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अध्याय 5: कर्म संन्यास योग

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अध्याय 5: कर्म संन्यास योग के लिए सांकेतिक चित्र
दृश्य-द्वार · अध्याय 5: कर्म संन्यास योग

युद्ध के मुहाने पर खड़े अर्जुन के मन में एक पुरानी गुत्थी फिर उठी। कभी कृष्ण कहते हैं, सब कर्म छोड़ दीजिए; कभी कहते हैं, कर्म करते रहिए। दोनों बातें एक साथ कैसे सच हों? यह पाँचवाँ अध्याय उसी उलझन का शान्त, सधा हुआ उत्तर है। यह गीता का सबसे छोटा अध्याय है, मगर शायद सबसे कसा हुआ भी।

छोड़ना या करना

अर्जुन ने सीधा पूछा, हे कृष्ण, आप एक ओर कर्म के त्याग की प्रशंसा करते हैं, और दूसरी ओर कर्मयोग की। इन दोनों में से जो एक निश्चित रूप से बेहतर हो, वह हमें साफ़-साफ़ बता दीजिए।

कृष्ण का उत्तर सधा हुआ था। बोले, दोनों ही राहें कल्याण तक ले जाती हैं। मगर सुनिए, इन दोनों में कर्मयोग श्रेष्ठ है। क्योंकि जो केवल बाहर से कर्म छोड़ बैठता है, उसका मन तो भीतर कामना, क्रोध और खिंचाव में उलझा रह सकता है। और जो भीतर से त्याग कर देता है, वह काम करता हुआ भी नहीं बँधता। सच्चा संन्यासी वही है जो न किसी से बैर रखता है, न किसी चीज़ की चाह। ऐसा मनुष्य द्वन्द्व से छूटकर सहज ही बंधन के पार निकल जाता है।

कमल का पत्ता

फिर कृष्ण ने वह उपमा दी जो इस अध्याय की आत्मा है।

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥

जो आसक्ति छोड़कर अपने सब कर्म ब्रह्म को सौंप देता है, वह पाप से वैसे ही अछूता रहता है, जैसे कमल का पत्ता पानी में रहकर भी पानी से।

श्रीमद्भगवद्गीता 5.10

कमल पानी में ही उगता है, पानी में ही रहता है, फिर भी एक बूँद उस पर ठहरती नहीं। ज्ञानी भी ऐसा ही होता है, संसार के बीचोंबीच रहकर भी संसार से अनछुआ। कृष्ण ने कहा, योगी अपनी इन्द्रियों और मन से जो भी करता है, वह सब आसक्ति छोड़कर, केवल भीतर की शुद्धि के लिए करता है। वह फल की डोर छोड़ देता है, इसलिए एक स्थायी शान्ति पा जाता है। और जो फल से बँधा है, वही कामना के फंदे में बँधा रहता है।

सब में एक ही

इसके बाद कृष्ण एक बहुत ऊँची दृष्टि की बात करते हैं, जिसे समदर्शन कहते हैं।

विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥

विद्या और विनय से भरे ब्राह्मण में, गाय में, हाथी में, कुत्ते में, और चाण्डाल में भी, ज्ञानी एक ही चेतना देखते हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता 5.18

बाहर के रूप, नाम और भेद चाहे कितने हों, भीतर बहती चेतना एक ही है। जो इस एक को हर जगह देख लेता है, उसका मन इसी जीवन में समता में ठहर जाता है, और वह वहीं, इसी देह में, ब्रह्म में स्थित हो जाता है। न प्रिय पाकर उछलता है, न अप्रिय पाकर डगमगाता है।

सुख की जड़ में दुख

कृष्ण ने बाहरी भोगों का भेद भी खोला। बोले, इन्द्रियों के स्पर्श से जो सुख जन्मते हैं, वे देखने में मीठे लगते हैं, मगर उन्हीं में दुख की जड़ छिपी रहती है। हर ऐसे सुख का एक आरम्भ है और एक अंत। जो इस आते-जाते सुख के पीछे भागता रहता है, वह कभी ठहर नहीं पाता। बुद्धिमान इस लय के पार जाता है। और जो पुरुष काम और क्रोध के वेग को यहीं, देह रहते ही, सह लेता है और थाम लेता है, वही सच्चा योगी है, वही भीतर से सुखी है।

