नावै की कीमति मिति कही न जाइ ॥
से जन धंनु जिन इक नामि लिव लाइ ॥
गुरमति साची साचा वीचारु ॥
आपे बखसे दे वीचारु ॥1॥
हरि नामु अचरजु प्रभु आपि सुणाए ॥
कली काल विचि गुरमुखि पाए ॥1॥ रहाउ ॥
हम मूरख मूरख मन माहि ॥
हउमै विचि सभ कार कमाहि ॥
गुर परसादी हंउमै जाइ ॥
आपे बखसे लए मिलाइ ॥2॥
बिखिआ का धनु बहुतु अभिमानु ॥
अहंकारि डूबै न पावै मानु ॥
आपु छोडि सदा सुखु होई ॥
गुरमति सालाही सचु सोई ॥3॥
आपे साजे करता सोइ ॥
तिसु बिनु दूजा अवरु न कोइ ॥
जिसु सचि लाए सोई लागै ॥
नानक नामि सदा सुखु आगै ॥4॥8॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हम भीखक भेखारी तेरे तू निज पति है दाता ॥
होहु दैआल नामु देहु मंगत जन कंउ सदा रहउ रंगि राता ॥1॥
हंउ बलिहारै जाउ साचे तेरे नाम विटहु ॥
करण कारण सभना का एको अवरु न दूजा कोई ॥1॥ रहाउ ॥
बहुते फेर पए किरपन कउ अब किछु किरपा कीजै ॥
होहु दइआल दरसनु देहु अपुना ऐसी बखस करीजै ॥2॥
भनति नानक भरम पट खूल॑े गुर परसादी जानिआ ॥
साची लिव लागी है भीतरि सतिगुर सिउ मनु मानिआ ॥3॥1॥9॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जो हरि सेवहि संत भगत तिन के सभि पाप निवारी ॥
हम ऊपरि किरपा करि सुआमी रखु संगति तुम जु पिआरी ॥1॥
हरि गुण कहि न सकउ बनवारी ॥
हम पापी पाथर नीरि डुबत करि किरपा पाखण हम तारी ॥ रहाउ ॥
जनम जनम के लागे बिखु मोरचा लगि संगति साध सवारी ॥
जिउ कंचनु बैसंतरि ताइओ मलु काटी कटित उतारी ॥2॥
हरि हरि जपनु जपउ दिनु राती जपि हरि हरि हरि उरि धारी ॥
हरि हरि हरि अउखधु जगि पूरा जपि हरि हरि हउमै मारी ॥3॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।