सहज अभ्यास

शीतली

मुड़ी हुई जीभ से श्वास का परिचय और उसके स्रोतों का प्रसंग।

आकृति, अनुभूति और नाम

शीतली में भीतर आती हवा को मुड़ी हुई जीभ से मार्ग मिलता है; बाहर जाती साँस नाक से लौटती है। नाम और शीतलता का पारम्परिक वर्णन अभ्यास की पहचान कराते हैं। उनसे ज्वर, मधुमेह या किसी दूसरे रोग के उपचार का निष्कर्ष नहीं निकलता।

विधि के साथ उसका स्रोत

हठयोगप्रदीपिका में सीत्कारी के बाद शीतली आती है और उसके वर्णन में कुम्भक भी है। सामान्य योग प्रोटोकॉल आधुनिक आरम्भिक क्रम देता है। इस पुस्तकालय का पूरा आरम्भिक परिचय बिना कुम्भक के और अपने चार चक्रों के सुझाव सहित नीचे रखा है। सीत्कारी का विकल्प भी यहीं बना हुआ है; उसके अलग पृष्ठ पर दोनों का भेद पढ़ सकते हैं।

अभ्यास का पूरा मार्गदर्शन

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सहज शुरुआत

शीतली और सीत्कारी

मुख से सहज पूरक, नासिका से रेचक

जीभ की सहज नली से श्वास भीतर लें और नाक से धीरे छोड़ें। जीभ न मुड़े तो उसके लिए भी सरल विकल्प है।

शीतली और सीत्कारी। जीभ की सहज नली से श्वास भीतर लें और नाक से धीरे छोड़ें। जीभ न मुड़े तो उसके लिए भी सरल विकल्प है।
मुख से श्वास लें, फिर मुख बंद करके नाक से छोड़ें। जीभ को ज़बरदस्ती न मोड़ें और साँस न रोकें।

तैयारी

सीधे और सहज बैठें। हाथ ढीले रखें। यदि स्वाभाविक रूप से सम्भव हो तो जीभ के दोनों किनारे मोड़कर छोटी नली बनाएँ।

कैसे करें

  1. मुड़ी हुई जीभ को होंठों के बीच थोड़ा बाहर लाएँ।
  2. उस नली से धीरे साँस भीतर लें।
  3. मुख बंद करके दोनों नासिकाओं से सहज साँस छोड़ें। बीच में न रोकें।
  4. जीभ न मुड़े तो सीत्कारी का विकल्प लें: दाँत हल्के अलग रखें, जीभ उनके पीछे रहे और दाँतों के बीच से साँस लें। फिर मुख बंद करके नाक से छोड़ें।

श्वास और मात्रा
4 चक्र से शुरू करें।

अभ्यास को समझिए

शीतली और सीत्कारी के नाम हवा के मुख से प्रवेश की अलग विधियों को बताते हैं। पारम्परिक हठयोग के वर्णन में आगे कुम्भक भी आता है। इस दर्शिका का आरम्भिक रूप उस अंश को छोड़ता है; इसे किसी रोग या बुखार का उपचार न मानें।

हठयोगप्रदीपिका 2.54-58: सीत्कारी और शीतली का पारम्परिक संदर्भ। यहाँ कुम्भक हटाकर सहज आरम्भिक रूप दिया है।

स्रोत और दायरा

आधार-संस्करण

Hatha Yoga Pradipika, chapter 2

इस प्रस्तुति का पाठ

  1. Hatha Yoga Pradipika, chapter 2

    Sanskrit verses 2.54–58.

    Svātmārāma; Sanskrit and Pancham Sinh’s 1914 translation. References on these pages use the Sanskrit numbering.

  2. Common Yoga Protocol (2026)

    Shitali, printed pp. 43–44.

    Ministry of Ayush, Government of India. Printed-page coordinates are 15 lower than PDF-page numbers. Modern teaching protocol.

  3. The Science of Pranayama

    Chapter Four, “Sitali”.

    Swami Sivananda; Divine Life Society, sixteenth edition 1997, authorized web edition 2000. Traditional teaching, not clinical evidence.

इस प्रस्तुति का दायरा

आधुनिक आरम्भिक रूप का परिचय, पूरे मार्गदर्शन और स्रोतों की तुलना सहित।

सीमाएँ और पाठ-भेद

ऊपर की चर्चा में महत्त्वपूर्ण भेद स्पष्ट हैं। पारम्परिक व्याख्या और कहे गए फल अपने स्रोतों के कथन हैं, चिकित्सकीय प्रमाण नहीं। समीक्षा: 11 सितम्बर 2026।