राजा उत्तानपाद की सभा में एक बालक गोद में बैठा है और दूसरा गोद की ओर बढ़ रहा है। जो बैठा है वह उत्तम है, छोटी रानी सुरुचि का बेटा; जो बढ़ रहा है वह पाँच बरस का ध्रुव है, बड़ी रानी सुनीति का बेटा, और श्रीमद्भागवत का चौथा स्कन्ध अपने आठवें अध्याय में इस दृश्य को ठीक इसी क्षण पर खोलता है। ध्रुव घुटने तक पहुँचकर ऊपर चढ़ने का यत्न करता है। राजा का हाथ उसकी ओर नहीं बढ़ता। तभी सुरुचि बोलती है, मीठी आवाज में, और राजा चुप बैठे सुनते रहते हैं। “बेटा, आप राजसिंहासन पर बैठने के अधिकारी नहीं।” “यदि आपको राजसिंहासन की इच्छा है, तो तपस्या करके परम पुरुष श्रीनारायण की आराधना कीजिए, और उनकी कृपा से मेरे गर्भ में आकर जन्म लीजिए।” बच्चा सब नहीं समझता, पर इतना समझ लेता है कि इस गोद में उसके लिए जगह नहीं। भागवत कहता है कि वह डंडे की चोट खाए साँप की तरह लंबी साँसें लेता है, और पिता एक शब्द नहीं बोलते। ध्रुव की सारी कथा इसी एक चुप्पी से निकलती है।
दूसरी गोद
ध्रुव सभा से पीछे हटता है और रोता हुआ माँ की कोठरी की ओर भागता है। सुनीति उसे गोद में उठाती है, पर सुरुचि की बातें महल की दूसरी स्त्रियों से उस तक पहले ही पहुँच चुकी हैं। बच्चे की हिचकियाँ उसकी छाती से टकराती हैं, और उसके पास उन्हें रोकने का कोई उपाय नहीं; वह स्वयं इस घर में उपेक्षित है, अपने बेटे को वह कौन सी जगह दिला सकती है। फिर वह एक गहरी साँस लेती है और वह कहती है जो इस कथा की धुरी है। “लाला, आप दूसरों के लिए किसी प्रकार के अमंगल की कामना मत कीजिए।” “सुरुचि ने जो कुछ कहा, उसमें झूठ नहीं।” “उस गोद में आपको जगह नहीं मिलेगी।” और तब, “पर एक गोद और भी है, जहाँ यह नहीं पूछा जाता कि कौन किसके गर्भ से जन्मा।” “वहाँ केवल पुकार से जगह मिलती है।” उसके परदादा ब्रह्मा को वह परम पद उन्हीं श्रीहरि के चरणों से मिला था, और उसके दादा मनु को भी। “उन्हीं को पुकारिए।”
ध्रुव माँ की ओर देखता है। रोना कहीं बीच में रुक गया है, और उसकी आँखों में कुछ बैठ गया है जो अब हिलने वाला नहीं। वह माँ के पैर छूता है और कहता है, “मैं जाऊँगा।” “कहाँ?” “वहाँ। जहाँ माँ ने कहा। उन्हें ढूँढने।” और पाँच बरस का बच्चा निकल जाता है, अकेला, महल छोड़कर, जंगल की ओर।
रास्ते में नारद
रास्ते में उसे देवर्षि नारद मिलते हैं। वे उसके मस्तक पर हाथ फेरते हैं और उसे लौटाने की कोशिश करते हैं। “बेटा, अभी तो आप बच्चे हैं, खेल-कूद में ही मस्त रहते हैं।” “आप घर लौट जाइए।” बच्चा उनकी बात का आदर करता है और उसे मानता नहीं। “देवर्षि, विमाता के कटु वचन ने मेरे हृदय को बेध दिया है।” “आपके समता के उपदेश तक मेरी पहुँच अभी नहीं है।” “मुझे वह मार्ग बताइए जिससे त्रिलोकी में सबसे ऊँचा पद मिल सके।” भागवत में वह यह भी जोड़ता है कि वह पद ऐसा हो जहाँ उसके पूर्वजों में से कोई न पहुँचा हो।
