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अंग 694

अंग
694
राग धनासरी
राग: धनासरी · रचयिता: Bhagat Ravi Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
पिंधी उभकले संसारा ॥
भ्रमि भ्रमि आए तुम चे दुआरा ॥
तू कुनु रे ॥
मै जी ॥ नामा ॥ हो जी ॥
आला ते निवारणा जम कारणा ॥3॥4॥
भगत रविदास चमार जाति के थे, बनारस से, पंद्रहवीं सदी के मध्य के। उनकी वाणी में बराबरी, श्रम, और एक तरह की शांत आत्म-स्वीकृति है। आज भी ‘रविदासी’ परम्परा एक बड़े समुदाय की पहचान है।

हिन्दी अर्थ: (हे भाई ! जीव-) टिंडें (जैसे रहट के डिब्बे पानी में डुबकियां लेते हैं) संसार-समुंद्र में डुबकियां ले रही हैं। हे प्रभू ! भटक-भटक के मैं आपके दर पर आ गिरा हूँ। हे (प्रभू) जी ! (अगर आप मुझसे पूछे) आप कौन है। (तो) हे जी ! मैं नामा हूँ। मुझे जगत के जंजाल से। जो कि जमों (के डरों) का कारण है।बचा ले। 3। 4।
पतित पावन माधउ बिरदु तेरा ॥
धंनि ते वै मुनि जन जिन धिआइओ हरि प्रभु मेरा ॥1॥
मेरै माथै लागी ले धूरि गोबिंद चरनन की ॥
सुरि नर मुनि जन तिनहू ते दूरि ॥1॥ रहाउ ॥
दीन का दइआलु माधौ गरब परहारी ॥
चरन सरन नामा बलि तिहारी ॥2॥5॥
रविदास जी का जीवन और वाणी एक ही धागे से बुने हुए हैं। चमड़े का काम करते-करते उन्होंने काशी के पंडितों के साथ एक तरह की समानांतर परम्परा खड़ी की।

हिन्दी अर्थ: हे माधो ! (विकारों में) गिरे हुए बंदों को (दोबारा) पवित्र करना आपका मूल कदीमों का (प्यार वाला) स्वभाव है। (हे भाई !) वह मुनि लोग भाग्यशाली है।जिन्होंने प्यारे हरी प्रभू को सिमरा है। 1। (उस गोबिंद की मेहर से) मेरे माथे पर (भी) उसके चरणों की धूड़ लगी है (भाव।मुझे भी गोबिंद के चरणों की धूड़ माथे पर लगानी नसीब हुई है); वह धूड़ देवते और मुनि जनों के भी भाग्यों में नहीं हो सकी। 1।रहाउ। हे माधो ! आप दीनों पर दया करने वाला है।आप (अहंकारियों का) अहंकार दूर करने वाला है। मैं नामदेव आपके चरणों की शरण आया हूँ और आपसे सदके हूँ। 2। 5।
धनासरी भगत रविदास जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हम सरि दीनु दइआलु न तुम सरि अब पतीआरु किआ कीजै ॥
बचनी तोर मोर मनु मानै जन कउ पूरनु दीजै ॥1॥
हउ बलि बलि जाउ रमईआ कारने ॥
कारन कवन अबोल ॥ रहाउ ॥
बहुत जनम बिछुरे थे माधउ इहु जनमु तुम॑ारे लेखे ॥
कहि रविदास आस लगि जीवउ चिर भइओ दरसनु देखे ॥2॥1॥
भगत रविदास चमार जाति के थे, बनारस से, पंद्रहवीं सदी के मध्य के। उनकी वाणी में बराबरी, श्रम, और एक तरह की शांत आत्म-स्वीकृति है। आज भी ‘रविदासी’ परम्परा एक बड़े समुदाय की पहचान है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी भगत रविदास जी की ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे माधो !) मेरे जैसा और कोई निमाणा नहीं।और आपके जैसा और कोई दया करने वाला नहीं।(मेरी कंगालता का) अब और परतावा करने की जरूरत नहीं। (हे सुंदर राम !) मुझ दास को ये पूर्ण सिदक बख्श कि मेरा मन आपकी सिफत सालाह की बातों में पसीज जाया करे। 1। हे सुंदर राम ! मैं आपसे सदा सदके हूँ। क्या बात है कि आप मेरे से बात नहीं करता।रहाउ। हे माधो ! कई जन्मों से मैं आपसे विछुड़ता आ रहा हूँ (मेहर कर। मेरा) ये जन्म आपकी याद में बीते; रविदास कहता है,आपका दीदार किए काफी समय हैं गया है।(दर्शन की) आस में ही मैं जीता हूँ। 2। 1।
चित सिमरनु करउ नैन अविलोकनो स्रवन बानी सुजसु पूरि राखउ ॥
मनु सु मधुकरु करउ चरन हिरदे धरउ रसन अंम्रित राम नाम भाखउ ॥1॥
मेरी प्रीति गोबिंद सिउ जिनि घटै ॥
मै तउ मोलि महगी लई जीअ सटै ॥1॥ रहाउ ॥
साधसंगति बिना भाउ नही ऊपजै भाव बिनु भगति नही होइ तेरी ॥
कहै रविदासु इक बेनती हरि सिउ पैज राखहु राजा राम मेरी ॥2॥2॥
रविदास जी का जीवन और वाणी एक ही धागे से बुने हुए हैं। चमड़े का काम करते-करते उन्होंने काशी के पंडितों के साथ एक तरह की समानांतर परम्परा खड़ी की।

