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महाभारतधर्म की कठिन भूमि

अध्याय 13क · लोमश के साथ तीर्थयात्रा: अगस्त्य से हनुमान तक

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महाभारत · वन पर्व
लोमश के साथ पाण्डवों की तीर्थयात्रा: अगस्त्य का समुद्र-पान और गंगावतरण, ऋष्यशृंग और परशुराम, प्रभास पर कृष्ण-बलराम से भेंट, च्यवन-सुकन्या, मान्धाता, शिबि और अष्टावक्र, यवक्रीत की कथा, और गन्धमादन पर भीम की हनुमान से भेंट, सौगन्धिक सरोवर, जटासुर और कुबेर।

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तीर्थयात्रा की कथाएँ इस तरह चलती हैं कि एक नदी दूसरी नदी में मिलती है और एक कथा दूसरी कथा में। लोमश पाण्डवों को तट-दर-तट ले चलते हैं, और हर तट पर एक पुराना राजा, एक क्रोधी मुनि, एक हठी बालक या एक धर्म-परीक्षा प्रतीक्षा में मिलती है: अगस्त्य, जो समुद्र पी जाते हैं और लौटाते नहीं; भगीरथ, जो चार पीढ़ियों की राख के लिए हज़ार वर्ष खड़े रहते हैं; एक सींग वाला मुनि, जिसने कभी स्त्री नहीं देखी; परशुराम, जिनका परशु पहले माता पर उठा; एक बाँबी, जिसकी दो चमकती आँखों को एक राजकुमारी काँटों से बींध देती है; एक राजा, जो कबूतर के बदले तुला पर स्वयं चढ़ जाता है; एक बालक, जो जनक के द्वार पर एक से तेरह तक गिनकर वन्दी को हरा देता है। और फिर यात्रा हिमालय में चढ़ती है, जहाँ द्रौपदी के लिए एक कमल की खोज में निकला भीम केले के वन में एक ऐसे वानर की पूँछ पकड़ लेता है जो हिलती नहीं। उस वानर का नाम हनुमान है, और वह भीम का बड़ा भाई है।

देवताओं की पुकार और अगस्त्य का द्वार

लोमश की कथा वहीं से आगे बढ़ी जहाँ पिछली साँझ रुकी थी। रात के अन्धकार में मुनियों को निगलने वाले कालकेय दिन उगते ही समुद्र की गहराई में उतर जाते थे, और पृथ्वी पर कोई नहीं जानता था कि ब्राह्मण मारे क्यों जा रहे हैं। तब देवता विष्णु के पास पहुँचे और हाथ जोड़कर बोले, ‘हे प्रभु, आपकी कृपा से ही चारों प्रकार के प्राणी बढ़ते हैं, और वे बढ़कर यज्ञ और पितृ-तर्पण से स्वर्गवासियों को तृप्त करते हैं। इस तरह आपके रक्षण में लोग एक-दूसरे के सहारे निर्भय जीते हैं। अब प्रजा पर यह विपत्ति आ पड़ी है। रात में ब्राह्मण मारे जा रहे हैं और हम नहीं जानते किसके हाथों। यदि ब्राह्मण नष्ट हुए तो पृथ्वी नष्ट होगी, और पृथ्वी गई तो स्वर्ग भी नहीं रहेगा। हे महाबाहु, हे जगत् के स्वामी, ऐसा कीजिए कि आपके रक्षण में लोक बचे रहें।’

विष्णु ने कहा, ‘प्राणियों के इस संहार का कारण हमें ज्ञात है। निश्चिन्त मन से सुनिए। कालकेय नाम की एक अत्यन्त उग्र दानव-सेना है। वृत्र के नेतृत्व में वे समस्त जगत् को उजाड़ रहे थे। जब उन्होंने देखा कि सहस्र नेत्रों वाले बुद्धिमान् इन्द्र ने वृत्र को मार डाला, तो प्राण बचाने के लिए वे वरुण के निवास समुद्र में घुस गए। मगरों और मछलियों से भरे उस समुद्र में छिपकर वे रात में इस स्थान के ऋषियों को मारते हैं, ताकि प्रजा का समूल नाश हो जाए। पर समुद्र की शरण में बैठे हुए वे मारे नहीं जा सकते। इसलिए आप समुद्र को सुखाने का कोई उपाय सोचिए। अगस्त्य के सिवा समुद्र को सोख लेने में समर्थ कौन है? और समुद्र सूखे बिना इन दानवों पर किसी और उपाय से हाथ नहीं डाला जा सकता।’

विष्णु का यह वचन सुनकर देवता ब्रह्मा से अनुमति लेकर अगस्त्य के आश्रम गए। वहाँ उन्होंने वरुण-पुत्र महात्मा अगस्त्य को देखा, जो तेज से दमकते हुए ऋषियों से वैसे ही घिरे बैठे थे जैसे ब्रह्मा देवताओं से घिरे रहते हैं। देवताओं ने पास जाकर उन अविचल मुनि की, जो सामने बैठे तप के पुंज-से लगते थे, उनके कर्मों का स्मरण करते हुए स्तुति की। वे बोले, ‘जब नहुष ने देवताओं को पीड़ित किया था, तब आप ही उनकी शरण बने थे। संसार का वह काँटा स्वर्ग के सिंहासन से गिराया गया। पर्वतों में श्रेष्ठ विन्ध्य सूर्य से क्रुद्ध होड़ करते हुए अचानक अपनी ऊँचाई बढ़ाने लगा, पर आपकी आज्ञा का उल्लंघन न कर सकने के कारण उसने बढ़ना छोड़ दिया। जब अन्धकार ने जगत् को ढँक लिया और मृत्यु प्राणियों को सताने लगी, तब आपको रक्षक पाकर ही उन्हें परम निर्भयता मिली। जब भी हम संकट में घिरते हैं, आप ही हमारी शरण होते हैं। इसीलिए हम आपसे एक वर माँगने आए हैं, क्योंकि आप माँगा हुआ वर सदा देते हैं।’

समझने की कुंजी (नाम): अगस्त्य को कथा बार-बार “मित्र और वरुण के पुत्र” कहती है। परम्परा के अनुसार वे और वसिष्ठ, दोनों इन्हीं देवताओं के तेज से एक घड़े में जन्मे थे, इसीलिए अगस्त्य को कुम्भज भी कहते हैं। नहुष का प्रसंग, जिसमें इन्द्र के पद पर बैठे राजा नहुष को अगस्त्य ने शाप देकर गिराया, इसी वन पर्व में आगे स्वयं आएगा, जब भीम को एक अजगर पकड़ेगा।

