मालु लेउ तउ दोजकि परउ ॥
दीनु छोडि दुनीआ कउ भरउ ॥11॥
पावहु बेड़ी हाथहु ताल ॥
नामा गावै गुन गोपाल ॥12॥
गंग जमुन जउ उलटी बहै ॥
तउ नामा हरि करता रहै ॥13॥
सात घड़ी जब बीती सुणी ॥
अजहु न आइओ त्रिभवण धणी ॥14॥
पाखंतण बाज बजाइला ॥
गरुड़ चड़॑े गोबिंद आइला ॥15॥
अपने भगत परि की प्रतिपाल ॥
गरुड़ चड़॑े आए गोपाल ॥16॥
कहहि त धरणि इकोडी करउ ॥
कहहि त ले करि ऊपरि धरउ ॥17॥
कहहि त मुई गऊ देउ जीआइ ॥
सभु कोई देखै पतीआइ ॥18॥
नामा प्रणवै सेल मसेल ॥
गऊ दुहाई बछरा मेलि ॥19॥
दूधहि दुहि जब मटुकी भरी ॥
ले बादिसाह के आगे धरी ॥20॥
बादिसाहु महल महि जाइ ॥
अउघट की घट लागी आइ ॥21॥
काजी मुलां बिनती फुरमाइ ॥
बखसी हिंदू मै तेरी गाइ ॥22॥
नामा कहै सुनहु बादिसाह ॥
इहु किछु पतीआ मुझै दिखाइ ॥23॥
इस पतीआ का इहै परवानु ॥
साचि सीलि चालहु सुलितान ॥24॥
नामदेउ सभ रहिआ समाइ ॥
मिलि हिंदू सभ नामे पहि जाहि ॥25॥
जउ अब की बार न जीवै गाइ ॥
त नामदेव का पतीआ जाइ ॥26॥
नामे की कीरति रही संसारि ॥
भगत जनां ले उधरिआ पारि ॥27॥
सगल कलेस निंदक भइआ खेदु ॥
नामे नाराइन नाही भेदु ॥28॥1॥10॥
जउ गुरदेउ त मिलै मुरारि ॥
जउ गुरदेउ त उतरै पारि ॥
जउ गुरदेउ त बैकुंठ तरै ॥
जउ गुरदेउ त जीवत मरै ॥1॥
सति सति सति सति सति गुरदेव ॥
झूठु झूठु झूठु झूठु आन सभ सेव ॥1॥ रहाउ ॥
जउ गुरदेउ त नामु द्रिड़ावै ॥
जउ गुरदेउ न दह दिस धावै ॥
जउ गुरदेउ पंच ते दूरि ॥
जउ गुरदेउ न मरिबो झूरि ॥2॥
जउ गुरदेउ त अंम्रित बानी ॥
जउ गुरदेउ त अकथ कहानी ॥
जउ गुरदेउ त अंम्रित देह ॥
जउ गुरदेउ नामु जपि लेहि ॥3॥
जउ गुरदेउ भवन त्रै सूझै ॥
जउ गुरदेउ ऊच पद बूझै ॥
जउ गुरदेउ त सीसु अकासि ॥
जउ गुरदेउ सदा साबासि ॥4॥
जउ गुरदेउ सदा बैरागी ॥
जउ गुरदेउ पर निंदा तिआगी ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
नामदेव के बारे में परम्परा कहती है कि उनके स्पर्श से एक मन्दिर का दरवाज़ा घूम कर उनकी ओर हो गया। आदि ग्रंथ में उनकी कई रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “नामदेव के बराबर का तोल के सोना ले लो (और इसे छोड़ दो)।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।