नारद चुप हो जाते हैं, और फिर उसे पूरा मार्ग दे देते हैं। “आपकी माता ने जो मार्ग बताया है, वही आपके लिए परम कल्याण का मार्ग है।” “आप यमुना के पवित्र तट पर मधुवन में जाकर तप कीजिए, वहाँ श्रीहरि का नित्य-निवास है।” वे उसे कालिन्दी में स्नान, कुश का आसन, प्राणायाम, और हृदय में भगवान् की चतुर्भुज मूर्ति को अंग अंग रचना सिखाते हैं, और झुककर उसे बारह अक्षर का मन्त्र देते हैं, ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। यहीं से नारद इस कथा से हट जाते हैं; आगे वे केवल एक बार लौटते हैं, उस पिता के पास जो बेटे के जाने के बाद सो नहीं पा रहा, और जिसे वे वचन देते हैं कि वह बालक शीघ्र लौटेगा।
पाँच महीने
ध्रुव मधुवन में यमुना के किनारे बैठ जाता है, और नवाँ अध्याय उसके बैठने को महीनों की सीढ़ी बना देता है। पहले महीने वह तीन तीन रात के अन्तर पर केवल कैथ और बेर खाता है। दूसरे महीने छह छह दिन पर सूखी घास और पत्ते। तीसरे महीने नौ नौ दिन पर केवल जल। चौथे महीने बारह बारह दिन पर केवल वायु। पाँचवें महीने वह साँस को जीत लेता है और एक पैर पर खंभे की तरह खड़ा हो जाता है, मन हृदय की उस मूर्ति पर टिकाए। तब तीनों लोक काँपने लगते हैं। उसके अंगूठे के दबाव से पृथ्वी ऐसे झुक जाती है जैसे गजराज के चढ़ने पर नाव। और जब उसकी साँस समष्टि के प्राण से एक हो जाती है, तब समस्त जीवों की साँस रुक जाती है।
देवता और लोकपाल घबराकर श्रीहरि की शरण में जाते हैं। “भगवन्, समस्त जीवों का प्राण एक साथ रुक गया है।” भगवान् कहते हैं कि यह तप बाहर से नहीं टूटेगा, वे स्वयं जाकर उसे रोकेंगे, और गरुड़ पर चढ़कर मधुवन उतरते हैं। उसी क्षण ध्रुव के हृदय में बिजली सी चमकती मूर्ति सहसा विलीन हो जाती है; वह घबराकर आँखें खोलता है और वही रूप सामने यमुना के तट पर खड़ा देखता है। बालक भूमि पर गिरकर प्रणाम करता है और ऐसे देखता है जैसे आँखों से पी लेगा। उसके भीतर स्तुति उमड़ रही है और उसके पास शब्द नहीं हैं। सबके हृदय में बैठे श्रीहरि यह कठिनाई देख लेते हैं और अपना शंख, जो स्वयं वेद है, धीरे से उसके गाल से छुआ देते हैं। शंख के स्पर्श से ध्रुव को वेदमयी वाणी मिल जाती है, और पाँच बरस का बालक धीरज के साथ वह स्तुति करता है जो भागवत ने पूरी की पूरी रखी है।