भीतर की शान्ति

अध्याय के अंत में कृष्ण उस अवस्था का वर्णन करते हैं जिसे ब्रह्म-निर्वाण कहते हैं। बाहरी स्पर्शों से मन को हटाकर, दृष्टि को भौंहों के बीच टिकाकर, श्वास को सम करके, इन्द्रियों, मन और बुद्धि को साध लेने वाला मुनि इच्छा और भय से मुक्त हो जाता है। वह जान लेता है कि सारे यज्ञों और तपों के पीछे जो एक है, वही सबका स्वामी और सबका मित्र है। यही शान्ति ब्रह्म-निर्वाण है। और यही वह द्वार है जो अगले अध्याय के ध्यान में और गहरा खुलने वाला है।

इस अध्याय का सार एक वाक्य में। कर्म को हाथ से छोड़ना आसान है, मन से “मेरा कर्म” छोड़ना कठिन। सच्चा योगी वही है जो भीतर त्याग कर देता है, चाहे बाहर काम करता ही रहे। और जो सब में एक ही को देख लेता है, वह पानी में कमल के पत्ते-सा, संसार में रहकर भी अनछुआ रहता है।

आधार: श्रीमद्भगवद्गीता

श्लोक-दर-श्लोक

इस अध्याय के सभी 29 श्लोक: देवनागरी मूल, रोमन लिप्यन्तरण, पदच्छेद, अन्वय और सीधा अर्थ। हर श्लोक की अपनी कड़ी है, जैसे lulla.net/bhagavad-gita/5/1/। ऊपर की कथा-व्याख्या पढ़ने के बाद यहाँ मूल तक उतरिए।

5.1संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि

अर्जुन उवाच

संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥1॥

saṃnyāsaṃ karmaṇāṃ kṛṣṇa punar yogaṃ ca śaṃsasi |
yac chreya etayor ekaṃ tan me brūhi suniścitam

संन्यासम्
त्याग को
कर्मणाम्
कर्मों के
कृष्ण
हे कृष्ण
पुनः
फिर
योगम्
कर्मयोग को
च
और
शंससि
प्रशंसा करते हैं
यत्
जो
श्रेयः
कल्याणकारी, श्रेष्ठ
एतयोः
इन दोनों में
एकम्
एक
तत्
वह
मे
मुझे
ब्रूहि
कहिए
सुनिश्चितम्
निश्चित रूप से

अन्वय: कृष्ण, कर्मणाम् संन्यासम् पुनः च योगम् शंससि। एतयोः यत् एकम् श्रेयः तत् मे सुनिश्चितम् ब्रूहि।

हे कृष्ण, आप कर्मों के त्याग की प्रशंसा करते हैं और फिर कर्मयोग की भी। इन दोनों में जो एक निश्चित रूप से कल्याणकारी हो, वह हमें कहिए।

5.2संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ

श्रीभगवानुवाच

संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥2॥

saṃnyāsaḥ karmayogaś ca niḥśreyasakarāv ubhau |
tayos tu karmasaṃnyāsāt karmayogo viśiṣyate

संन्यासः
कर्मों का त्याग
कर्मयोगः
कर्मयोग
च
और
निःश्रेयसकरौ
परम कल्याण करने वाले
उभौ
दोनों
तयोः
उन दोनों में
तु
परन्तु
कर्मसंन्यासात्
कर्मों के त्याग से
कर्मयोगः
कर्मयोग
विशिष्यते
श्रेष्ठ है

अन्वय: संन्यासः च कर्मयोगः उभौ निःश्रेयसकरौ। तयोः तु कर्मसंन्यासात् कर्मयोगः विशिष्यते।

कर्मों का त्याग और कर्मयोग, दोनों ही परम कल्याण करने वाले हैं। परन्तु उन दोनों में कर्मों के त्याग से कर्मयोग श्रेष्ठ है।

5.3ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति

ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।
निर्द्वंद्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥3॥

jñeyaḥ sa nityasaṃnyāsī yo na dveṣṭi na kāṅkṣati |
nirdvaṃdvo hi mahābāho sukhaṃ bandhāt pramucyate

ज्ञेयः
जानना चाहिए
सः
वह
नित्यसंन्यासी
सदा संन्यासी
यः
जो
न
न
द्वेष्टि
द्वेष करता है
न
न
काङ्क्षति
कामना करता है
निर्द्वंद्वः
द्वन्द्वों से रहित
हि
क्योंकि
महाबाहो
हे महाबाहु
सुखम्
सुखपूर्वक
बन्धात्
बन्धन से
प्रमुच्यते
मुक्त हो जाता है

अन्वय: यः न द्वेष्टि न काङ्क्षति सः नित्यसंन्यासी ज्ञेयः। महाबाहो, निर्द्वंद्वः हि सुखम् बन्धात् प्रमुच्यते।

जो किसी से द्वेष नहीं करता और किसी की कामना नहीं करता, उसे सदा संन्यासी ही जानना चाहिए। हे महाबाहु, द्वन्द्वों से रहित पुरुष सुखपूर्वक बन्धन से मुक्त हो जाता है।

