लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish

02 / श्वास

श्वास को जानिए।
जल्दी मत कीजिए।

श्वास परिचित है। उसी परिचय में थोड़ा ध्यान जोड़िए: पहले देखना, फिर सहज क्रम समझना। शुरुआत के इन अभ्यासों में कुम्भक नहीं है।

सहज श्वास से शुरू करें

सहज श्वास से शुरू कीजिए, या कोई दूसरा आरम्भिक अभ्यास चुनिए। एक बार में एक निर्देश खोलिए और जितना सहज लगे, उतना ही कीजिए।

श्वास को नियंत्रित करने से बेचैनी, चक्कर या साँस फूलना हो तो रुककर सामान्य श्वास पर लौटें। पहले सामान्य सावधानियाँ पढ़ लें।

मूल अभ्यास-दर्शिका का प्रसंग

सहज शुरुआत, स्पष्ट समझ

अपनी साँस से मुलाक़ात

साँस तो साथ रहती है; उसकी ख़बर लेने की फ़ुर्सत कम मिलती है। प्राण योग की परम्परा में व्यापक अर्थ रखता है, उसे केवल भीतर आने वाली हवा कह देने से बात अधूरी रह जाती है। यहाँ शुरुआत उस अनुभव से कीजिए जो अभी उपलब्ध है: आराम से बैठना, साँस को पहचानना और बेवजह का ज़ोर छोड़ देना।

आसन के बाद का प्रसंग

योगसूत्र 2.49 से 50 में आसन के बाद श्वास-प्रश्वास की गति और देश, काल, संख्या का प्रसंग आता है। यह क्रम बताता है कि प्राणायाम ध्यानपूर्वक सीखा जाने वाला अनुशासन है। यहाँ शुरुआती अभ्यास के लिए स्थिर कुर्सी और आरामदेह बैठना चुना गया है।

पूरक, रेचक और कुम्भक

श्वास भीतर लेने को पूरक, बाहर छोड़ने को रेचक और रोकने को कुम्भक कहते हैं। शब्द परिचित हों तब भी रोकने की अवधि अपने आप तय न करें। तीनों आरम्भिक अभ्यास कुम्भक के बिना हैं।

गिनती का लिहाज़, सहजता का भी

जहाँ समान गिनती दी है, उससे क्रम समझने में मदद मिलती है। मगर गिनती पूरी करने के लिए साँस को खींचना या बेचैनी सहना मुनासिब नहीं। जब ज़रूरत हो, हाथ नीचे रख दीजिए और साँस को अपनी रवानी में लौटने दीजिए।

योगसूत्र 2.49 से 50 और नीचे दिए हठयोग तथा आधुनिक शिक्षण-संदर्भ।

श्वास को नियंत्रित करने से बेचैनी, चक्कर या साँस फूलना हो तो रुककर सामान्य श्वास पर लौटें। पहले सामान्य सावधानियाँ पढ़ लें।

स्वाभाविक श्वास का अवलोकन
01

सहज शुरुआत

सहज श्वास का अवलोकन

पहले जो चल रहा है, उसे देखिए

बैठिए और आती-जाती साँस को पहचानिए। देखने के लिए उसे बदलना आवश्यक नहीं।

तैयारी

आराम से बैठें। पैर पूरे सहारे पर हों, हाथ जाँघों पर रखें और आँखें खुली या नज़र हल्की नीची रखें।

कैसे करें

  1. अगली साँस भीतर आते और बाहर जाते हुए देखें। उसकी गति या गहराई न बदलें।
  2. जबड़ा और कंधे ढीले होने दें। अधिक हवा भरने की कोशिश न करें।
  3. ध्यान भटके तो यह पहचानकर धीरे साँस के स्पर्श पर लौट आएँ।
  4. अंत में तलवों और कुर्सी के सहारे को फिर महसूस करें।

