राग धनासरी
शाम का स्थिर राग, बैठ कर सुनने वाला।
धनासरी राग शाम का है, स्थिर, बैठ कर सुनने वाला। उत्तरी और दक्षिणी दोनों शास्त्रीय परम्पराओं में इसकी मान्यता है, और दोनों स्वरूप कुछ-कुछ भिन्न हैं।

ग्रंथ में धनासरी की रचनाएँ अंग छह-सौ-साठ के क़रीब से शुरू होती हैं और सात-सौ के क़रीब तक चलती हैं। गुरु अर्जन और गुरु राम दास दोनों ने इस राग में बहु-रचनाएँ कीं।
"गगन मै थालु रवि चंदु दीपक बने तारिका मंडल जनक मोती ॥" धनासरी M1, आरती
इस राग के सब अंग
इस राग के शबद
हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।
महला 1 (14)
- दूख विसारणु सेविआ सदा सदा दातारु ॥1॥अंग 660
- हम आदमी हां इक दमी मुहलति मुहतु न जाणा ॥अंग 660
- किउ सिमरी सिवरिआ नही जाइ ॥अंग 661
- नदरि करे ता सिमरिआ जाइ ॥अंग 661
- तपि तपि खपै बहुतु बेकार ॥अंग 661
- चोरु सलाहे चीतु न भीजै ॥अंग 662
- काइआ कागदु मनु परवाणा ॥अंग 662
- कालु नाही जोगु नाही नाही सत का ढबु ॥अंग 662
- गगन मै थालु रवि चंदु दीपक बने तारिका मंडल जनक मोती ॥अंग 663
- गुरु सागरु रतनी भरपूरे ॥अंग 685
- सहजि मिलै मिलिआ परवाणु ॥अंग 686
- तीरथि नावण जाउ तीरथु नामु है ॥अंग 687
- गुर गिआनु अपारा सिरजणहारा जिनि सिरजी तिनि गोई ॥अंग 688
- लेखु न मिटई पुरबि कमाइआ किआ जाणा किआ होसी ॥अंग 689
महला 3 (9)
- इहु धनु अखुटु न निखुटै न जाइ ॥अंग 663
- हरि नामु धनु निरमलु अति अपारा ॥अंग 664
- सदा धनु अंतरि नामु समाले ॥अंग 664
- जगु मैला मैलो होइ जाइ ॥अंग 664
- जो हरि सेवहि तिन बलि जाउ ॥अंग 665
- मनु मरै धातु मरि जाइ ॥अंग 665
- काचा धनु संचहि मूरख गावार ॥अंग 665
- नावै की कीमति मिति कही न जाइ ॥अंग 666
- हम भीखक भेखारी तेरे तू निज पति है दाता ॥अंग 666
महला 4 (13)
- जो हरि सेवहि संत भगत तिन के सभि पाप निवारी ॥अंग 666
- हरि के संत जना हरि जपिओ तिन का दूखु भरमु भउ भागी ॥अंग 667
- हरि का संतु सतगुरु सत पुरखा जो बोलै हरि हरि बानी ॥अंग 667
- हम अंधुले अंध बिखै बिखु राते किउ चालह गुर चाली ॥अंग 667
- हरि हरि बूंद भए हरि सुआमी हम चात्रिक बिलल बिललाती ॥अंग 668
- कलिजुग का धरमु कहहु तुम भाई किव छूटह हम छुटकाकी ॥अंग 668
- उर धारि बीचारि मुरारि रमो रमु मनमोहन नामु जपीने ॥अंग 668
- हरि पड़ु हरि लिखु हरि जपि हरि गाउ हरि भउजलु पारि उतारी ॥अंग 669
- गुर प्रसादि को विरला पावै जिन कउ लिलाटि लिखिआ धुरि भाउ ॥1॥अंग 669
- सेवक सिख पूजण सभि आवहि सभि गावहि हरि हरि ऊतम बानी ॥अंग 669
- इछा पूरकु सरब सुखदाता हरि जा कै वसि है कामधेना ॥अंग 669
- मेरे साहा मै हरि दरसन सुखु होइ ॥अंग 670
- गुण गाइ विगसै सदा अनदिनु जा आपि साचे भावए ॥अंग 690
महला 5 (60)
- भव खंडन दुख भंजन स्वामी भगति वछल निरंकारे ॥अंग 670
- बिनु जल प्रान तजे है मीना जिनि जल सिउ हेतु बढाइओ ॥अंग 670
- करि किरपा दीओ मोहि नामा बंधन ते छुटकाए ॥अंग 671
- जब ते दरसन भेटे साधू भले दिनस ओइ आए ॥अंग 671
- जिस का तनु मनु धनु सभु तिस का सोई सुघड़ु सुजानी ॥अंग 671
- वडे वडे राजन अरु भूमन ता की त्रिसन न बूझी ॥अंग 672
- लवै न लागन कउ है कछूऐ जा कउ फिरि इहु धावै ॥अंग 672
- बारि जाउ गुर अपुने ऊपरि जिनि हरि हरि नामु द्रिड़॑ाया ॥अंग 672
- जिह करणी होवहि सरमिंदा इहा कमानी रीति ॥अंग 673
- पानी पखा पीसउ संत आगै गुण गोविंद जसु गाई ॥अंग 673