5.4सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः

सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ॥4॥

sāṃkhyayogau pṛthag bālāḥ pravadanti na paṇḍitāḥ |
ekam apy āsthitaḥ samyag ubhayor vindate phalam

सांख्ययोगौ
सांख्य और योग को
पृथक्
अलग अलग
बालाः
अज्ञानी लोग
प्रवदन्ति
कहते हैं
न
नहीं
पण्डिताः
ज्ञानी लोग
एकम्
एक में
अपि
भी
आस्थितः
स्थित पुरुष
सम्यक्
भली भाँति
उभयोः
दोनों का
विन्दते
पाता है
फलम्
फल

अन्वय: बालाः सांख्ययोगौ पृथक् प्रवदन्ति, न पण्डिताः। एकम् अपि सम्यक् आस्थितः उभयोः फलम् विन्दते।

अज्ञानी लोग सांख्य और योग को अलग अलग कहते हैं, ज्ञानी लोग ऐसा नहीं कहते। जो एक में भी भली भाँति स्थित है, वह दोनों का फल पा लेता है।

5.5यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते

यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ।
एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥5॥

yat sāṃkhyaiḥ prāpyate sthānaṃ tad yogair api gamyate |
ekaṃ sāṃkhyaṃ ca yogaṃ ca yaḥ paśyati sa paśyati

यत्
जो
सांख्यैः
ज्ञानयोगियों द्वारा
प्राप्यते
पाया जाता है
स्थानम्
स्थान, पद
तत्
वह
योगैः
कर्मयोगियों द्वारा
अपि
भी
गम्यते
पाया जाता है
एकम्
एक
सांख्यम्
सांख्य को
च
और
योगम्
योग को
च
भी
यः
जो
पश्यति
देखता है
सः
वही
पश्यति
यथार्थ देखता है

अन्वय: यत् स्थानम् सांख्यैः प्राप्यते तत् योगैः अपि गम्यते। यः सांख्यम् च योगम् च एकम् पश्यति सः पश्यति।

जो स्थान ज्ञानयोगियों द्वारा पाया जाता है, वही कर्मयोगियों द्वारा भी पाया जाता है। जो सांख्य और योग को एक देखता है, वही यथार्थ देखता है।

5.6संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः

संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥6॥

saṃnyāsas tu mahābāho duḥkham āptum ayogataḥ |
yogayukto munir brahma nacireṇādhigacchati

संन्यासः
संन्यास
तु
परन्तु
महाबाहो
हे महाबाहु
दुःखम्
कठिन
आप्तुम्
पाना
अयोगतः
कर्मयोग के बिना
योगयुक्तः
कर्मयोग में लगा
मुनिः
मननशील पुरुष
ब्रह्म
ब्रह्म को
नचिरेण
शीघ्र ही
अधिगच्छति
प्राप्त करता है

अन्वय: महाबाहो, अयोगतः तु संन्यासः आप्तुम् दुःखम्। योगयुक्तः मुनिः नचिरेण ब्रह्म अधिगच्छति।

हे महाबाहु, कर्मयोग के बिना संन्यास पाना कठिन है। कर्मयोग में लगा हुआ मननशील पुरुष शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।

5.7योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः

योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥7॥

yogayukto viśuddhātmā vijitātmā jitendriyaḥ |
sarvabhūtātmabhūtātmā kurvann api na lipyate

योगयुक्तः
कर्मयोग में लगा
विशुद्धात्मा
शुद्ध अन्तःकरण वाला
विजितात्मा
मन को जीत चुका
जितेन्द्रियः
इन्द्रियों को जीत चुका
सर्वभूतात्मभूतात्मा
सब भूतों के आत्मरूप
कुर्वन्
कर्म करता हुआ
अपि
भी
न
नहीं
लिप्यते
लिप्त होता है

अन्वय: योगयुक्तः विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन् अपि न लिप्यते।

जो कर्मयोग में लगा है, जिसका अन्तःकरण शुद्ध है, जिसने मन और इन्द्रियों को जीत लिया है और जो सब प्राणियों की आत्मा को अपनी ही आत्मा जानता है, वह कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता।

5.8नैव किं चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्

नैव किं चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन् ॥8॥

naiva kiṃ cit karomīti yukto manyeta tattvavit |
paśyañ śṛṇvan spṛśañ jighrann aśnan gacchan svapañ śvasan

