तू वड दाता तू वड दाना अउरु नही को दूजा ॥ तू समरथु सुआमी मेरा हउ किआ जाणा तेरी पूजा ॥3॥ तेरा महलु अगोचरु मेरे पिआरे बिखमु तेरा है भाणा ॥ कहु नानक ढहि पइआ दुआरै रखि लेवहु मुगध अजाणा ॥4॥2॥20॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।
हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! आप (सबसे) बड़ा दातार है। आप (सबसे) बड़ा समझदार है (आपके बराबर का) कोई अन्य दूसरा नहीं। आप सब ताकतों का मालिक है। आप मेरा पति है। मैं आपकी भक्ति करनी नहीं जानता (आप स्वयं ही मेहर करे। तो कर सकता हॅूँ)। 3। हे मेरे प्यारे प्रभू ! जहाँ आप बसता है वह ठिकाना हम जीवों की ज्ञान-इन्द्रियों की पहुँच से परे है। आपकी रजा में चलना बड़ा मुश्किल काम है। हे नानक ! कह- (हे प्रभू !) मैं आपके दर पर गिर गया हूँ। मुझ मूर्ख को मुझ अंजान को (आप स्वयं हाथ दे के) बचा ले। 4। 2। 0।
बसंतु हिंडोल महला 5 ॥ मूलु न बूझै आपु न सूझै भरमि बिआपी अहं मनी ॥1॥ पिता पारब्रहम प्रभ धनी ॥ मोहि निसतारहु निरगुनी ॥1॥ रहाउ ॥ ओपति परलउ प्रभ ते होवै इह बीचारी हरि जनी ॥2॥ नाम प्रभू के जो रंगि राते कलि महि सुखीए से गनी ॥3॥ अवरु उपाउ न कोई सूझै नानक तरीऐ गुर बचनी ॥4॥3॥21॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।
हिन्दी अर्थ: बसंतु हिंडोल महला 5॥ हे भाई ! अहंकार के कारण (जीव की बुद्धि माया की खातिर) दौड़-भाग में फसी रहती है। (तभी जीव अपने) मूल-प्रभू के साथ सांझ नहीं डालता। और अपने आप को भी नहीं समझता। 1। हे मेरे पिता पारब्रहम ! हे मेरे मालिक प्रभू ! मुझ गुणहीन को (संसार-समुंद्र से) पार लंघा। 1। रहाउ। हे भाई ! संत-जनों ने तो यही विचार किया है कि जगत की उत्पक्ति और जगत का विनाश परमात्मा के हुकम अनुसार ही होता है। 2। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम के प्यार-रंग में रंगे रहते हैं। मैं तो उनको ही सुखी जीवन वाले समझता हूँ। 3। हे नानक ! (कह- हे भाई !) गुरू के बचनों पर चल कर ही संसार-समुंद्र से पार लांघा जा सकता है। कोई और तरीका नहीं सूझता (जिसकी मदद से पार हुआ जा सके)। 4। 3। 21।
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ रागु बसंतु हिंडोल महला 9 ॥ साधो इहु तनु मिथिआ जानउ ॥ या भीतरि जो रामु बसतु है साचो ताहि पछानो ॥1॥ रहाउ ॥ इहु जगु है संपति सुपने की देखि कहा ऐडानो ॥ संगि तिहारै कछू न चालै ताहि कहा लपटानो ॥1॥ उसतति निंदा दोऊ परहरि हरि कीरति उरि आनो ॥ जन नानक सभ ही मै पूरन एक पुरख भगवानो ॥2॥1॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।
हिन्दी अर्थ: ੴ सतिगुर प्रसादि॥ रागु बसंतु हिंडोल महला 9॥ हे संत जनो ! इस शरीर को नाशवंत समझो। इस शरीर में जो पदार्थ बस रहा है। (सिर्फ) उसको सदा कायम रहने वाला जानो। 1। रहाउ। हे भाई ! यह जगत उस धन के समान ही है जो सपने में मिल जाता है (और। जागते ही खत्म हो जाता है) (इस जगत को धन को) देख के अहंकार क्यों करता है। यहाँ कोई भी चीज़ (अंत समय में) आपके साथ नहीं जा सकती। फिर इससे क्यों चिपका हुआ है। 1। हे भाई ! किसी की खुशामद किसी की निंदा- ये दोनों काम छोड़ दे। सिर्फ परमात्मा की सिफत-सालाह (अपने) हृदय में बसाओ। हे दास नानक ! (कह- हे भाई !) सिर्फ वह भगवान पुरख ही (सलाहने-योग्य है जो) सब जीवों में व्यापक है। 2। 1।
बसंतु महला 9 ॥ पापी हीऐ मै कामु बसाइ ॥ मनु चंचलु या ते गहिओ न जाइ ॥1॥ रहाउ ॥ जोगी जंगम अरु संनिआस ॥ सभ ही परि डारी इह फास ॥1॥ जिहि जिहि हरि को नामु सम॑ारि ॥ ते भव सागर उतरे पारि ॥2॥ जन नानक हरि की सरनाइ ॥ दीजै नामु रहै गुन गाइ ॥3॥2॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।
हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 9॥ हे भाई ! पापों में फसाने वाली काम-वासना (मनुष्य के) हृदय में टिकी रहती है। इस वास्ते (मनुष्य का) चंचल मन काबू में नहीं आ सकता। 1। रहाउ। हे भाई ! जोगी जंगम और सन्यासी (जो अपनी तरफ़ से माया का) त्याग कर गए हैं- इस सबके ऊपर ही (माया ने काम-वासना का) यह फंदा फेंका हुआ है। 1। हे भाई ! जिस जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम अपने हृदय में बसाया है। वे सभी संसार-समुंद्र (के विकारों) से पार लांघ जाते हैं। 2। हे नानक ! परमात्मा का दास परमात्मा की शरण पड़ा रहता है (परमात्मा के दर पर वह अरजोई करता रहता है- हे प्रभू ! अपने दास को अपना) नाम दे (ताकि आपका दास आपके) गुण गाता रहे (इस तरह वह कामादिक विकारों की मार से बचा रहता है)। 3। 2।
बसंतु महला 9 ॥ माई मै धनु पाइओ हरि नामु ॥ मनु मेरो धावन ते छूटिओ करि बैठो बिसरामु ॥1॥ रहाउ ॥ माइआ ममता तन ते भागी उपजिओ निरमल गिआनु ॥ लोभ मोह एह परसि न साकै गही भगति भगवान ॥1॥ जनम जनम का संसा चूका रतनु नामु जब पाइआ ॥ त्रिसना सकल बिनासी मन ते निज सुख माहि समाइआ ॥2॥ जा कउ होत दइआलु किरपा निधि सो गोबिंद गुन गावै ॥ कहु नानक इह बिधि की संपै कोऊ गुरमुखि पावै ॥3॥3॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।
हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 9॥ हे (मेरी) माँ ! (जब का गुरू की शरण पड़ कर) मैंने नाम-धन हासिल किया है। मेरा मन (माया की खातिर) दौड़-भाग करने से बच गया है। (अब मेरा मन नाम-धन में) ठिकाना बना के बैठ गया है। 1। रहाउ। हे मेरी माँ ! (गुरू की किरपा से मेरे अंदर) शुद्ध-स्वरूप-परमात्मा के साथ गहरी सांझ बन गई है (जिसके कारण) मेरे शरीर में से माया जोड़ने की (धन एकत्र करने की) लालसा दूर हो गई है। (जब से मैंने) भगवान की भक्ति हृदय में बसाई है लोभ और मोह ये मेरे ऊपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकते। 1। हे मेरी माँ ! जब से (गुरू की कृपा से) मैंने परमात्मा का अमूल्य नाम पाया है। मेरा जन्मों-जन्मांतरों का सहम दूर हो गया है; मेरे मन में से सारी तृष्णा समाप्त हो गई है। अब मैं उस आनंद में टिका रहता हूँ जो सदा मेरे साथ बना रहने वाला है। 2। हे माँ ! कृपा का खजाना गोबिंद जिस मनुष्य पर दयावान होता है। वह मनुष्य उसके गुण गाता रहता है। हे नानक ! कह- (हे माँ !) कोई विरला मनुष्य इस किस्म का धन गुरू के सन्मुख रह के हासिल करता है। 3। 3।
बसंतु महला 9 ॥ मन कहा बिसारिओ राम नामु ॥ तनु बिनसै जम सिउ परै कामु ॥1॥ रहाउ ॥ इहु जगु धूए का पहार ॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।
हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 9॥ हे मन ! आप परमात्मा का नाम क्यों भुलाए बैठा है। (जब) शरीर नाश हैं जाता है। (तब परमात्मा के नाम के बिना) जमों से वास्ता पड़ता है। 1। रहाउ। हे मन ! यह संसार (तो। मानो) धूएँ का पहाड़ है (जिसको हवा का एक बुल्ला उड़ा के ले जाता है)।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
तेग बहादुर जी की रचनाएँ ग्रंथ के अंतिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं। वैराग्य, क्षणिकता, और मरण-चेतना उनकी वाणी के केन्द्रीय धागे हैं।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! आप (सबसे) बड़ा दातार है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।