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अंग 666

अंग
666
राग धनासरी
राग: धनासरी · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
नानक आपे वेखै आपे सचि लाए ॥4॥7॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: वह खुद ही (सबकी) संभाल करता है।और खुद ही (जीवों को) अपने सदा स्थिर नाम में जोड़ता है। 4। 7।
धनासरी महला 3 ॥
नावै की कीमति मिति कही न जाइ ॥
से जन धंनु जिन इक नामि लिव लाइ ॥
गुरमति साची साचा वीचारु ॥
आपे बखसे दे वीचारु ॥1॥
हरि नामु अचरजु प्रभु आपि सुणाए ॥
कली काल विचि गुरमुखि पाए ॥1॥ रहाउ ॥
हम मूरख मूरख मन माहि ॥
हउमै विचि सभ कार कमाहि ॥
गुर परसादी हंउमै जाइ ॥
आपे बखसे लए मिलाइ ॥2॥
बिखिआ का धनु बहुतु अभिमानु ॥
अहंकारि डूबै न पावै मानु ॥
आपु छोडि सदा सुखु होई ॥
गुरमति सालाही सचु सोई ॥3॥
आपे साजे करता सोइ ॥
तिसु बिनु दूजा अवरु न कोइ ॥
जिसु सचि लाए सोई लागै ॥
नानक नामि सदा सुखु आगै ॥4॥8॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 3 ॥ हे भाई ! ये नहीं कहा जा सकता कि परमात्मा का नाम किस मोल मिल सकता है और इस नाम की ताकत कितनी है। जिन मनुष्यों ने परमात्मा के नाम में सुरति जोड़ी हुई है वे भाग्यशाली हैं। जो मनुष्य कभी गलती ना करने वाली गुरू की मति ग्रहण करता है।वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू के गुणों की विचार (अपने अंदर) बसाता है। पर ये विचार प्रभू उसे ही देता है जिस पर खुद मेहर करता है। 1। हे भाई ! परमात्मा का नाम हैरान करने वाली ताकत वाला है।(पर यह नाम) प्रभू स्वयं ही (किसी भाग्यशाली को) सुनाता है। इन झगड़ों-भरे जीवन समय में वही मनुष्य हरी-नाम प्राप्त करता है जो गुरू के सन्मुख रहता है। 1।रहाउ। हे भाई ! (हम अपने) मन में (ध्यान से विचारें तो इस अहंकार के कारण) हम केवल मूर्ख हैं। हम जीव (अपना) हरेक काम अहंकार के आसरे ही करते हैं। ये अहंकार (हमारे अंदर से) गुरू की कृपा से दूर हो सकता है। (गुरू भी उसी को) मिलाता है जिस पर प्रभू खुद ही मेहर करता है। 2। (हे भाई ! ये दुनियावी) माया का धन (मनुष्य के मन में) बड़ा अहंकार (पैदा करता है)।और। जो मनुष्य अहंकार में डूबा रहता है वह (प्रभू की हजूरी में) आदर नहीं पाता। हे भाई ! स्वैभाव त्याग के सदा आत्मिक आनंद बना रहता है। हे भाई ! मैं तो गुरू की मति ले के उस सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह करता रहता हूँ। 3। हे भाई ! वह करतार स्वयं ही (सारी सृष्टि को) पैदा करता है। उसके बिना कोई और (ऐसी अवस्था वाला) नहीं। वह करतार जिस मनुष्य को (अपने) सदा-स्थिर नाम में जोड़ता है।वही मनुष्य (नाम-सिमरन में) लगता है। हे नानक ! जो मनुष्य नाम में लगता है उसको ही आत्मिक आनंद बना रहता है (इस लोक में भी।और) परलोक में भी। 4। 8।
रागु धनासिरी महला 3 घरु 4
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हम भीखक भेखारी तेरे तू निज पति है दाता ॥
होहु दैआल नामु देहु मंगत जन कंउ सदा रहउ रंगि राता ॥1॥
हंउ बलिहारै जाउ साचे तेरे नाम विटहु ॥
