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अंग 1141

अंग
1141
राग भैरों
राग: भैरों · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रोग बंध रहनु रती न पावै ॥
बिनु सतिगुर रोगु कतहि न जावै ॥3॥
पारब्रहमि जिसु कीनी दइआ ॥
बाह पकड़ि रोगहु कढि लइआ ॥
तूटे बंधन साधसंगु पाइआ ॥
कहु नानक गुरि रोगु मिटाइआ ॥4॥7॥20॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: रोग के बँधनों के कारण (जूनियों में) भटकने से रक्ती भर भी खलासी नहीं मिल सकती। हे भाई ! गुरू की शरण के बिना (यह) रोग किसी तरह भी दूर नहीं होता। 3। हे भाई ! जिस मनुष्य पर परमात्मा ने मेहर कर दी। उसको उसने बाँह पकड़ के रोगों से बचा लिया। जब उसने गुरू की संगति प्राप्त की। उसके (आत्मिक रोगों के सारे) बँधन टूट गए। हे नानक ! कह- (जो भी मनुष्य गुरू की शरण पड़ा।) गुरू ने (उसका) रोग मिटा दिया। 4। 7। 20।
भैरउ महला 5 ॥
चीति आवै तां महा अनंद ॥
चीति आवै तां सभि दुख भंज ॥
चीति आवै तां सरधा पूरी ॥
चीति आवै तां कबहि न झूरी ॥1॥
अंतरि राम राइ प्रगटे आइ ॥
गुरि पूरै दीओ रंगु लाइ ॥1॥ रहाउ ॥
चीति आवै तां सरब को राजा ॥
चीति आवै तां पूरे काजा ॥
चीति आवै तां रंगि गुलाल ॥
चीति आवै तां सदा निहाल ॥2॥
चीति आवै तां सद धनवंता ॥
चीति आवै तां सद निभरंता ॥
चीति आवै तां सभि रंग माणे ॥
चीति आवै तां चूकी काणे ॥3॥
चीति आवै तां सहज घरु पाइआ ॥
चीति आवै तां सुंनि समाइआ ॥
चीति आवै सद कीरतनु करता ॥
मनु मानिआ नानक भगवंता ॥4॥8॥21॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! (जब किसी मनुष्य के) हृदय में परमात्मा आ बसता है। तब उसके अंदर बड़ा आनंद बन जाता है। तब उसके सारे दुखों का नाश हो जाता है। तब उसकी हरेक आशा पूरी हो जाती है। तब वह कभी भी कोई चिंता-फिक्र नहीं करता। 1। हे भाई ! पूरे गुरू से जिस मनुष्य के हृदय में प्रभू-पातशाह प्रकट हो जाता है। उसके अंदर रंग लगा देता है (आत्मिक आनंद बना देता है)। 1। रहाउ। हे भाई ! (जब किसी मनुष्य के) हृदय में परमात्मा आ बसता है। तब वह (मानो) सबका राजा बन जाता है। तब उसके सारे काम सफल हो जाते हैं। तब वह गाढ़े आत्मिक आनंद में मस्त रहता है। तब वह सदा प्रसन्न-चित्त रहता है। 2। हे भाई ! (जब परमात्मा किसी मनुष्य के) हृदय में आ बसता है। त बवह सदा के लिए नाम-धन का शाह बन जाता है। तब वह सदा के लिए माया की खातिर भटकना से बच जाता है। त बवह सारे (आत्मिक) आनंद भोगता है। तब उसे किसी की मुथाजी नहीं रह जाती। 3। हे भाई ! (जब परमात्मा किसी मनुष्य के) हृदय में आ प्रकट होता है। तब वह मनुष्य आत्मिक अडोलता का ठिकाना पा लेता है। तब वह उस आत्मिक अवस्था में लीन रहता है जहाँ माया वाले फुरने नहीं उठते। तबवह सदा परमात्मा की सिफत-सालाह करता है। हे नानक ! तब उसका मन परमात्मा के साथ पतीज जाता है। 4। 8। 21।
भैरउ महला 5 ॥
बापु हमारा सद चरंजीवी ॥
भाई हमारे सद ही जीवी ॥
मीत हमारे सदा अबिनासी ॥
कुटंबु हमारा निज घरि वासी ॥1॥
हम सुखु पाइआ तां सभहि सुहेले ॥
गुरि पूरै पिता संगि मेले ॥1॥ रहाउ ॥
मंदर मेरे सभ ते ऊचे ॥
देस मेरे बेअंत अपूछे ॥
राजु हमारा सद ही निहचलु ॥
मालु हमारा अखूटु अबेचलु ॥2॥
सोभा मेरी सभ जुग अंतरि ॥
बाज हमारी थान थनंतरि ॥
कीरति हमरी घरि घरि होई ॥
भगति हमारी सभनी लोई ॥3॥
पिता हमारे प्रगटे माझ ॥
पिता पूत रलि कीनी सांझ ॥
कहु नानक जउ पिता पतीने ॥