सार: रात में ब्राह्मणों की हत्या का रहस्य विष्णु खोलते हैं: वृत्र के बचे हुए साथी कालकेय समुद्र में छिपे हैं, और समुद्र सूखे बिना उन पर हाथ नहीं पड़ सकता। देवता उस एक मुनि के द्वार पहुँचते हैं जो पहले भी नहुष और विन्ध्य को झुका चुके हैं।

विन्ध्य का हठ और अगस्त्य का दक्षिण-गमन

युधिष्ठिर ने बीच में पूछा, ‘हे महर्षि, हम विस्तार से सुनना चाहते हैं कि क्रोध से विवेक खो बैठा विन्ध्य अचानक अपना शरीर क्यों बढ़ाने लगा था।’

लोमश ने कहा, ‘सूर्य उदय से अस्त तक सोने-सी आभा वाले पर्वतराज मेरु की परिक्रमा किया करते थे। यह देखकर विन्ध्य पर्वत ने सूर्य से कहा, “हे प्रकाश के कर्ता, जैसे आप प्रतिदिन मेरु की परिक्रमा करके उसका सम्मान करते हैं, वैसे ही हमारा भी कीजिए।” सूर्य ने उस महान पर्वत को उत्तर दिया, “हम अपनी इच्छा से इस पर्वत की परिक्रमा नहीं करते। जिन्होंने यह विश्व रचा है, उन्होंने ही हमें यह मार्ग सौंपा है।” यह सुनते ही विन्ध्य क्रोध से एकाएक बढ़ने लगा, ताकि सूर्य और चन्द्रमा का मार्ग रोक दे। सब देवता मिलकर पर्वतराज विन्ध्य के पास आए और उसे रोकने का यत्न किया, पर उसने उनकी एक न सुनी। तब वे सब उस मुनि के पास गए जो आश्रम में तप में लीन थे, धर्मात्माओं में श्रेष्ठ, और उन्हें सब वृत्तान्त कह सुनाया।’

‘देवताओं ने कहा, “पर्वतों का यह राजा विन्ध्य क्रोध के वश होकर सूर्य और चन्द्रमा का मार्ग रोक रहा है, और नक्षत्रों की गति भी। हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, हे महादानी, आपके सिवा कोई उसे रोक नहीं सकता। आप ही उसे थाम लीजिए।” देवताओं का यह वचन सुनकर वे ब्राह्मण पर्वत के पास आए। पत्नी सहित वहाँ पहुँचकर वे विन्ध्य के समीप गए और बोले, “हे पर्वतश्रेष्ठ, हम आपसे मार्ग चाहते हैं, क्योंकि किसी प्रयोजन से हमें दक्षिण दिशा जाना है। हमारे लौटने तक आप हमारी प्रतीक्षा कीजिए। हमारे लौट आने पर, हे पर्वतराज, आप जितना चाहें बढ़ लीजिएगा।” और हे शत्रुदमन, विन्ध्य से यह वचन लेकर वरुण-पुत्र आज तक दक्षिण दिशा से लौटे नहीं हैं। आपने पूछा था, इसलिए हमने बताया कि अगस्त्य के प्रभाव से विन्ध्य क्यों नहीं बढ़ता। अब सुनिए कि अगस्त्य से अपनी प्रार्थना मनवाकर देवताओं ने कालकेयों को कैसे मारा।’

समझने की कुंजी (स्थान): मेरु वह सुनहरा पर्वत है जिसके चारों ओर सूर्य घूमते हैं और जो पौराणिक भूगोल में जगत् की धुरी है। विन्ध्य वह पर्वतमाला है जो उत्तर और दक्षिण भारत को बाँटती है। अगस्त्य के दक्षिण जाकर न लौटने की यह कथा उस परम्परा की जड़ है जिसमें अगस्त्य दक्षिण के ऋषि माने जाते हैं, और विन्ध्य आज भी झुका हुआ है।

सार: विन्ध्य सूर्य से मेरु-जैसा सम्मान माँगता है, और ठुकराए जाने पर आकाश का रास्ता रोकने को बढ़ने लगता है। अगस्त्य बल से नहीं, एक वचन से उसे झुकाते हैं: लौटने तक प्रतीक्षा करो। और वे लौटते नहीं।

समुद्र-पान और कालकेयों का अन्त

देवताओं की बात सुनकर मित्र-वरुण के पुत्र अगस्त्य ने पूछा, ‘आप लोग किसलिए आए हैं? हमसे कौन-सा वर चाहते हैं?’ देवताओं ने मुनि से कहा, ‘हे महात्मन्, हम आपसे यह कार्य चाहते हैं कि आप महासागर को पी जाइए। तब हम देवताओं के शत्रु कालकेयों को उनके सारे अनुचरों सहित मार सकेंगे।’ मुनि ने कहा, ‘ऐसा ही हो। जो आप चाहते हैं और जिससे मनुष्यों का बड़ा कल्याण होगा, वही हम करेंगे।’ इतना कहकर वे तप में परिपक्व ऋषियों और देवताओं को साथ लेकर नदियों के स्वामी समुद्र की ओर चल पड़े। मनुष्य, नाग, गन्धर्व, यक्ष और किन्नर उस अद्भुत दृश्य को देखने की इच्छा से उन महात्मा मुनि के पीछे-पीछे चले। सब मिलकर उस भयानक गर्जना वाले समुद्र के पास पहुँचे, जो अपनी लहरों से मानो नाच रहा था, हवा के साथ उछलता, फेन के ढेरों से हँसता, कन्दराओं से टकराता, अनेक प्रकार के मगरों से भरा और पक्षियों के झुण्डों से घिरा हुआ।

लोमश ने कहा, ‘समुद्र-तट पर पहुँचकर वरुण-पुत्र भगवान् अगस्त्य ने एकत्र देवताओं और ऋषियों से कहा, “हम निश्चय ही इस समुद्र को, जल के देवता के इस निवास को, पी जाने वाले हैं। आप लोग अपनी तैयारी शीघ्र कर लीजिए।” ये थोड़े-से शब्द कहकर मित्र-वरुण की वह अविचल सन्तान क्रोध में भरकर समुद्र पीने लगी, और सारे लोक खड़े देखते रहे। समुद्र को इस तरह पिया जाता देख इन्द्र सहित देवता महान् विस्मय में डूब गए और स्तुति-वचनों से उनका गुणगान करने लगे, “आप हमारे रक्षक हैं, मनुष्यों के लिए स्वयं विधाता हैं, लोकों के स्रष्टा हैं। आपकी कृपा से देवताओं सहित यह विश्व विनाश से बच सकेगा।” देवताओं से स्तुत, चारों ओर बजते गन्धर्वों के वाद्यों और बरसते दिव्य पुष्पों के बीच, उन महात्मा ने विशाल समुद्र को जल-हीन कर दिया।’

