Lulla Family

अंग 1171

अंग
1171
राग बसंत
राग: बसंत · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
काहे कलरा सिंचहु जनमु गवावहु ॥
काची ढहगि दिवाल काहे गचु लावहु ॥1॥ रहाउ ॥
कर हरिहट माल टिंड परोवहु तिसु भीतरि मनु जोवहु ॥
अंम्रितु सिंचहु भरहु किआरे तउ माली के होवहु ॥2॥
कामु क्रोधु दुइ करहु बसोले गोडहु धरती भाई ॥
जिउ गोडहु तिउ तुम॑ सुख पावहु किरतु न मेटिआ जाई ॥3॥
बगुले ते फुनि हंसुला होवै जे तू करहि दइआला ॥
प्रणवति नानकु दासनि दासा दइआ करहु दइआला ॥4॥1॥9॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: (हे ब्राहमण ! मूर्ति और तुलसी की पूजा करके) आप अपना जनम (व्यर्थ) गवा रहा है (आपका यह उद्यम यूँ ही है जैसे कोई किसान कलॅर धरती को पानी दिए जाए। कलॅर में फसल नहीं उगेगी) आप व्यर्थ ही कलॅर को सींच रहा है। (गारे की) कच्ची दीवार (अवश्य ही) ढहि जाएगी (अंदरूनी आचरण को बिसार के आप बाहर तुलसी आदि की पूजा कर रहा है। आप तो गारे की कच्ची दीवार पर) चूने का पलस्तर व्यर्थ ही कर रहा है। 1। रहाउ। (किसान अपने खेत के क्यारे सींचने के लिए अपने कूँए में रहट लगवाता है। बैल जोह के कूएं को चलाता है और पानी से क्यारे भरता है। इसी तरह हे ब्राहमण !) हाथों से सेवा करने को रहट और रहट की माला और उस माला में डब्बों (टिंडों) का जोड़ बना। (हाथों से सेवा वाले घड़े की माला वाले कूँएं) में अपना मन जोह। आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल सींच के अपनी ज्ञानेन्द्रियों के क्यारे इस नाम-जल से नाको-नाक भर। तब आप इस जगत-बाग़ के पालनहार प्रभू का प्यारा बनेगा। 2। (किसान उगी हुई खेती को खुरपी से गोडता है। फसल के हरेक पौधे को प्यार से संभाल के बचाता जाता है। और फालआप घास-बूटी नदीन को। मानो। गुस्से से बार उखाड़-उखाड़ के फेंकता जाता है। आप भी) हे भाई ! अपनी शरीर-धरती को गोड़। प्यार और गुस्सा ये दो खुरपे बना (दैवी-गुणों को प्यार से बचाए रख। विकारों को गुस्से से जड़ से उखाड़ता जा)। ज्यों-ज्यों आप इस तरह गोड़ी करेगा। त्यों-त्यों आत्मिक सुख पाएगा। आपकी की हुई यह मेहनत व्यर्थ नहीं जाएगी। 3। हे प्रभू ! हे दयालु प्रभू ! अगर आप मेहर करे तो (आपकी मेहर से मनुष्य पाखण्डी) बगुले से सुंदर हँस बन सकता है। आपके दासों का दास नानक विनती करता है (और कहता है कि) हे दयालु प्रभू ! मेहर कर (और बगुले से हँस करने वाला अपना नाम बख्श)। 4। 1। 9।
बसंतु महला 1 हिंडोल ॥
साहुरड़ी वथु सभु किछु साझी पेवकड़ै धन वखे ॥
आपि कुचजी दोसु न देऊ जाणा नाही रखे ॥1॥
मेरे साहिबा हउ आपे भरमि भुलाणी ॥
अखर लिखे सेई गावा अवर न जाणा बाणी ॥1॥ रहाउ ॥
कढि कसीदा पहिरहि चोली तां तुम॑ जाणहु नारी ॥
जे घरु राखहि बुरा न चाखहि होवहि कंत पिआरी ॥2॥
जे तूं पड़िआ पंडितु बीना दुइ अखर दुइ नावा ॥
प्रणवति नानकु एकु लंघाए जे करि सचि समावां ॥3॥2॥10॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 1 हिंडोल॥ आत्मिक जीवन की दाति जो पति-प्रभू की तरफ से मिली थी वह तो सबके साथ बाँटी जा सकने वाली (सांझी) थी। पर जगत-पेके घर में रहते हुए (माया के मोह के प्रभाव तले) मैं जीव-स्त्री भेद-भाव ही सीखती रही। मैं स्वयं ही कुचॅजी रही। (भाव। मैंने सुंदर जीवन-जुगति ना सीखी। इस कुचॅज में दुख सहेड़े हैं। पर) मैं किसी और पर (इन दुखों के लिए) कोई दोष नहीं लगा सकती। (पति-प्रभू द्वारा मिली आत्मिक जीवन की दाति को) संभाल के रखने की मुझे जाच नहीं आई। 