- जिनि कीने वसि अपुनै त्रै गुण भवण चतुर संसारा ॥अंग 673
- तुम दाते ठाकुर प्रतिपालक नाइक खसम हमारे ॥अंग 673
- पूजा वरत तिलक इसनाना पुंन दान बहु दैन ॥अंग 674
- बंधन ते छुटकावै प्रभू मिलावै हरि हरि नामु सुनावै ॥अंग 674
- हरि हरि लीने संत उबारि ॥अंग 674
- अब हरि राखनहारु चितारिआ ॥अंग 674
- मेरा लागो राम सिउ हेतु ॥अंग 675
- अउखधु तेरो नामु दइआल ॥अंग 675
- हा हा प्रभ राखि लेहु ॥अंग 675
- दीन दरद निवारि ठाकुर राखै जन की आपि ॥अंग 675
- फिरत फिरत भेटे जन साधू पूरै गुरि समझाइआ ॥अंग 676
- छोडि जाहि से करहि पराल ॥अंग 676
- मोहि मसकीन प्रभु नामु अधारु ॥अंग 676
- सो कत डरै जि खसमु सम॑ारै ॥अंग 677
- घरि बाहरि तेरा भरवासा तू जन कै है संगि ॥अंग 677
- सगल मनोरथ प्रभ ते पाए कंठि लाइ गुरि राखे ॥अंग 677
- जह जह पेखउ तह हजूरि दूरि कतहु न जाई ॥अंग 677
- जिनि तुम भेजे तिनहि बुलाए सुख सहज सेती घरि आउ ॥अंग 678
- तिसु सिउ न लाईऐ हीतु जा को किछु नाही बीतु अंत की बार ओहु संगि न चालै ॥अंग 678
- मेरे लाल भलो रे भलो रे भलो हरि मंगना ॥अंग 678
- हरि एकु सिमरि एकु सिमरि एकु सिमरि पिआरे ॥अंग 679
- सिमरउ सिमरि सिमरि सुख पावउ सासि सासि समाले ॥अंग 679
- भए क्रिपाल दइआल गोबिंदा अंम्रितु रिदै सिंचाई ॥अंग 679
- दरबवंतु दरबु देखि गरबै भूमवंतु अभिमानी ॥अंग 679
- जा कउ हरि रंगु लागो इसु जुग महि सो कहीअत है सूरा ॥अंग 679
- जतन करै मानुख डहकावै ओहु अंतरजामी जानै ॥अंग 680
- नामु गुरि दीओ है अपुनै जा कै मसतकि करमा ॥अंग 680
- नेत्र पुनीत भए दरस पेखे माथै परउ रवाल ॥अंग 680
- अपनी उकति खलावै भोजन अपनी उकति खेलावै ॥अंग 680
- संत क्रिपाल दइआल दमोदर काम क्रोध बिखु जारे ॥अंग 680
- छडाइ लीओ महा बली ते अपने चरन पराति ॥अंग 681
- पर हरना लोभु झूठ निंद इव ही करत गुदारी ॥अंग 681
- सिमरि सिमरि सुआमी प्रभु अपना सीतल तनु मनु छाती ॥अंग 681
- दूत दुसमन सभि तुझ ते निवरहि प्रगट प्रतापु तुमारा ॥अंग 681
- चतुर दिसा कीनो बलु अपना सिर ऊपरि करु धारिओ ॥अंग 681
- अउखी घड़ी न देखण देई अपना बिरदु समाले ॥अंग 682
- जिस कउ बिसरै प्रानपति दाता सोई गनहु अभागा ॥अंग 682
- जन के पूरन होए काम ॥अंग 682
- मांगउ राम ते इकु दानु ॥अंग 682
- मांगउ राम ते सभि थोक ॥अंग 682
- त्रिसना बुझै हरि कै नामि ॥अंग 682
- जन की कीनी पारब्रहमि सार ॥अंग 683
- हरि चरन सरन गोबिंद दुख भंजना दास अपुने कउ नामु देवहु ॥अंग 683
- हलति सुखु पलति सुखु नित सुखु सिमरनो नामु गोबिंद का सदा लीजै ॥अंग 683
- बंदना हरि बंदना गुण गावहु गोपाल राइ ॥ रहाउ ॥अंग 683
- त्रिपति भई सचु भोजनु खाइआ ॥अंग 684
- गुर के चरन जीअ का निसतारा ॥अंग 684
- कितै प्रकारि न तूटउ प्रीति ॥ दास तेरे की निरमल रीति ॥1॥ रहाउ ॥अंग 684
- जो जो जूनी आइओ तिह तिह उरझाइओ माणस जनमु संजोगि पाइआ ॥अंग 686
- भजु संगि साधू इकु अराधू जनम मरन दुख नासए ॥अंग 691
महला 9 (4)
- काहे रे बन खोजन जाई ॥अंग 684
- साधो इहु जगु भरम भुलाना ॥अंग 684
- तिह जोगी कउ जुगति न जानउ ॥अंग 685
- अब मै कउनु उपाउ करउ ॥अंग 685
भगत कबीर जी (5)
भगत नामदेव जी (5)
भगत रविदास जी (3)
अन्य भगत (4)
- नाराइण निंदसि काइ भूली गवारी ॥अंग 695
- स्री सैणु ॥अंग 695
- कायउ देवा काइअउ देवल काइअउ जंगम जाती ॥अंग 695
- गोपाल तेरा आरता ॥अंग 695