श्वास और मात्रा
कुछ सहज श्वास तक रहें। न कोई निश्चित गिनती, न साँस रोकना।

अभ्यास को समझिए

अभ्यास में मन का भटकना भी दिखाई देता है। उसे देखकर लौट आना इस आरम्भिक अभ्यास का हिस्सा है। यहाँ किसी विशेष अनुभव, शून्यता या विचाररहित दशा को पैदा करने का निर्देश नहीं है।

मौलिक रूप से तैयार आरम्भिक अभ्यास।

परिचय और स्रोत
ध्यान का खुला वृत्त; कोई निर्धारित गति नहीं
ध्यान का खुला वृत्त; कोई निर्धारित गति नहीं।

यहीं से क्यों

साँस को सँवारने से पहले उससे परिचय हो सकता है। नीचे दिया अभ्यास उसकी अपनी गति और गहराई को रहने देता है। साँस पर ध्यान असहज लगे तो पाँवों या कुर्सी के सहारे पर लौट आइए। उठने से पहले कोई विशेष अनुभव हासिल करना ज़रूरी नहीं।

अवलोकन और नियमन

साँस को देखना और उसकी चाल बदलना अलग बातें हैं। बिहार योग की चर्चा प्राण की पहचान के लिए श्वास के अवलोकन से आरम्भ करती है; ICYER की प्रस्तुति भी मनन में श्वास की सजगता का स्थान रखती है। स्वाभाविक श्वास का अवलोकन उसी सहज प्रवेश का अवसर है। इसे प्राणायाम की हर शास्त्रीय विधि का पर्याय न समझिए।

ध्यान के लिए एक वैकल्पिक वृत्त

ध्यान टिकाने में सहारा मिले तो बिन्दु स्वयं चलाइए। वृत्त श्वास की गति निर्धारित नहीं करता और साँस को मापता नहीं है।

स्रोत और दायरा

आधार-संस्करण

YOGA, October 2020

पाठ-स्थान

  1. YOGA, October 2020

    “Importance of Breath Awareness”, छपे पृष्ठ 36 से 38।

    बिहार स्कूल ऑफ़ योग। “श्वास-सजगता का महत्त्व”, पृष्ठ 36 से 38; “भ्रामरी”, पृष्ठ 49 से 50। शिक्षण के कथन चिकित्सकीय दावों के रूप में नहीं लिए गए।

  2. Basic Practice of Some Pranayamas

    “Pranayamas for contemplation and meditation”, पीडीएफ पृष्ठ 5।

    आनन्द बालयोगी भवनानी, इंटरनेशनल सेंटर फ़ॉर योग एजुकेशन एंड रिसर्च। पृष्ठ-संख्या पीडीएफ की है; हाथ की स्थितियों के वर्णन अलग से मिलाए गए हैं।

दायरा

आधुनिक आरम्भिक रूप का परिचय, पूरे मार्गदर्शन और स्रोतों की तुलना सहित।

सीमाएँ और पाठ-भेद

ऊपर की चर्चा में महत्त्वपूर्ण भेद स्पष्ट हैं। पारम्परिक व्याख्या और कहे गए फल अपने स्रोतों के कथन हैं, चिकित्सकीय प्रमाण नहीं। समीक्षा: 11 सितम्बर 2026।

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अगला निर्देश

अनुलोम विलोम
02

सहज शुरुआत

अनुलोम-विलोम की सहज शुरुआत

नासिकाओं का क्रम बदलना · बिना कुम्भक

स्पर्श हल्का हो और साँस शांत। एक पूरा चक्र ध्यान से करना तेज़ी से कई चक्र करने से अधिक उपयोगी शुरुआत है।

तैयारी

सीधे बैठें। बायाँ हाथ जाँघ पर रखें। दाएँ हाथ की तर्जनी और मध्यमा भीतर मोड़ें। अंगूठे से दायीं नासिका और अनामिका व छोटी उँगली से बायीं नासिका को हल्का बंद करें। इस हाथ की स्थिति को विष्णु मुद्रा कहते हैं।

