लुल्ला परिवारLulla Family
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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

राग धनासरी

राग · M1-M5 + भगत

राग धनासरी

शाम का स्थिर राग, बैठ कर सुनने वाला।

धनासरी राग शाम का है, स्थिर, बैठ कर सुनने वाला। उत्तरी और दक्षिणी दोनों शास्त्रीय परम्पराओं में इसकी मान्यता है, और दोनों स्वरूप कुछ-कुछ भिन्न हैं।

ढलती दोपहर की धूप में पकी गेहूँ की फ़सल: राग धनासरी

ग्रंथ में धनासरी की रचनाएँ अंग छह-सौ-साठ के क़रीब से शुरू होती हैं और सात-सौ के क़रीब तक चलती हैं। गुरु अर्जन और गुरु राम दास दोनों ने इस राग में बहु-रचनाएँ कीं।

"गगन मै थालु रवि चंदु दीपक बने तारिका मंडल जनक मोती ॥" धनासरी M1, आरती
इस राग के सब अंग

इस राग के शबद

हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।

महला 1 (14)
  1. दूख विसारणु सेविआ सदा सदा दातारु ॥1॥अंग 660
  2. हम आदमी हां इक दमी मुहलति मुहतु न जाणा ॥अंग 660
  3. किउ सिमरी सिवरिआ नही जाइ ॥अंग 661
  4. नदरि करे ता सिमरिआ जाइ ॥अंग 661
  5. तपि तपि खपै बहुतु बेकार ॥अंग 661
  6. चोरु सलाहे चीतु न भीजै ॥अंग 662
  7. काइआ कागदु मनु परवाणा ॥अंग 662
  8. कालु नाही जोगु नाही नाही सत का ढबु ॥अंग 662
  9. गगन मै थालु रवि चंदु दीपक बने तारिका मंडल जनक मोती ॥अंग 663
  10. गुरु सागरु रतनी भरपूरे ॥अंग 685
  11. सहजि मिलै मिलिआ परवाणु ॥अंग 686
  12. तीरथि नावण जाउ तीरथु नामु है ॥अंग 687
  13. गुर गिआनु अपारा सिरजणहारा जिनि सिरजी तिनि गोई ॥अंग 688
  14. लेखु न मिटई पुरबि कमाइआ किआ जाणा किआ होसी ॥अंग 689
महला 3 (9)
  1. इहु धनु अखुटु न निखुटै न जाइ ॥अंग 663
  2. हरि नामु धनु निरमलु अति अपारा ॥अंग 664
  3. सदा धनु अंतरि नामु समाले ॥अंग 664
  4. जगु मैला मैलो होइ जाइ ॥अंग 664
  5. जो हरि सेवहि तिन बलि जाउ ॥अंग 665
  6. मनु मरै धातु मरि जाइ ॥अंग 665
  7. काचा धनु संचहि मूरख गावार ॥अंग 665
  8. नावै की कीमति मिति कही न जाइ ॥अंग 666
  9. हम भीखक भेखारी तेरे तू निज पति है दाता ॥अंग 666
महला 4 (13)
  1. जो हरि सेवहि संत भगत तिन के सभि पाप निवारी ॥अंग 666
  2. हरि के संत जना हरि जपिओ तिन का दूखु भरमु भउ भागी ॥अंग 667
  3. हरि का संतु सतगुरु सत पुरखा जो बोलै हरि हरि बानी ॥अंग 667
  4. हम अंधुले अंध बिखै बिखु राते किउ चालह गुर चाली ॥अंग 667
  5. हरि हरि बूंद भए हरि सुआमी हम चात्रिक बिलल बिललाती ॥अंग 668
  6. कलिजुग का धरमु कहहु तुम भाई किव छूटह हम छुटकाकी ॥अंग 668
  7. उर धारि बीचारि मुरारि रमो रमु मनमोहन नामु जपीने ॥अंग 668
  8. हरि पड़ु हरि लिखु हरि जपि हरि गाउ हरि भउजलु पारि उतारी ॥अंग 669