1। हे मेरे मालिक-प्रभू ! मैं स्वयं ही (माया के मोह की) भटकना में पड़ के जीवन के सही रास्ते से भटकी हुई हूँ। (माया के मोह में फस के जितने भी कर्म मैं जन्मों-जन्मांतरों से करती आ रही हूँ। उनके जो) संस्कार मेरे मन में उकरे हुए हैं। मैं उनको गाती चली जा रही हूँ (उनकी ही प्रेरणा से बार-बार वैसे ही कर्म करती जा रही हूँ) मैं (मन की) कोई घाड़त (घड़नी) नहीं जानती हूँ (मैं कोई ऐसा कर्म करना नहीं जानती जिनसे मेरे अंदर से माया के मोह के संस्कार समाप्त हो)। 1। रहाउ। जो जीव-सि्त्रयाँ शुभ-गुणों के सुंदर चित्र (अपने मन में बना के) प्रेम-पटोला पहनती हैं उनको ही सुचॅजियाँ (सदाचारी) सि्त्रयाँ समझो। जो सि्त्रयाँ अपने (आत्मिक जीवन का) घर संभाल के रखती हैं कोई विकार कोई बुराई नहीं चखतीं (भाव। जो बुरे रसों में प्रवृत नहीं होतीं) वे पति-प्रभू को प्यारी लगती हैं। 2। हे भाई ! अगर आप सचमुच पढ़ा-लिखा विद्वान है समझदार है (तो यह बात पक्की तरह समझ ले कि संसार-समुंद्र के विकारों के पानियों में से पार लांघने के लिए) हरी-नाम ही बेड़ी है। नानक विनती करता है कि हरी-नाम ही (संसार-समुंद्र से) पार लंघाता है और मैं सदा कायम रहने वाले प्रभू के नाम में टिका रहूँ। 3। 2। 10।
बसंतु हिंडोल महला 1 ॥
राजा बालकु नगरी काची दुसटा नालि पिआरो ॥
दुइ माई दुइ बापा पड़ीअहि पंडित करहु बीचारो ॥1॥
सुआमी पंडिता तुम॑ देहु मती ॥
किन बिधि पावउ प्रानपती ॥1॥ रहाउ ॥
भीतरि अगनि बनासपति मउली सागरु पंडै पाइआ ॥
चंदु सूरजु दुइ घर ही भीतरि ऐसा गिआनु न पाइआ ॥2॥
राम रवंता जाणीऐ इक माई भोगु करेइ ॥
ता के लखण जाणीअहि खिमा धनु संग्रहेइ ॥3॥
कहिआ सुणहि न खाइआ मानहि तिन॑ा ही सेती वासा ॥
प्रणवति नानकु दासनि दासा खिनु तोला खिनु मासा ॥4॥3॥11॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: बसंतु हिंडोल महला 1॥ हे पण्डित ! (अगर कोई विचार की बात करनी है तो) यह सोचो कि (शरीर-नगरी पर) राज करने वाला मन अंजान है। यह शरीर-नगर भी कच्चा है (बाहर से विकारों के हमलों का मुकाबला करने के योग्य नहीं है क्योंकि ज्ञानेन्द्रियाँ कमजोर हैं)। (फिर इस अंजान मन का) प्यार भी कामादिक बुरे साथियों के साथ ही है। इसकीी माताएँ भी दो सुनी जाती हैं (बुद्धि और अविद्या)। इसके पिता भी दो ही बताए जाते हैं (परमात्मा और माया ग्रसित जीवात्मा। आम तौर पर यह अंजान मन अविद्या और माया-ग्रसित जीवात्मा की बातों में आया रहता है)। 1। हे पंडित जी महाराज ! आप तो और ही तरह की शिक्षा दे रहे हैं। (ऐसी दी हुई मति के साथ) मैं अपने प्राणों के मालिक परमात्मा को कैसे मिल सकता हूँ। 1। रहाउ। (हे पण्डित ! आप तो और ही किस्म की शिक्षा दे रहा है। आपकी दी हुई शिक्षा से अंजान मन को) यह समझ नहीं आती कि शीतलता (-शांति) और ईश्वरीय-तेज दोनों मनुष्य के शरीर के अंदर मौजूद हैं। (समझ ना आ सकने का कारण यह है कि) शरीर के अंदर विकारों की आग (मची हुई है) जवानी भी लहरें ले रही है (जैसे हरी-भरी वनस्पति के अंदर आग छुपी रहती है)। मायावी वासना का समुंद्र इस शरीर के अंदर ठाठा मार रहा है (मानो। समुंदर एक गाँव में छुपा हुआ है। सो। शिक्षा तो वह चाहिए जो इस अंदरूनी बाढ़ को रोक सके)। 