स्तुति के बाद विष्णु मुसकराकर पूछते हैं, “क्या माँगते हैं?” ध्रुव यहाँ तक इसीलिए आया था कि सौतेले भाई से ऊँचा सिंहासन माँगे, और वह वही माँगता है। “प्रभु, मैं तो आपसे एक राजगद्दी माँगने आया था।” भगवान् हँसते हैं, बहुत प्रेम से। “बेटा, आप जो माँगने आए थे, वह भी मिलेगा।” “आप राज्य पाएँगे, और छत्तीस हज़ार बरस धर्म से पृथ्वी का पालन करेंगे।” और फिर वह जो उसने माँगा नहीं था। “एक स्थान, जहाँ से आप कभी नहीं हटेंगे।” आकाश का एक तारा, जिसके चारों ओर ग्रह, नक्षत्र और तारागण ऐसे घूमते रहेंगे जैसे खलिहान की मेढ़ी के चारों ओर बैल, और जिसे पहले किसी ने नहीं पाया। “वह ध्रुवलोक मैं आपको देता हूँ।” भगवान् उसे आगे का जीवन भी कह देते हैं, कि उत्तम एक दिन शिकार में मारा जाएगा और उसकी माँ उसे खोजती हुई दावानल में जाएगी, और कि ध्रुव बुढ़ापे में सप्तर्षियों से ऊपर उस धाम में आएगा जहाँ से कोई लौटता नहीं। फिर वे गरुड़ पर उठ जाते हैं।
घर की ओर लौटते हुए उसका मन भारी होता जाता है। छह महीने में इस बच्चे ने वह दूरी तय की थी जो सिद्धों को जन्मों में मिलती है, और उस क्षण को उसने एक गद्दी माँगने में खर्च कर दिया। “जिस प्रकार कोई कँगला किसी चक्रवर्ती सम्राट् को प्रसन्न करके उससे चावलों की कनी माँगे, उसी प्रकार मैंने भी आत्मानन्द देनेवाले श्रीहरि से व्यर्थ का अभिमान बढ़ानेवाले उच्च पद ही माँगे।” “संसार-बन्धन का नाश करनेवाले प्रभु से मैंने संसार ही माँग लिया।” ख़बर उससे पहले नगर पहुँच जाती है। उत्तानपाद रथ से कूदकर दौड़ते हैं, बेटे को छाती से लगाते हैं, और कुछ देर कुछ बोल नहीं पाते। ध्रुव दोनों माताओं के सामने झुकता है, दोनों के, और सुरुचि उसे उठाकर छाती से लगाती है। सुनीति के स्तनों से दूध बहकर उसके आँसुओं से मिल जाता है।
अलकापुरी
समय आने पर उत्तानपाद उसे पृथ्वी का राजा बनाकर वन चले जाते हैं। दसवाँ अध्याय ध्रुव का घर बसाता है, प्रजापति शिशुमार की कन्या भ्रमि से दो पुत्र, कल्प और वत्सर, और वायु की कन्या इला से पुत्र उत्कल और एक कन्या। फिर वह दिन आता है जो पहले से कहा जा चुका था। उत्तम हिमालय पर शिकार खेलते हुए एक यक्ष के हाथों मारा जाता है, और सुरुचि उसे खोजती हुई दावानल में समा जाती है। समाचार सुनकर ध्रुव क्रोध, शोक और उद्वेग से भर उठता है। वह रथ पर हिमालय की घाटी में यक्षों की नगरी अलकापुरी पहुँचता है और शंख फूँकता है। यक्षों की पूरी सेना, भागवत की गिनती में एक लाख तीस हजार, एक अकेले रथ पर अस्त्र बरसाती है, यहाँ तक कि ध्रुव और उसका सारथि उस वर्षा में ऐसे छिप जाते हैं जैसे पहाड़ बादल में; और तभी रथ कोहरे से निकलते सूरज की तरह फिर दिखाई देता है।
