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अंग 692

अंग
692
राग धनासरी
राग: धनासरी · रचयिता: Bhagat Kabeer Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
दिन ते पहर पहर ते घरीआं आव घटै तनु छीजै ॥
कालु अहेरी फिरै बधिक जिउ कहहु कवन बिधि कीजै ॥1॥
सो दिनु आवन लागा ॥
मात पिता भाई सुत बनिता कहहु कोऊ है का का ॥1॥ रहाउ ॥
जब लगु जोति काइआ महि बरतै आपा पसू न बूझै ॥
लालच करै जीवन पद कारन लोचन कछू न सूझै ॥2॥
कहत कबीर सुनहु रे प्रानी छोडहु मन के भरमा ॥
केवल नामु जपहु रे प्रानी परहु एक की सरनां ॥3॥2॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: दिनों से पहर।पहर से घड़ियां (गिन लो।इस तरह थोड़ा-थोड़ा समय करके) उम्र कम होती जाती है।और शरीर कमजोर होता जाता है। (सब जीवों के सिर पर) काल-रूप शिकारी ऐसे फिरता है जैसे (हिरन आदि का शिकार करने वाले) शिकारी।बताओ।इस शिकारी से बचने के लिए कौन सा यत्न किया जा सकता है। 1। (हरेक जीव के सर पर) वह दिन आता जाता है (जब काल-शिकारी आ पकड़ता है); माता।पिता।पुत्र।पत्नी -इनमें से कोई (उस काल के आगे) किसी की सहायता नहीं कर सकता। 1।रहाउ। जब तक शरीर में आत्मा मौजूद रहती है।पशु- (मनुष्य) अपनी अस्लियत को नहीं समझता। और और ही जीने की लालच करता रहता है।इसे आँखों से ये नहीं दिखता (कि काल-अहेरी से छुटकारा नहीं हो सकेगा)। 2। कबीर कहता है, हे भाई ! सुनो।मन के (ये) भुलेखे दूर कर दो (कि सदा यहीं बैठे रहना है)। हे जीव ! (और लालसाएं छोड़ के) सिर्फ प्रभू का नाम सिमरो।और उस एक की शरण आएँ। 3। 2।
जो जनु भाउ भगति कछु जानै ता कउ अचरजु काहो ॥
जिउ जलु जल महि पैसि न निकसै तिउ ढुरि मिलिओ जुलाहो ॥1॥
हरि के लोगा मै तउ मति का भोरा ॥
जउ तनु कासी तजहि कबीरा रमईऐ कहा निहोरा ॥1॥ रहाउ ॥
कहतु कबीरु सुनहु रे लोई भरमि न भूलहु कोई ॥
किआ कासी किआ ऊखरु मगहरु रामु रिदै जउ होई ॥2॥3॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: इस में कोई अनोखी बात नहीं।जो भी मनुष्य प्रभू-प्रेम और प्रभू-भक्ति से सांझ बनाता है (उसका प्रभू के साथ एक हो जाना कोई बड़ी बात नहीं है)। जैसे पानी।पानी में मिल के (दोबारा) अलग नहीं हो सकता।वैसे (कबीर) जुलाहा (भी) स्वै भाव मिटा के परमात्मा में मिल गया है।1। हे संत जनो ! (लोगों के लिए तो) मैं दिमाग का पागल ही सही (भाव।लोग मुझे भले ही मूर्ख कहें कि मैं काशी छोड़ के मगहर आ गया हूँ)। (पर।) हे कबीर ! अगर आप काशी में (रहते हुए) शरीर त्यागे (और मुक्ति मिल जाए) तो इसमें परमात्मा का क्या उपकार समझा जाएगा।क्योंकि काशी में तो वैसे ही इन लोगों के ख्याल के मुताबिक मरने पर मुक्ति मिल जाती है।तो फिर सिमरने से क्या लाभ। 1।रहाउ। (पर) कबीर कहता है, हे लोगो ! सुनो।कोई मनुष्य किसी भुलेखे में ना पड़ जाए (कि काशी में मुक्ति मिलती है।और मगहर में नहीं मिलती)। अगर परमात्मा (का नाम) हृदय में हो।तो काशी क्या और कलराठा मगहर क्या।(दोनों तरफ प्रभू में लीन हुआ जा सकता है)। 2। 3।
इंद्र लोक सिव लोकहि जैबो ॥
ओछे तप करि बाहुरि ऐबो ॥1॥
किआ मांगउ किछु थिरु नाही ॥
राम नाम रखु मन माही ॥1॥ रहाउ ॥
सोभा राज बिभै बडिआई ॥
अंति न काहू संग सहाई ॥2॥
पुत्र कलत्र लछमी माइआ ॥
इन ते कहु कवनै सुखु पाइआ ॥3॥
कहत कबीर अवर नही कामा ॥