कैसे करें

  1. अंगूठे से दायीं नासिका बंद करके बायीं से साँस लें।
  2. अनामिका और छोटी उँगली से बायीं नासिका बंद करें। अंगूठा हटाकर दायीं से साँस छोड़ें।
  3. दायीं से साँस लें। फिर उसे बंद करके बायीं से साँस छोड़ें।
  4. यह एक चक्र हुआ। उँगलियों का दबाव हल्का और साँस की गति सहज रहे; बीच में साँस न रोकें।

श्वास और मात्रा
सहज, समान गिनती पर 4 चक्र से शुरू करें। गिनती निभाने के लिए साँस को खींचें नहीं।

अभ्यास को समझिए

नाड़ीशोधन और अनुलोम-विलोम नाम अलग शिक्षण-परम्पराओं में कुछ भिन्न क्रमों के लिए भी मिलते हैं। यहाँ केवल नासिकाओं को बारी-बारी बदलने का सरल रूप दिया है। इसे अनुपात, बन्ध या कुम्भक वाले पूर्ण पारम्परिक क्रम का स्थानापन्न न मानें।

स्वामी सत्यानन्द सरस्वती, आसन प्राणायाम मुद्रा बन्ध, नाड़ीशोधन प्रकरण: आधुनिक शिक्षण-संदर्भ। यहाँ दिया प्रारम्भिक रूप कुम्भक के बिना है।

परिचय और स्रोत

इस क्रम का दायरा

नीचे पूरा अभ्यास बिना कुम्भक के है। बायीं और दायीं नासिका से होकर क्रम अपनी आरम्भिक ओर लौटता है। चार चक्रों का सुझाव इस पुस्तकालय के आरम्भिक परिचय से है; सामान्य योग प्रोटोकॉल में पाँच चक्र हैं। दोनों की गिनती को एक ही उद्धरण न समझिए।

नाम और हाथ की स्थिति

सामान्य योग प्रोटोकॉल नाड़ीशोधन और अनुलोम विलोम को साथ रखता है। दूसरी शिक्षण-परम्पराएँ इन नामों के अन्तर्गत चरणों और विधियों का भेद करती हैं। यहाँ की उँगलियों की स्थिति शिवानन्द परम्परा में विष्णु मुद्रा और 2026 के प्रोटोकॉल में नासाग्र मुद्रा कहलाती है। नाम के साथ हाथ और श्वास का वास्तविक क्रम भी देखिए।

स्रोत और दायरा

आधार-संस्करण

Common Yoga Protocol (2026)

पाठ-स्थान

  1. Common Yoga Protocol (2026)

    नाडीशोधन / अनुलोम विलोम, छपे पृष्ठ 41 से 42।

    आयुष मंत्रालय, भारत सरकार। आधुनिक शिक्षण-प्रोटोकॉल।

  2. The Sivananda Companion to Yoga

    “The Vishnu Mudra”, छपा पृष्ठ 73।

    शिवानन्द योग वेदान्त केन्द्र, 1983; “The Vishnu Mudra”, छपा पृष्ठ 73। संस्करण की स्कैन प्रति फ़्रेंड्स ऑफ़ तिबेत की साइट पर है।

  3. Hatha Yoga Pradipika, chapter 2

    अध्याय 2, संस्कृत श्लोक 2.10; शास्त्रीय विधि में कुम्भक भी है।

    स्वात्माराम; संस्कृत मूल और पंचम सिंह का 1914 का अंग्रेज़ी अनुवाद। श्लोक-संख्या संस्कृत पाठ के अनुसार है।

दायरा

आधुनिक आरम्भिक रूप का परिचय, पूरे मार्गदर्शन और स्रोतों की तुलना सहित।

सीमाएँ और पाठ-भेद

ऊपर की चर्चा में महत्त्वपूर्ण भेद स्पष्ट हैं। पारम्परिक व्याख्या और कहे गए फल अपने स्रोतों के कथन हैं, चिकित्सकीय प्रमाण नहीं। समीक्षा: 11 सितम्बर 2026।