जो यक्ष भाग सकते हैं, भाग जाते हैं, और ध्रुव खाली नगर के सामने रथ रोक लेता है, क्योंकि कोई नहीं जानता कि मायावी क्या बचाकर रखते हैं। तभी समुद्र की सी गरज उठती है जहाँ समुद्र नहीं है; रक्त की वर्षा होती है, ऊपर एक पर्वत गदाएँ और शिलाएँ बरसाता है, और अन्त में प्रलय के दिन जैसा समुद्र घाटी के चारों ओर से चढ़ता है। उस प्रलय के बीच ध्रुव एक छोटा सा, ठीक ठीक काम करता है; वह आचमन करता है और धनुष पर नारायणास्त्र चढ़ाता है। जिस क्षण वह प्रत्यंचा छूता है, वह सारी रची हुई दुनिया एक साथ बुझ जाती है, जैसे ज्ञान का दीप जलते ही रात चली जाती है।
धनुष फिर बोले, इससे पहले उसके पितामह रणभूमि पर खड़े हैं। स्वायम्भुव मनु ऋषियों के साथ उतरे हैं और पोते के भीतर से युद्ध को धीरे धीरे निकालने लगते हैं। “बेटा, बस।” “अधिक क्रोध करना ठीक नहीं।” इनमें से अधिकतर ने आपके भाई को छुआ तक नहीं; एक के काम के लिए आपने एक पूरे समाज को दण्ड दिया है। “समस्त जीवों की उत्पत्ति और विनाश का कारण तो एकमात्र काल ही है।” किसी यक्ष ने उत्तम को नहीं मारा। “क्रोध को शान्त कीजिए।” और अन्त में, कि ये यक्ष शिव के सखा कुबेर के हैं, उनके पास जाइए और उन्हें प्रसन्न कीजिए। ध्रुव दादा के एक वचन पर वह वैर छोड़ देता है जिसे ज्ञानी सबसे दुस्त्याज्य कहते हैं। तभी कुबेर स्वयं वहाँ आते हैं। “क्षत्रियकुमार!” वे कहते हैं कि न आपने यक्षों को मारा, न यक्षों ने आपके भाई को। “माँग लीजिए, जो चाहें।” ध्रुव धन के देवता के सामने खड़ा है और वही एक चीज माँगता है जो किसी कोष में नहीं रखी, कि उसे श्रीहरि की अखण्ड स्मृति बनी रहे। कुबेर वह देकर वहीं अदृश्य हो जाते हैं।
बदरिकाश्रम
ध्रुव बर्हिष्मती लौटता है और वह राजा बनता है जिसका वचन उसे मिला था। वह यज्ञों से भगवान् की आराधना करता है, हर प्राणी में उन्हीं को देखता है, और प्रजा उसमें और एक पिता में भेद करना छोड़ देती है। वह छत्तीस हजार बरस पृथ्वी का पालन करता है, जो भागवत के हिसाब से एक देवता की पूरी आयु है। जब बुढ़ापा आता है, वह रानियों, पुत्रों, कोष, सेना और समुद्र से घिरी पृथ्वी पर एक ही छोटी सी मुहर पढ़ लेता है, कि मृत्यु ने इसे पहले ही ले रखा है। वह पुत्र उत्कल को राजसिंहासन सौंपता है और बदरिकाश्रम चला जाता है।
वहाँ वह पवित्र जल में स्नान करके बैठ जाता है, और जो बालक कभी यमुना के किनारे आहार, जल और साँस से ऊपर चढ़ा था, वही अब बूढ़े शरीर में वह चढ़ाई फिर करता है। साँस उसके वश में आती है, मन भगवान् के स्वरूप में ऐसा ठहरता है कि देखने वाले और दिखने वाले के बीच की रेखा टूट जाती है, और अन्त में उसे ‘मैं ध्रुव हूँ’ इसकी स्मृति भी नहीं रहती। उसी क्षण एक विमान उतरता है, दसों दिशाओं को आलोकित करता हुआ, और उसमें श्रीहरि के देश के दो पुरुष खड़े हैं, चार भुजाएँ, श्याम रंग, किशोर अवस्था। ध्रुव उठ खड़ा होता है, जुड़े हुए हाथ और होंठों पर भगवान् के नाम। “राजन्, आपका कल्याण हो।” “आपने पाँच वर्ष की अवस्था में ही तपस्या करके सर्वेश्वर भगवान् को प्रसन्न कर लिया था।” “चलिए, आप विष्णुधाम में निवास कीजिए, जहाँ आपके पूर्वजों सहित कोई भी पहुँच नहीं सका।” उनके नाम सुनन्द और नन्द हैं।
