नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: जिसने हमारे शरीर को गरमी दे के जीवात्मा (शरीर में) टिका दी; (जिसकी कला से शरीर में) श्वास चलता है और मनुष्य हर जगह (चल-फिर के) बोल-चाल कर सकता है। 2। जितना भी माया का मोह है दुनिया की प्रीति है।रसों के स्वाद हैं। ये सारे मन में विकारों की कालिख ही पैदा करते हैं।विकारों के दाग़ ही लगाते जाते हैं। (सिमरन से सूने रह के विकारों में फस के) मनुष्य विकारों के दाग़ अपने माथे पर लगा के (यहाँ से) चल पड़ता है। और परमात्मा की हजूरी में इसे बैठने के लिए जगह नहीं मिलती। 3। (पर। हे प्रभू ! जीव के भी क्या वश।) आपका नाम सिमरन (का गुण) आपकी मेहर से ही मिल सकता है। आपके नाम में लग के (मोह और विकारों के समुंद्र में से) पार लांघा जा सकता है।(इनसे बचने के लिए) और कोई जगह नहीं। हे नानक ! (निराश होने की आवश्यक्ता नहीं) अगर कोई मनुष्य (प्रभू को भुला के विकारों में) डूबता भी है (वह प्रभू इतना दयालु है कि) फिर भी उसकी संभाल होती है। वह सदा-स्थिर रहने वाला प्रभू सब जीवों को दातें देने वाला है (किसी से भेद-भाव नहीं रखता)। 4। 3। 5।
धनासरी महला 1 ॥ चोरु सलाहे चीतु न भीजै ॥ जे बदी करे ता तसू न छीजै ॥ चोर की हामा भरे न कोइ ॥ चोरु कीआ चंगा किउ होइ ॥1॥ सुणि मन अंधे कुते कूड़िआर ॥ बिनु बोले बूझीऐ सचिआर ॥1॥ रहाउ ॥ चोरु सुआलिउ चोरु सिआणा ॥ खोटे का मुलु एकु दुगाणा ॥ जे साथि रखीऐ दीजै रलाइ ॥ जा परखीऐ खोटा होइ जाइ ॥2॥ जैसा करे सु तैसा पावै ॥ आपि बीजि आपे ही खावै ॥ जे वडिआईआ आपे खाइ ॥ जेही सुरति तेहै राहि जाइ ॥3॥ जे सउ कूड़ीआ कूड़ु कबाड़ु ॥ भावै सभु आखउ संसारु ॥ तुधु भावै अधी परवाणु ॥ नानक जाणै जाणु सुजाणु ॥4॥4॥6॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 1 ॥ अगर कोई चोर (उस हाकिम की जिसके सामने उसका मुकदमा पेश है) खुशमद करे तो उसे (ये) यकीन नहीं बन सकता (कि ये सच्चा है)। अगर वह चोर (हाकिम की) बुराई करे तो भी थोड़ा सा भी नहीं घबराता। कोई भी मनुष्य किसी चोर के अच्छे होने की गवाही नहीं दे सकता। जो मनुष्य (लोगों की नजरों में) चोर माना गया।वह (खुशमदों व बद्खोईयों से औरों के सामने) अच्छा नहीं बन सकता। 1। हे अँधे लालची व झूठे मन ! (ध्यान से) सुन। सच्चा मनुष्य बिना बोले ही पहचाना जाता है। 1।रहाउ। चोर भले ही समझदार बने चतुर बने (पर आखिर है वह चोर ही।उसकी कद्र-कीमत नहीं पड़ती। जैसे खोटे रुपए का मूल्य दो कौड़ी बराबर ही है। अगर खोटे रुपए को (खरों में) रख दें।(खरों में) मिला दें। तो भी जब उसकी परख होती है तब वह खोटा ही कहा जाता है। 2। मनुष्य जैसा काम करता है वैसा ही वह उसका फल पाता है। हर कोई खुद (कर्मों के बीज) बीज के खुद ही फल खाता है। अगर कोई मनुष्य (हो तो खोटा।पर) अपनी महानताओं (अच्छाईयां बखान किए जाए) की कस्में उठाए जा (उसका ऐतबार नहीं बन सकता। क्योंकि) मनुष्य की जैसी मनो-कामना है वैसे ही रास्ते पर वह चलता है। 3। (अपना ऐतबार जमाने के लिए चालाक बन के) चाहे सारे संसार को झूठी बातें और गप्पें मारता रहे (पर।हे प्रभू ! कोई मनुष्य आपको धोखा नहीं दे सकता)। चाहे सारी दुनिया उसे भला पुरुष कहे तो भी वह सत्य के दरबार में मंजूर नहीं होता। (हे प्रभू ! जो दिल का खरा हो तो) एक सीधा मनुष्य भी आपको पसंद आ जाता है।आपके दर पर कबूल हैं जाता है। हे नानक ! घट घट की जानने वाला सुजान प्रभू (सब कुछ) जानता है। 4। 3। 6।