न
नहीं
एव
ही
किं चित्
कुछ भी
करोमि
मैं करता हूँ
इति
ऐसा
युक्तः
योगयुक्त पुरुष
मन्येत
माने
तत्त्ववित्
तत्त्व को जानने वाला
पश्यन्
देखता हुआ
शृण्वन्
सुनता हुआ
स्पृशन्
स्पर्श करता हुआ
जिघ्रन्
सूँघता हुआ
अश्नन्
खाता हुआ
गच्छन्
चलता हुआ
स्वपन्
सोता हुआ
श्वसन्
श्वास लेता हुआ

अन्वय: तत्त्ववित् युक्तः पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन् अश्नन् गच्छन् स्वपन् श्वसन् अपि न एव किं चित् करोमि इति मन्येत।

तत्त्व को जानने वाला योगयुक्त पुरुष देखता, सुनता, स्पर्श करता, सूँघता, खाता, चलता, सोता और श्वास लेता हुआ भी यही माने कि वह कुछ भी नहीं करता।

5.9प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि

प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥9॥

pralapan visṛjan gṛhṇann unmiṣan nimiṣann api |
indriyāṇīndriyārtheṣu vartanta iti dhārayan

प्रलपन्
बोलता हुआ
विसृजन्
त्यागता हुआ
गृह्णन्
ग्रहण करता हुआ
उन्मिषन्
आँखें खोलता हुआ
निमिषन्
आँखें मूँदता हुआ
अपि
भी
इन्द्रियाणि
इन्द्रियाँ
इन्द्रियार्थेषु
इन्द्रियों के विषयों में
वर्तन्ते
बरत रही हैं
इति
ऐसा
धारयन्
धारणा रखता हुआ

अन्वय: प्रलपन् विसृजन् गृह्णन् उन्मिषन् निमिषन् अपि, इन्द्रियाणि इन्द्रियार्थेषु वर्तन्ते इति धारयन्, न एव किं चित् करोमि इति मन्येत।

बोलता, त्यागता, ग्रहण करता, आँखें खोलता और मूँदता हुआ भी वह यही धारणा रखता है कि इन्द्रियाँ ही अपने विषयों में बरत रही हैं।

5.10ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥10॥

brahmaṇy ādhāya karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā karoti yaḥ |
lipyate na sa pāpena padmapatram ivāmbhasā

ब्रह्मणि
ब्रह्म में
आधाय
अर्पण करके
कर्माणि
कर्मों को
सङ्गम्
आसक्ति को
त्यक्त्वा
छोड़कर
करोति
करता है
यः
जो
लिप्यते
लिप्त होता है
न
नहीं
सः
वह
पापेन
पाप से
पद्मपत्रम्
कमल का पत्ता
इव
जैसे
अम्भसा
जल से

अन्वय: यः कर्माणि ब्रह्मणि आधाय सङ्गम् त्यक्त्वा करोति, सः अम्भसा पद्मपत्रम् इव पापेन न लिप्यते।

जो कर्मों को ब्रह्म में अर्पण करके और आसक्ति छोड़कर करता है, वह पाप से वैसे ही लिप्त नहीं होता जैसे कमल का पत्ता जल से।

5.11कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि

कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि ।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥11॥

kāyena manasā buddhyā kevalair indriyair api |
yoginaḥ karma kurvanti saṅgaṃ tyaktvātmaśuddhaye

कायेन
शरीर से
मनसा
मन से
बुद्ध्या
बुद्धि से
केवलैः
केवल, आसक्ति रहित
इन्द्रियैः
इन्द्रियों से
अपि
भी
योगिनः
योगी लोग
कर्म
कर्म
कुर्वन्ति
करते हैं
सङ्गम्
आसक्ति को
त्यक्त्वा
छोड़कर
आत्मशुद्धये
अन्तःकरण की शुद्धि के लिए

अन्वय: योगिनः सङ्गम् त्यक्त्वा आत्मशुद्धये केवलैः कायेन मनसा बुद्ध्या इन्द्रियैः अपि कर्म कुर्वन्ति।

योगी लोग आसक्ति छोड़कर अन्तःकरण की शुद्धि के लिए केवल शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियों से कर्म करते हैं।

5.12युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्

युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥12॥

yuktaḥ karmaphalaṃ tyaktvā śāntim āpnoti naiṣṭhikīm |
ayuktaḥ kāmakāreṇa phale sakto nibadhyate

युक्तः
कर्मयोगी
कर्मफलम्
कर्म के फल को
त्यक्त्वा
छोड़कर
शान्तिम्
शान्ति को
आप्नोति
पाता है
नैष्ठिकीम्
निष्ठा से मिलने वाली, स्थिर
अयुक्तः
योग से रहित पुरुष
कामकारेण
कामना की प्रेरणा से
फले
फल में
सक्तः
आसक्त
निबध्यते
बँध जाता है