हिन्दी अर्थ: (तभी मेरी आरजू है कि) मैं चित्त लगा के प्रभू के नाम का सिमरन करता रहूँ।आँखों से उसका दीदार करता रहूँ।कानों में उसकी बाणी व उसका सु-यश भरे रखूँ। अपने मन को भौरा बनाए रखूँ।उसके (चरन-कमल) हृदय में टिकाए रखूँ।और जीभ से उस प्रभू का आत्मिक जीवन देने वाला नाम उचारता रहूँ। 1। (मुझे डर रहता है कि) कि कहीं गोबिंद से मेरी प्रीति कम ना हो जाए। मैंने तो बड़े महंगे मूल्यों में (ये प्रीति) ली है।जिंद दे के (इस प्रीति का) सौदा किया है। 1।रहाउ। (पर ये) प्रीत साध-संगत के बिना पैदा नहीं हो सकती।और हे प्रभू ! प्रीति के बिना आपकी भक्ति नहीं हैं सकती। रविदास प्रभू के आगे अरदास करता है, हे राजन ! हे मेरे राम ! (मैं आपकी शरण आया हूँ) मेरी लाज रखना। 2। 2।
नामु तेरो आरती मजनु मुरारे ॥
हरि के नाम बिनु झूठे सगल पासारे ॥1॥ रहाउ ॥
नामु तेरो आसनो नामु तेरो उरसा नामु तेरा केसरो ले छिटकारे ॥
नामु तेरा अंभुला नामु तेरो चंदनो घसि जपे नामु ले तुझहि कउ चारे ॥1॥
नामु तेरा दीवा नामु तेरो बाती नामु तेरो तेलु ले माहि पसारे ॥
नाम तेरे की जोति लगाई भइओ उजिआरो भवन सगलारे ॥2॥
नामु तेरो तागा नामु फूल माला भार अठारह सगल जूठारे ॥
तेरो कीआ तुझहि किआ अरपउ नामु तेरा तुही चवर ढोलारे ॥3॥
दस अठा अठसठे चारे खाणी इहै वरतणि है सगल संसारे ॥
कहै रविदासु नामु तेरो आरती सति नामु है हरि भोग तुहारे ॥4॥3॥
भगत रविदास चमार जाति के थे, बनारस से, पंद्रहवीं सदी के मध्य के। उनकी वाणी में बराबरी, श्रम, और एक तरह की शांत आत्म-स्वीकृति है। आज भी ‘रविदासी’ परम्परा एक बड़े समुदाय की पहचान है।

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! (अंजान लोग मूर्तियों की आरती करते हैं।पर मेरे लिए तो) आपका नाम (ही आपकी) आरती है।और तीर्थों का स्नान है। (हे भाई !) परमात्मा के नाम से टूट के अन्य सभी आडंबर झूठे हैं। 1।रहाउ। आपका नाम (मेरे लिए पण्डित वाला) आसन है (जिस पर बैठ के वह मूर्ति की पूजा करता है)।आपका नाम ही (चंदन घिसाने के लिए) शिला है।(मूर्ति पूजने वाला मनुष्य सिर पर केसर घोल के मूर्ति पर) केसर छिड़कता है। पवर मेरे लिए आपका नाम ही केसर है।हे मुरारी ! आपका नाम ही पानी है।नाम ही चंदन है।(इस नाम-चंदन को नाम-पानी के साथ) घिसा के।आपके नाम का सिमरन-रूपी चंदन ही मैं आपके ऊपर लगाता हूँ। 1। हे प्रभू ! आपका नाम दीया है।नाम ही (दीए की) बाती है।नाम ही तेल है।जो ले के मैंने (नाम-दीए में) डाला है; मैंने आपके नाम की ही ज्योति जलाई है (जिसकी बरकति से) सारे भवनों में रौशनी हैं गई है। 2। आपका नाम मैंने धागा बनाया है।नाम को मैंने फूल और फूलों की माला बनाया है।और सारी बनस्पति (जिससे लोग फूल ले के मूर्तियों के आगे भेट करते हैं।आपके नाम के सामने वे) झूठी है। (ये सारी कुदरति तो आपकी बनाई हुई है) आपकी पैदा की हुई में से मैं आपके आगे क्या रखूँ।(सो।) मैं आपका नाम-रूपी चवर ही आपके पर झुलाता रहूँ। 3। सारे जगत की नित्य की कार तो ये है कि (आपका नाम भुला के) अठारह पुराणों की कथाओं में फसे हुए हैं।अढ़सठ तीर्थों के स्नान को ही पुन्य कर्म समझ बैठे हैं।और।इस तरह चारों खाणियों की जूनियों में भटक रहे हैं। रविदास कहता है, हे प्रभू ! आपका नाम ही (मेरे लिए) आपकी आरती है आपके सदा कायम रहने वाले नाम का ही भोग मैं आपको लगाता हूँ। 4। 3।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

रविदास जी का जीवन और वाणी एक ही धागे से बुने हुए हैं। चमड़े का काम करते-करते उन्होंने काशी के पंडितों के साथ एक तरह की समानांतर परम्परा खड़ी की, जिसने सामाजिक संरचना को अंदर से चुनौती दी।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई ! जीव-) टिंडें (जैसे रहट के डिब्बे पानी में डुबकियां लेते हैं) संसार-समुंद्र में डुबकियां ले रही हैं।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।