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अंग 679

अंग
679
राग धनासरी
राग: धनासरी · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
धनासरी महला 5 घरु 7
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि एकु सिमरि एकु सिमरि एकु सिमरि पिआरे ॥
कलि कलेस लोभ मोह महा भउजलु तारे ॥ रहाउ ॥
सासि सासि निमख निमख दिनसु रैनि चितारे ॥
साधसंग जपि निसंग मनि निधानु धारे ॥1॥
चरन कमल नमसकार गुन गोबिद बीचारे ॥
साध जना की रेन नानक मंगल सूख सधारे ॥2॥1॥31॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 घरु 7 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे प्यारे ! सदा ही परमात्मा का नाम सिमरा कर। (ये सिमरन) इस बड़े भयानक संसार समुंद्र से पार लंघा देता है जिसमें बेअंत सांसारिक झगड़े हैं।जिसमें लोभ मोह (की लहरें उठ रही) हैं।रहाउ। हे भाई ! दिन-रात छिन-छिन हरेक सांस के साथ (परमात्मा का नाम) याद करता रह। साध-संगति में (बैठ के) बेशर्म हो के परमात्मा का नाम जपा कर।ये नाम-खजाना अपने मन में बसाए रख। 1। हे प्यारे ! परमात्मा के कोमल चरणों पर अपना सिर निवाए रख।गोविंद के गुण अपने सोच-मण्डल में बसा। हे नानक ! संत जनों के चरणों की धूड़ (अपने माथे पर लगाया कर।ये चरण-धूड़) आत्मिक खुशियां व आत्मिक आनंद देती है। 2। 1। 31।
धनासरी महला 5 घरु 8 दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सिमरउ सिमरि सिमरि सुख पावउ सासि सासि समाले ॥
इह लोकि परलोकि संगि सहाई जत कत मोहि रखवाले ॥1॥
गुर का बचनु बसै जीअ नाले ॥
जलि नही डूबै तसकरु नही लेवै भाहि न साकै जाले ॥1॥ रहाउ ॥
निरधन कउ धनु अंधुले कउ टिक मात दूधु जैसे बाले ॥
सागर महि बोहिथु पाइओ हरि नानक करी क्रिपा किरपाले ॥2॥1॥32॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 घरु 8 दुपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! (परमात्मा के नाम को मैं अपने) हरेक सांस के साथ हृदय में बसा के सिमरता हूँ।और।सिमर-सिमर के आत्मिक आनंद प्राप्त करता हूँ। ये हरी नाम इस लोक में और परलोक में मेरे साथ मददगार है।हर जगह मेरा रखवाला है। 1। हे भाई ! (परमात्मा की सिफत सालाह से भरपूर) गुरू का शबद मेरी जिंद के साथ बसता है। (परमात्मा का नाम) एक ऐसा धन है जो पानी में डूबता नहीं।जिसको चोर चुरा नहीं सकता।जिसे आग नहीं जला सकती। 1।रहाउ। हे भाई ! परमात्मा का नाम कंगाल के लिए धन है।अंधे के वास्ते डंगोरी (छड़ी) है।जैसे बच्चे के लिए माँ का दूध है (वैसे ही हरी-नाम मनुष्य की आत्मा के लिए भोजन है)। हे नानक ! जिस मनुष्य पर कृपालु प्रभू ने कृपा की।उसको (ये नाम) मिल गया (जो) समुंद्र में जहाज है। 2। 1। 32।
धनासरी महला 5 ॥
भए क्रिपाल दइआल गोबिंदा अंम्रितु रिदै सिंचाई ॥
नव निधि रिधि सिधि हरि लागि रही जन पाई ॥1॥
संतन कउ अनदु सगल ही जाई ॥
ग्रिहि बाहरि ठाकुरु भगतन का रवि रहिआ स्रब ठाई ॥1॥ रहाउ ॥
ता कउ कोइ न पहुचनहारा जा कै अंगि गुसाई ॥
