हणवंतु जागै धरि लंकूरु ॥ संकरु जागै चरन सेव ॥ कलि जागे नामा जैदेव ॥2॥ जागत सोवत बहु प्रकार ॥ गुरमुखि जागै सोई सारु ॥ इसु देही के अधिक काम ॥ कहि कबीर भजि राम नाम ॥3॥2॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: जागता रहा हनुमान पूछल धार के भी (भाव। लोग उसको पूँछ वाला ही कहते हैं)। प्रभू-चरणों की सेवा करके जागा शिव जी। जागते रहे (अब के समय) कलियुग में जागते रहे भगत नामदेव और जैदेव जी। 2। जागना और सोए रहना (भी) कई किस्मों का है (चोर भी तो रात को जागते ही हैं)। वह जागना श्रेष्ठ है जो गुरमुखों का जागना है (भाव। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहके माया के हमलों की तरफ से सचेत रहता है। वही जाग रहा है)। यह सिमरन) जीव के बहुत काम आता है। कबीर कहता है- हे भाई ! प्रभू का नाम सिमर (के सचेत रह)3। 2।
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: स्त्री ने पति को जन्म दिया है (भाव। जिस मन को माया ने जन्म दिया है। वही इसको भोगने वाला बन जाता है) । मन-पुत्र ने पिता-जीवात्मा को खेलने लगा दिया है। (यह मन) थनों के बिना ही (जीवात्मा को) दूध पिला रहा है (भाव। नाशवंत पदार्थों के स्वाद में डाल रहा है)। 1। हे लोगो ! देखो। कलियुग का अजीब प्रभाव पड़ रहा है (भाव। प्रभू से विछुड़ने के कारण जीव पर अजीब दबाव पड़ रहा है)। (मन-रूप) पुत्र ने अपनी माँ (-माया) को ब्याह लिया है। 1। रहाउ। (इस मन के) कोई पैर नहीं हैं। पर छलांगे लगाता फिरता है; (इसका) मुँह नहीं। पर खिड़-खिड़ के हसता फिरता है। (जीव का असल तो ऐसा है कि इसको माया की) नींद नहीं व्याप सकती थी। पर (‘कलि को भाउ’ देखो) जीव लंबी तान के सोया हुआ है; और बर्तन के बग़ैर ही दूध दुहे जा रहा है (भाव। शेखचिल्ली की तरह सपने संजोता रहता है)। 2। (इस माया-रूप) गाय से सुख तो नहीं मिल सकते। पर यह (मन को) झूठे पदार्थों-रूप दूध में मोह रही है। (अपनी असल बिरती के मुताबिक तो इस जीव को कोई भटकना नहीं होनी चाहिए। पर ‘कलि का भाउ’ देखो) लंबे रास्ते (चौरासी के चक्करों में) पड़ा हुआ है। हे कबीर ! (इस जगत को) समझा के बता कि सतिगुरू के बिना जीवन-सफर का सही रास्ता नहीं मिल सकता। 3। 3।
प्रहलाद पठाए पड़न साल ॥ संगि सखा बहु लीए बाल ॥ मो कउ कहा पड़॑ावसि आल जाल ॥ मेरी पटीआ लिखि देहु स्री गोुपाल ॥1॥ नही छोडउ रे बाबा राम नाम ॥ मेरो अउर पड़॑न सिउ नही कामु ॥1॥ रहाउ ॥ संडै मरकै कहिओ जाइ ॥ प्रहलाद बुलाए बेगि धाइ ॥ तू राम कहन की छोडु बानि ॥ तुझु तुरतु छडाऊ मेरो कहिओ मानि ॥2॥ मो कउ कहा सतावहु बार बार ॥ प्रभि जल थल गिरि कीए पहार ॥ इकु रामु न छोडउ गुरहि गारि ॥ मो कउ घालि जारि भावै मारि डारि ॥3॥ काढि खड़गु कोपिओ रिसाइ ॥ तुझ राखनहारो मोहि बताइ ॥ प्रभ थंभ ते निकसे कै बिसथार ॥ हरनाखसु छेदिओ नख बिदार ॥4॥ ओइ परम पुरख देवाधि देव ॥ भगति हेति नरसिंघ भेव ॥ कहि कबीर को लखै न पार ॥ प्रहलाद उधारे अनिक बार ॥5॥4॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: प्रहलाद को (उसें पिता हर्णाकष्यप ने) पाठशाला में पढ़ने भेजा। (प्रहलाद ने अपने) साथ कई बालक साथ ले लिए। (जब अध्यापक कुछ और आल-जंजाल पढ़ाने लगा। तो प्रहलाद ने कहा। हे बाबा !) मुझे ऊल-जलूल क्यों पढ़ाता है। मेरी इस पटिआ पर ‘श्री गोपाल श्री गोपाल’ लिख दो। 1। हे बाबा ! मैं परमात्मा का नाम सिमरना नहीं छोड़ूँगा। नाम के बिना कोई और बात पढ़ने से मेरा कोई वास्ता नहीं। 