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अगला निर्देश

शीतली
03

सहज शुरुआत

शीतली और सीत्कारी

मुख से सहज पूरक, नासिका से रेचक

जीभ की सहज नली से श्वास भीतर लें और नाक से धीरे छोड़ें। जीभ न मुड़े तो उसके लिए भी सरल विकल्प है।

शीतली और सीत्कारी। जीभ की सहज नली से श्वास भीतर लें और नाक से धीरे छोड़ें। जीभ न मुड़े तो उसके लिए भी सरल विकल्प है।
मुख से श्वास लें, फिर मुख बंद करके नाक से छोड़ें। जीभ को ज़बरदस्ती न मोड़ें और साँस न रोकें।

तैयारी

सीधे और सहज बैठें। हाथ ढीले रखें। यदि स्वाभाविक रूप से सम्भव हो तो जीभ के दोनों किनारे मोड़कर छोटी नली बनाएँ।

कैसे करें

  1. मुड़ी हुई जीभ को होंठों के बीच थोड़ा बाहर लाएँ।
  2. उस नली से धीरे साँस भीतर लें।
  3. मुख बंद करके दोनों नासिकाओं से सहज साँस छोड़ें। बीच में न रोकें।
  4. जीभ न मुड़े तो सीत्कारी का विकल्प लें: दाँत हल्के अलग रखें, जीभ उनके पीछे रहे और दाँतों के बीच से साँस लें। फिर मुख बंद करके नाक से छोड़ें।

श्वास और मात्रा
4 चक्र से शुरू करें।

अभ्यास को समझिए

शीतली और सीत्कारी के नाम हवा के मुख से प्रवेश की अलग विधियों को बताते हैं। पारम्परिक हठयोग के वर्णन में आगे कुम्भक भी आता है। आरम्भिक रूप उस अंश को छोड़ देता है; इसे किसी रोग या बुखार का उपचार न मानें।

हठयोगप्रदीपिका 2.54 से 58: सीत्कारी और शीतली का पारम्परिक संदर्भ। यहाँ कुम्भक हटाकर सहज आरम्भिक रूप दिया है।

परिचय और स्रोत

आकृति, अनुभूति और नाम

शीतली में भीतर आती हवा को मुड़ी हुई जीभ से मार्ग मिलता है; बाहर जाती साँस नाक से लौटती है। नाम और शीतलता का पारम्परिक वर्णन अभ्यास की पहचान कराते हैं। उनसे ज्वर, मधुमेह या किसी दूसरे रोग के उपचार का निष्कर्ष नहीं निकलता।

विधि के साथ उसका स्रोत

हठयोगप्रदीपिका में सीत्कारी के बाद शीतली आती है और उसके वर्णन में कुम्भक भी है। सामान्य योग प्रोटोकॉल आधुनिक आरम्भिक क्रम देता है। इस पुस्तकालय का पूरा आरम्भिक परिचय बिना कुम्भक के और अपने चार चक्रों के सुझाव सहित नीचे रखा है। सीत्कारी का विकल्प भी यहीं बना हुआ है; उसके अलग पृष्ठ पर दोनों का भेद पढ़ सकते हैं।

स्रोत और दायरा

आधार-संस्करण

Hatha Yoga Pradipika, chapter 2

पाठ-स्थान

  1. Hatha Yoga Pradipika, chapter 2

    अध्याय 2, संस्कृत श्लोक 2.54 से 58।

    स्वात्माराम; संस्कृत मूल और पंचम सिंह का 1914 का अंग्रेज़ी अनुवाद। श्लोक-संख्या संस्कृत पाठ के अनुसार है।

  2. Common Yoga Protocol (2026)

    शीतली, छपे पृष्ठ 43 से 44।

    आयुष मंत्रालय, भारत सरकार। आधुनिक शिक्षण-प्रोटोकॉल।

  3. The Science of Pranayama

    अध्याय 4, “Sitali”।

    स्वामी शिवानन्द; डिवाइन लाइफ़ सोसाइटी, सोलहवाँ संस्करण 1997, अधिकृत वेब संस्करण 2000। पारम्परिक शिक्षण, चिकित्सकीय प्रमाण नहीं।