‘विशाल समुद्र को सूखा देखकर देवताओं का समूह अत्यन्त प्रसन्न हुआ, और दिव्य शिल्प के चुने हुए शस्त्र उठाकर निर्भय हृदय से दानवों का वध करने लगा। महाबली, वेगवान् और भीषण गर्जना करते हुए भी वे दानव उन फुर्तीले और पराक्रमी स्वर्गवासियों का आघात सह न सके। देवताओं से आक्रान्त, चीखते हुए उन दानवों ने कुछ देर घोर युद्ध किया, पर वे पहले ही उन ऋषियों के तप-तेज से जल चुके थे जिन्होंने अपने को साध लिया था; इसलिए भरसक प्रयत्न करके भी अन्त में देवताओं के हाथों मारे गए। सोने के आभूषणों, कुण्डलों और भुजबन्दों से सजे वे दानव मरे हुए भी ऐसे सुन्दर लगते थे जैसे फूलों से लदे पलाश के वृक्ष। हे नरश्रेष्ठ, कालकेय वंश के थोड़े-से बचे हुए दानव पृथ्वी देवी को चीरकर पाताल की तह में जा छिपे।’

‘दानवों को मरा देखकर देवताओं ने अनेक वचनों से उन महर्षि की स्तुति की और कहा, “हे महाबाहु, आपकी कृपा से मनुष्यों को महान् वरदान मिला, और निर्दय बल वाले कालकेय आपके प्रभाव से मारे गए। हे प्राणियों के स्रष्टा, अब समुद्र को भर दीजिए; जो जल आपने पिया है, उसे लौटा दीजिए।” इस पर भगवान् महर्षि ने उत्तर दिया, “वह जल तो हम पचा चुके। समुद्र भरने का यत्न करना हो तो आपको कोई और उपाय सोचना पड़ेगा।” परिपक्व आत्मा वाले उस मुनि का यह वचन सुनकर देवता विस्मय और खेद, दोनों से भर गए। फिर एक-दूसरे से विदा लेकर और महर्षि को प्रणाम करके सब प्राणी अपने-अपने मार्ग चले गए, और विष्णु सहित देवता ब्रह्मा के पास आए। समुद्र को फिर से भरने के विषय में उन्होंने हाथ जोड़कर विचार-विमर्श किया।’

सार: अगस्त्य समुद्र पी जाते हैं, देवता सूखी तह पर उतरकर कालकेयों को काट डालते हैं, और बचे हुए पाताल में धँस जाते हैं। पर जब देवता जल लौटाने को कहते हैं, तो मुनि का उत्तर सादा और अटल है: वह तो पच गया। समुद्र को भरने की जिम्मेदारी अब किसी और के हिस्से आएगी।

सगर के साठ हज़ार पुत्र और कपिल की दृष्टि

लोमश ने कहा, ‘एकत्र देवताओं से पितामह ब्रह्मा ने कहा, “हे देवताओ, जहाँ आपकी इच्छा ले जाए, वहाँ जाइए। समुद्र को अपनी पुरानी अवस्था में लौटने में बहुत समय लगेगा; उसका अवसर महाराज भगीरथ के कुल के लोग जुटाएँगे।” पितामह का यह वचन सुनकर सब श्रेष्ठ देवता उस दिन की प्रतीक्षा करते हुए अपने मार्ग चले गए।’

युधिष्ठिर ने पूछा, ‘हे मुनि, वह अवसर क्या था? भगीरथ के पूर्वजों ने उसे कैसे जुटाया? भगीरथ के प्रयत्न से समुद्र फिर कैसे भरा? हे धर्म को ही धन मानने वाले ब्राह्मण, हम उस राजा के कर्मों की कथा आपके मुख से विस्तार से सुनना चाहते हैं।’ वैशम्पायन ने कहा, ‘महात्मा धर्मराज के इस प्रश्न पर उन ब्राह्मणश्रेष्ठ ने महामना राजा सगर के कर्मों की कथा कही।’

लोमश ने कहा, ‘इक्ष्वाकु के कुल में सगर नाम का एक राजा हुआ, रूप और बल से सम्पन्न। पर उस भयंकर नाम वाले राजा के कोई पुत्र नहीं था। उसने हैहय और तालजंघ वंशों को रौंद डाला, समूचे क्षत्रिय-कुल को अपने वश में किया और अपने राज्य पर शासन किया। हे भरतश्रेष्ठ, उसकी दो रानियाँ थीं, अपने रूप और यौवन पर गर्व करने वाली, एक विदर्भ की राजकुमारी और दूसरी शिबि के राजवंश की। पुत्र की कामना से वह राजा दोनों रानियों को लेकर कैलास पर्वत गया और अत्यन्त कठोर तप में लग गया। कठोर तप और योग-ध्यान में लगे उस राजा को त्रिपुर-संहारक, तीन नेत्रों वाले, पिनाक धनुष और त्रिशूल धारण करने वाले, अनेक रूप धरने में समर्थ, उमा के स्वामी महादेव के दर्शन हुए। वरदायक देव को देखते ही वह महाबाहु राजा दोनों रानियों सहित उनके चरणों में गिर पड़ा और पुत्र माँगा। प्रसन्न होकर शिव ने कहा, “हे नरेश, जिस घड़ी आपने हमसे यह प्रार्थना की है, उसे देखते हुए आपकी एक रानी से साठ हज़ार पुत्र जन्मेंगे, वीर और अत्यन्त अभिमानी। पर हे पृथ्वीपति, वे सब एक साथ नष्ट होंगे। दूसरी रानी से एक ही वीर पुत्र होगा, जो आपका वंश चलाएगा।” इतना कहकर रुद्र वहीं अन्तर्धान हो गए, और राजा सगर हर्ष से भरा हुआ अपनी रानियों के साथ घर लौट आया।’

