जिन कउ तखति मिलै वडिआई गुरमुखि से परधान कीए ॥ पारसु भेटि भए से पारस नानक हरि गुर संगि थीए ॥4॥4॥12॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: गुरू की शरण पड़ कर जिन लोगों को हृदय-तख़्त पर बैठे रहने की (भाव। माया के पीछे भटकने से बचे रहने की) इज्जत मिलती है। उनको परमात्मा जगत में प्रसिद्ध कर देता है। हे नानक ! गुरू-पारस को मिल के वे स्वयं भी पारस हो जाते हैं (उनके अंदर भी यह समर्थता आ जाती है कि माया-ग्रसित मनों को प्रभू-चरणों में जोड़ सकें)। वह लोग सदा के लिए परमात्मा और गुरू के साथी बन जाते हैं (उनकी सुरति सदा) गुरू-प्रभू के चरणों में टिकी रहती है। 4। 4। 12।
बसंतु महला 3 घरु 1 दुतुके ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ माहा रुती महि सद बसंतु ॥ जितु हरिआ सभु जीअ जंतु ॥ किआ हउ आखा किरम जंतु ॥ तेरा किनै न पाइआ आदि अंतु ॥1॥ तै साहिब की करहि सेव ॥ परम सुख पावहि आतम देव ॥1॥ रहाउ ॥ करमु होवै तां सेवा करै ॥ गुर परसादी जीवत मरै ॥ अनदिनु साचु नामु उचरै ॥ इन बिधि प्राणी दुतरु तरै ॥2॥ बिखु अंम्रितु करतारि उपाए ॥ संसार बिरख कउ दुइ फल लाए ॥ आपे करता करे कराए ॥ जो तिसु भावै तिसै खवाए ॥3॥ नानक जिस नो नदरि करेइ ॥ अंम्रित नामु आपे देइ ॥ बिखिआ की बासना मनहि करेइ ॥ अपणा भाणा आपि करेइ ॥4॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 3 घरु 1 दुतुके सतिगुर प्रसादि॥ हे प्रभू ! सारे महीनों में सारी ऋतुओं में सदा खिले रहने वाला आप स्वयं ही मौजूद है। जिस (आपकी) बरकति से हरेक जीव जीवित है (सजिंद है)। मैं तुच्छ सा जीव क्या कह सकता हूँ। किसी ने भी आपका ना आदि पाया है ना अंत पाया है। 1। हे मालिक ! हे प्रभू देव ! जो मनुष्य आपकी सेवा-भक्ति करते हैं। वे सबसे ऊँचा आत्मिक आनंद पाते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! (जब किसी मनुष्य पर परमात्मा की) बख्शिश होती है तब वह (परमात्मा की) सेवा-भगती करता है। गुरू की कृपा से (वह मनुष्य) दुनिया की किरत-कार करता हुआ ही विकारों से बचा रहता है। वह मनुष्य हर वक्त परमात्मा का सदा रहने वाला नाम उचारता रहता है। और। इस तरीके से वह मनुष्य उस संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है जिससे पार लांघना बहुत मुश्किल है। 2। हे भाई ! आत्मिक मौत लाने वाली माया और आत्मिक जीवन देने वाला नाम- यह करतार ने (ही) पैदा किए हैं। जगत-वृक्ष को उसने ये दोनों फल लगाए हुए हैं। (सर्व-व्यापक हो के) करतार स्वयं ही (सब कुछ) कर रहा है और (जीवों से) करवा रहा है। जिस जीव को जो फल खिलाने की उसकी मर्जी होती है उसी को वही खिला देता है। 3। हे नानक ! जिस मनुष्य पर करतार मेहर की निगाह करता है। उसको वह स्वयं ही आत्मिक जीवन देने वाला अपना नाम देता है। (उसके अंदर से) माया की लालसा रोक देता है। हे भाई ! अपनी रज़ा परमात्मा स्वयं (ही) करता है। 4। 1।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 3॥ हे प्रभू ! जो मनुष्य आपके सदा-स्थिर नाम में रंगे जाते हैं। वे प्रसन्न-चित्त रहते हैं। हे दीनों पर दया करने वाले प्रभू ! (मेरे ऊपर भी) मेहर कर (मुझे भी अपना नाम बख्श)। हे भाई ! उस प्रभू के बिना मुझे और कोई बेली नहीं दिखाई देता। जैसे उसकी रज़ा होती है वैसे ही वह (जीवों की) रक्षा करता है। 