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सहज अभ्यास

सीत्कारी

सीत्कार वाली श्वास को शीतली से अलग पहचानिए।

शीतली से इसका भेद

सीत्कारी में हवा दाँतों के पास के खुले मार्ग से आती है; शीतली की तरह जीभ की नली बनाना उसकी पहचान नहीं। हठयोगप्रदीपिका मुख की ध्वनि और नाक से रेचक बताती है। शिवानन्द जीभ की अधिक विशिष्ट स्थिति देते हैं। ICYER में मुख और जीभ की एक दूसरी व्यवस्था तथा अधिक सक्रिय समापन है। इन अन्तरों को एक ही विधि के अदल-बदल योग्य चरण न मानिए।

यहाँ का सहज विकल्प

शीतली-परिचय में जीभ न मुड़ने पर सीत्कारी का विकल्प है: जीभ हल्के खुले दाँतों के पीछे रहती है और भीतर आती साँस दाँतों के बीच से गुजरती है। उसी परिचय के अनुसार मुख बन्द करके नाक से सहज रेचक होता है। कुम्भक न जोड़िए। जीभ का आकार, सीत्कार की आवाज़ या साँस की लम्बाई ज़ोर लगाकर बनाने की आवश्यकता नहीं।

पूरा प्रसंग साथ रखिए

नीचे शीतली-परिचय के पूरे निर्देश, सहज विकल्प और सावधानियाँ फिर दिए हैं, जिससे यह विकल्प अपने प्रसंग से न कटे। ठण्डी हवा से दाँत या गला चुभना, खुला मुँह रखने से दमे की तकलीफ़ बढ़ना और चक्कर आना उसी परिचय की सावधानियाँ हैं। पारम्परिक पाठों की तुलना समझने के लिए है; उससे अभ्यास की नई समय-सारिणी नहीं बनाई गई है।

अभ्यास का पूरा मार्गदर्शन

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सहज शुरुआत

शीतली और सीत्कारी

मुख से सहज पूरक, नासिका से रेचक

जीभ की सहज नली से श्वास भीतर लें और नाक से धीरे छोड़ें। जीभ न मुड़े तो उसके लिए भी सरल विकल्प है।

शीतली और सीत्कारी। जीभ की सहज नली से श्वास भीतर लें और नाक से धीरे छोड़ें। जीभ न मुड़े तो उसके लिए भी सरल विकल्प है।
मुख से श्वास लें, फिर मुख बंद करके नाक से छोड़ें। जीभ को ज़बरदस्ती न मोड़ें और साँस न रोकें।

तैयारी

सीधे और सहज बैठें। हाथ ढीले रखें। यदि स्वाभाविक रूप से सम्भव हो तो जीभ के दोनों किनारे मोड़कर छोटी नली बनाएँ।

कैसे करें

  1. मुड़ी हुई जीभ को होंठों के बीच थोड़ा बाहर लाएँ।
  2. उस नली से धीरे साँस भीतर लें।
  3. मुख बंद करके दोनों नासिकाओं से सहज साँस छोड़ें। बीच में न रोकें।
  4. जीभ न मुड़े तो सीत्कारी का विकल्प लें: दाँत हल्के अलग रखें, जीभ उनके पीछे रहे और दाँतों के बीच से साँस लें। फिर मुख बंद करके नाक से छोड़ें।

श्वास और मात्रा
4 चक्र से शुरू करें।

अभ्यास को समझिए

शीतली और सीत्कारी के नाम हवा के मुख से प्रवेश की अलग विधियों को बताते हैं। पारम्परिक हठयोग के वर्णन में आगे कुम्भक भी आता है। आरम्भिक रूप उस अंश को छोड़ देता है; इसे किसी रोग या बुखार का उपचार न मानें।

हठयोगप्रदीपिका 2.54 से 58: सीत्कारी और शीतली का पारम्परिक संदर्भ। यहाँ कुम्भक हटाकर सहज आरम्भिक रूप दिया है।

स्रोत और दायरा

आधार-संस्करण

Hatha Yoga Pradipika, chapter 2

पाठ-स्थान

  1. Hatha Yoga Pradipika, chapter 2

    अध्याय 2, संस्कृत श्लोक 2.54 से 56।

    स्वात्माराम; संस्कृत मूल और पंचम सिंह का 1914 का अंग्रेज़ी अनुवाद। श्लोक-संख्या संस्कृत पाठ के अनुसार है।

  2. The Science of Pranayama

    अध्याय 4, “Sitkari”।

    स्वामी शिवानन्द; डिवाइन लाइफ़ सोसाइटी, सोलहवाँ संस्करण 1997, अधिकृत वेब संस्करण 2000। पारम्परिक शिक्षण, चिकित्सकीय प्रमाण नहीं।

  3. Basic Practice of Some Pranayamas

    “Cooling pranayamas: Sitkari”, पीडीएफ पृष्ठ 4 से 5।

    आनन्द बालयोगी भवनानी, इंटरनेशनल सेंटर फ़ॉर योग एजुकेशन एंड रिसर्च। पृष्ठ-संख्या पीडीएफ की है; हाथ की स्थितियों के वर्णन अलग से मिलाए गए हैं।

दायरा

आधुनिक आरम्भिक रूप का परिचय, पूरे मार्गदर्शन और स्रोतों की तुलना सहित।

सीमाएँ और पाठ-भेद

ऊपर की चर्चा में महत्त्वपूर्ण भेद स्पष्ट हैं। पारम्परिक व्याख्या और कहे गए फल अपने स्रोतों के कथन हैं, चिकित्सकीय प्रमाण नहीं। समीक्षा: 11 सितम्बर 2026।