भगत नामदेव महाराष्ट्र के संत थे, तेरहवीं-चौदहवीं सदी के। पंढरपुर के विट्ठल-मन्दिर से जुड़े, मगर बाद में पंजाब आ कर बसे, और गुरुदासपुर के पास उनकी समाधि है।
हिन्दी अर्थ: हे नामदेव ! भगत वही है जिस पर प्रभू स्वयं प्रसन्न हो जाए (और अपने नाम की दाति दे)। 3। 1।
लोभ लहरि अति नीझर बाजै ॥ काइआ डूबै केसवा ॥1॥ संसारु समुंदे तारि गोुबिंदे ॥ तारि लै बाप बीठुला ॥1॥ रहाउ ॥ अनिल बेड़ा हउ खेवि न साकउ ॥ तेरा पारु न पाइआ बीठुला ॥2॥ होहु दइआलु सतिगुरु मेलि तू मो कउ ॥ पारि उतारे केसवा ॥3॥ नामा कहै हउ तरि भी न जानउ ॥ मो कउ बाह देहि बाह देहि बीठुला ॥4॥2॥
नामदेव की वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं। आदि ग्रंथ में उनकी छियासठ रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।
हिन्दी अर्थ: (इस संसार-समुंद्र में) लोभ की लहरें बहुत ठाठा मार रही हैं। हे सुंदर केशों वाले प्रभू ! मेरा शरीर इनमें डूबता जा रहा है। 1। मुझे संसार-समुंद्र में से पार लंघा ले हे बीठल पिता ! हे गोबिंद ! । 1। रहाउ। हे बीठल ! (मेरी जिंदगी की) बेड़ी झॅखड़ (भँवर) में (फस गई है)। मैं इसको चप्पू लगाने के योग्य नहीं हूँ; हे प्रभू ! आपके (इस संसार-समुंद्र का) मुझे परला छोर नहीं मिलता। 2। हे केशव ! मेरे पर दया कर। मुझे गुरू मिला। और (इस समुंद्र में से) पार लंघा। 3। (आपका) नामदेव। हे बीठल ! बिनती करता है- (समुंद्र में लहरें उठ रही हैं। मेरी बेड़ी भँवर में फंस गई है। और) मैं तो तैरना भी नहीं जानता। मुझे अपनी बाँह पकड़ा। दाता ! बाँह पकड़ा। 4। 1। 2।
सहज अवलि धूड़ि मणी गाडी चालती ॥ पीछै तिनका लै करि हांकती ॥1॥ जैसे पनकत थ्रूटिटि हांकती ॥ सरि धोवन चाली लाडुली ॥1॥ रहाउ ॥ धोबी धोवै बिरह बिराता ॥ हरि चरन मेरा मनु राता ॥2॥ भणति नामदेउ रमि रहिआ ॥ अपने भगत पर करि दइआ ॥3॥3॥
भगत नामदेव महाराष्ट्र के संत थे, तेरहवीं-चौदहवीं सदी के। पंढरपुर के विट्ठल-मन्दिर से जुड़े, मगर बाद में पंजाब आ कर बसे, और गुरुदासपुर के पास उनकी समाधि है।
हिन्दी अर्थ: (जैसे) पहले (भाव। आगे-आगे) मैले कपड़ों से लादी हुई गाड़ी सहजे-सहजे चलती जाती है। और पीछे-पीछे (धोबिन) डंडी ले के हाँकती जाती है; (वैसे ही पहले ये आलसी शरीर सहजे-सहजे चलता है। पर ‘लाडुली’ इसको प्रेम आदि से प्रेरती है)। 1। जैसे (धोबिन) (उस गाड़ी को) पानी के घाट की तरफ ‘थ्रूटिटि’ कह-कह के हाँकती है। सर पर (धोबी की) लाडली (स्त्री) (कपड़े) धोने के लिए जाती है। वैसे ही प्रेमिका (जीव-स्त्री) सत्संग सरोवर पर (मन को) धोने के लिए जाती है। 1। रहाउ। प्यार में रंगा हुआ धोबी (-गुरू सरोवर आई जिज्ञासू-सि्त्रयों के मन) पवित्र कर देता है; (उसी गुरू-धोबी की मेहर सदका) मेरा मन (भी) अकाल-पुरख के चरणों में रंगा गया है। 2। नामदेव कहता है- वह अकाल-पुरख सब जगह व्यापक है। और अपने भक्तों पर (इस तरह। भाव। गुरू के माध्यम से) मेहर करता रहता है। 3।
बसंतु बाणी रविदास जी की ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ तुझहि सुझंता कछू नाहि ॥ पहिरावा देखे ऊभि जाहि ॥ गरबवती का नाही ठाउ ॥ तेरी गरदनि ऊपरि लवै काउ ॥1॥ तू कांइ गरबहि बावली ॥ जैसे भादउ खूंबराजु तू तिस ते खरी उतावली ॥1॥ रहाउ ॥ जैसे कुरंक नही पाइओ भेदु ॥ तनि सुगंध ढूढै प्रदेसु ॥ अप तन का जो करे बीचारु ॥ तिसु नही जमकंकरु करे खुआरु ॥2॥ पुत्र कलत्र का करहि अहंकारु ॥ ठाकुरु लेखा मगनहारु ॥ फेड़े का दुखु सहै जीउ ॥ पाछे किसहि पुकारहि पीउ पीउ ॥3॥ साधू की जउ लेहि ओट ॥ तेरे मिटहि पाप सभ कोटि कोटि ॥ कहि रविदास जोु जपै नामु ॥ तिसु जाति न जनमु न जोनि कामु ॥4॥1॥