‘समय पाकर दोनों कमलनयनी रानियाँ गर्भवती हुईं। विदर्भ की राजकुमारी ने तुम्बे-जैसा एक आकार जना, और शिबि की राजकुमारी ने देवता-सा सुन्दर एक बालक। राजा ने उस तुम्बे को फेंक देने का मन बनाया ही था कि आकाश से गम्भीर और गहरी वाणी सुनाई दी, “हे राजन्, यह उतावली मत कीजिए, अपने पुत्रों को त्यागिए मत। तुम्बे से बीज निकालिए और घी से आधे भरे, भाप उठते पात्रों में उन्हें सँभालकर रखिए। तब हे भरतवंशी, आपको साठ हज़ार पुत्र मिलेंगे। महादेव ने कहा है कि आपके पुत्र इसी विधि से जन्मेंगे, इसलिए इससे मन मत मोड़िए।” राजा ने उस आकाशवाणी पर श्रद्धा रखी और वैसा ही किया। उसने बीजों को अलग-अलग करके घी से भरे पात्रों में रखा और हर पात्र के लिए एक धाय नियुक्त की। बहुत समय बीतने पर रुद्र की कृपा से उस राजर्षि के साठ हज़ार अत्यन्त बलशाली पुत्र उत्पन्न हुए। पर वे भयंकर थे और उनके कर्म निर्दय। वे आकाश में उड़ सकते थे, और संख्या में इतने अधिक होने के कारण देवताओं तक को तुच्छ समझते थे। युद्ध के व्यसनी वे वीर देवताओं, गन्धर्वों, राक्षसों, सब प्राणियों का पीछा करते फिरते। सगर के मूर्ख पुत्रों से पीड़ित सब लोग देवताओं के साथ ब्रह्मा की शरण में गए। पितामह ने कहा, “अपने मार्ग जाइए। थोड़े ही समय में सगर के पुत्रों का, उनके अपने ही कर्मों से, एक महान् और अत्यन्त भयंकर विनाश होने वाला है।”’

‘बहुत दिन बीतने पर महाराज सगर ने अश्वमेध यज्ञ की दीक्षा ली। उसका यज्ञ-अश्व पुत्रों के रक्षण में पृथ्वी पर घूमने लगा। बड़ी सावधानी से रक्षित होने पर भी वह अश्व जब उस सूखे, देखने में भयावह समुद्र के पास पहुँचा, तो जहाँ खड़ा था वहीं अदृश्य हो गया। सगर के पुत्रों ने समझा कि अश्व चुराया गया है, और पिता के पास लौटकर यही कहा। राजा ने कहा, “जाइए और सब दिशाओं में अश्व को ढूँढ़िए।” पिता की आज्ञा से उन्होंने सब दिशाओं और सारी पृथ्वी की सतह पर अश्व खोजा, पर मिलकर भी न अश्व पा सके, न चोर। लौटकर हाथ जोड़े हुए उन्होंने पिता से कहा, “हे राजन्, आपकी आज्ञा से पर्वतों, वनों, समुद्रों, द्वीपों, नदियों और कन्दराओं समेत यह सारा संसार हमने छान डाला, पर न अश्व मिला, न उसका चुराने वाला।” यह सुनकर राजा क्रोध से विवेक खो बैठा और, नियति के हाथों खिंचा हुआ, बोला, “जाइए, और कभी न लौटिए। अश्व को फिर ढूँढ़िए। यज्ञ के अश्व के बिना, हे पुत्रो, आप कभी न लौटें।”’

‘पिता की यह आज्ञा मानकर सगर के पुत्र फिर सारी पृथ्वी छानने लगे। तब उन वीरों को धरती की सतह में एक दरार दिखी। उस गड्ढे के पास पहुँचकर वे खोदने लगे, और कुदालों और फावड़ों से पूरा जोर लगाकर समुद्र की तह खोदते चले गए। इस तरह सगर के पुत्रों द्वारा मिलकर खोदा हुआ, चारों ओर से चीरा और काटा हुआ वरुण का वह निवास परम कष्ट में पड़ गया। दानव, नाग, राक्षस और अनेक जीव मारे जाते हुए करुण चीत्कार करने लगे; सैकड़ों-हज़ारों प्राणी कटे सिर, कटे धड़, फटी त्वचा और टूटी हड्डियों के साथ पड़े दिखे। बहुत लम्बा समय इस खुदाई में बीता, पर अश्व नहीं मिला। तब हे पृथ्वीपति, समुद्र के उत्तर-पूर्व कोने में क्रुद्ध सगर-पुत्रों ने पाताल तक खोद डाला, और वहाँ उन्होंने धरती की सतह पर घूमते अश्व को देखा। और उन्होंने महात्मा कपिल को देखा, जो तेज के पुंज-से दीखते थे, अपनी आभा से वैसे दमकते जैसे अग्नि अपनी ज्वालाओं से। अश्व को देखकर वे हर्ष से भर उठे, और नियति से आगे ठेले हुए, क्रोध में, महात्मा कपिल की उपस्थिति की परवाह किए बिना अश्व पकड़ने को दौड़े। तब ऋषियों में श्रेष्ठ कपिल ने, जिन्हें महर्षि कपिल वासुदेव कहते हैं, ज्वलन्त दृष्टि से देखा और उनकी ओर ज्वालाएँ छोड़ीं, और सगर के मूर्ख पुत्र वहीं जलकर राख हो गए।’

समझने की कुंजी (संख्या-आधुनिक-समतुल्य): “साठ हज़ार पुत्र” कथा की अतिशयोक्ति नहीं, उसका विषय है: एक ऐसा बल जो गिना तो जा सकता है, पर सँभाला नहीं जा सकता। तुम्बे के बीजों से घी के पात्रों में पले पुत्र, और अश्व का ठीक उसी सूखे समुद्र के तट पर खो जाना जिसे अगस्त्य पी गए थे, दोनों कथाएँ यहाँ एक-दूसरे में गुँथ जाती हैं।

सार: शिव का वर दो धार वाला है: साठ हज़ार पुत्र, और उन सबका एक साथ नाश। यज्ञ का अश्व सूखे समुद्र के तट पर खो जाता है, पिता का क्रोध पुत्रों को “बिना अश्व के मत लौटना” कहकर धरती खोदने भेजता है, और पाताल में कपिल की एक दृष्टि उन्हें राख कर देती है।

असमंज का त्याग, अंशुमान की विनय और भगीरथ का तप

‘महातपस्वी नारद ने उन्हें राख हुआ देखा और सगर के पास जाकर समाचार दिया। मुनि के मुख से यह भयानक समाचार सुनकर राजा घड़ी-भर शोक में डूबा रहा, फिर उसे शिव का कहा हुआ वचन याद आया। तब उसने असमंज के पुत्र, अपने पौत्र अंशुमान को बुलाकर कहा, “अपार बल वाले वे साठ हज़ार पुत्र कपिल के क्रोध से टकराकर हमारे कारण मारे गए। और हे निष्कलंक पुत्र, आपके पिता को भी हमने त्याग दिया था, राजा का धर्म निभाने और प्रजा का हित करने के लिए।”’

युधिष्ठिर ने पूछा, ‘हे मुनि, राजाओं में श्रेष्ठ सगर ने अपने वीर पुत्र को क्यों त्यागा? यह तो दूसरों के लिए बहुत कठिन काम है।’