पिता पूत एकै रंगि लीने ॥4॥9॥22॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! (जब पूरे गुरू ने मुझे प्रभू-पिता के साथ मिला दिया। तब मुझे निश्चय हो गया कि) हम जीवों का प्रभू-पिता सदा कायम रहने वाला है। मेरे साथ आत्मिक सांझ रखने वाले भी सदा ही आत्मिक जीवन वाले बन गए। मेरे साथ हरी-नाम सिमरन का प्रेम रखने वाले सदा के लिए अटल जीवन वाले हो गए। (सारी इन्द्रियों का) मेरा परिवार प्रभू-चरणों में टिके रहने वाला बन गया। 1। हे भाई ! जब पूरे गुरू ने मुझे प्रभू-पिता के साथ मिला दिया। मुझे आत्मिक आनंद प्राप्त हो गया। तब (मेरे साथ संबंध रखने वाले मित्र। भाई सारे इन्द्रियां- यह) सारे ही (आत्मिक आनंद की बरकति से) सुखी हो गए। 1। रहाउ। हे भाई ! (जब पूरे गुरू ने मुझे प्रभू-पिता के साथ मिला दिया। तब मेरी जिंद के टिके रहने वाले) ठिकाने सारी (मायावी प्रेरणाओं) से ऊँचे हो गए कि यम-राज वहाँ कुछ पूछने के लायक ही ना रहा। तब मेरी अपनी इन्द्रियों पर हकूमत सदा के लिए अॅटल हो गई। तब मेरे पास इतना नाम-खजाना इकट्ठा हो गया। जो खत्म ही ना हो सके। जो सदा के लिए कायम रहे। 2। हे भाई ! (जब पूरे गुरू ने मुझे प्रभू-पिता के साथ मिला दिया। मुझे समझ आ गई कि यह जो प्रभू की शोभा) सारे युगों में हो रही है मेरे वास्ते भी यही शोभा है मेरे लिए भी यही है। (यह जो) सब लोगों में (प्रभू की) भक्ति हो रही है मेरे लिए भी यही है (प्रभू-चरणों में मिलाप की बरकति से मुझे किसी शोभा मशहूरी कीर्ति आदर-मान की वासना नहीं रही) (यह जो) हरेक जगह में (प्रभू की) कीर्ति हो रही है। (यह जो) हरेक घर में (प्रभू की) सिफत-सालाह हो रही है। 3। हे भाई ! (जब पूरे गुरू ने मुझे प्रभू-पिता के साथ मिला दिया) प्रभू-पिता मेरे हृदय में प्रकट हो गए। प्रभू-पिता ने मेरे साथ इस तरह प्यार डाल लिया जैसे पिता अपने पुत्र के साथ प्यार बनाता है। हे नानक ! कह-जब पिता-प्रभू (अपने किसी पुत्र पर) दयावान होता है। तब प्रभू-पिता और जीव-पुत्र एक ही प्यार में एक-मेक हो जाते हैं। 4। 9। 22।
भैरउ महला 5 ॥
निरवैर पुरख सतिगुर प्रभ दाते ॥
हम अपराधी तुम॑ बखसाते ॥
जिसु पापी कउ मिलै न ढोई ॥
सरणि आवै तां निरमलु होई ॥1॥
सुखु पाइआ सतिगुरू मनाइ ॥
सभ फल पाए गुरू धिआइ ॥1॥ रहाउ ॥
पारब्रहम सतिगुर आदेसु ॥
मनु तनु तेरा सभु तेरा देसु ॥
चूका पड़दा तां नदरी आइआ ॥
खसमु तूहै सभना के राइआ ॥2॥
तिसु भाणा सूके कासट हरिआ ॥
तिसु भाणा तां थल सिरि सरिआ ॥
तिसु भाणा तां सभि फल पाए ॥
चिंत गई लगि सतिगुर पाए ॥3॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे किसी से वैर ना रखने वाले गुरू पुरख ! हे दातार प्रभू ! हम (जीव) भूल (-चूक) करने वाले हैं। आप (हमारी) भूलें बख्शने वाले हैं। हे सतिगुरू ! जिस पापी को और कहीं आसरा नहीं मिलता। जब वह आपकी शरण आ जाता है। तब वह पवित्र जीवन वाला बन जाता है। 1। हे भाई ! गुरू को हृदय में बसा के (मनुष्य) सारे (इच्छित) फल हासिल कर लेता है। गुरू को प्रसन्न करके (मनुष्य) आत्मिक आनंद प्राप्त कर लेता है। 1। रहाउ। हे गुरू ! हे प्रभू ! (आपको मेरी) नमस्कार है। (हम जीवों का यह) मन (यह) तन आपका ही दिया हुआ है (जो कुछ दिखाई दे रहा है) सारा आपका ही देश है (हर जगह आप ही बस रहा है)। (जब किसी जीव के अंदर से माया के मोह का) पर्दा गिर जाता है तब आप उसको दिखाई दे जाता है। हे सब जीवों के पातशाह ! आप (सबका) पति है। 2। हे भाई ! यदि उस प्रभू को ठीक लगे तो सूखे काष्ठ हरे हो जाते हैं। थल पर सरोवर बन जाता है। जब कोई मनुष्य उस प्रभू को अच्छा लग जाए। तब वह सारे फल प्राप्त कर लेता है। गुरू के चरणों में लग के (उसके अंदर से) चिंता दूर हो जाता है। 3।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रोग के बँधनों के कारण (जूनियों में) भटकने से रक्ती भर भी खलासी नहीं मिल सकती।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।