राग बसंत

वसन्त-ऋतु का राग, फूल-फलन का स्वर।
बसन्त वसन्त-ऋतु का राग है, फूल खिलने वाले महीनों का। माघ से चैत्र तक (फरवरी से अप्रैल) यह विशेष रूप से गाया जाता है, और होली के क़रीब इसकी मादकता चरम पर होती है।
स्वर में एक मीठा उत्साह है, मगर ज़ोरदार नहीं। ग्रंथ में बसन्त की रचनाएँ अंग ग्यारह-सौ-अड़तीस के क़रीब से शुरू होती हैं।
"बसत्र उतारि दिगंबरु होगु ॥" बसंत M3
इस राग के सब अंग
इस राग के शबद
हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।
महला 1 (18)
- माहा माह मुमारखी चड़िआ सदा बसंतु ॥अंग 1168
- रुति आईले सरस बसंत माहि ॥अंग 1168
- सुइने का चउका कंचन कुआर ॥अंग 1168
- सगल भवन तेरी माइआ मोह ॥अंग 1169
- मेरी सखी सहेली सुनहु भाइ ॥अंग 1169
- आपे कुदरति करे साजि ॥अंग 1170
- साल ग्राम बिप पूजि मनावहु सुक्रितु तुलसी माला ॥अंग 1170
- साहुरड़ी वथु सभु किछु साझी पेवकड़ै धन वखे ॥अंग 1171
- राजा बालकु नगरी काची दुसटा नालि पिआरो ॥अंग 1171
- साचा साहु गुरू सुखदाता हरि मेले भुख गवाए ॥अंग 1171
- जगु कऊआ नामु नही चीति ॥अंग 1187
- मनु भूलउ भरमसि आइ जाइ ॥अंग 1187
- दरसन की पिआस जिसु नर होइ ॥अंग 1188
- चंचलु चीतु न पावै पारा ॥अंग 1189
- मतु भसम अंधूले गरबि जाहि ॥अंग 1189
- दुबिधा दुरमति अधुली कार ॥अंग 1190
- आपे भवरा फूल बेलि ॥अंग 1190
- नउ सत चउदह तीनि चारि करि महलति चारि बहाली ॥अंग 1190
महला 3 (20)
- बसत्र उतारि दिगंबरु होगु ॥अंग 1169
- साहिब भावै सेवकु सेवा करै ॥अंग 1170
- माहा रुती महि सद बसंतु ॥अंग 1172
- राते साचि हरि नामि निहाला ॥अंग 1172
- हरि सेवे सो हरि का लोगु ॥अंग 1172
- अंतरि पूजा मन ते होइ ॥अंग 1173
- भगति वछलु हरि वसै मनि आइ ॥अंग 1173
- माइआ मोहु सबदि जलाए ॥अंग 1173
- पूरै भागि सचु कार कमावै ॥अंग 1174
- भगति करहि जन देखि हजूरि ॥अंग 1174
- नामि रते कुलां का करहि उधारु ॥अंग 1174
- बिनु करमा सभ भरमि भुलाई ॥अंग 1175
- क्रिपा करे सतिगुरू मिलाए ॥अंग 1175
- गुर सबदी हरि चेति सुभाइ ॥अंग 1175
- तेरा कीआ किरम जंतु ॥अंग 1176
- बनसपति मउली चड़िआ बसंतु ॥अंग 1176
- सभि जुग तेरे कीते होए ॥अंग 1176
- तिन॑ बसंतु जो हरि गुण गाइ ॥अंग 1176
- बसंतु चड़िआ फूली बनराइ ॥अंग 1176
- गुरु सालाही सद अपणा भाई गुर चरणी चितु लाई ॥1॥अंग 1177
महला 4 (8)
- जिउ पसरी सूरज किरणि जोति ॥अंग 1177