दायरा

आधुनिक आरम्भिक रूप का परिचय, पूरे मार्गदर्शन और स्रोतों की तुलना सहित।

सीमाएँ और पाठ-भेद

ऊपर की चर्चा में महत्त्वपूर्ण भेद स्पष्ट हैं। पारम्परिक व्याख्या और कहे गए फल अपने स्रोतों के कथन हैं, चिकित्सकीय प्रमाण नहीं। समीक्षा: 11 सितम्बर 2026।

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अगला निर्देश

सीत्कारी

यहाँ का सहज विकल्प

शीतली-परिचय में जीभ न मुड़ने पर सीत्कारी का विकल्प है: जीभ हल्के खुले दाँतों के पीछे रहती है और भीतर आती साँस दाँतों के बीच से गुजरती है। उसी परिचय के अनुसार मुख बन्द करके नाक से सहज रेचक होता है। कुम्भक न जोड़िए। जीभ का आकार, सीत्कार की आवाज़ या साँस की लम्बाई ज़ोर लगाकर बनाने की आवश्यकता नहीं।

पूरा प्रसंग साथ रखिए

नीचे शीतली-परिचय के पूरे निर्देश, सहज विकल्प और सावधानियाँ फिर दिए हैं, जिससे यह विकल्प अपने प्रसंग से न कटे। ठण्डी हवा से दाँत या गला चुभना, खुला मुँह रखने से दमे की तकलीफ़ बढ़ना और चक्कर आना उसी परिचय की सावधानियाँ हैं। पारम्परिक पाठों की तुलना समझने के लिए है; उससे अभ्यास की नई समय-सारिणी नहीं बनाई गई है।

अभ्यास का पूरा मार्गदर्शन

03

सहज शुरुआत

शीतली और सीत्कारी

मुख से सहज पूरक, नासिका से रेचक

जीभ की सहज नली से श्वास भीतर लें और नाक से धीरे छोड़ें। जीभ न मुड़े तो उसके लिए भी सरल विकल्प है।

शीतली और सीत्कारी। जीभ की सहज नली से श्वास भीतर लें और नाक से धीरे छोड़ें। जीभ न मुड़े तो उसके लिए भी सरल विकल्प है।
मुख से श्वास लें, फिर मुख बंद करके नाक से छोड़ें। जीभ को ज़बरदस्ती न मोड़ें और साँस न रोकें।

तैयारी

सीधे और सहज बैठें। हाथ ढीले रखें। यदि स्वाभाविक रूप से सम्भव हो तो जीभ के दोनों किनारे मोड़कर छोटी नली बनाएँ।

कैसे करें

  1. मुड़ी हुई जीभ को होंठों के बीच थोड़ा बाहर लाएँ।
  2. उस नली से धीरे साँस भीतर लें।
  3. मुख बंद करके दोनों नासिकाओं से सहज साँस छोड़ें। बीच में न रोकें।
  4. जीभ न मुड़े तो सीत्कारी का विकल्प लें: दाँत हल्के अलग रखें, जीभ उनके पीछे रहे और दाँतों के बीच से साँस लें। फिर मुख बंद करके नाक से छोड़ें।

श्वास और मात्रा
4 चक्र से शुरू करें।

अभ्यास को समझिए

शीतली और सीत्कारी के नाम हवा के मुख से प्रवेश की अलग विधियों को बताते हैं। पारम्परिक हठयोग के वर्णन में आगे कुम्भक भी आता है। आरम्भिक रूप उस अंश को छोड़ देता है; इसे किसी रोग या बुखार का उपचार न मानें।

हठयोगप्रदीपिका 2.54 से 58: सीत्कारी और शीतली का पारम्परिक संदर्भ। यहाँ कुम्भक हटाकर सहज आरम्भिक रूप दिया है।