2। वही मनुष्य परमात्मा का सिमरन करता समझा जा सकता है जो (बुद्धि और अविद्या- दो माताओं में से) एक माँ (अविद्या को) समाप्त कर दे। (जो मनुष्य अविद्या माता का समाप्त कर देता है) उसके (रोजाना जीवन के) लक्षण ये दिखते हैं कि वह दूसरों की ज्यादतियाँ ठंडे-जिगर से सहने का आत्मिक धन (सदा) इकट्ठा करता है। 3। (हे प्रभू ! आपके) दासों का दास विनती करता है (कि इन्सानी मन बेबस है) इसका संग सदा उन (ज्ञानेन्द्रियों) के साथ रहता है जो कोई शिक्षा सुनते ही नहीं हैं और जो विषौ-विकारों से कभी तृप्त भी नहीं होते। (यही कारण है कि यह मन) कभी तोला हो जाता है। कभी मासा रह जाता है (कभी मुकाबला करने की हिम्मत करता है और कभी घबरा जाता है)। 4। 3। 11।
बसंतु हिंडोल महला 1 ॥
साचा साहु गुरू सुखदाता हरि मेले भुख गवाए ॥
करि किरपा हरि भगति द्रिड़ाए अनदिनु हरि गुण गाए ॥1॥
मत भूलहि रे मन चेति हरी ॥
बिनु गुर मुकति नाही त्रै लोई गुरमुखि पाईऐ नामु हरी ॥1॥ रहाउ ॥
बिनु भगती नही सतिगुरु पाईऐ बिनु भागा नही भगति हरी ॥
बिनु भागा सतसंगु न पाईऐ करमि मिलै हरि नामु हरी ॥2॥
घटि घटि गुपतु उपाए वेखै परगटु गुरमुखि संत जना ॥
हरि हरि करहि सु हरि रंगि भीने हरि जलु अंम्रित नामु मना ॥3॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: बसंतु हिंडोल महला 1॥ गुरू ऐसा शाहु है जिसके पास प्रभू के नाम का धन सदा ही टिका रहता है। (इस वास्ते) गुरू सुख देने के समर्थ है। गुरू प्रभू के साथ मिला देता है। और माया इकट्ठी करने की भूख मनुष्य के मन में से निकाल देता है। गुरू मेहर करके (शरण आए सिख के मन में) प्रभू को मिलने की तमन्ना पक्की कर देता है (क्योंकि गुरू स्वयं) हर वक्त परमात्मा की सिफत-सालाह करता रहता है (अपनी सुरति सदा प्रभू की सिफत-सालाह में टिकाए रखता है)। 1। हे (मेरे) मन ! परमात्मा को (सदा) याद रख। (देखना। माया की भूख में फस के) कहीं (उसको) भुला ना देना। (पर) गुरू की शरण पड़ने से ही परमात्मा का नाम मिलता है। गुरू की शरण पड़े बिना माया की भूख से खलासी नहीं हो सकती (भले ही) तीनों लोकों में ही (दौड़-भाग कर के देख ले)। (इस वास्ते। हे मन ! गुरू का पल्ला पकड़)। 1। रहाउ। दिली-आकर्षण के बिना सतिगुरू भी नहीं मिलता (भाव। गुरू की कद्र नहीं पाई जा सकती)। और भाग्यों के बिना (पिछले संस्कारों की राशि-पूँजी के बिना) प्रभू को मिलने की तमन्ना (मन में) नहीं उपजती। (पिछले संस्कारों की राशि-पूँजी वाले) भाग्यों के बिना गुरमुखों की संगति नहीं मिलती (भाव। सत्संग की कद्र नहीं पड़ सकती)। प्रभू की अपनी मेहर के साथ ही उसका नाम प्राप्त होता है। 2। जो प्रभू स्वयं सारी सृष्टि पैदा करता है और उसकी संभाल करता है। वह हरेक शरीर में छुपा बैठा है। गुरू की शरण पड़ने वाले संत-जनों को वह हर जगह प्रत्यक्ष दिखाई देने लग जाता है। वह संत जन सदा प्रभू का नाम जपते हैं। और उसके प्यार-रंग में मस्त रहते हैं। उनके मन में प्रभू का आत्मिक जिंदगी देने वाला नाम-जल सदा बसता रहता है। 3।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे ब्राहमण ! मूर्ति और तुलसी की पूजा करके) आप अपना जनम (व्यर्थ) गवा रहा है (आपका यह उद्यम यूँ ही है जैसे कोई किसान कलॅर धरती को पानी दिए जाए।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।