अन्वय: युक्तः कर्मफलम् त्यक्त्वा नैष्ठिकीम् शान्तिम् आप्नोति। अयुक्तः कामकारेण फले सक्तः निबध्यते।

कर्मयोगी कर्म के फल को छोड़कर स्थिर शान्ति पाता है। योग से रहित पुरुष कामना की प्रेरणा से फल में आसक्त होकर बँध जाता है।

5.13सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी

सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥13॥

sarvakarmāṇi manasā saṃnyasyāste sukhaṃ vaśī |
navadvāre pure dehī naiva kurvan na kārayan

सर्वकर्माणि
सब कर्मों को
मनसा
मन से
संन्यस्य
त्याग करके
आस्ते
रहता है
सुखम्
सुखपूर्वक
वशी
संयमी पुरुष
नवद्वारे
नौ द्वारों वाले
पुरे
नगर में, शरीर में
देही
देहधारी
न
न
एव
ही
कुर्वन्
करता हुआ
न
न
कारयन्
कराता हुआ

अन्वय: वशी देही सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्य न एव कुर्वन् न कारयन् नवद्वारे पुरे सुखम् आस्ते।

संयमी देहधारी सब कर्मों को मन से त्याग कर नौ द्वारों वाले शरीर रूपी नगर में सुखपूर्वक रहता है, न कुछ करता हुआ और न कराता हुआ।

5.14न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥14॥

na kartṛtvaṃ na karmāṇi lokasya sṛjati prabhuḥ |
na karmaphalasaṃyogaṃ svabhāvas tu pravartate

न
न
कर्तृत्वम्
कर्तापन को
न
न
कर्माणि
कर्मों को
लोकस्य
लोगों के लिए
सृजति
रचता है
प्रभुः
प्रभु, आत्मा
न
न
कर्मफलसंयोगम्
कर्मफल के संयोग को
स्वभावः
स्वभाव, प्रकृति
तु
ही
प्रवर्तते
प्रवृत्त होता है

अन्वय: प्रभुः लोकस्य न कर्तृत्वम् न कर्माणि न कर्मफलसंयोगम् सृजति। स्वभावः तु प्रवर्तते।

प्रभु लोगों के लिए न कर्तापन रचते हैं, न कर्मों को और न कर्मफल के संयोग को। स्वभाव ही प्रवृत्त होता है।

5.15नादत्ते कस्य चित्पापं न चैव सुकृतं विभुः

नादत्ते कस्य चित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥15॥

nādatte kasya cit pāpaṃ na caiva sukṛtaṃ vibhuḥ |
ajñānenāvṛtaṃ jñānaṃ tena muhyanti jantavaḥ

न
न
आदत्ते
ग्रहण करते हैं
कस्य चित्
किसी के
पापम्
पाप को
न
न
च
और
एव
ही
सुकृतम्
पुण्य को
विभुः
सर्वव्यापी प्रभु
अज्ञानेन
अज्ञान से
आवृतम्
ढका हुआ
ज्ञानम्
ज्ञान
तेन
उससे
मुह्यन्ति
मोहित होते हैं
जन्तवः
जीव

अन्वय: विभुः कस्य चित् पापम् न आदत्ते, न च एव सुकृतम्। ज्ञानम् अज्ञानेन आवृतम्, तेन जन्तवः मुह्यन्ति।

सर्वव्यापी प्रभु न किसी का पाप ग्रहण करते हैं और न ही पुण्य। ज्ञान अज्ञान से ढका हुआ है, इसी से जीव मोहित होते हैं।

5.16ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः

ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥16॥

jñānena tu tad ajñānaṃ yeṣāṃ nāśitam ātmanaḥ |
teṣām ādityavaj jñānaṃ prakāśayati tatparam

ज्ञानेन
ज्ञान से
तु
परन्तु
तत्
वह
अज्ञानम्
अज्ञान
येषाम्
जिनका
नाशितम्
नष्ट हो गया
आत्मनः
आत्मा के
तेषाम्
उनका
आदित्यवत्
सूर्य के समान
ज्ञानम्
ज्ञान
प्रकाशयति
प्रकाशित करता है
तत्
उस
परम्
परम तत्त्व को

अन्वय: येषाम् तु तत् अज्ञानम् आत्मनः ज्ञानेन नाशितम्, तेषाम् ज्ञानम् आदित्यवत् तत् परम् प्रकाशयति।

परन्तु जिनका वह अज्ञान आत्मज्ञान से नष्ट हो गया है, उनका ज्ञान सूर्य के समान उस परम तत्त्व को प्रकाशित कर देता है।

