वह मन-) शिकार मुझे अपने शरीर के अंदर ही मिल गया (और। मैं उसको काबू कर लिया)। 2। हे भाई ! (पाँचों) हिरनों को पकड़ कर अपने घर ले आया। अपनी दुकान में ले आया। (संत जन उनको) रक्ती-रक्ती कर के (मेरे अंदर से) दूर जगह ले गए (मेरे अंदर से संत जनों ने पाँचों धार्मिक हिरनों को बिल्कुल ही निकाल दिया)। 3। हे भाई ! संत जनों ने ये पकड़ा हुआ शिकार (ये वश में किया हुआ मेरा मन) मुझे बख्शिश के तौर पर दे दिया। अब मुझ नानक के हृदय में सिर्फ परमात्मा का नाम ही नाम है (मन वश में आ गया है। और कामादिक भी अपना जोर नहीं डाल सकते)। 4। 4।
भैरउ महला 5 ॥ जे सउ लोचि लोचि खावाइआ ॥ साकत हरि हरि चीति न आइआ ॥1॥ संत जना की लेहु मते ॥ साधसंगि पावहु परम गते ॥1॥ रहाउ ॥ पाथर कउ बहु नीरु पवाइआ ॥ नह भीगै अधिक सूकाइआ ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य को अगर सौ बार भी बड़ी तमन्ना से (उसका आत्मिक जीवन कायम रखने के लिए नाम-) भोजन खिलाने का यतन किया जाए। तो भी उसके चित्त में परमात्मा का नाम (-भोजन) टिक नहीं सकता। 1। हे भाई ! (परमात्मा के चरणों से टूटे हुए बंदों की संगति करने की जगह) संतजनों से (सही जीवन-जुगति की) शिक्षा लिया करो। संत जनों की संगति में (रह के) आप सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त कर लेंगे। 1। रहाउ। हे भाई ! अगर किसी पत्थर पर बहुत सारा पानी फेंका जाए। (तो भी वह पत्थर अंदर से) भीगता नहीं। (अंदर से वह) बिल्कुल सूखा ही रहता है (यही हाल है साकत का)। 2।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “भैरउ महला 5 घरु 1 सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! (आपकी यह बात कच्ची है कि) परमात्मा ने और सारी तिथियां एक तरफ रख दीं।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।