लोमश ने कहा, ‘शिबि की राजकुमारी से सगर को असमंज नाम का पुत्र हुआ था। वह नगरवासियों के दुर्बल बच्चों को गला पकड़कर, चीखते हुए, नदी में फेंक दिया करता था। भय और शोक से व्याकुल नगरवासी इकट्ठे होकर, हाथ जोड़े, सगर के पास आए और बोले, “हे महाराज, शत्रु-सेना के आक्रमण के भय से आप ही हमारे रक्षक हैं। इसलिए असमंज से आने वाले इस भयंकर संकट से भी हमें आप ही बचाइए।” प्रजा के मुख से यह भयावह बात सुनकर वह धर्मात्मा राजा घड़ी-भर उदास रहा, फिर मन्त्रियों से बोला, “आज ही हमारे पुत्र असमंज को नगर से बाहर निकाल दिया जाए। यदि आप हमें प्रसन्न करना चाहते हैं तो यह शीघ्र कीजिए।” मन्त्रियों ने तुरन्त वही किया। इस तरह महामना सगर ने नगरवासियों के कल्याण के लिए अपने पुत्र को निकाला। अब सुनिए कि सगर ने धनुर्धर अंशुमान से क्या कहा।’

‘सगर ने कहा, “हे पुत्र, अपने पुत्रों की मृत्यु से, आपके पिता को त्यागने से, और अश्व न पा सकने से हमारा हृदय दुखी है। हे पौत्र, शोक से पीड़ित और यज्ञ में विघ्न से व्याकुल हम पर कृपा कीजिए: अश्व लौटा लाइए और हमें नरक से बचाइए।” महात्मा सगर के इस वचन पर अंशुमान दुखी मन से उसी स्थान पर गया जहाँ धरती खोदी गई थी। उसी मार्ग से समुद्र की तह में उतरकर उसने तेजस्वी कपिल और उस अश्व को देखा। तेज के पुंज-से उन प्राचीन, धर्मात्माओं में श्रेष्ठ मुनि को देखकर उसने भूमि पर सिर रखकर प्रणाम किया और अपने आने का कारण बताया। कपिल अंशुमान से प्रसन्न हुए और बोले कि वर माँगिए। उसने पहले यज्ञ के लिए अश्व माँगा, और दूसरे, अपने पितरों की शुद्धि। तब मुनि-श्रेष्ठ कपिल ने कहा, “हे निष्कलंक राजकुमार, आप जो चाहते हैं वह सब हम देंगे। आपका मंगल हो। आप में क्षमा, सत्य और धर्म बसे हैं। आपके कारण सगर की सब कामनाएँ पूरी हुईं; आप सचमुच अपने पिता के पुत्र हैं। आपकी योग्यता से सगर के पुत्र स्वर्ग जाएँगे। और आपके पुत्र का पुत्र, सगर-पुत्रों को शुद्ध करने के लिए, कठोर तप से महादेव को प्रसन्न करके तीन धाराओं में बहने वाली गंगा को इस लोक में लाएगा। आपका कल्याण हो। यज्ञ का अश्व ले जाइए, और महामना सगर का यज्ञ पूरा कीजिए।”’

‘अंशुमान अश्व लेकर सगर की यज्ञशाला में लौटा। उसने पितामह के चरणों में प्रणाम किया, और सगर ने उसका सिर सूँघकर स्नेह किया। अंशुमान ने जो देखा-सुना था सब कहा, अपने चाचाओं का विनाश भी, और यह भी कि अश्व यज्ञशाला में लौट आया है। यह सुनकर सगर ने पुत्रों का शोक छोड़ दिया, अंशुमान को सराहा और यज्ञ पूरा किया। यज्ञ समाप्त होने पर सब देवताओं ने सगर का सम्मान किया, और उसने वरुण के निवास समुद्र को अपना पुत्र बना लिया। बहुत लम्बे समय तक राज्य करके उस कमलनयन राजा ने पौत्र को राजगद्दी सौंपी और स्वर्ग चला गया। धर्मात्मा अंशुमान ने भी पितामह के पदचिह्नों पर चलते हुए समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी का पालन किया। उसका पुत्र दिलीप हुआ, धर्म का ज्ञाता। उसे राज्य सौंपकर अंशुमान भी चला गया। पूर्वजों की भयानक गति सुनकर दिलीप बहुत दुखी हुआ और उनके उद्धार का उपाय सोचता रहा। उसने गंगा को पृथ्वी पर उतारने का भरसक यत्न किया, पर सफल न हुआ। उसे भगीरथ नाम का पुत्र हुआ, सुन्दर, धर्मपरायण, सत्यवादी और द्वेष से रहित। दिलीप ने उसे राजा बनाया, स्वयं वन चला गया, और तप में सिद्धि पाकर अन्त में स्वर्ग गया।’

‘धनुर्धर, सम्राटों में श्रेष्ठ, महारथी भगीरथ सारे संसार की आँखों और हृदय का आनन्द था। उस महाबाहु ने जाना कि उसके पूर्वज महात्मा कपिल के हाथों भयानक अन्त को प्राप्त हुए हैं और देवलोक नहीं पा सके। दुखी हृदय से राज-काज मन्त्री को सौंपकर वह तप करने हिमालय की ओर चला। अपने पाप मिटाने और गंगा की कृपा पाने के लिए उसने उस पर्वतश्रेष्ठ को देखा: धातुओं से भरे अनेक आकार के शिखर, हवा पर टिके बादलों से झरती बूँदें, नदियाँ, कुंज और चट्टानों की ऐसी शृंखलाएँ जो नगर के महलों-सी लगें; कन्दराओं में छिपे सिंह और बाघ; भृंगराज, हंस, दात्यूह, जलकुक्कुट, मयूर, जीवंजीवक, चकोर और अपने बच्चों से प्रेम करने वाले अनेक रंग के पक्षी; कमलों से भरे सरोवर, सारसों की पुकार, पत्थर की शिलाओं पर बैठे किन्नर और अप्सराएँ, दिशाओं के हाथियों के दाँतों से छिले वृक्ष, विद्याधरों का आना-जाना, रत्नों की भरमार और जलती जीभ वाले विषधर सर्प। वह पर्वत कहीं सोने-सा, कहीं चाँदी के ढेर-सा, और कहीं काजल के ढेर-सा दीखता था। ऐसे हिमालय पर उस नरश्रेष्ठ ने भयंकर तप आरम्भ किया। एक हज़ार वर्ष तक उसका आहार केवल जल, फल और मूल रहा। जब देवताओं की गणना से एक हज़ार वर्ष बीत गए, तब महानदी गंगा ने साकार रूप धरकर उसे दर्शन दिया।’

समझने की कुंजी (संख्या-आधुनिक-समतुल्य): “देवताओं की गणना से एक हज़ार वर्ष”: परम्परा में देवताओं का एक दिन मनुष्यों के एक वर्ष के बराबर है, इसलिए यह अवधि मनुष्य की गिनती में लाखों वर्ष ठहरती है। कथा इस अंक से यह कहती है कि भगीरथ का तप चार पीढ़ियों के अधूरे प्रयत्न का अन्तिम, असम्भव-सा हठ था।