5.17तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः

तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥17॥

tadbuddhayas tadātmānas tanniṣṭhās tatparāyaṇāḥ |
gacchanty apunarāvṛttiṃ jñānanirdhūtakalmaṣāḥ

तद्बुद्धयः
उसमें बुद्धि लगाए हुए
तदात्मानः
उसमें मन लगाए हुए
तन्निष्ठाः
उसमें निष्ठा रखने वाले
तत्परायणाः
उसे ही परम आश्रय मानने वाले
गच्छन्ति
जाते हैं
अपुनरावृत्तिम्
जहाँ से फिर लौटना नहीं
ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः
ज्ञान से पाप धो चुके

अन्वय: तद्बुद्धयः तदात्मानः तन्निष्ठाः तत्परायणाः ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः अपुनरावृत्तिम् गच्छन्ति।

जिनकी बुद्धि उसमें लगी है, जिनका मन उसमें लगा है, जिनकी निष्ठा उसमें है और जो उसे ही परम आश्रय मानते हैं, वे ज्ञान से पापों को धोकर उस गति को पाते हैं जहाँ से फिर लौटना नहीं होता।

5.18विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि

विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥18॥

vidyāvinayasaṃpanne brāhmaṇe gavi hastini |
śuni caiva śvapāke ca paṇḍitāḥ samadarśinaḥ

विद्याविनयसंपन्ने
विद्या और विनय से युक्त
ब्राह्मणे
ब्राह्मण में
गवि
गौ में
हस्तिनि
हाथी में
शुनि
कुत्ते में
च
और
एव
भी
श्वपाके
चाण्डाल में
च
और
पण्डिताः
ज्ञानी लोग
समदर्शिनः
समान देखने वाले

अन्वय: पण्डिताः विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि शुनि च एव श्वपाके च समदर्शिनः।

ज्ञानी लोग विद्या और विनय से युक्त ब्राह्मण में, गौ में, हाथी में, कुत्ते में और चाण्डाल में भी समान ही देखते हैं।

5.19इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥19॥

ihaiva tair jitaḥ sargo yeṣāṃ sāmye sthitaṃ manaḥ |
nirdoṣaṃ hi samaṃ brahma tasmād brahmaṇi te sthitāḥ

इह
यहाँ
एव
ही
तैः
उनके द्वारा
जितः
जीत लिया गया
सर्गः
संसार, जन्म
येषाम्
जिनका
साम्ये
समता में
स्थितम्
स्थित
मनः
मन
निर्दोषम्
दोष रहित
हि
क्योंकि
समम्
सम
ब्रह्म
ब्रह्म
तस्मात्
इसलिए
ब्रह्मणि
ब्रह्म में
ते
वे
स्थिताः
स्थित हैं

अन्वय: येषाम् मनः साम्ये स्थितम्, तैः इह एव सर्गः जितः। ब्रह्म हि निर्दोषम् समम्, तस्मात् ते ब्रह्मणि स्थिताः।

जिनका मन समता में स्थित है, उन्होंने यहीं संसार को जीत लिया है। क्योंकि ब्रह्म दोष रहित और सम है, इसलिए वे ब्रह्म में ही स्थित हैं।

5.20न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्

न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।
स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥20॥

na prahṛṣyet priyaṃ prāpya nodvijet prāpya cāpriyam |
sthirabuddhir asaṃmūḍho brahmavid brahmaṇi sthitaḥ

न
न
प्रहृष्येत्
हर्षित हो
प्रियम्
प्रिय को
प्राप्य
पाकर
न
न
उद्विजेत्
उद्विग्न हो
प्राप्य
पाकर
च
और
अप्रियम्
अप्रिय को
स्थिरबुद्धिः
स्थिर बुद्धि वाला
असंमूढः
मोह से रहित
ब्रह्मवित्
ब्रह्म को जानने वाला
ब्रह्मणि
ब्रह्म में
स्थितः
स्थित

अन्वय: स्थिरबुद्धिः असंमूढः ब्रह्मवित् ब्रह्मणि स्थितः प्रियम् प्राप्य न प्रहृष्येत्, अप्रियम् च प्राप्य न उद्विजेत्।

स्थिर बुद्धि वाला, मोह से रहित, ब्रह्म को जानने वाला और ब्रह्म में स्थित पुरुष प्रिय को पाकर हर्षित न हो और अप्रिय को पाकर उद्विग्न न हो।

5.21बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्

बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् ।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥21॥

bāhyasparśeṣv asaktātmā vindaty ātmani yat sukham |
sa brahmayogayuktātmā sukham akṣayam aśnute