उसकी देह तपे सोने की तरह चमक उठती है। चढ़ने से पहले एक और आकृति उस पर्वत पर आती है, स्वयं मृत्यु, जो हर देह का ऋण वसूलने आया है। ध्रुव उसके सिर पर पैर रखता है और उसी को सीढ़ी बनाकर विमान पर चढ़ जाता है। और तब, बैठकर, उठने की ठीक कगार पर, ध्रुव को अपनी माँ याद आती है। “क्या मैं अपनी बेचारी माता को छोड़कर अकेला ही दुर्लभ वैकुण्ठधाम को जाऊँगा?” सुनन्द और नन्द उस विचार को बनते ही पढ़ लेते हैं और उँगली से दिखाते हैं; आगे, पहले से ऊपर, एक दूसरा विमान चढ़ रहा है, और उसमें देवी सुनीति जा रही हैं। जिस माँ की गोद से यह यात्रा शुरू हुई थी, वही अब आगे आगे चल रही है। ध्रुव तीनों लोकों और सप्तर्षियों के मण्डल से ऊपर, विष्णु के उस नित्य धाम में पहुँचता है जो अपने प्रकाश से जलता है। वहाँ तारों का पूरा चक्र आज तक उसी के चारों ओर घूमता है, और ध्रुव तारा अपनी जगह से कभी नहीं हटा।
विष्णुपुराण भी ध्रुव को बताता है, अपने पहले अंश के ग्यारहवें और बारहवें अध्याय में, ध्रुव का वनगमन और मरीचि आदि ऋषियों से भेंट, और तपस्या से प्रसन्न भगवान् का उसे ध्रुवपद देना; वह कथन उसी पुराण का है और उसे भागवत से मिलाया नहीं गया है। महाभारत उसे अनुशासन पर्व में एक बार नाम से पुकारता है, जब बाण शय्या पर लेटे भीष्म को देखने आए महर्षियों में व्यास, च्यवन और कश्यप के साथ ध्रुव भी गिने जाते हैं।
उनकी राह
तीन ठहराव, तीन प्रश्न
नीचे तीन प्रसंग हैं जहाँ एक बालक दूसरी गोद की ओर चलता है, एक गद्दी माँगता है, और एक वैर छोड़ देता है। ये हमारे पढ़ने के प्रश्न हैं।
- वहाँ केवल पुकार से जगह मिलती है। ध्रुव की तपस्या पढ़िए, राजा की गोद से उस क्षण तक जब पाँच बरस का बच्चा जंगल की ओर निकल जाता है। पूछिए: सुनीति ने बेटे को सुरुचि से लड़ने के बजाय किसी और को पुकारने क्यों भेजा?
- प्रभु, मैं तो आपसे एक राजगद्दी माँगने आया था। ध्रुव की तपस्या में मधुवन के पहले महीने से घर लौटती राह के पछतावे तक पढ़िए। पूछिए: जो माँगा गया वह भी मिला और जो नहीं माँगा गया वह भी; तब बालक का मन भारी क्यों है?
- बेटा, बस। ध्रुव की तपस्या में अलकापुरी के शंखनाद से कुबेर के अदृश्य होने तक पढ़िए। पूछिए: धन के देवता के सामने ध्रुव ने वही क्यों माँगा जो कोई कोष नहीं रखता?
अन्त में पहले दृश्य पर लौटिए, जहाँ एक बच्चा गोद की ओर बढ़ रहा है और पिता का हाथ नहीं उठता। जो तारा आज तक अपनी जगह से नहीं हटा, वह उस चुप्पी से निकला था या उस माँ की साँस से?