परिचय और स्रोत

शीतली से इसका भेद

सीत्कारी में हवा दाँतों के पास के खुले मार्ग से आती है; शीतली की तरह जीभ की नली बनाना उसकी पहचान नहीं। हठयोगप्रदीपिका मुख की ध्वनि और नाक से रेचक बताती है। शिवानन्द जीभ की अधिक विशिष्ट स्थिति देते हैं। ICYER में मुख और जीभ की एक दूसरी व्यवस्था तथा अधिक सक्रिय समापन है। इन अन्तरों को एक ही विधि के अदल-बदल योग्य चरण न मानिए।

स्रोत और दायरा

आधार-संस्करण

Hatha Yoga Pradipika, chapter 2

पाठ-स्थान

  1. Hatha Yoga Pradipika, chapter 2

    अध्याय 2, संस्कृत श्लोक 2.54 से 56।

    स्वात्माराम; संस्कृत मूल और पंचम सिंह का 1914 का अंग्रेज़ी अनुवाद। श्लोक-संख्या संस्कृत पाठ के अनुसार है।

  2. The Science of Pranayama

    अध्याय 4, “Sitkari”।

    स्वामी शिवानन्द; डिवाइन लाइफ़ सोसाइटी, सोलहवाँ संस्करण 1997, अधिकृत वेब संस्करण 2000। पारम्परिक शिक्षण, चिकित्सकीय प्रमाण नहीं।

  3. Basic Practice of Some Pranayamas

    “Cooling pranayamas: Sitkari”, पीडीएफ पृष्ठ 4 से 5।

    आनन्द बालयोगी भवनानी, इंटरनेशनल सेंटर फ़ॉर योग एजुकेशन एंड रिसर्च। पृष्ठ-संख्या पीडीएफ की है; हाथ की स्थितियों के वर्णन अलग से मिलाए गए हैं।

दायरा

आधुनिक आरम्भिक रूप का परिचय, पूरे मार्गदर्शन और स्रोतों की तुलना सहित।

सीमाएँ और पाठ-भेद

ऊपर की चर्चा में महत्त्वपूर्ण भेद स्पष्ट हैं। पारम्परिक व्याख्या और कहे गए फल अपने स्रोतों के कथन हैं, चिकित्सकीय प्रमाण नहीं। समीक्षा: 11 सितम्बर 2026।

इस अभ्यास का अलग पन्ना खोलिए

अगला निर्देश

भ्रामरी
बाहर जाती साँस के साथ गुंजन
बाहर जाती साँस के साथ गुंजन।

श्वास का रूप देखिए

सहारे के साथ आराम से बैठिए और जबड़े को ढीला रहने दीजिए। नाक से सहज साँस भीतर लीजिए। होंठ हल्के जुड़े रहें और बाहर जाती साँस के साथ धीमा गुंजन होने दीजिए। बची हुई हवा को निचोड़कर आवाज़ खींचने की जगह गुंजन समाप्त होने पर स्वाभाविक श्वास में लौट आइए। सहज लगे तभी आगे बढ़िए; घड़ी या चक्रों की कोई अनिवार्य गिनती नहीं है। गुंजन से खिंचाव, साँस की तकलीफ़, चक्कर या घबराहट हो तो वहीं रुककर सामान्य श्वास पर लौट आइए।

पुराने पाठ का भेद

हठयोगप्रदीपिका 2.68 दोनों चरणों के लिए भौंरे की ध्वनि का रूपक रखती है और अधिक वेग वाला पूरक बताती है। उस विधि को इस आधुनिक परिचय के समान कहना ठीक नहीं होगा। नाम सम्बन्ध बताता है; बारीकियाँ अन्तर समझाती हैं।

परिचय और स्रोत

पहले सरल रूप

सामान्य योग प्रोटोकॉल में एक साधारण गुंजन-अभ्यास और दूसरा हाथों को चेहरे पर रखने वाला रूप है। यहाँ पहले रूप का परिचय है। बिहार योग की प्रस्तुति भी बाहर जाती साँस पर गुंजन को इसकी पहचान बताती है। हाथ विश्राम में रह सकते हैं; इस परिचय में कान बन्द करना, आँखों पर दबाव या कुम्भक नहीं जोड़ा गया है।