करण कारण सभना का एको अवरु न दूजा कोई ॥1॥ रहाउ ॥
बहुते फेर पए किरपन कउ अब किछु किरपा कीजै ॥
होहु दइआल दरसनु देहु अपुना ऐसी बखस करीजै ॥2॥
भनति नानक भरम पट खूल॑े गुर परसादी जानिआ ॥
साची लिव लागी है भीतरि सतिगुर सिउ मनु मानिआ ॥3॥1॥9॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: रागु धनासिरी महला 3 घरु 4 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे प्रभू ! हम जीव आपके (दर के) मंगते हैं।आप स्वतंत्र रह के सब को दातें देने वाला है। हे प्रभू ! मेरे पर दयावान हो।मुझ मंगते को अपना नाम दे (ता कि) मैं सदा आपके प्रेम-रंग में रंगा रहूँ। 1। हे प्रभू ! मैं आपके सदा कायम रहने वाले नाम से सदके जाता हूँ। आप सारे जगत का मूल है; आप ही सब जीवों को पैदा करने वाला है कोई और (आपके जैसा) नहीं। 1।रहाउ। हे प्रभू ! मुझ माया-ग्रसित को (अब तक मरने के) अनेकों चक्कर लग चुके हैं।अब तो मेरे पर कुछ मेहर कर। हे प्रभू ! मेरे पर दया कर।मेरे पर यही कृपा कर कि मुझे अपना दीदार दे। 2। हे भाई ! नानक कहता है, गुरू की कृपा से जिस मनुष्य के भ्रम के पर्दे खुल जाते हैं।उसकी (परमात्मा के साथ) गहरी सांझ बन जाती है। उसके हृदय में (परमात्मा के साथ) सदा कायम रहने वाली लगन लग जाती है।गुरू के साथ उसका मन पतीज जाता है। 3। 1। 9।
धनासरी महला 4 घरु 1 चउपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जो हरि सेवहि संत भगत तिन के सभि पाप निवारी ॥
हम ऊपरि किरपा करि सुआमी रखु संगति तुम जु पिआरी ॥1॥
हरि गुण कहि न सकउ बनवारी ॥
हम पापी पाथर नीरि डुबत करि किरपा पाखण हम तारी ॥ रहाउ ॥
जनम जनम के लागे बिखु मोरचा लगि संगति साध सवारी ॥
जिउ कंचनु बैसंतरि ताइओ मलु काटी कटित उतारी ॥2॥
हरि हरि जपनु जपउ दिनु राती जपि हरि हरि हरि उरि धारी ॥
हरि हरि हरि अउखधु जगि पूरा जपि हरि हरि हउमै मारी ॥3॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 4 घरु 1 चउपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे प्रभू ! आपके जो संत जो भगत आपका सिमरन करते हैं।आप उनके (पिछले किए) सारे पाप दूर करने वाला है। हे मालिक प्रभू ! हमारे पर भी मेहर कर।(हमें उस) साध-संगति में रख जो आपको प्यारी लगती है। 1। हे हरी ! हे प्रभू ! मैं आपके गुण बयान नहीं कर सकता। हम जीव पापी हैं।पापों में डूबे रहते हैं।जैसे पत्थर पानी में डूबे रहते हैं।मेहर कर।हम पत्थरों (पत्थर-दिलों) को संसार समुंद्र से पार लंघा ले।रहाउ। हे भाई !जीवों के अनेकों जन्मों के चिपके हुए पापों का जहर पापों का जंग साध-संगति की शरण पड़ के वैसे हीसाफ हो जाता है जैसे सोना आग में तपाने से उसकी सारी मैल कट जाती है।उतार दी जाती है। (हे भाई ! तभी) मैं (भी) दिन-रात परमात्मा के नाम का जाप जपता हूँ।नाम जप के उसको अपने हृदय में बसाए रखता हूँ। हे भाई ! परमात्मा का नाम जगत में ऐसी दवाई है जो अपना असर किए बग़ैर नहीं रहती।यह नाम जप के (अंदर से) अहंकार को खत्म किया जा सकता है। 3।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।