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अंग 1170

अंग
1170
राग बसंत
राग: बसंत · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुरि संगि दिखाइओ राम राइ ॥1॥
मिलु सखी सहेली हरि गुन बने ॥
हरि प्रभ संगि खेलहि वर कामनि गुरमुखि खोजत मन मने ॥1॥ रहाउ ॥
मनमुखी दुहागणि नाहि भेउ ॥
ओहु घटि घटि रावै सरब प्रेउ ॥
गुरमुखि थिरु चीनै संगि देउ ॥
गुरि नामु द्रिड़ाइआ जपु जपेउ ॥2॥
बिनु गुर भगति न भाउ होइ ॥
बिनु गुर संत न संगु देइ ॥
बिनु गुर अंधुले धंधु रोइ ॥
मनु गुरमुखि निरमलु मलु सबदि खोइ ॥3॥
गुरि मनु मारिओ करि संजोगु ॥
अहिनिसि रावे भगति जोगु ॥
गुर संत सभा दुखु मिटै रोगु ॥
जन नानक हरि वरु सहज जोगु ॥4॥6॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: गुरू के वह प्रकाश-रूप प्रभू जिस सहेली को अंग-संग (बसा हुआ) दिखा दिया है (उसी को ही वह मिला है)। 1। हे मेरी सखी सहेलियो ! मिल के बैठो (और प्रभू-पति के गुण गाओ) प्रभू के गुण गाने ही (मनुष्य जनम में) फबते हैं। पति-प्रभू की जो जीव-सि्त्रयाँ प्रभू-परमात्मा के साथ खेलती हैं। गुरू के माध्यम से प्रभू की तलाश करते हुए उनके मन (प्रभू की याद में) पतीज जाते हैं। 1। रहाउ। अपने मन के पीछे चलने वाली भाग्यहीन जीव-सि्त्रयों को यह भेद-भरी बात समझ नहीं आती कि वह सबका प्यारा प्रभू हरेक शरीर के अंदर बस रहा है। गुरू के बताए हुए रास्ते पर चलने वाली जीव-स्त्री उस सदा कायम रहने वाले प्रकाश-प्रभू को अपने अंग-संग देखती है। गुरू ने उसके हृदय में प्रभू का नाम पक्का कर दिया है। वह उसी नाम का जाप जपती है। 2। (हे मेरी सहेलियो !) गुरू की शरण पड़े बिना ना परमात्मा का प्यार बन सकता है ना उसकी भक्ति हो सकती है। संत गुरू की शरण के बिना वह (प्यारा प्रभू) अपना साथ नहीं बख्शता। गुरू के दर पर आए बिना माया-मोह में अंधे हुए जीव को दुनिया का जंजाल ही व्यापता है। वह सदा दुखी रहता है। 3। गुरू ने (परमात्मा के साथ) संयोग बना के जिसका मन (माया के मोह से) मार दिया है। वह दिन-रात परमात्मा के भक्ति के मिलाप का रस लेता है। हे दास नानक ! संत गुरू की संगति में (बैठने से जीव का) दुख मिट जाता है रोग दूर हो जाता है (क्योंकि) उसको प्रभू-पति मिल जाता है उसको अडोल अवस्था का मिलाप प्राप्त हो जाता है। 4। 6।
बसंतु महला 1 ॥
आपे कुदरति करे साजि ॥
सचु आपि निबेड़े राजु राजि ॥
गुरमति ऊतम संगि साथि ॥
हरि नामु रसाइणु सहजि आथि ॥1॥
मत बिसरसि रे मन राम बोलि ॥
अपरंपरु अगम अगोचरु गुरमुखि हरि आपि तुलाए अतुलु तोलि ॥1॥ रहाउ ॥
गुर चरन सरेवहि गुरसिख तोर ॥
गुर सेव तरे तजि मेर तोर ॥
नर निंदक लोभी मनि कठोर ॥
गुर सेव न भाई सि चोर चोर ॥2॥
गुरु तुठा बखसे भगति भाउ ॥
गुरि तुठै पाईऐ हरि महलि ठाउ ॥
परहरि निंदा हरि भगति जागु ॥
हरि भगति सुहावी करमि भागु ॥3॥
गुरु मेलि मिलावै करे दाति ॥
गुरसिख पिआरे दिनसु राति ॥
फलु नामु परापति गुरु तुसि देइ ॥
कहु नानक पावहि विरले केइ ॥4॥7॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 1॥ प्रभू स्वयं ही साज के अपनी कुदरति रचता है। (इस कुदरति में) अपना हुकम चला के सदा-स्थिर रहने वाला प्रभू स्वयं ही (जीवों के किए कर्मों के) फैसले करता है। जिनको गुरू की श्रेष्ठ मति प्राप्त होती है। उनको सदा अंग-संग दिखाई देता है। सबसे उक्तम नाम-रस उनको अडोल अवस्था में (टिके रहने के कारण मिल जाता है)। 1। हे (मेरे) मन ! परमात्मा का नाम बोल। (देखना) कहीं भुला ना देना। वह परमात्मा परे से परे है। अपहुँच है। इन्द्रियों की पहुँच से परे है। वह तोल में अतुल है (भाव। उसके गुणों का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता)। पर जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं उनके हृदय में प्रभू स्वयं (अपने गुणों को) तोलाता है (अपनी सिफत-सालाह स्वयं उनसे करवाता है)। 