जम की त्रास मिटै जिसु सिमरत नानक नामु धिआई ॥2॥2॥33॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ प्रभू जी अपने सेवकों पर (सदा) कृपाल रहते हैं।दयावान रहते हैं।(अगर प्रभू की कृपा हो।तो संत जनों की शरण पड़ कर) मैं भी अपने हृदय में आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल इकट्ठा कर सकूँ। हे भाई ! धरती के सारे नौ खजाने।सारी ही करामाती नौ ताकतें।संत जनों के पैरों पर टिकी रहती हैं। 1। हे भाई ! संतजनों को (हरी-नाम की बरकति से) सब जगह आत्मिक आनंद बना रहता है। घर में। बाहर (हर जगह) परमात्मा भक्तों का (रखवाला) है।(भक्तों को प्रभू) सब जगह बसता दिखता है। 1।रहाउ। हे भाई ! जिस मनुष्य के पक्ष में परमात्मा खुद होता है।उस मनुष्य की कोई और मनुष्य बराबरी नहीं कर सकता। हे नानक ! (कह, हे भाई !) जिस परमात्मा का नाम सिमरने से मौत का सहम समाप्त हो जाता है (आत्मिक मौत नजदीक नहीं फटकती)।आप भी उसका नाम सिमरा कर। 2। 2। 33।
धनासरी महला 5 ॥
दरबवंतु दरबु देखि गरबै भूमवंतु अभिमानी ॥
राजा जानै सगल राजु हमरा तिउ हरि जन टेक सुआमी ॥1॥
जे कोऊ अपुनी ओट समारै ॥
जैसा बितु तैसा होइ वरतै अपुना बलु नही हारै ॥1॥ रहाउ ॥
आन तिआगि भए इक आसर सरणि सरणि करि आए ॥
संत अनुग्रह भए मन निरमल नानक हरि गुन गाए ॥2॥3॥34॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ (हे भाई ! धनी मनुष्य को धन का आसरा होता है।पर) धनी मनुष्य धन को देख के अहंकार करने लग जाता है।(जमीन के मालिक को जमीन का सहारा होता है।पर) जमीन का मालिक (अपनी जमीन को देख के) अहंकारी हो जाता है। राजा समझता है कि सारे देश में मेरा ही राज है (राजे को राज का सहारा है।पर राज का अहंकार भी है)।इसी तरह परमात्मा के सेवक को मालिक प्रभू का आसरा है (पर उसको कोई अहंकार नहीं)। 1। अगर कोई मनुष्य असली ओट (परमात्मा) को अपने हृदय में टिकाए रखे। तो वह (अहंकार आदि के मुकाबले पर) अपना हौसला नहीं हारता।(क्योंकि) वह मनुष्य अपनी पायां के मुताबिक बरतता है (अपनी सीमा से बाहर नहीं होता।अहंकार में नहीं आता।मानवता से नहीं गिरता)। 1।रहाउ। हे नानक ! जो मनुष्य और सारे (धन भूमि राज आदि के) आसरे छोड़ के एक प्रभू का आसरा रखने वाले बन जाते हैं।जो ये कह के प्रभू के दर पर आ जाते हैं कि। हे प्रभू ! हम आपकी शरण आए हैं।गुरू की कृपा से परमात्मा के गुण गा गा के उनके मन पवित्र हैं जाते हैं। 2। 3। 34।
धनासरी महला 5 ॥
जा कउ हरि रंगु लागो इसु जुग महि सो कहीअत है सूरा ॥
आतम जिणै सगल वसि ता कै जा का सतिगुरु पूरा ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! इस जगत में वही मनुष्य शूरवीर कहलवाता है जिसके (हृदय-घर में) प्रभू के प्रति प्यार पैदा हो जाता है। पूरा गुरू जिस मनुष्य का (मददगार बन जाता) है।वह मनुष्य अपने मन को जीत लेता है।सारी (सृष्टि) उसके वश में आ जाती है (दुनिया का कोई पदार्थ उसको मोह नहीं सकता)। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “धनासरी महला 5 घरु 7 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।