रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: लोभ जीव के लिए अंधेरे भरा कैदखाना बना हुआ है। और इसके अपने कमाए पाप इसके पैर में लोहे की बेड़ी बने हुए हैं। 3। (इस लब के कारण) जीव का सरमाया यह है कि इसको। मानो। नित्य मुसलों की मार पड़ रही है। और इसका अपना कमाया पाप (-जीवन) इसके सिर पर कोतवाली कर रहा है। पर। हे प्रभू ! (जीव के भी क्या वश।) जैसी आपकी निगाह हैं वैसा ही जीव बन जाता है। आपको अच्छा लगे तो ठीक। आपको अच्छा लगे तो बुरा बन जाता है (ये थी लोगों की बोली जो हिन्दू-राज के समय आम तौर पर बरती जाती थी)। 4। पर। अब मुसलमानी राज का वक्त है। (जिसको पहले हिन्दकी बोली में) ‘आदि पुरख’ कहा जाता था अब उसको ‘अल्ला’ कहा जा रहा है। अब ये रिवाज चल पड़ा है कि (हिन्दू जिन मन्दिरों में देवताओं की पूजा करते हैं। उन) दैव-मन्दिरों पर टैक्स लगाया जा रहा है। 5। अब लोटा। बांग। नमाज़। मुसॅला (प्रधान हैं)। परमात्मा की बँदगी करने वालों ने नीले वस्त्र पहने हुए हैं। अब आपकी (भाव। आपके बँदों की) बोली ही और हैं गई है। हरेक घर में सब जीवों के मुँह पर (शब्द ‘पिता’ की जगह) शब्द ‘मीआं’ प्रधान है। 6। हे पातशाह ! आप धरती का पति है। मालिक है। अगर आप (यही पसंद करता है कि यहाँ इस्लामी राज हैं जाए) तो हम जीवों की क्या ताकत है (कि गिला कर सकें) । चारों कुंटों के जीव। हे पातशाह ! आपको सलाम करते हैं (आपके आगे ही झुकते हैं) हरेक घर में आपकी सिफत-सालाह हैं रही है (आपके आगे ही आपके पैदा किए हुए) बँदे अपनी तक़लीफें बता सकते हैं। 7। (पर। तीर्थों मन्दिरों आदि पर रोक और गिले की भी आवश्यक्ता नहीं क्योंकि) तीर्थों के स्नान। स्मृतियों के पाठ और दान-पुन्य आदि का अगर कोई लाभ है तो वह (तिल-मात्र ही है) थोड़ी सी मजदूरी के रूप में ही। हे नानक ! अगर कोई मनुष्य परमात्मा का नाम एक घड़ी मात्र. ही याद करे तो उसको (लोक-परलोक में) आदर मिलता है। 8। 1। 8।
बसंतु हिंडोलु घरु 2 महला 4 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ कांइआ नगरि इकु बालकु वसिआ खिनु पलु थिरु न रहाई ॥ अनिक उपाव जतन करि थाके बारं बार भरमाई ॥1॥ मेरे ठाकुर बालकु इकतु घरि आणु ॥ सतिगुरु मिलै त पूरा पाईऐ भजु राम नामु नीसाणु ॥1॥ रहाउ ॥ इहु मिरतकु मड़ा सरीरु है सभु जगु जितु राम नामु नही वसिआ ॥ राम नामु गुरि उदकु चुआइआ फिरि हरिआ होआ रसिआ ॥2॥ मै निरखत निरखत सरीरु सभु खोजिआ इकु गुरमुखि चलतु दिखाइआ ॥ बाहरु खोजि मुए सभि साकत हरि गुरमती घरि पाइआ ॥3॥ दीना दीन दइआल भए है जिउ क्रिसनु बिदर घरि आइआ ॥ मिलिओ सुदामा भावनी धारि सभु किछु आगै दालदु भंजि समाइआ ॥4॥ राम नाम की पैज वडेरी मेरे ठाकुरि आपि रखाई ॥ जे सभि साकत करहि बखीली इक रती तिलु न घटाई ॥5॥ जन की उसतति है राम नामा दह दिसि सोभा पाई ॥ निंदकु साकतु खवि न सकै तिलु अपणै घरि लूकी लाई ॥6॥ जन कउ जनु मिलि सोभा पावै गुण महि गुण परगासा ॥ मेरे ठाकुर के जन प्रीतम पिआरे जो होवहि दासनि दासा ॥7॥ आपे जलु अपरंपरु करता आपे मेलि मिलावै ॥ नानक गुरमुखि सहजि मिलाए जिउ जलु जलहि समावै ॥8॥1॥9॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: बसंतु हिंडोलु महला 1 घरु 4 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! शरीर-नगर में (ये मन) एक (ऐसा) अंजान बालक बसता है जो एक पल के लिए भी टिका नहीं रह सकता। (इसको टिकाने के लिए) अनेकों उपाय अनेकों यत्न कर के थक जाते हैं। पर (यह मन) बार-बार भटकता फिरता है। 