स्रोत और दायरा

आधार-संस्करण

Common Yoga Protocol (2026)

पाठ-स्थान

  1. Common Yoga Protocol (2026)

    भ्रामरी प्रकार 1 और 2, छपे पृष्ठ 45 से 46।

    आयुष मंत्रालय, भारत सरकार। आधुनिक शिक्षण-प्रोटोकॉल।

  2. YOGA, October 2020

    “Bhramari pranayama”, छपे पृष्ठ 49 से 50।

    बिहार स्कूल ऑफ़ योग। “श्वास-सजगता का महत्त्व”, पृष्ठ 36 से 38; “भ्रामरी”, पृष्ठ 49 से 50। शिक्षण के कथन चिकित्सकीय दावों के रूप में नहीं लिए गए।

  3. Hatha Yoga Pradipika, chapter 2

    अध्याय 2, संस्कृत श्लोक 2.68।

    स्वात्माराम; संस्कृत मूल और पंचम सिंह का 1914 का अंग्रेज़ी अनुवाद। श्लोक-संख्या संस्कृत पाठ के अनुसार है।

दायरा

आधुनिक आरम्भिक रूप का परिचय, पूरे मार्गदर्शन और स्रोतों की तुलना सहित।

सीमाएँ और पाठ-भेद

ऊपर की चर्चा में महत्त्वपूर्ण भेद स्पष्ट हैं। पारम्परिक व्याख्या और कहे गए फल अपने स्रोतों के कथन हैं, चिकित्सकीय प्रमाण नहीं। समीक्षा: 11 सितम्बर 2026।

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सभी बारह विषय देखिए

श्वास का कोई विषय चुनिए

12 विषय: पाँच सहज अभ्यास और सात सन्दर्भ-पाठ, जिनमें कुम्भक की शब्दावली भी है।

02 / सहज अभ्यास

अनुलोम विलोम

हल्के स्पर्श और सहज श्वास के साथ दोनों नासिकाओं का पूरा क्रम।

03 / सहज अभ्यास

शीतली

मुड़ी हुई जीभ से श्वास का परिचय और उसके स्रोतों का प्रसंग।

04 / सहज अभ्यास

सीत्कारी

सीत्कार वाली श्वास को शीतली से अलग पहचानिए।

05 / सहज अभ्यास

भ्रामरी

सहज रेचक के साथ गुंजन, और पाठों के भेद की साफ़ पहचान।

06 / पारम्परिक सन्दर्भ

उज्जायी

कण्ठ से सम्बन्धित श्वास का शास्त्रीय और आधुनिक प्रसंग पढ़िए।

07 / पारम्परिक सन्दर्भ

कपालभाति

शोधन की एक क्रिया, जिसके अलग रूपों को पहचानना ज़रूरी है।

08 / पारम्परिक सन्दर्भ

भस्त्रिका

धौंकनी की उपमा और उसके साथ आने वाला पूरा प्रसंग समझिए।

09 / पारम्परिक सन्दर्भ

सूर्यभेदन

इस नाम की विधि को श्वास की दिशा से पहचानिए।

10 / पारम्परिक सन्दर्भ

मूर्च्छा

अवस्था-विशेष का ऐतिहासिक वर्णन, आरम्भिक अभ्यास का लक्ष्य नहीं।

11 / पारम्परिक सन्दर्भ

प्लाविनी

तैरने के विलक्षण कथन को उसके अपने पाठ में पढ़िए।

12 / पारम्परिक सन्दर्भ

कुम्भक और बन्ध

श्वास-धारण की शब्दावली, उसके आवश्यक भेदों के साथ।

योग्य शिक्षक के साथ

बलपूर्वक विधियों का
अलग अनुशासन है।

कपालभाति और भस्त्रिका समझने के लिए दी गई हैं। इनके वेग, चक्रों की संख्या या अवधि का क्रम स्वयं तय न कीजिए; उसे योग्य शिक्षक के सामने ही सीखिए। परिचित नाम होना पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं है।

