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अंग 695

अंग
695
राग धनासरी
राग: धनासरी · रचयिता: भगत त्रिलोचन जी
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
धनासरी बाणी भगतां की त्रिलोचन
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नाराइण निंदसि काइ भूली गवारी ॥
दुक्रितु सुक्रितु थारो करमु री ॥1॥ रहाउ ॥
संकरा मसतकि बसता सुरसरी इसनान रे ॥
कुल जन मधे मिल्यिो सारग पान रे ॥
करम करि कलंकु मफीटसि री ॥1॥
बिस्व का दीपकु स्वामी ता चे रे सुआरथी पंखी राइ गरुड़ ता चे बाधवा ॥
करम करि अरुण पिंगुला री ॥2॥
अनिक पातिक हरता त्रिभवण नाथु री तीरथि तीरथि भ्रमता लहै न पारु री ॥
करम करि कपालु मफीटसि री ॥3॥
अंम्रित ससीअ धेन लछिमी कलपतर सिखरि सुनागर नदी चे नाथं ॥
करम करि खारु मफीटसि री ॥4॥
दाधीले लंका गड़ु उपाड़ीले रावण बणु सलि बिसलि आणि तोखीले हरी ॥
करम करि कछउटी मफीटसि री ॥5॥
पूरबलो क्रित करमु न मिटै री घर गेहणि ता चे मोहि जापीअले राम चे नामं ॥
बदति त्रिलोचन राम जी ॥6॥1॥
भगत त्रिलोचन जी देव-गिरी (आज का दौलताबाद) के थे, नामदेव के समकालीन। उनके शबद कम हैं, मगर हर एक में एक यो-योगिक अनुशासन झलकता है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी बाणी भगतां की त्रिलोचन ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भूली हुई मूर्ख जिंदे ! आप परमात्मा को क्यों दोष देती है। पाप-पुंन आपका अपना किया हुआ कर्म है (जिसके कारण दुख-सुख सहना पड़ता है)। 1।रहाउ। (हे मेरी जिंदे !) (चंद्रमा)भले ही वह शिव जी के माथे पर बसता हैनित्य गंगा में स्नान करता है। और उसी की कुल में विष्णु जी ने (कृष्ण रूप धार के) जन्म लिया पर अपने किए कर्मों के कारण उसका दाग़ ना हट सका । 1। चाहे सारे जगत को प्रकाश देने वाला सूरज उसका स्वामी है।उस सूरज का वह सारथी है।और पक्षियों का राजा गरुड़ उसका रिश्तेदार है। (हे घर की गृहणी !) अपने कर्मों के कारण अरुण पिंगला ही रहा।2। चाहे (शिव जी) सारे जगत का नाथ (समझा जाता) है।(और जीवों के) अनेकों पाप नाश करने वाला है।पर वह हरेक तीर्थ पर भटकता फिरा।तो भी (उस खोपरी से) उसकी खलासी नहीं हो रही थी। (ब्रहम-हत्या के) किए कर्म के अनुसार (शिव जी के हाथों से) खोपरी नहीं उतर सकी थी। 3। (हे मेरी जिंदे !) चाहे वह सारी नदियों का नाथ है और उसमें से अमृत।चंद्रमा।कामधेनु।लक्ष्मी।कल्पतरु।सतमुँही घोड़ा।धनवंतरी वैद्य (आदि) नौ रत्न निकले थे। अपने किए (मंद कर्म) अनुसार (समुंद्र का) खारा पन नहीं हट सका। 4। चाहे उसने (श्री रामचंद्र जी के खातिर) लंका का किला जलाया।रावण का बाग़ उजाड़ दिया।सल दूर करने वाली बूटी ला के रामचंद्र जी को प्रसन्न ही किया। (हे घर गेहणि !) अपने किए कर्मों के अधीन (हनुमान के भाग्यों से) उसकी छोटी सी कच्छी ना हट सकी।5। हे मेरी जिंदे ! पिछला किया हुआ कोई भी कर्म (अवतार पूजा।तीर्थ स्नान आदि से) नहीं मिटता।इसीलिए मैं तो परमात्मा का ही नाम सिमरता हूँ। त्रिलोचन कहता है कि मैं तो ‘राम राम’ ही जपता हूँ (भाव।परमात्मा की ओट लेता हूँ और अपने किए कर्म करके आए दुख से प्रभू को दोष नहीं देता)। 6। 1।
स्री सैणु ॥
धूप दीप घ्रित साजि आरती ॥
वारने जाउ कमला पती ॥1॥
मंगला हरि मंगला ॥ नित मंगलु राजा राम राइ को ॥1॥ रहाउ ॥
ऊतमु दीअरा निरमल बाती ॥
तुहंी निरंजनु कमला पाती ॥2॥
रामा भगति रामानंदु जानै ॥
पूरन परमानंदु बखानै ॥3॥
मदन मूरति भै तारि गोबिंदे ॥
सैनु भणै भजु परमानंदे ॥4॥2॥
भगत त्रिलोचन जी देव-गिरी (आज का दौलताबाद) के थे, नामदेव के समकालीन। उनके शबद कम हैं, मगर हर एक में एक यो-योगिक अनुशासन झलकता है।