1। रहाउ। (प्रहलाद के अध्यापक) संडे मरके (अमरक) ने जाकर (हर्णाकश्यप को यह बात) कह दी। उसने जल्दी से प्रहलाद को बुला लिया। (अध्यापक ने प्रहलाद को समझाया) आप परमात्मा के नाम के सिमरन की आदत को छोड़ दे। मैं आपको तुरंत छुड़वा लूँगा। 2। (प्रहलाद ने उक्तर दिया। ये बात कह कर) मुझे क्यों बार-बार परेशान करते हैं। जिस प्रभू ने पानी। धरती। पहाड़ आदि सारी सृष्टि बनाई। मैं उस राम को सिमरना नहीं छोड़ूँगा। (उसको छोड़ने से) मेरे गुरू को गाली लगती है (भाव। मेरे गुरू की बदनामी होती है)। मुझे चाहे जला भी दे। चाहे मार दे। 3। (हर्णाकश्यप) खिझ के क्रोध में आया। तलवार (म्यान से) निकाल के (कहने लगा-) मुझे वह बता जो आपको बचाने वाला है। प्रभू भयानक रूप धार के खम्भे में से निकल आया। और उसने अपने नाखूनों से चीर के हर्णाकश्यप को मार दिया। 4। कबीर कहता है- प्रभू जी परम-पुरख हैं। देवताओं के भी बड़े देवता हैं। प्रहलाद की भक्ति से प्रसन्न होकर प्रभू ने नरसिंघ का रूप धारा। कोई जीव उस प्रभू की ताकत का अंत नहीं पा सकता। प्रहलाद को अनेकों कष्टों से बचाया। 5। 4।
इसु तन मन मधे मदन चोर ॥ जिनि गिआन रतनु हिरि लीन मोर ॥ मै अनाथु प्रभ कहउ काहि ॥ को को न बिगूतो मै को आहि ॥1॥ माधउ दारुन दुखु सहिओ न जाइ ॥ मेरो चपल बुधि सिउ कहा बसाइ ॥1॥ रहाउ ॥ सनक सनंदन सिव सुकादि ॥ नाभि कमल जाने ब्रहमादि ॥ कबि जन जोगी जटाधारि ॥ सभ आपन अउसर चले सारि ॥2॥ तू अथाहु मोहि थाह नाहि ॥ प्रभ दीना नाथ दुखु कहउ काहि ॥ मोरो जनम मरन दुखु आथि धीर ॥ सुख सागर गुन रउ कबीर ॥3॥5॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: (मेरी ‘चंचल बुधि’ के कारण। अब) मेरे इस तन-मन में कामदेव चोर आ बसा है। जिसने ज्ञान-रूप मेरा रत्न (मेरे अंदर से) चुरा लिया है (भाव। जिसने मेरी समझ बिगाड़ दी है)। हे प्रभू ! मैं (बड़ा) आजिज़ हो गया हूँ। (अपना दुख आपके बिना और) किसको बताऊँ। (इस काम के हाथ से) कौन-कौन दुखी नहीं हुआ। मुझ (गरीब) की क्या बिसात है। 1। हे मेरे माधो ! अपनी चंचल मति के आगे मेरी कोई पेश नहीं चलती। यह अति-भयंकर दुख (अब) मुझसे सहा नहीं जाता। 1। रहाउ। सनक। सनंदन। शिव। शुकदेव जैसे (बड़े-बड़े ऋषि-तपस्वी) कमल की नाभि से जन्मे ब्रहमा आदि। कवि लोग। जोगी और जटाधारी साधू- ये सब (काम से डरते-डरते) अपने-अपने समय में दिन-काट कर चले गए। 2। आप बड़े गहरे जिगरे वाला है। मैं (आपके गंभीर समुंदर जैसे महा विशाल दिल की) थाह नहीं लगा सकता। हे दीनानाथ प्रभू ! दुख दूर कर। मेरे जन्म-मरण का दुख निवृत्त करके शान्ति प्रदान करो हे कबीर ! (काम आदि से बचने के लिए एक ही प्रभू का आसरा है। उसके आगे इस तरह अरजोई कर-) हे सुखों के सागर प्रभू ! मैं और किस के आगे अरज़ोई करूँ। माया से पैदा हुआ यह मेरा सारी उम्र का दुख दूर कर। ता कि मैं आपके गुण याद कर सकूँ। 3। 5।
नाइकु एकु बनजारे पाच ॥ बरध पचीसक संगु काच ॥ नउ बहीआं दस गोनि आहि ॥ कसनि बहतरि लागी ताहि ॥1॥ मोहि ऐसे बनज सिउ नहीन काजु ॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: जीव (मानो) एक शाह है। पाँच ज्ञान इन्द्रियाँ (इस शाह के) बनजारे हैं। पच्चिस प्रकृतियाँ (काफ़िले के) बैल हैं। पर ये सारा साथ कच्चा ही है। नौ दरवाजे (मानो) बहियाँ हैं। दस इन्द्रियाँ छटें हैं। बहक्तर नाड़ियाँ (छटों को सीने के लिए) रस्सियाँ हैं जो इन (इन्द्रिय-रूपी छटों) को लगी हुई हैं। 1। मुझे ऐसा व्यापार करने की आवश्यक्ता नहीं।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जागता रहा हनुमान पूछल धार के भी (भाव।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।