NCCIH का शुरुआती योग-मार्गदर्शन बलपूर्वक श्वास से बचने की सलाह देता है।

कपालभाति

शुद्धिक्रिया का संदर्भ

हठयोगप्रदीपिका में कपालभाति षट्कर्मों के प्रसंग में आती है। प्रचलित शिक्षण में छोटे, सक्रिय रेचक के बाद पूरक अपने आप होता है। घेरण्डसंहिता में इसी नाम के कई रूप हैं, जिनमें जल से की जाने वाली क्रियाएँ भी हैं। इसलिए केवल नाम समान होने से विधि समान नहीं हो जाती।

उच्च रक्तचाप, हृदयरोग, हर्निया, गर्भावस्था, हाल की पेट की शल्यचिकित्सा, ग्लूकोमा, चक्कर, दबाव से बढ़ती अम्लता या श्रोणितल की समस्या हो तो चिकित्सक और योग्य प्रशिक्षक की स्वीकृति के बिना न करें।

हठयोगप्रदीपिका 2.35; घेरण्डसंहिता 1.55 से 60। यहाँ गति, आवृत्ति या अवधि का अभ्यास-निर्देश नहीं दिया गया है।

भस्त्रिका

धौंकनी जैसी सक्रिय श्वास

भस्त्रिका में भीतर और बाहर, दोनों दिशाओं की श्वास सक्रिय होती है। धौंकनी की उपमा इसी गति के लिए है। इसे कपालभाति का दूसरा नाम समझना ठीक नहीं। पारम्परिक क्रम में आने वाले अन्य अंश और उनकी उपयुक्तता प्रत्यक्ष शिक्षण में समझनी चाहिए।

उच्च रक्तचाप, हृदयरोग, हर्निया, गर्भावस्था, हाल की पेट की शल्यचिकित्सा, ग्लूकोमा, घबराहट के दौरे, चक्कर या श्वसन-रोग हो तो चिकित्सक और योग्य प्रशिक्षक की स्वीकृति के बिना न करें।

हठयोगप्रदीपिका 2.44 तथा 2.59 से 67। इस परिचय से गति, चक्र-संख्या या अवधि तय न करें।

स्रोत और शिक्षण-संदर्भ

व्यायाम की सामान्य सलाह और परम्परा के वर्णन अलग प्रयोजनों के लिए दिए हैं। शास्त्रीय वर्णन अपने आप चिकित्सकीय प्रमाण नहीं बन जाता। कुछ स्रोत-कड़ियाँ अंग्रेज़ी में हैं।

  1. योग: प्रभाव और सावधानियाँ

    NCCIH का सामान्य मार्गदर्शन: शुरुआती अभ्यास, अनुकूल बदलाव और सुरक्षा।

  2. हठयोगप्रदीपिका

    स्वात्माराम का ग्रंथ; पंचम सिंह का अनुवाद। अध्याय 2, विशेषकर 35, 44 और 54 से 67। पारम्परिक संदर्भ को आधुनिक चिकित्सकीय प्रमाण से अलग पढ़ें।

  3. घेरण्डसंहिता

    संस्कृत पाठ, 1.55 से 60: कपालभाति के भिन्न रूप। केवल नाम से विधियों को एक न मानें।

  4. आसन प्राणायाम मुद्रा बन्ध

    स्वामी सत्यानन्द सरस्वती, चौथा संशोधित संस्करण, 2009; नाड़ीशोधन प्रकरण। कड़ी प्रकाशक की शिक्षण-सामग्री की ओर है।

  5. पतञ्जलि योगसूत्र

    संस्कृत पाठ: 1.12 से 14, 2.46 तथा 2.49 से 50। अभ्यास, आसन और प्राणायाम की प्रस्तावना के संदर्भ।