  9. गुर प्रसादि को विरला पावै जिन कउ लिलाटि लिखिआ धुरि भाउ ॥1॥अंग 669
  10. सेवक सिख पूजण सभि आवहि सभि गावहि हरि हरि ऊतम बानी ॥अंग 669
  11. इछा पूरकु सरब सुखदाता हरि जा कै वसि है कामधेना ॥अंग 669
  12. मेरे साहा मै हरि दरसन सुखु होइ ॥अंग 670
  13. गुण गाइ विगसै सदा अनदिनु जा आपि साचे भावए ॥अंग 690
महला 5 (60)
  1. भव खंडन दुख भंजन स्वामी भगति वछल निरंकारे ॥अंग 670
  2. बिनु जल प्रान तजे है मीना जिनि जल सिउ हेतु बढाइओ ॥अंग 670
  3. करि किरपा दीओ मोहि नामा बंधन ते छुटकाए ॥अंग 671
  4. जब ते दरसन भेटे साधू भले दिनस ओइ आए ॥अंग 671
  5. जिस का तनु मनु धनु सभु तिस का सोई सुघड़ु सुजानी ॥अंग 671
  6. वडे वडे राजन अरु भूमन ता की त्रिसन न बूझी ॥अंग 672
  7. लवै न लागन कउ है कछूऐ जा कउ फिरि इहु धावै ॥अंग 672
  8. बारि जाउ गुर अपुने ऊपरि जिनि हरि हरि नामु द्रिड़॑ाया ॥अंग 672
  9. जिह करणी होवहि सरमिंदा इहा कमानी रीति ॥अंग 673
  10. पानी पखा पीसउ संत आगै गुण गोविंद जसु गाई ॥अंग 673
  11. जिनि कीने वसि अपुनै त्रै गुण भवण चतुर संसारा ॥अंग 673
  12. तुम दाते ठाकुर प्रतिपालक नाइक खसम हमारे ॥अंग 673
  13. पूजा वरत तिलक इसनाना पुंन दान बहु दैन ॥अंग 674
  14. बंधन ते छुटकावै प्रभू मिलावै हरि हरि नामु सुनावै ॥अंग 674
  15. हरि हरि लीने संत उबारि ॥अंग 674
  16. अब हरि राखनहारु चितारिआ ॥अंग 674
  17. मेरा लागो राम सिउ हेतु ॥अंग 675
  18. अउखधु तेरो नामु दइआल ॥अंग 675
  19. हा हा प्रभ राखि लेहु ॥अंग 675
  20. दीन दरद निवारि ठाकुर राखै जन की आपि ॥अंग 675
  21. फिरत फिरत भेटे जन साधू पूरै गुरि समझाइआ ॥अंग 676
  22. छोडि जाहि से करहि पराल ॥अंग 676
  23. मोहि मसकीन प्रभु नामु अधारु ॥अंग 676
  24. सो कत डरै जि खसमु सम॑ारै ॥अंग 677
  25. घरि बाहरि तेरा भरवासा तू जन कै है संगि ॥अंग 677
  26. सगल मनोरथ प्रभ ते पाए कंठि लाइ गुरि राखे ॥अंग 677
  27. जह जह पेखउ तह हजूरि दूरि कतहु न जाई ॥अंग 677
  28. जिनि तुम भेजे तिनहि बुलाए सुख सहज सेती घरि आउ ॥अंग 678
  29. तिसु सिउ न लाईऐ हीतु जा को किछु नाही बीतु अंत की बार ओहु संगि न चालै ॥अंग 678
  30. मेरे लाल भलो रे भलो रे भलो हरि मंगना ॥अंग 678
  31. हरि एकु सिमरि एकु सिमरि एकु सिमरि पिआरे ॥अंग 679
  32. सिमरउ सिमरि सिमरि सुख पावउ सासि सासि समाले ॥अंग 679
  33. भए क्रिपाल दइआल गोबिंदा अंम्रितु रिदै सिंचाई ॥अंग 679
  34. दरबवंतु दरबु देखि गरबै भूमवंतु अभिमानी ॥अंग 679
  35. जा कउ हरि रंगु लागो इसु जुग महि सो कहीअत है सूरा ॥अंग 679
  36. जतन करै मानुख डहकावै ओहु अंतरजामी जानै ॥अंग 680
  37. नामु गुरि दीओ है अपुनै जा कै मसतकि करमा ॥अंग 680