सार: सगर ने प्रजा के लिए अपना पुत्र त्यागा था; अब उसी त्यागे हुए पुत्र का पुत्र अंशुमान विनय से कपिल को प्रसन्न करके अश्व और एक भविष्यवाणी लौटा लाता है। यज्ञ पूरा होता है, पर साठ हज़ार चाचाओं की राख को जल चाहिए। दिलीप हार जाते हैं; भगीरथ हिमालय पर एक हज़ार दिव्य वर्ष खड़े रहते हैं, और गंगा प्रकट होती हैं।

गंगावतरण: शिव के मस्तक से सागर तक

‘गंगा ने कहा, “हे महाराज, आप हमसे क्या चाहते हैं? हम आपको क्या दें? हे नरश्रेष्ठ, कहिए, हम वैसा ही करेंगी।” राजा ने हिमालय की पुत्री गंगा को उत्तर दिया, “हे वरदायिनी, हे महानदी, हमारे पितामह के पिता के पुत्र अश्व की खोज में कपिल के हाथों यमलोक भेज दिए गए। महात्मा सगर के वे साठ हज़ार पुत्र तेजस्वी कपिल से टकराकर एक ही क्षण में नष्ट हो गए, और नष्ट होकर भी उन्हें स्वर्ग में स्थान नहीं मिला। हे महानदी, जब तक आप उन शरीरों को अपने जल से नहीं सींचतीं, सगर के पुत्रों का उद्धार नहीं है। हे भगवती, हमारे पूर्वजों, सगर के पुत्रों को स्वर्ग पहुँचाइए। उन्हीं के लिए हम आपसे विनती कर रहे हैं।”’

‘लोकवन्दिता गंगा राजा का यह वचन सुनकर प्रसन्न हुईं और भगीरथ से बोलीं, “हे महाराज, आप जो कहते हैं, वह करने को हम तैयार हैं, इसमें सन्देह नहीं। पर जब हम आकाश से पृथ्वी पर उतरेंगी, तो हमारे गिरने का वेग सँभालना कठिन होगा। हे नरपाल, तीनों लोकों में नीलकण्ठ महादेव के सिवा कोई उसे सँभाल नहीं सकता। हे महाबाहु, तप से उन वरदायक शिव को प्रसन्न कीजिए। वे हमारे वेग को अपने मस्तक पर धारण करेंगे और आपके पितरों की सेवा की आपकी कामना पूरी करेंगे।” यह सुनकर महाराज भगीरथ कैलास पर्वत गए, कठोर तप में लगे, और समय बीतने पर कल्याणकारी शिव की कृपा पाई। पितरों के लिए स्वर्ग का स्थान सुरक्षित करने की इच्छा से उस नरश्रेष्ठ ने शिव से यही वर पाया कि उतरती हुई गंगा को वे धारण करेंगे।’

‘भगवान् शिव ने भगीरथ की बात सुनी और स्वर्गवासियों का प्रिय करने के विचार से राजा से कहा, “ऐसा ही हो। हे नरपालों में धर्मात्मा, हे महाबाहु, आपके लिए हम उस पवित्र, कल्याणी, दिव्य देवनदी को धारण करेंगे जब वह आकाश से उतरेगी।” इतना कहकर वे भयानक आकृति वाले, अनेक प्रकार के उठे हुए शस्त्रों वाले अपने गणों को साथ लेकर हिमालय आए, और वहाँ खड़े होकर नरश्रेष्ठ भगीरथ से बोले, “हे महाबाहु, पर्वतराज की पुत्री उस नदी का आवाहन कीजिए। जब वह त्रिदिव से गिरेगी, नदियों में श्रेष्ठ उसे हम धारण करेंगे।” शिव का यह वचन सुनकर राजा भक्तिभाव से प्रणाम करके गंगा का ध्यान करने लगा। राजा के ध्यान से बुलाई गई वह निर्मल जल वाली रमणीय नदी, यह देखकर कि महेश्वर स्वयं उसे लेने खड़े हैं, अचानक आकाश से उतर पड़ी।’

‘उसे आकाश से छलाँग लगाते देख देवता, महर्षि, गन्धर्व, नाग और यक्ष दर्शक बनकर वहाँ जुट गए। तब हिमालय की पुत्री गंगा आकाश से उतरीं। उनके भँवर उमड़ रहे थे, वे मछलियों और मगरों से भरी थीं। समुद्र की ओर बढ़ती हुई वे तीन धाराओं में बँट गईं; उनके जल पर फेन के ढेर तैर रहे थे, जो हंसों की पंक्तियों-से लगते थे। कहीं वे टेढ़ी-मेढ़ी चाल से चलतीं, कहीं ठोकर खातीं, फेन को वस्त्र-सा ओढ़े किसी उन्मत्त नारी-सी आगे बढ़तीं, और कहीं अपने जल की गर्जना से ऊँचे स्वर छोड़तीं। इस तरह अनेक रूप धरते हुए जब वे आकाश से गिरकर पृथ्वी पर पहुँचीं, तो भगीरथ से बोलीं, “हे महाराज, हमें वह मार्ग दिखाइए जिस पर हमें चलना है। हे पृथ्वीपति, हम आपके लिए धरती पर उतरी हैं।” यह सुनकर राजा भगीरथ उस स्थान की ओर चल पड़ा जहाँ महाबली सगर के पुत्रों के शरीर पड़े थे, ताकि पवित्र जल उन्हें आप्लावित कर दे। गंगा को धारण करने का कार्य पूरा करके लोकवन्दित शिव देवताओं के साथ पर्वतश्रेष्ठ कैलास लौट गए। और राजा गंगा के साथ समुद्र तक पहुँचा; वरुण का वह निवास शीघ्र ही भर गया। राजा ने गंगा को अपनी पुत्री बनाया और उसी स्थान पर अपने पितरों को जलांजलि दी; उसके हृदय की कामना पूरी हुई। आपने पूछा था, इसलिए हमने पूरी कथा कही: तीन धाराओं में बहने वाली गंगा समुद्र भरने के लिए पृथ्वी पर कैसे लाई गईं, महर्षि ने किस कारण समुद्र पिया, और ब्रह्मघाती वातापि अगस्त्य के हाथों कैसे नष्ट हुआ।’

समझने की कुंजी (नाम): इसी कथा से गंगा के नाम आते हैं: भागीरथी (भगीरथ की लाई हुई), सागर के पुत्रों के उद्धार से सागर का नाम भी जल-राशि पर टिका, और गंगा-सागर वह संगम है जहाँ नदी ने अपना काम पूरा किया। “त्रिदिव” तीसरा लोक, अर्थात् स्वर्ग है; “तीन धाराओं” की गंगा स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल, तीनों में बहने वाली त्रिपथगा है।