1। हे भाई ! गुरू परमेश्वर मेरे मन को प्यारा लगता है। मैं उसके दर्शन किए बिना नहीं रह सकता (दर्शनों के बिना मुझे धैर्य नहीं आता)। (जब) गुरू (मुझे अपनी) संगति में मिलाता है। (तब) मैं आत्मिक अडोलता में (टिक के उसको) मिलता हूँ। 1। रहाउ। हे भाई ! जिस मनुष्य का यह लालची मन (सदा) लालच में फसा रहता है। वह मनुष्य परमात्मा का नाम भुला के फिर हाथ मलता है। जो मनुष्य गुरू की बताई हुई हरी-भगती में रंगे जाते हैं उनको (प्रभू-चरणों से) विछुड़ों को गुरू (दोबारा) मिला देता है। जिनके माथे पर भाग्य जाग उठे उनको गुरू ने परमात्मा का नाम बख्श दिया। 2। हे भाई ! यह शरीर हवा पानी (आदि तत्वों) का बना हुआ है। जिस मनुष्य के इस शरीर में अहंकार का रोग है। (उसके शरीर में इस रोग की) कठिन पीड़ा बनी रहती है। गुरू के सन्मुख हो के जो मनुष्य परमात्मा के गुण गाता है। परमात्मा का नाम (उसके लिए अहम्-रोग दूर करने के लिए) दवा बन जाता है। जो भी मनुष्य (गुरू की शरण आया) गुरू ने कृपा करके उसका यह रोग दूर कर दिया। 3। हे भाई ! (जगत में हंस। हेत। लोभ। कोप) चार आग की नदियां बह रही हैं। (जिन मनुष्यों के) शरीर में ये चारों आग प्रबल हैं। वे मनुष्य तृष्णा में जलते हैं। हे नानक ! (कह- हे भाई !) जिन भाग्यशाली सेवकों की गुरू ने रक्षा की। (गुरू ने उनको इन नदियों से) पार लंघा लिया। उन्होंने आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम अपने हृदय में बसा लिया। 4। 2।
बसंतु महला 3 ॥ हरि सेवे सो हरि का लोगु ॥ साचु सहजु कदे न होवै सोगु ॥ मनमुख मुए नाही हरि मन माहि ॥ मरि मरि जंमहि भी मरि जाहि ॥1॥ से जन जीवे जिन हरि मन माहि ॥ साचु सम॑ालहि साचि समाहि ॥1॥ रहाउ ॥ हरि न सेवहि ते हरि ते दूरि ॥ दिसंतरु भवहि सिरि पावहि धूरि ॥ हरि आपे जन लीए लाइ ॥ तिन सदा सुखु है तिलु न तमाइ ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 3॥ हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा का सिमरन करता है वह परमात्मा का भक्त है। उसको सदा कायम रहने वाली आत्मिक अडोलता मिली रहती है। उसको कभी कोई ग़म छू नहीं सकता। पर। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य आत्मिक मौत सहेड़ी रखते हैं (क्योंकि) उनके मन में परमात्मा की याद नहीं। वह मनुष्य आत्मिक मौत सहेड़-सहेड़ के जन्मों के चक्करों में पड़े रहते हैं। और बार-बार आत्मिक मौत के चुंगल में फसे रहते हैं। 1। हे भाई ! जिन मनुष्यों के मन में परमात्मा का नाम बसता है जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू को हृदय में बसाए रखते हैं। सदा-स्थिर प्रभू में लीन रहते हैं। वे मनुष्य आत्मिक जीवन वाले हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा का नाम नहीं सिमरते। वे परमात्मा से विछुड़े रहते हैं। वे मनुष्य और-और देशों में भटकते फिरते हैं। अपने सिर में मिट्टी डालते हैं (दुखी होते रहते हैं)। हे भाई ! अपने भक्तों को प्रभू स्वयं ही (अपने चरणों में) जोड़े रखता है उनको सदा आत्मिक आनंद प्राप्त रहता है। उनको कभी रक्ती भर भी (माया का) लालच नहीं व्यापता। 2।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू की शरण पड़ कर जिन लोगों को हृदय-तख़्त पर बैठे रहने की (भाव।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।