धनासरी महला 1 ॥ काइआ कागदु मनु परवाणा ॥ सिर के लेख न पड़ै इआणा ॥ दरगह घड़ीअहि तीने लेख ॥ खोटा कामि न आवै वेखु ॥1॥ नानक जे विचि रुपा होइ ॥ खरा खरा आखै सभु कोइ ॥1॥ रहाउ ॥ कादी कूड़ु बोलि मलु खाइ ॥ ब्राहमणु नावै जीआ घाइ ॥ जोगी जुगति न जाणै अंधु ॥ तीने ओजाड़े का बंधु ॥2॥ सो जोगी जो जुगति पछाणै ॥ गुर परसादी एको जाणै ॥ काजी सो जो उलटी करै ॥ गुर परसादी जीवतु मरै ॥ सो ब्राहमणु जो ब्रहमु बीचारै ॥ आपि तरै सगले कुल तारै ॥3॥ दानसबंदु सोई दिलि धोवै ॥ मुसलमाणु सोई मलु खोवै ॥ पड़िआ बूझै सो परवाणु ॥ जिसु सिरि दरगह का नीसाणु ॥4॥5॥7॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 1 ॥ ये मनुष्य का शरीर (जैसे) एक काग़ज़ है।मनुष्य का मन (शरीर रूपी काग़ज़ पर लिखा हुआ) दरगाही परवाना है। पर मूर्ख मनुष्य अपने माथे के लेख नहीं पढ़ता (भाव।ये समझने का प्रयत्न नहीं करता कि उसके पिछले किए कर्मों के अनुसार किस तरह के संस्कार-लेख उसके मन में मौजूद हैं जो उसे अब और प्रेरणा कर रहे हैं)। माया के तीनों गुणों के असर में रह के किए हुए कर्मों के संस्कार ईश्वरीय नियमों के अनुसार हरेक मनुष्य के मन में उकर जाते हैं। पर हे भाई ! देख (जैसे कोई खोटा सिक्का काम नहीं आता।वैसे ही खोटे किए हुए काम का) खोटा-संस्कार वाला लेख भी काम नहीं आता। 1। हे नानक ! अगर रुपए आदि सिक्के में चाँदी हो तो हरेक उसे खरा सिक्का कहता है (इसी तरह जिस मन में पवित्रता हैं। उसे खरा कहा जाता है)। 1।रहाउ। काज़ी (जो एक तरफ तो इस्लाम धर्म का नेता है और दूसरी तरफ हाकिम भी है।रिश्वत की खातिर शरई कानून के बारे में) झूठ बोल के हराम का माल (रिश्वत) खाता है। ब्राहमण (करोड़ों शूद्र कहलाते) लोगों को दुखी कर-कर के तीर्थ-स्नान भी करता है। जोगी भी अंधा है और जीवन की जाच नहीं जानता। (ये तीनों अपनी ओर से धार्मिक नेता हैं।पर) इन तीनों के ही अंदर आत्मिक जीवन के पक्ष से सुन्नम-सूना है। 2। असल जोगी वह है जो जीवन की जाच समझता है और गुरू की कृपा से एक परमात्मा के साथ गहरी सांझ डालता है। काजी वह है जो सुरति को हराम के माल से मोड़ता है जो गुरू की किरपा से दुनिया में रहते हुए दुनियावी ख्वाइशों से पलटता है। ब्राहमण वह है जो सर्व-व्यापक प्रभू में सुरति जोड़ता है। इस तरह खुद भी संसार-समुंद्र में से पार लांघता है और अपनी सारी कुलों को भी लंघा लेता है। 3। वही मनुष्य बुद्धिमान है जो अपने दिल में टिकी हुई बुराईयों को दूर करता है। वही मुसलमान है जो मन में से विकारों की मैल का नाश करता है। वही विद्वान है जो जीवन का सही रास्ता समझता है। उसके माथे पर दरगाह का टीका लगता है वही प्रभू की हजूरी में कबूल होता है। 4।
धनासरी महला 1 घरु 3 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ कालु नाही जोगु नाही नाही सत का ढबु ॥ थानसट जग भरिसट होए डूबता इव जगु ॥1॥ कल महि राम नामु सारु ॥ अखी त मीटहि नाक पकड़हि ठगण कउ संसारु ॥1॥ रहाउ ॥ आंट सेती नाकु पकड़हि सूझते तिनि लोअ ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 1 घरु 3 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। ये (मानस जनम का) समय (आँखें बंद करने व नाक पकड़ने के लिए) नहीं।(इन सजावटों से) परमात्मा से मेल नहीं होता।ना ही ये उच्च आचरण का तरीका है। (इन ढंग-तरीकों से) जगत के (अनेकों) पवित्र हृदय भी गंदे हो जाते हैं।इस तरह जगत (विकारों में) डूबने लग जाता है। 1। जगत में परमात्मा का नाम (और सारे कामों से) श्रेष्ठ है। (जो ये लोग) आँखें तो बँद करते हैं।नाक भी पकड़ते हैं (ये) जगत को ठॅगने के लिए (करते हैं।ये भक्ति नहीं।ये उक्तम धार्मिक कर्म नहीं)। 1। हाथ के अंगूठे के पास की दो उंगलियों से ये (अपना) नाक पकड़ते हैं (समाधि के रूप में बैठ के मुँह से कहते हैं कि उन्हें) तीनों ही लोक दिखाई दे रहे हैं।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिसने हमारे शरीर को गरमी दे के जीवात्मा (शरीर में) टिका दी; (जिसकी कला से शरीर में) श्वास चलता है और मनुष्य हर जगह (चल-फिर के) बोल-चाल कर सकता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।