बाह्यस्पर्शेषु
बाहरी विषयों में
असक्तात्मा
अनासक्त मन वाला
विन्दति
पाता है
आत्मनि
आत्मा में
यत्
जो
सुखम्
सुख
सः
वह
ब्रह्मयोगयुक्तात्मा
ब्रह्म के ध्यान में लगा हुआ
सुखम्
सुख को
अक्षयम्
अक्षय
अश्नुते
भोगता है

अन्वय: बाह्यस्पर्शेषु असक्तात्मा आत्मनि यत् सुखम् विन्दति, सः ब्रह्मयोगयुक्तात्मा अक्षयम् सुखम् अश्नुते।

जिसका मन बाहरी विषयों में अनासक्त है, वह आत्मा में जो सुख है उसे पाता है। ब्रह्म के योग में लगा हुआ वह पुरुष अक्षय सुख भोगता है।

5.22ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते

ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥22॥

ye hi saṃsparśajā bhogā duḥkhayonaya eva te |
ādyantavantaḥ kaunteya na teṣu ramate budhaḥ

ये
जो
हि
क्योंकि
संस्पर्शजाः
विषय संयोग से उत्पन्न
भोगाः
भोग
दुःखयोनयः
दुःख के कारण
एव
ही
ते
वे
आद्यन्तवन्तः
आदि और अन्त वाले
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
न
नहीं
तेषु
उनमें
रमते
रमता है
बुधः
ज्ञानी पुरुष

अन्वय: कौन्तेय, ये हि संस्पर्शजाः भोगाः ते दुःखयोनयः एव आद्यन्तवन्तः। बुधः तेषु न रमते।

हे कुन्तीपुत्र, इन्द्रियों और विषयों के संयोग से उत्पन्न जो भोग हैं, वे दुःख के ही कारण हैं और आदि तथा अन्त वाले हैं। ज्ञानी पुरुष उनमें नहीं रमता।

5.23शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्

शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥23॥

śaknotīhaiva yaḥ soḍhuṃ prāk śarīravimokṣaṇāt |
kāmakrodhodbhavaṃ vegaṃ sa yuktaḥ sa sukhī naraḥ

शक्नोति
समर्थ है
इह
यहाँ
एव
ही
यः
जो
सोढुम्
सहने में
प्राक्
पहले
शरीरविमोक्षणात्
शरीर छूटने से
कामक्रोधोद्भवम्
काम और क्रोध से उत्पन्न
वेगम्
वेग को
सः
वह
युक्तः
योगी
सः
वह
सुखी
सुखी
नरः
मनुष्य

अन्वय: यः इह एव शरीरविमोक्षणात् प्राक् कामक्रोधोद्भवम् वेगम् सोढुम् शक्नोति, सः नरः युक्तः, सः सुखी।

जो मनुष्य यहीं, शरीर छूटने से पहले, काम और क्रोध से उत्पन्न वेग को सहने में समर्थ है, वही योगी है और वही सुखी है।

5.24योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः

योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥24॥

yo ’ntaḥsukho ’ntarārāmas tathāntarjyotir eva yaḥ |
sa yogī brahmanirvāṇaṃ brahmabhūto ’dhigacchati

यः
जो
अन्तःसुखः
भीतर ही सुखी
अन्तरारामः
भीतर ही रमण करने वाला
तथा
और
अन्तर्ज्योतिः
भीतर ही प्रकाश वाला
एव
ही
यः
जो
सः
वह
योगी
योगी
ब्रह्मनिर्वाणम्
ब्रह्म में लय, ब्रह्मरूप मोक्ष
ब्रह्मभूतः
ब्रह्मरूप हुआ
अधिगच्छति
प्राप्त करता है

अन्वय: यः अन्तःसुखः अन्तरारामः तथा यः अन्तर्ज्योतिः एव, सः योगी ब्रह्मभूतः ब्रह्मनिर्वाणम् अधिगच्छति।

जो भीतर ही सुखी है, भीतर ही रमण करता है और जिसका प्रकाश भीतर ही है, वह योगी ब्रह्मरूप होकर ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त करता है।

5.25लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥25॥

labhante brahmanirvāṇam ṛṣayaḥ kṣīṇakalmaṣāḥ |
chinnadvaidhā yatātmānaḥ sarvabhūtahite ratāḥ

लभन्ते
पाते हैं
ब्रह्मनिर्वाणम्
ब्रह्मनिर्वाण को
ऋषयः
ऋषि लोग
क्षीणकल्मषाः
जिनके पाप क्षीण हो गए
छिन्नद्वैधाः
जिनके संशय कट गए
यतात्मानः
संयत मन वाले
सर्वभूतहिते
सब प्राणियों के हित में
रताः
लगे हुए