सार: गंगा उतरने को तैयार हैं, पर उनका वेग शिव के सिवा कोई नहीं थाम सकता। भगीरथ दूसरा तप करते हैं, महादेव गणों सहित हिमालय पर खड़े होते हैं, और नदी हंसों-से फेन के साथ तीन धाराओं में उतरकर पूछती है: रास्ता कौन-सा? वह रास्ता राख तक जाता है, और वहाँ से सूखे समुद्र तक, जो भर जाता है। अगस्त्य का पिया हुआ जल इस तरह चार पीढ़ियों बाद लौटता है।

नन्दा-अपरनन्दा और ऋषभ-शिखर की चुप्पी

वैशम्पायन ने कहा, ‘हे भरतश्रेष्ठ, फिर कुन्ती-पुत्र धीमी चाल से नन्दा और अपरनन्दा नामक दो नदियों तक गए, जिनमें पाप का भय मिटाने का गुण था। पवित्र हेमकूट पर्वत पर पहुँचकर राजा ने अनेक विचित्र और अकल्पनीय दृश्य देखे। वहाँ शब्द बोलते ही बादल घिर आते और हज़ारों पत्थर बरसने लगते। लोग उसे देखकर उदास हो जाते और पर्वत पर चढ़ नहीं पाते। वहाँ हवा सदा चलती और आकाश सदा बरसता; वेद-पाठ की ध्वनि सुनाई देती, पर कोई दिखता नहीं। साँझ और सवेरे देवताओं तक आहुति पहुँचाने वाली पवित्र अग्नि दीखती, और मक्खियाँ काटकर तप में विघ्न डालतीं। मन पर उदासी छा जाती और लोग बीमार पड़ जाते। ऐसे अनेक विचित्र लक्षण देखकर पाण्डु-पुत्र ने लोमश से फिर इन अद्भुत बातों के विषय में पूछा।’

लोमश ने कहा, ‘हे शत्रुदमन, हमने जैसा सुना है, वैसा ही कहते हैं; एकाग्र मन से सुनिए। इस ऋषभ-शिखर पर कभी ऋषभ नाम के एक मुनि रहते थे। उनकी आयु कई सौ वर्ष की थी, वे तप में लीन और अत्यन्त क्रोधी थे। दूसरों के बोलने से चिढ़कर उन्होंने क्रोध में पर्वत से कहा था, “जो कोई यहाँ एक शब्द भी बोले, उस पर पत्थर बरसाइए, और हवाओं को बुलाकर उसका शब्द बन्द कर दीजिए।” इसीलिए यहाँ मनुष्य के बोलते ही गरजता हुआ बादल उसे रोक देता है। हे राजन्, उन महर्षि ने क्रोध में और भी कर्मों पर रोक लगाई थी। परम्परा कहती है कि पुराने समय में जब देवता नन्दा पर आए थे, तो उन्हें देखने अचानक बहुत-से मनुष्य आ पहुँचे। इन्द्र आदि देवता देखा जाना नहीं चाहते थे, इसलिए उन्होंने पहाड़ खड़े करके इस स्थान को दुर्गम बना दिया। उस दिन से, हे कुन्ती-पुत्र, मनुष्य पर्वत-जैसी उस चीज़ पर दृष्टि तक नहीं डाल सकते, चढ़ना तो दूर। जिसने तप नहीं किया, वह इस बड़े पर्वत को देख नहीं सकता, न इस पर चढ़ सकता है। इसलिए हे कुन्ती-पुत्र, अपनी वाणी पर संयम रखिए। यहाँ उस समय सब देवताओं ने श्रेष्ठ यज्ञ किए थे; आज तक उनके चिह्न दिखते हैं। यह घास कुश-जैसी है, भूमि मानो कुश से बिछी है, और ये अनेक वृक्ष यज्ञ-पशु बाँधने के स्थानों-से लगते हैं। देवता और ऋषि आज भी यहाँ रहते हैं, और उनकी अग्नि साँझ-सवेरे दिखाई देती है। यहाँ स्नान करने से पाप तुरन्त नष्ट होता है। इसलिए हे कुरुश्रेष्ठ, छोटे भाइयों के साथ यहाँ स्नान कीजिए। नन्दा में स्नान करके आप कौशिकी नदी को चलेंगे, जहाँ विश्वामित्र ने कठोरतम तप किया था।’ तब राजा ने साथियों सहित वहाँ स्नान किया और शीतल जल वाली, निर्मल और रमणीय कौशिकी नदी की ओर प्रस्थान किया।

समझने की कुंजी (स्थान): हेमकूट (सोने की चोटी) और उसका ऋषभ-शिखर हिमालय के उस भाग में कल्पित हैं जहाँ मनुष्य और देवताओं की सीमा मिलती है; आगे गन्धमादन और कैलास इसी दिशा में हैं। कौशिकी आज की कोसी नदी है, जो नेपाल से बिहार में उतरती है; विश्वामित्र का नाम कुशिक-वंश से है, इसीलिए नदी कौशिकी कहलाई।

सार: यात्रा में पहला ऐसा स्थान आता है जहाँ बोलना मना है। ऋषभ मुनि के क्रोध और देवताओं की एकान्त-प्रियता ने मिलकर एक पर्वत को चुप्पी का नियम दे दिया है। लोमश का उपदेश सादा है: यहाँ वाणी रोकिए, स्नान कीजिए, आगे चलिए।

कौशिकी तट पर ऋष्यशृंग की कथा: हिरणी से जन्मा मुनि

लोमश ने कहा, ‘हे भरतश्रेष्ठ, यह कौशिकी नाम की पवित्र देवनदी है, और यह सामने विश्वामित्र का रमणीय आश्रम है। और यह पवित्र नाम वाला आश्रम महात्मा कश्यप का है, जिनके पुत्र ऋष्यशृंग थे, तपस्वी और जितेन्द्रिय। अपने तप के बल से उन्होंने इन्द्र को वर्षा करने पर विवश किया; वल और वृत्र के संहारक वे देवता उनसे डरकर अकाल में बरसे। कश्यप के उस बलशाली पुत्र का जन्म एक हिरणी से हुआ था। लोमपाद के राज्य में उन्होंने महान् चमत्कार किया, और जब फसलें लौट आईं, तो राजा लोमपाद ने अपनी पुत्री शान्ता उन्हें वैसे ही ब्याह दी जैसे सूर्य ने अपनी पुत्री सावित्री दी थी।’