1। हे मेरे मालिक ! (हम जीवों के इस) अंजान मन को आप ही एक ठिकाने पर लगा (आपकी मेहर से मन भटकने से हट के ठहराव में आ सकता है)। हे भाई ! जब गुरू मिलता है तब पूरन परमात्मा मिल जाता है (तब मन भी टिक जाता है)। (इस वास्ते। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ के) परमात्मा का नाम जपा कर (ये हरी-नाम ही परमात्मा के दर पर पहुँचने के लिए) राहदारी है। 1। रहाउ। हे भाई ! अगर इस (शरीर) में परमात्मा का नाम नहीं बसा। तो यह मुर्दा है तो यह निरा मिट्टी का ढेर है। हे भाई ! सारा जगत ही नाम के बिना मुर्दा है। हे भाई ! परमात्मा का नाम (आत्मिक जीवन देने वाला) जल है। गुरू ने (जिस मनुष्य के मुँह में ये नाम-) जल टपका दिया। वह मनुष्य फिर आत्मिक जीवन वाला हो गया। वह मनुष्य आत्मिक तरावट वाला हो गया। 2। मैंने बड़े ध्यान से अपना सारा शरीर (ही) खोजा है। गुरू की मति पर चल के मैंने अपने हृदय-घर में ही परमात्मा को पा लिया है। हे भाई ! परमात्मा से टूटे हुए सारे मनुष्य दुनिया तलाश-तलाश के आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं। पर गुरू ने (मुझे) एक अजब तमाशा दिखाया है। 3। हे भाई ! परमात्मा बड़े-बड़े गरीबों पर (सदा) दया करता आया है जैसे कि कृष्ण (गरीब) बिदर के घर आए थे। और। जब (गरीब) सुदामा श्रद्धा धार के (कृष्ण जी को) मिला था। तो (वापस उसके अपने घर पहुँचने से) पहले ही उसकी गरीबी दूर करके हरेक पदार्थ (उसके घर) पहुँच चुका था। 4। हे भाई ! परमात्मा का नाम (जपने वालों) की बहुत ज्यादा इज्जत (लोक-परलोक में होती है। भक्तों की ये इज्जत सदा से ही) मालिक-प्रभू ने स्वयं (ही) बचाई हुई है। परमात्मा से टूटे हुए सारे लोग (मिल के भगत जनों की) निंदा करें। (तो भी परमात्मा उनकी इज्जत) रक्ती भर भी घटने नहीं देता। 5। हे भाई ! परमात्मा का नाम (जपने से परमात्मा के) सेवक की (लोक-परलोक में) शोभा होती है। (सेवक नाम की बरकति से) हर तरफ शोभा कमाता है। पर परमात्मा से टूटा हुआ निंदक मनुष्य (सेवक की हो रही शोभा को) रक्ती भर भी बर्दाश्त नहीं कर सकता (इस तरह वह निंदक सेवक का तो कुछ नहीं बिगाड़ सकता। वह) अपने हृदय-घर में (ही ईष्या और जलन की) आग लगाए रखता है (निंदक अपने आप ही अंदर से जलता-भुजता रहता है)। 6। हे भाई ! (निंदक तो अंदर-अंदर से जलता है। दूसरी तरफ़) परमात्मा का भक्त प्रभू के भक्त को मिल के शोभा कमाता है। उसके आत्मिक गुणों में (भक्त-जन को मिल के) और गुणों में बढ़ोक्तरी होती है। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा के दासों के दास बनते हैं। वे परमात्मा को प्यारे लगते हैं। 7। हे भाई ! (परमात्मा सब पर दया करने वाला है। वह साकत निंदक को भी बचाने वाला है। साकत-निंदक की ईष्या की आग बुझाने के लिए) वह बेअंत करतार स्वयं ही जल है। वह स्वयं ही (निंदक को भी गुरू की) संगति में (ला के) जोड़ता है। हे नानक ! परमात्मा गुरू की शरण डाल के (निंदक को भी) आत्मिक अडोलता में (इस प्रकार) मिला देता है जैसे पानी पानी में मिल जाता है। 8। 1। 9।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “लोभ जीव के लिए अंधेरे भरा कैदखाना बना हुआ है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।