पहले सरल रूप
सामान्य योग प्रोटोकॉल में एक साधारण गुंजन-अभ्यास और दूसरा हाथों को चेहरे पर रखने वाला रूप है। यहाँ पहले रूप का परिचय है। बिहार योग की प्रस्तुति भी बाहर जाती साँस पर गुंजन को इसकी पहचान बताती है। हाथ विश्राम में रह सकते हैं; इस परिचय में कान बन्द करना, आँखों पर दबाव या कुम्भक नहीं जोड़ा गया है।
श्वास का रूप देखिए
सहारे के साथ आराम से बैठिए और जबड़े को ढीला रहने दीजिए। नाक से सहज साँस भीतर लीजिए। होंठ हल्के जुड़े रहें और बाहर जाती साँस के साथ धीमा गुंजन होने दीजिए। बची हुई हवा को निचोड़कर आवाज़ खींचने की जगह गुंजन समाप्त होने पर स्वाभाविक श्वास में लौट आइए। सहज लगे तभी आगे बढ़िए; इस पृष्ठ में घड़ी या अनिवार्य चक्र-संख्या नहीं है।
पुराने पाठ का भेद
हठयोगप्रदीपिका 2.68 दोनों चरणों के लिए भौंरे की ध्वनि का रूपक रखती है और अधिक वेग वाला पूरक बताती है। उस विधि को इस आधुनिक परिचय के समान कहना ठीक नहीं होगा। नाम सम्बन्ध बताता है; बारीकियाँ अन्तर समझाती हैं। गुंजन या श्वास का नियन्त्रण खिंचाव, साँस की तकलीफ़, चक्कर या घबराहट लाए तो सामान्य श्वास-मार्गदर्शन के अनुसार रुक जाइए।
स्रोत और दायरा
आधार-संस्करण
इस प्रस्तुति का पाठ
- Common Yoga Protocol (2026)
Bhramari Type 1 and Type 2, printed pp. 45–46.
Ministry of Ayush, Government of India. Printed-page coordinates are 15 lower than PDF-page numbers. Modern teaching protocol.
- YOGA, October 2020
“Bhramari pranayama,” printed pp. 49–50.
Bihar School of Yoga. “Importance of Breath Awareness,” pp. 36–38; “Bhramari,” pp. 49–50. Teaching statements are not adopted as medical claims.
- Hatha Yoga Pradipika, chapter 2
Sanskrit verse 2.68.
Svātmārāma; Sanskrit and Pancham Sinh’s 1914 translation. References on these pages use the Sanskrit numbering.
इस प्रस्तुति का दायरा
आधुनिक आरम्भिक रूप का परिचय, पूरे मार्गदर्शन और स्रोतों की तुलना सहित।
सीमाएँ और पाठ-भेद
ऊपर की चर्चा में महत्त्वपूर्ण भेद स्पष्ट हैं। पारम्परिक व्याख्या और कहे गए फल अपने स्रोतों के कथन हैं, चिकित्सकीय प्रमाण नहीं। समीक्षा: 11 सितम्बर 2026।