  38. नेत्र पुनीत भए दरस पेखे माथै परउ रवाल ॥अंग 680
  39. अपनी उकति खलावै भोजन अपनी उकति खेलावै ॥अंग 680
  40. संत क्रिपाल दइआल दमोदर काम क्रोध बिखु जारे ॥अंग 680
  41. छडाइ लीओ महा बली ते अपने चरन पराति ॥अंग 681
  42. पर हरना लोभु झूठ निंद इव ही करत गुदारी ॥अंग 681
  43. सिमरि सिमरि सुआमी प्रभु अपना सीतल तनु मनु छाती ॥अंग 681
  44. दूत दुसमन सभि तुझ ते निवरहि प्रगट प्रतापु तुमारा ॥अंग 681
  45. चतुर दिसा कीनो बलु अपना सिर ऊपरि करु धारिओ ॥अंग 681
  46. अउखी घड़ी न देखण देई अपना बिरदु समाले ॥अंग 682
  47. जिस कउ बिसरै प्रानपति दाता सोई गनहु अभागा ॥अंग 682
  48. जन के पूरन होए काम ॥अंग 682
  49. मांगउ राम ते इकु दानु ॥अंग 682
  50. मांगउ राम ते सभि थोक ॥अंग 682
  51. त्रिसना बुझै हरि कै नामि ॥अंग 682
  52. जन की कीनी पारब्रहमि सार ॥अंग 683
  53. हरि चरन सरन गोबिंद दुख भंजना दास अपुने कउ नामु देवहु ॥अंग 683
  54. हलति सुखु पलति सुखु नित सुखु सिमरनो नामु गोबिंद का सदा लीजै ॥अंग 683
  55. बंदना हरि बंदना गुण गावहु गोपाल राइ ॥ रहाउ ॥अंग 683
  56. त्रिपति भई सचु भोजनु खाइआ ॥अंग 684
  57. गुर के चरन जीअ का निसतारा ॥अंग 684
  58. कितै प्रकारि न तूटउ प्रीति ॥ दास तेरे की निरमल रीति ॥1॥ रहाउ ॥अंग 684
  59. जो जो जूनी आइओ तिह तिह उरझाइओ माणस जनमु संजोगि पाइआ ॥अंग 686
  60. भजु संगि साधू इकु अराधू जनम मरन दुख नासए ॥अंग 691
महला 9 (4)
  1. काहे रे बन खोजन जाई ॥अंग 684
  2. साधो इहु जगु भरम भुलाना ॥अंग 684
  3. तिह जोगी कउ जुगति न जानउ ॥अंग 685
  4. अब मै कउनु उपाउ करउ ॥अंग 685
भगत कबीर जी (5)
  1. सनक सनंद महेस समानां ॥ सेखनागि तेरो मरमु न जानां ॥1॥अंग 691
  2. दिन ते पहर पहर ते घरीआं आव घटै तनु छीजै ॥अंग 692
  3. जो जनु भाउ भगति कछु जानै ता कउ अचरजु काहो ॥अंग 692
  4. इंद्र लोक सिव लोकहि जैबो ॥अंग 692
  5. राम सिमरि राम सिमरि राम सिमरि भाई ॥अंग 692
भगत नामदेव जी (5)
  1. गहरी करि कै नीव खुदाई ऊपरि मंडप छाए ॥अंग 692
  2. दस बैरागनि मोहि बसि कीन॑ी पंचहु का मिट नावउ ॥अंग 693
  3. मारवाड़ि जैसे नीरु बालहा बेलि बालहा करहला ॥अंग 693
  4. पहिल पुरीए पुंडरक वना ॥अंग 693
  5. पतित पावन माधउ बिरदु तेरा ॥अंग 694
भगत रविदास जी (3)
  1. धनासरी भगत रविदास जी कीअंग 694
  2. चित सिमरनु करउ नैन अविलोकनो स्रवन बानी सुजसु पूरि राखउ ॥अंग 694
  3. नामु तेरो आरती मजनु मुरारे ॥अंग 694
अन्य भगत (4)
  1. नाराइण निंदसि काइ भूली गवारी ॥अंग 695
  2. स्री सैणु ॥अंग 695
  3. कायउ देवा काइअउ देवल काइअउ जंगम जाती ॥अंग 695
  4. गोपाल तेरा आरता ॥अंग 695

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