- रैणि दिनसु दुइ सदे पए ॥अंग 1177
- राम नामु रतन कोठड़ी गड़ मंदरि एक लुकानी ॥अंग 1178
- तुम॑ वड पुरख वड अगम गुसाई हम कीरे किरम तुमनछे ॥अंग 1178
- मेरा इकु खिनु मनूआ रहि न सकै नित हरि हरि नाम रसि गीधे ॥अंग 1178
- मनु खिनु खिनु भरमि भरमि बहु धावै तिलु घरि नही वासा पाईऐ ॥अंग 1179
- आवण जाणु भइआ दुखु बिखिआ देह मनमुख सुंञी सुंञु ॥अंग 1179
- कांइआ नगरि इकु बालकु वसिआ खिनु पलु थिरु न रहाई ॥अंग 1191
महला 5 (24)
- गुरु सेवउ करि नमसकार ॥अंग 1180
- हटवाणी धन माल हाटु कीतु ॥अंग 1180
- तिसु बसंतु जिसु प्रभु क्रिपालु ॥अंग 1180
- जीअ प्राण तुम॑ पिंड दीन॑ ॥अंग 1181
- प्रभ प्रीतम मेरै संगि राइ ॥अंग 1181
- मिलि पाणी जिउ हरे बूट ॥अंग 1181
- तुम बड दाते दे रहे ॥अंग 1181
- तिसु तू सेवि जिनि तू कीआ ॥अंग 1182
- जिसु बोलत मुखु पवितु होइ ॥अंग 1182
- मन तन भीतरि लागी पिआस ॥अंग 1182
- राम रंगि सभ गए पाप ॥अंग 1183
- सचु परमेसरु नित नवा ॥अंग 1183
- गुर चरण सरेवत दुखु गइआ ॥अंग 1183
- सगल इछा जपि पुंनीआ ॥अंग 1184
- किलबिख बिनसे गाइ गुना ॥अंग 1184
- रोग मिटाए प्रभू आपि ॥अंग 1184
- हुकमु करि कीन॑े निहाल ॥अंग 1184
- देखु फूल फूल फूले ॥अंग 1185
- होइ इकत्र मिलहु मेरे भाई दुबिधा दूरि करहु लिव लाइ ॥अंग 1185
- तेरी कुदरति तूहै जाणहि अउरु न दूजा जाणै ॥अंग 1185
- मूलु न बूझै आपु न सूझै भरमि बिआपी अहं मनी ॥1॥अंग 1186
- सुणि साखी मन जपि पिआर ॥अंग 1192
- अनिक जनम भ्रमे जोनि माहि ॥अंग 1192
- बसंत की वार महलु 5अंग 1193
महला 9 (5)
- साधो इहु तनु मिथिआ जानउ ॥अंग 1186
- पापी हीऐ मै कामु बसाइ ॥अंग 1186
- माई मै धनु पाइओ हरि नामु ॥अंग 1186
- मन कहा बिसारिओ राम नामु ॥अंग 1186
- कहा भूलिओ रे झूठे लोभ लाग ॥अंग 1187
भगत कबीर जी (8)
- मउली धरती मउलिआ अकासु ॥अंग 1193
- पंडित जन माते पड़ि॑ पुरान ॥अंग 1193
- जोइ खसमु है जाइआ ॥अंग 1194
- प्रहलाद पठाए पड़न साल ॥अंग 1194
- इसु तन मन मधे मदन चोर ॥अंग 1194
- नाइकु एकु बनजारे पाच ॥अंग 1194
- माता जूठी पिता भी जूठा जूठे ही फल लागे ॥अंग 1195
- सुरह की जैसी तेरी चाल ॥अंग 1196
भगत नामदेव जी (3)
- साहिबु संकटवै सेवकु भजै ॥अंग 1195
- लोभ लहरि अति नीझर बाजै ॥अंग 1196
- सहज अवलि धूड़ि मणी गाडी चालती ॥अंग 1196
भगत रविदास जी (1)
- तुझहि सुझंता कछू नाहि ॥अंग 1196
अन्य भगत (1)
- कत जाईऐ रे घर लागो रंगु ॥अंग 1195