1। रहाउ। हे प्रभू ! जो गुरसिख गुरू के चरणों की सेवा करते हैं। वह आपके (सेवक) बन जाते हैं। गुरू की सेवा की बरकति से वे मेर-तेर त्याग के (संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाते हैं। पर जो लोग दूसरों की निंदा करते हैं। माया के लोभ में फंसे रहते हैं और मन से कठोर हैं (जिसके मन दूसरों का दुख देख के द्रवित नहीं हैं) उनको गुरू द्वारा बताई गई सेवा अच्छी नहीं लगती वे महा-चोर हैं (उनका जीवन चोरों के जीवन जैसा है)। 2। जिन पर गुरू प्रसन्न होता है उनको वह प्रभू की भक्ति का प्यार बख्शता है। गुरू के प्रसन्न होने से ही प्रभू के दर पर जगह मिलती है। वह पराई निंदा त्याग के प्रभू की भक्ति में सावधानी हासिल करते हैं। (प्रभू की) मेहर से प्रभू की सोहावनी भक्ति (उनके जीवन का) हिस्सा बन जाती है। 3। गुरू जिनको संगति में मिलाता है जिन को (नाम की) दाति देता है वह प्यारे गुरसिख दिन-रात (नाम की दाति संभाल के रखते हैं)। जिनको गुरू प्रसन्न हो के नाम बख्शता है उन्हें प्रभू का नाम जो इन्सानी-जिंदगी का असल मनोरथ है। मिल जाता है। पर। हे नानक ! कह- यह नाम की दाति कोई विरले भाग्यशाली व्यक्ति ही प्राप्त करते हैं। 4। 7।
बसंतु महला 3 इक तुका ॥
साहिब भावै सेवकु सेवा करै ॥
जीवतु मरै सभि कुल उधरै ॥1॥
तेरी भगति न छोडउ किआ को हसै ॥
साचु नामु मेरै हिरदै वसै ॥1॥ रहाउ ॥
जैसे माइआ मोहि प्राणी गलतु रहै ॥
तैसे संत जन राम नाम रवत रहै ॥2॥
मै मूरख मुगध ऊपरि करहु दइआ ॥
तउ सरणागति रहउ पइआ ॥3॥
कहतु नानकु संसार के निहफल कामा ॥
गुर प्रसादि को पावै अंम्रित नामा ॥4॥8॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 3 इक तुका॥ अगर मालिक-प्रभू को पसंद आए तो ही (कोई) सेवक प्रभू की सेवा (भक्ति) कर सकता है। वह सेवक जगत के कार्य-व्यवहार करता हुआ ही माया की ओर से उपराम रहता है। अपने सारे कुल भी (इस मोह से) बचा लेता है। 1। हे प्रभू ! मैं आपकी भगती नहीं छोडूँगा (चाहे इस कारण जगत मेरी हसी-मजाक उड़ाए)। मैं किसी की हसी-मज़ाक की परवाह नहीं करूँगा (मेहर कर। आपका) सदा कायम रहने वाला नाम मेरे हृदय में बसा रहे। 1। रहाउ। जैसे कोई प्राणी माया के मोह में डूबा रहता है (तथा किसी और तरफ वह ध्यान नहीं देता)। इसी तरह संत जन परमात्मा का नाम ही सिमरता रहता है। 2। हे प्रभू ! मुझ मूर्ख अंजान पर मेहर कर। (ताकि) मैं आपकी शरण में ही पड़ा रहूँ। 3। नानक कहता है- जगत के सारे काम (आखिर) व्यर्थ (साबत होते) हैं (फिर भी जीव निरे दुनियां के धंधों में ही खचित रहते हैं)। गुरू की कृपा से कोई विरला व्यक्ति प्रभू का आत्मिक जीवन देने वाला नाम प्राप्त करता है। 4। 8।
महला 1 बसंतु हिंडोल घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
साल ग्राम बिप पूजि मनावहु सुक्रितु तुलसी माला ॥
राम नामु जपि बेड़ा बांधहु दइआ करहु दइआला ॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: महला 1 बसंतु हिंडोल घरु 2 सतिगुर प्रसादि॥ हे ब्राहमण ! उस दयाल प्रभू की पूजा करो। उसको प्रसन्न करो। यही है सालग्राम (की पूजा)। नेक आचरण बनाओ। यह है तुलसी की माला। हे ब्राहमण ! परमात्मा का नाम सिमर के (संसार-समुंद्र की विकारों की लहरों में से पार लांघने के लिए) यह बेड़ा तैयार कर। (सदा परमात्मा के दर पर अरदास कर और कह-) हे दयालु प्रभू ! (मेरे पर) दया कर (और मुझे अपने नाम की दाति दे)। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू के वह प्रकाश-रूप प्रभू जिस सहेली को अंग-संग (बसा हुआ) दिखा दिया है (उसी को ही वह मिला है)।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।