अन्वय: क्षीणकल्मषाः छिन्नद्वैधाः यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ऋषयः ब्रह्मनिर्वाणम् लभन्ते।

जिनके पाप क्षीण हो गए हैं, जिनके संशय कट गए हैं, जिनका मन संयत है और जो सब प्राणियों के हित में लगे हैं, वे ऋषि ब्रह्मनिर्वाण को पाते हैं।

5.26कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्

कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ॥26॥

kāmakrodhaviyuktānāṃ yatīnāṃ yatacetasām |
abhito brahmanirvāṇaṃ vartate viditātmanām

कामक्रोधवियुक्तानाम्
काम और क्रोध से रहित
यतीनाम्
यतियों के
यतचेतसाम्
संयत चित्त वाले
अभितः
सब ओर, दोनों ओर
ब्रह्मनिर्वाणम्
ब्रह्मनिर्वाण
वर्तते
विद्यमान रहता है
विदितात्मनाम्
आत्मा को जान चुके

अन्वय: कामक्रोधवियुक्तानाम् यतचेतसाम् विदितात्मनाम् यतीनाम् अभितः ब्रह्मनिर्वाणम् वर्तते।

काम और क्रोध से रहित, संयत चित्त वाले और आत्मा को जान चुके यतियों के लिए ब्रह्मनिर्वाण सब ओर से विद्यमान रहता है।

5.27स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः

स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥27॥

sparśān kṛtvā bahir bāhyāṃś cakṣuś caivāntare bhruvoḥ |
prāṇāpānau samau kṛtvā nāsābhyantaracāriṇau

स्पर्शान्
विषयों को
कृत्वा
करके
बहिः
बाहर
बाह्यान्
बाहरी
चक्षुः
दृष्टि को
च
और
एव
ही
अन्तरे
मध्य में
भ्रुवोः
भौंहों के
प्राणापानौ
प्राण और अपान को
समौ
सम
कृत्वा
करके
नासाभ्यन्तरचारिणौ
नासिका के भीतर चलने वाले

अन्वय: बाह्यान् स्पर्शान् बहिः कृत्वा, चक्षुः च एव भ्रुवोः अन्तरे कृत्वा, नासाभ्यन्तरचारिणौ प्राणापानौ समौ कृत्वा।

बाहरी विषयों को बाहर ही रखकर, दृष्टि को भौंहों के मध्य में स्थिर करके, और नासिका के भीतर चलने वाले प्राण तथा अपान को सम करके।

5.28यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः

यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥28॥

yatendriyamanobuddhir munir mokṣaparāyaṇaḥ |
vigatecchābhayakrodho yaḥ sadā mukta eva saḥ

यतेन्द्रियमनोबुद्धिः
इन्द्रिय, मन, बुद्धि जिसके वश में
मुनिः
मुनि
मोक्षपरायणः
मोक्ष को परम लक्ष्य मानने वाला
विगतेच्छाभयक्रोधः
इच्छा, भय और क्रोध से रहित
यः
जो
सदा
सदा
मुक्तः
मुक्त
एव
ही
सः
वह

अन्वय: यः मुनिः यतेन्द्रियमनोबुद्धिः मोक्षपरायणः विगतेच्छाभयक्रोधः, सः सदा मुक्तः एव।

जो मुनि इन्द्रियों, मन और बुद्धि को वश में किए हुए है, मोक्ष को ही परम लक्ष्य मानता है और इच्छा, भय तथा क्रोध से रहित है, वह सदा मुक्त ही है।

5.29भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥29॥

bhoktāraṃ yajñatapasāṃ sarvalokamaheśvaram |
suhṛdaṃ sarvabhūtānāṃ jñātvā māṃ śāntim ṛcchati

भोक्तारम्
भोगने वाला
यज्ञतपसाम्
यज्ञों और तपों का
सर्वलोकमहेश्वरम्
सब लोकों का महान ईश्वर
सुहृदम्
सुहृद, हितैषी
सर्वभूतानाम्
सब प्राणियों का
ज्ञात्वा
जानकर
माम्
मुझको
शान्तिम्
शान्ति को
ऋच्छति
पाता है

अन्वय: माम् यज्ञतपसाम् भोक्तारम् सर्वलोकमहेश्वरम् सर्वभूतानाम् सुहृदम् ज्ञात्वा शान्तिम् ऋच्छति।

मुझे यज्ञों और तपों का भोक्ता, सब लोकों का महान ईश्वर और सब प्राणियों का सुहृद जानकर वह शान्ति पाता है।