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अंग 660

अंग
660
राग धनासरी
राग: धनासरी · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
धनासरी महला 1 घरु 1 चउपदे
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
जीउ डरतु है आपणा कै सिउ करी पुकार ॥
दूख विसारणु सेविआ सदा सदा दातारु ॥1॥
साहिबु मेरा नीत नवा सदा सदा दातारु ॥1॥ रहाउ ॥
अनदिनु साहिबु सेवीऐ अंति छडाए सोइ ॥
सुणि सुणि मेरी कामणी पारि उतारा होइ ॥2॥
दइआल तेरै नामि तरा ॥
सद कुरबाणै जाउ ॥1॥ रहाउ ॥
सरबं साचा एकु है दूजा नाही कोइ ॥
ता की सेवा सो करे जा कउ नदरि करे ॥3॥
तुधु बाझु पिआरे केव रहा ॥
सा वडिआई देहि जितु नामि तेरे लागि रहां ॥
दूजा नाही कोइ जिसु आगै पिआरे जाइ कहा ॥1॥ रहाउ ॥
सेवी साहिबु आपणा अवरु न जाचंउ कोइ ॥
नानकु ता का दासु है बिंद बिंद चुख चुख होइ ॥4॥
साहिब तेरे नाम विटहु बिंद बिंद चुख चुख होइ ॥1॥ रहाउ ॥4॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 1 घरु 1 चउपदे औंकार वही एक है, उसका नाम सत्य है, वह सृष्टि एवं जीवो की रचना करने वाला है, वह सर्वशक्तिमान है,वह निर्वेर, अकालमूर्ति कोई योनि धारण नहीं करता, वह स्वयंभू है, जिसे गुरु की कृपा से ही पाया जाता है। (जगत दुखों का समुंद्र है।इन दुखों को देख के) मेरी जीवात्मा काँपती है (परमात्मा के बिना और कोई बचाने वाला दिखाई नहीं देता) जिसके पास मैं मिन्नतें करूँ।(सो। अन्य आसरे छोड़ के) मैं दुखों के नाश करने वाले प्रभू को ही सिमरता हूँ।वह सदा ही बख्शिशें करने वाला है। 1। (फिर वह) मेरा मालिक सदा बख्शिशें करता रहता है (पर वह मेरी रोज के तरले सुन के उकताता नहीं।बख्शिशों में) नित्य यूँ है जैसे पहली बार ही बख्शिशें करने लगा है। 1।रहाउ। हे मेरी जिंदे ! हर रोज उस मालिक को ही याद करना चाहिए (दुखों में से) आखिर वह ही बचाता है। हे जिंदे ! ध्यान से सुन (उस मालिक का आसरा लेने से ही दुख के समुंद्र में से) पार लांघा जा सकता है। 2। हे दयालु प्रभू ! मैं आपसे सदा सदके जाता हूँ (मेहर कर।अपना नाम दे। ता कि) आपके नाम के द्वारा मैं (दुखों के इस समुंद्र में से) पार लांघ सकूँ। 1।रहाउ। सदा कायम रहने वाला परमात्मा ही सब जगह मौजूद है।उसके बिना और कोई नहीं। जिस जीव पर वह मेहर की निगाह करता है।वह उसका सिमरन करता है। 3। हे प्यारे (प्रभू !) आपकी याद के बिना मैं व्याकुल हैं जाता हूँ। मुझे वह कोई बड़ी दाति दे।जिस सदका मैं आपके नाम में जुड़ा रहूँ। हे प्यारे ! आपके बिना और कोई ऐसा नहीं हैं।जिसके पास जा के मैं ये आरजू कर सकूँ। 1।रहाउ। (दुखों के इस सागर में से तैरने के लिए) मैं अपने मालिक प्रभू को ही याद करता हूँ।किसी और से मैं यह माँग नहीं माँगता। नानक (अपने) उस (मालिक) का ही सेवक है।उस मालिक से ही खिन खिन सदके होता है। 4। हे मेरे मालिक ! मैं आपके नाम से छिन-छिन कुर्बान जाता हूँ। 1।रहाउ।
धनासरी महला 1 ॥
हम आदमी हां इक दमी मुहलति मुहतु न जाणा ॥
नानकु बिनवै तिसै सरेवहु जा के जीअ पराणा ॥1॥
अंधे जीवना वीचारि देखि केते के दिना ॥1॥ रहाउ ॥
सासु मासु सभु जीउ तुमारा तू मै खरा पिआरा ॥
नानकु साइरु एव कहतु है सचे परवदगारा ॥2॥
जे तू किसै न देही मेरे साहिबा किआ को कढै गहणा ॥
नानकु बिनवै सो किछु पाईऐ पुरबि लिखे का लहणा ॥3॥
नामु खसम का चिति न कीआ कपटी कपटु कमाणा ॥
जम दुआरि जा पकड़ि चलाइआ ता चलदा पछुताणा ॥4॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 1 ॥ नानक विनती करता है, (हे भाई !) हम आदमी एक दम के ही मालिक हैं (क्या पता कि दम कब खत्म हो जाए।हमें अपनी जिंदगी की) मियाद का पता नहीं। हमें ये पता नहीं कि मौत का वक्त कब आ जाना है।(इस वास्ते) उस परमात्मा का सिमरन करो जिसने ये जिंद और श्वास दिए हैं। 1। हे (माया के मोह में) अंधे हुए जीव ! (आँखें खोल के) देख।सोच समझ।यहाँ जगत में थोड़े ही दिनों की जिंदगी है। 1।रहाउ। (पर जीवों के भी क्या वश है।(जैसे) ये श्वास ये शरीर ये जिंद सब कुछ आपका ही दिया हुआ है (वैसे ही) अपना प्यार भी आप आप ही दे हे सदा अटल रहने वाले और जीवों को पालने वाले प्रभू) आपका ढाढी नानक (आपके दर पर) यह ही विनती करता है, !। 2। हे मेरे मालिक ! अगर आप अपने प्यार की दाति आप ही किसी जीव को ना दे; तो जीव के पास कोई ऐसी वस्तु नहीं है कि बदले में दे के आपका प्यार ले ले। नानक विनती करता है कि जीव को तो वही कुछ मिल सकता है जो उसके पूर्बले कर्मों के अनुसार संस्कार-रूप लेख (उसके माथे पर लिखे हुए) हैं (अपने नाम के प्यार की दाति तो तूने आप ही देनी है)। 3। (पिछले कर्मों के संस्कारों के असर तहत) छली मनुष्य तो छल ही कमाता रहता है।और पति-प्रभू का नाम अपने मन में नहीं बसाता। (सारी उम्र यूँ ही गुजार के आखिरी वक्त) जब पकड़ के जमराज के दरवाजे की ओर धकेला जाता है।तो (यहाँ से) चलने के वक्त हाथ मलता है। 4।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “धनासरी महला 1 घरु 1 चउपदे औंकार वही एक है, उसका नाम सत्य है, वह सृष्टि एवं जीवो की रचना करने वाला है, वह सर्वशक्तिमान है,वह निर्वेर, अकालमूर्ति कोई योनि धारण नहीं करता, वह स्वयंभू ।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।