नामदेव की वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं। आदि ग्रंथ में उनकी छियासठ रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।
हिन्दी अर्थ: बसंतु बाणी रविदास जी की सतिगुर प्रसादि ॥ (हे काया !) आप अपने ठाठ देख के अकड़ती है। (इस अकड़ में) आपको कुछ भी सुरति नहीं रही। (देख) अहंकार की कोई जगह नहीं (होती)। आपके बुरे दिन आए हुए हैं (कि आप झूठा मान कर रही है)। 1। हे मेरी कमली काया ! आप क्यों गुमान करती है। आप तो उस कुकरमुत्ते से भी जल्दी नाश हैं जाने वाली जो भाद्रों में (उगती है)। 1। रहाउ। (हे काया !) जैसे हिरन को ये पता नहीं होता (भेद नहीं मिलता) कि कस्तूरी की सुगंधि उसके अपने शरीर में से (आती है)। पर वह परदेस में ढूँढता फिरता है (वैसे ही आपको ये समझ नहीं आती कि सुखों का मूल प्रभू आपके अपने अंदर ही है)। जो जीव अपने शरीर की विचार करता है (कि ये सदा-स्थिर रहने वाला नहीं)। उसको जम-दूत दुखी नहीं करता। 2। (हे काया !) आप पुत्र और पत्नी का गुमान करती है (और प्रभू को भुला बैठी है। याद रख) मालिक प्रभू (किए हुए कर्मों का) लेखा माँगता है जीव अपने किए हुए दुष्कर्मों के कारण दुख सहता है। (हे काया ! प्राणों के निकल जाने के बाद) आप किस को ‘प्यारा। प्यारा’ कह के आवाजें मारेगी। 3। (हे काया !) अगर आप गुरू का आसरा ले। आपके करोड़ों पाप सारे के सारे नाश हैं जाएं। रविदास कहता है-जो मनुष्य नाम जपता है। उसकी (नीच। निम्न श्रेणी) जाति समाप्त हो जाती है। उसका जन्म मिट जाता है। जूनियों से उसका वास्ता नहीं रहता। 4। 1।
बसंतु कबीर जीउ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ सुरह की जैसी तेरी चाल ॥ तेरी पूंछट ऊपरि झमक बाल ॥1॥ इस घर महि है सु तू ढूंढि खाहि ॥ अउर किस ही के तू मति ही जाहि ॥1॥ रहाउ ॥ चाकी चाटहि चूनु खाहि ॥ चाकी का चीथरा कहां लै जाहि ॥2॥ छीके पर तेरी बहुतु डीठि ॥ मतु लकरी सोटा तेरी परै पीठि ॥3॥ कहि कबीर भोग भले कीन ॥ मति कोऊ मारै ईंट ढेम ॥4॥1॥
भगत नामदेव महाराष्ट्र के संत थे, तेरहवीं-चौदहवीं सदी के। पंढरपुर के विट्ठल-मन्दिर से जुड़े, मगर बाद में पंजाब आ कर बसे, और गुरुदासपुर के पास उनकी समाधि है।
हिन्दी अर्थ: बसंतु कबीर जीउ सतिगुर प्रसादि ॥ (हे कुत्ते !) गाय जैसी (भोली-भाली) आपकी चाल है। आपकी पूँछ पर बाल भी सुदर चमक रहे हैं (हे कुक्ता-स्वभाव जीव ! शरीफों जैसी आपकी सूरति और आपका पहरावा है)। 1। यहाँ सदा नहीं बैठे रहना। (हे कुत्ते के स्वभाव वाले जीव !) जो कुछ अपनी हक की कमाई है। उसी को निसंग हो के इस्तेमाल कर। किसी बेगाने माल की लालसा ना करनी। 1। रहाउ। (हे कुत्ते !) आप चक्की चाटता है। और आटा खाता है। पर (जाते हुए) परोला कहाँ ले के जाएगा। (हे जीव ! जो माया रोजाना इस्तेमाल करता है ये तो भले बर्तता रह। पर जोड़-जोड़ के आखिर कहाँ ले कर जाएगा।)। 2। (हे स्वान !) आप छिक्के की ओर बहुत झाँक रहा है। देखना कहीं कमर पर डण्डा ना बजे। (जो जीव। बेगाने घरों की ओर ताकता है; इस में से उपाधि ही निकलेगी)। 3। कबीर कहता है- (हे श्वान !) तूने बहुत कुछ खाया-उजाड़ा है। पर ध्यान रखना कहीं कोई ईट-ढेला आपके सिर पर ना मार दे। (हे जीव ! आप जो यह भोग भोगने में व्यस्त हुआ पड़ा है। इनका अंत दुखद ही होता है)। 4। 1।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
नामदेव के बारे में परम्परा कहती है कि उनके स्पर्श से एक मन्दिर का दरवाज़ा घूम कर उनकी ओर हो गया। आदि ग्रंथ में उनकी कई रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नामदेव ! भगत वही है जिस पर प्रभू स्वयं प्रसन्न हो जाए (और अपने नाम की दाति दे)।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।