हमरै मन धन राम को नामा ॥4॥4॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: अगर मनुष्य इन्द्र-पुरी व शिव-पुरी आदि में तप आदि के हल्के किस्म के काम करके भी पहुँच जाएगा तो भी वहीं दोबारा वापस आएगा (भाव।शास्त्रों के अपने ही लिखे अनुसार इन जगहों पर भी सदा के लिए टिका नहीं रहा जा सकता)। 1। अपने प्रभू से मैं क्या माँगू।कोई चीज सदा कायम रहने वाली नहीं (दिखाई देती)। बस प्रभु का‘नाम’ (ही सदा कायम रहने वाला है उसे) मन में बसा के रख1।रहाउ। जगत में नाम-शोहरत।राज।ऐश्वर्य।वडिआई – इनमें से भी कोई आखिरी समय में संगी-साथी नहीं बन सकता। 2। पुत्र।पत्नी। धन-पदार्थ – बताओ। (हे भाई !) इनसे कभी किसी ने सुख पाया है। 3। कबीर कहता है, (प्रभू के नाम से टूट के) और कोई काम किसी अर्थ के नहीं। मेरे मन को तो परमात्मा का नाम ही (सदा कायम रहने वाला) धन प्रतीत होता है। 4। 4।
राम सिमरि राम सिमरि राम सिमरि भाई ॥
राम नाम सिमरन बिनु बूडते अधिकाई ॥1॥ रहाउ ॥
बनिता सुत देह ग्रेह संपति सुखदाई ॥
इन॑ मै कछु नाहि तेरो काल अवध आई ॥1॥
अजामल गज गनिका पतित करम कीने ॥
तेऊ उतरि पारि परे राम नाम लीने ॥2॥
सूकर कूकर जोनि भ्रमे तऊ लाज न आई ॥
राम नाम छाडि अंम्रित काहे बिखु खाई ॥3॥
तजि भरम करम बिधि निखेध राम नामु लेही ॥
गुर प्रसादि जन कबीर रामु करि सनेही ॥4॥5॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! प्रभू का सिमरन कर।प्रभू का सिमरन कर।सदा राम का सिमरन कर। प्रभू का सिमरन किए बिना बहुत सारे जीव (विकारों में) डूब जाते हैं। 1।रहाउ। पत्नी।पुत्र।शरीर।घर। दौलत – ये सारे सुख देने वाले प्रतीत होते हैं। पर जब मौत रूपी आपका आखिरी समय आया।तो इनमें से कोई भी आपका अपना नहीं रह जाएगा। 1। अजामल।गज। गनिका -ये विकार करते रहे। पर जब परमात्मा का नाम इन्होंने सिमरा।तो ये भी (इन विकारों में से) पार लांघ गए। 2। (हे सज्जन !) आप सूअर।कुत्ते आदि की जूनियों में भटकता रहा।फिर भी आपको (अब) शर्म नहीं आई (कि आप अभी भी नाम नहीं सिमरता)। परमात्मा का अमृत-नाम विसार के क्यों (विकारों का) जहर खा रहा है। 3। (हे भाई !) शास्त्रों के अनुसार किए जाने वाले कौन से काम है।और शास्त्रों में कौन से कामों के करने की मनाही है, इस वहिम को छोड़ दे।और परमात्मा का नाम सिमर। हे दास कबीर ! आप अपने गुरू की कृपा से अपने परमात्मा को ही अपना प्यारा (साथी) बना। 4। 5।
धनासरी बाणी भगत नामदेव जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गहरी करि कै नीव खुदाई ऊपरि मंडप छाए ॥
मारकंडे ते को अधिकाई जिनि त्रिण धरि मूंड बलाए ॥1॥
हमरो करता रामु सनेही ॥
काहे रे नर गरबु करत हहु बिनसि जाइ झूठी देही ॥1॥ रहाउ ॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी बाणी भगत नामदेव जी की ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। जिन्होंने गहरी नीवें खुदवा के ऊपर महल-माढ़ियां उसरवाई (उनके भी यहीं रह गए; तभी समझदार लोक इन महल-माढ़ियों का मान नहीं करते; देखो) मारकण्डे ऋषि से ज्यादा उम्र किसी की होनी है।उसने तीलों की कुल्ली में ही समय बिताया। 1। हमारा असल प्यारा (जिसने साथ निभाना है) तो करतार है।परमात्मा है। हे लोगो ! (अपने शरीर का) क्यों गुमान करते हैं।ये शरीर नाशवान है।नाश हो जाएगा; 1।रहाउ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।