हिन्दी अर्थ: श्री सैणु ॥ धूप। दीप और घी (आदि) सामग्री इकट्ठी करके आपकी आरती करनी है हे माया के मालिक प्रभू ! मैं आपसे सदके जाता हूँ (आपसे सदके जाना ही) । 1। हे हरी ! (मेरे अंदर) आनंद-मंगल हो रहा है हे राजन ! हे राम ! आपकी मेहर से (मेरे अंदर) सदा (आपके नाम-सिमरन का) आनंद-मंगल हैं रहा है। 1।रहाउ। सुंदर अच्छा दीपक और साफ-सुथरी बाती हे कमलापति ! आप निरंजन ही मेरे लिए (आरती करने के लिए) है। 2। वह प्रभू की भक्ति की बरकति से उसके मिलाप का आनंद वह लेता है जो मनुष्य सर्व-व्यापक परम आनंद स्वरूप प्रभू के गुण गाता है। 3। जो सुंदर स्वरूप वाला है।जो (संसार के) डरों से पार लंघाने वाला है और जो सृष्टि की सार लेने वाला है सैण कहता है, (हे मेरे मन !) उस परम-आनंद परमात्मा का सिमरन कर। 4। 2।
पीपा ॥
कायउ देवा काइअउ देवल काइअउ जंगम जाती ॥
काइअउ धूप दीप नईबेदा काइअउ पूजउ पाती ॥1॥
काइआ बहु खंड खोजते नव निधि पाई ॥
ना कछु आइबो ना कछु जाइबो राम की दुहाई ॥1॥ रहाउ ॥
जो ब्रहमंडे सोई पिंडे जो खोजै सो पावै ॥
पीपा प्रणवै परम ततु है सतिगुरु होइ लखावै ॥2॥3॥
भगत त्रिलोचन जी देव-गिरी (आज का दौलताबाद) के थे, नामदेव के समकालीन। उनके शबद कम हैं, मगर हर एक में एक यो-योगिक अनुशासन झलकता है।

हिन्दी अर्थ: पीपा ॥ (सो) काया (की खोज) ही मेरा देवता है (जिसकी मैंने आरती करनी है)।शरीर (की खोज) ही मेरा मंदिर है (जहॉ।मैं शरीर के अंदर बसते प्रभू की आरती करता हूँ)। काया (की खोज) ही (मेरे वास्ते मेरे अंदर बसते देवते के लिए) धूप-दीप और नैदेव है।काया की खोज (करके) ही मैं मानो।पत्र भेट रख के (अपने अंदर बसते ईष्ट देव की) पूजा कर रहा हूँ। 1। देश-देशांतरों को खोज के (आखिर अपने) शरीर के अंदर ही मैंने प्रभू के नाम रूप नौ-निधियां पा ली हैं। (अब मेरी काया में) परमात्मा (की याद) का ही तेज प्रताप है (उसकी बरकति से मेरे लिए) ना कुछ पैदा होता है ना कुछ मरता है (भाव।मेरा जनम-मरण मिट गया है)। 1।रहाउ। जो सृष्टि का रचनहार परमात्मा सारे ब्रहमण्ड में (व्यापक) है वही (मनुष्य के) शरीर में है।जो मनुष्य खोज करता है वह उसको ढूँढ लेता है। पीपा विनती करता है, अगर सतिगुरू मिल जाए तो (अंदर ही) दर्शन करा देता है। 2। 1।
धंना ॥
गोपाल तेरा आरता ॥
जो जन तुमरी भगति करंते तिन के काज सवारता ॥1॥ रहाउ ॥
दालि सीधा मागउ घीउ ॥
हमरा खुसी करै नित जीउ ॥
पन॑ीआ छादनु नीका ॥ अनाजु मगउ सत सी का ॥1॥
गऊ भैस मगउ लावेरी ॥
इक ताजनि तुरी चंगेरी ॥
घर की गीहनि चंगी ॥
जनु धंना लेवै मंगी ॥2॥4॥
भगत त्रिलोचन जी देव-गिरी (आज का दौलताबाद) के थे, नामदेव के समकालीन। उनके शबद कम हैं, मगर हर एक में एक यो-योगिक अनुशासन झलकता है।

हिन्दी अर्थ: धंना ॥ हे पृथ्वी को पालने वाले प्रभू ! मैं आपके दर का मंगता हूँ (मेरी जरूरतें पूरी कर); जो जो मनुष्य आपकी भक्ति करते हैं आप उनके काम सिरे चढ़ाता है।1। रहाउ। मैं (आपके दर से) दाल, आटा और घी माँगता हूँ, जो मेरी जिंद को नित्य सुखी रखे, जूती व बढ़िया कपड़ा भी माँगता हूँ, और सात जोताई वाला अन्न भी (आपी से) माँगता हूँ।1। हे गोपाल ! मैं गाय भैंस लावेरी भी माँगता हूँ, और एक बढ़िया अरबी घोड़ी भी चाहिए। घर की अच्छी स्त्री भी मैं आपका दास धंना आपसे माँग के लेता हूँ ।2।1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

इस रचयिता के बारे में परम्परा-विवरण विरल हैं, मगर उनकी वाणी अपनी कह जाती है। आदि ग्रंथ के संकलन में इन रचनाओं को जगह 1604 में मिली, और तब से यही उनकी पहचान है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “धनासरी बाणी भगतां की त्रिलोचन ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।