नारद का पूर्वजन्म · एक दासी का पाँच बरस का बेटा, साधुओं की जूठन, और निर्जन वन की एक वाणी।
प्रह्लाद का विद्रोह · पाठशाला में एक और बालक, जिसे पिता की गोद की जगह पिता का क्रोध मिला, और जिसने वही नाम पुकारा।
सर्ग, प्रजापति और स्वायम्भुव मनु · वह दादा जो अलकापुरी में पोते के भीतर से युद्ध निकालने आए, और उनके दो पुत्र, प्रियव्रत और उत्तानपाद।
जो गोद नहीं मिली
ध्रुव की कथा में तीन माँगें हैं, और तीनों अलग हैं। पहली शब्दों में नहीं है; एक बच्चा गोद की ओर बढ़ता है और हाथ नहीं उठता। दूसरी मधुवन में है, जहाँ पाँच महीने की तपस्या के अन्त में वही बच्चा ठीक वही माँगता है जिसके लिए निकला था, एक गद्दी, अपने भाई से ऊँची; भागवत इस माँग को न छिपाता है, न सुधारता है, और भगवान् उसे पूरी करके ऊपर से वह देते हैं जो माँगा नहीं गया। तीसरी अलकापुरी की है, जहाँ कुबेर कहते हैं कि जो चाहें माँग लीजिए, और वह राजा वही एक चीज माँगता है जो किसी कोष में नहीं रखी। इन तीन माँगों के बीच जो बदला है, वह माँगने की दिशा है, और भागवत उस बदलाव को उपदेश से नहीं, घर लौटती राह के पछतावे से दिखाता है। फिर भी यह कथा उस गद्दी वाली माँग को छोटा नहीं करती। सुनीति ने अपने बेटे से नहीं कहा था कि राज्य की इच्छा छोड़ दीजिए; उसने कहा था कि एक गोद और है, और उसे उसी इच्छा के साथ वहाँ भेज दिया। जो गोद नहीं मिली, वही उसे उस गोद तक ले गई जो आज तक नहीं छूटी। इसीलिए अन्त में, जब विमान उठने को है, ध्रुव सबसे पहले अपनी माँ को याद करता है और उसे आगे के विमान में जाते देखता है; भागवत का यह चित्र उसकी सारी कथा का उत्तर है।
आधार-संस्करण और पाठ
आधार-संस्करण: गीताप्रेस का श्रीमद्भागवत; विष्णुपुराण के लिए गीताप्रेस का संस्करण और इस पुस्तकालय का अध्याय मानचित्र; महाभारत के लिए गीताप्रेस का संस्करण।
इस कथा का पाठ: राजा की गोद, सुरुचि और सुनीति के वचन, नारद का मन्त्र: भागवत, स्कन्ध 4, अध्याय 8। मधुवन के पाँच महीने, शंख का स्पर्श, वर और घर लौटना: अध्याय 9। उत्तम की मृत्यु और अलकापुरी का युद्ध: अध्याय 10। मनु का उपदेश: अध्याय 11। कुबेर का वर, राज्य, बदरिकाश्रम और सुनीति का विमान: अध्याय 12। ध्रुव का वनगमन और ध्रुवपद: विष्णुपुराण, अंश 1, अध्याय 11 से 12। भीष्म की बाण शय्या के पास ऋषियों की सूची: महाभारत, अनुशासन पर्व।
इस प्रस्तुति का दायरा: चुने हुए पात्र-प्रसंग और अलग चिह्नित पाठकीय प्रश्न।
सीमाएँ और पाठ-भेद: यह पात्र-परिचय कथा-सार और संपादकीय मनन को साथ रखता है। प्रसंगों का आधार इस पुस्तकालय की भागवत की ध्रुव कड़ी है; जो विवरण उस कड़ी के हिन्दी पाठ से आगे जाते हैं, वे गीताप्रेस के भागवत के उन्हीं अध्यायों से हैं। विष्णुपुराण के ध्रुव अध्याय इस पुस्तकालय में अभी नहीं हैं; उनका उल्लेख अध्याय मानचित्र के शीर्षकों तक सीमित है। उद्धरण-चिह्नों के वाक्य इस पुस्तकालय की ध्रुव कड़ी के हिन्दी पाठ से हैं।