युधिष्ठिर ने पूछा, ‘कश्यप के पुत्र ऋष्यशृंग हिरणी से कैसे जन्मे? निन्दनीय संयोग से उत्पन्न होकर भी वे पवित्र कैसे हुए? वल-वृत्र-संहारक इन्द्र उस बुद्धिमान् बालक से क्यों डरे और अकाल में क्यों बरसे? और पवित्र आचरण वाली वह राजकुमारी शान्ता कैसी सुन्दर थी, जिसने मृग-शावक-से उस मुनि का हृदय हर लिया? और जब राजर्षि लोमपाद धर्मात्मा थे, तो उनके राज्य में पाक-शासन इन्द्र ने वर्षा क्यों रोकी? हे पवित्र मुनि, यह सब जैसा हुआ, विस्तार से कहिए, क्योंकि हम ऋष्यशृंग के जीवन के कर्म सुनना चाहते हैं।’

लोमश ने कहा, ‘सुनिए, भयंकर नाम वाले ऋष्यशृंग विभाण्डक के पुत्र कैसे हुए। विभाण्डक ब्राह्मण-मुनि थे, तप से अपनी आत्मा को साधे हुए, जिनका बीज कभी निष्फल न जाता, और जो ज्ञान में प्रजापति-से दीप्त थे। पिता अत्यन्त सम्मानित थे, और पुत्र ऐसा तेजस्वी कि बालक होने पर भी वृद्ध उसका आदर करते। कश्यप-पुत्र विभाण्डक एक बड़े सरोवर पर जाकर तप में लगे और देवता-से उस मुनि ने बहुत समय तक साधना की। एक बार जल में आचमन करते हुए उन्होंने अप्सरा उर्वशी को देखा, और उनका वीर्य स्खलित हो गया। हे राजन्, उसी समय एक प्यासी हिरणी ने पानी के साथ उसे पी लिया और इस कारण गर्भवती हुई। वह हिरणी वास्तव में देवताओं की एक कन्या थी, जिससे लोक-स्रष्टा ब्रह्मा ने पहले ही कहा था, “आप हिरणी बनेंगी, और उस रूप में एक मुनि को जन्म देकर मुक्त होंगी।” नियति के अनुसार और स्रष्टा का वचन मिथ्या न होने के कारण उस हिरणी से विभाण्डक का पुत्र, एक महान् मुनि, जन्मा। ऋष्यशृंग तपस्या में लीन होकर सदा वन में रहते थे। हे राजन्, उन महात्मा मुनि के सिर पर एक सींग था, इसीलिए वे ऋष्यशृंग कहलाए। पिता के सिवा उन्होंने कभी कोई मनुष्य नहीं देखा था, इसलिए उनका मन पूरी तरह ब्रह्मचर्य के धर्म में लगा रहा।’

‘उसी समय अंग देश का राजा लोमपाद था, दशरथ का मित्र। हमने सुना है कि भोग-लालसा में उसने किसी ब्राह्मण से झूठ कहा था, और तभी से समस्त ब्राह्मण-वर्ग ने उसे त्याग दिया; उसके पास यज्ञ कराने वाला पुरोहित तक न रहा। सहस्र नेत्रों वाले इन्द्र ने अचानक उसके राज्य में वर्षा रोक दी, और प्रजा दुख पाने लगी। तब राजा ने तपस्वी, सुशिक्षित और समर्थ ब्राह्मणों से पूछा कि देवराज से वर्षा कैसे मिले, कोई उपाय सोचिए। उनमें से एक ऋषिश्रेष्ठ ने राजा से कहा, “हे राजन्, ब्राह्मण आपसे रुष्ट हैं; उन्हें शान्त करने का कोई कर्म कीजिए। और मुनि-पुत्र ऋष्यशृंग को बुलवाइए, जो वन में रहते हैं, स्त्री-जाति को जानते तक नहीं, और सरलता में ही सुख पाते हैं। यदि वे महातपस्वी आपके राज्य में पधारें, तो आकाश तुरन्त बरसेगा, इसमें हमें तनिक सन्देह नहीं।” यह सुनकर लोमपाद ने अपने पापों का प्रायश्चित्त किया और राज्य से बाहर चला गया; ब्राह्मणों के शान्त हो जाने पर लौटा, और प्रजा उसे लौटा देखकर फिर प्रसन्न हुई। तब अंगराज ने मन्त्रणा में कुशल मन्त्रियों की सभा बुलाई और ऋष्यशृंग को लाने की कोई योजना बनाने में बहुत श्रम किया। सब विद्याओं में निपुण, लोक-व्यवहार में सिद्ध उन मन्त्रियों के साथ अन्त में उसने एक उपाय निश्चित किया, और नगर की चतुर गणिकाओं को बुलवाया। उनके आने पर राजा ने कहा, “हे सुन्दरियो, कोई उपाय कीजिए कि मुनि-पुत्र ऋष्यशृंग को लुभाकर, उनका विश्वास पाकर, हमारे राज्य में ले आइए।” एक ओर राजा के क्रोध का भय और दूसरी ओर मुनि के शाप का डर; वे स्त्रियाँ उदास और किंकर्तव्यविमूढ़ होकर बोलीं कि यह काम हमारे बस का नहीं। पर उनमें एक बूढ़ी स्त्री ने राजा से कहा, “हे महाराज, जिनका धन केवल तप है, उन्हें हम यहाँ लाने का यत्न करेंगी। पर इस योजना के लिए आपको हमें कुछ वस्तुएँ जुटानी होंगी। तब सम्भव है कि हम मुनि-पुत्र ऋष्यशृंग को ले आएँ।” राजा ने आज्ञा दी कि वह जो माँगे, सब जुटाया जाए, और उसे बहुत-सा धन और अनेक प्रकार के रत्न भी दिए। तब वह रूप और यौवन से सम्पन्न कुछ स्त्रियों को साथ लेकर बिना विलम्ब वन की ओर चली।’

समझने की कुंजी (नाम): ऋष्यशृंग का नाम ही उनका चिह्न है: ऋष्य (एक प्रकार का हिरण) और शृंग (सींग)। लोमपाद अंग देश (आज का भागलपुर-मुंगेर क्षेत्र) का राजा और दशरथ का मित्र है; इसी मित्रता के कारण वाल्मीकि रामायण में ऋष्यशृंग दशरथ का पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराते हैं और राम आदि का जन्म होता है। शान्ता वहाँ दशरथ की पुत्री कही गई है, जिसे लोमपाद ने गोद लिया था; यहाँ व्यास उसे लोमपाद की पुत्री कहते हैं।

सार: एक मुनि का बीज एक हिरणी पी जाती है, और सींग वाला एक बालक जन्मता है जिसने पिता के सिवा कोई मनुष्य नहीं देखा। उधर एक राजा के झूठ से रूठे ब्राह्मण और रूठा हुआ आकाश। उपाय एक ही है: उस निर्दोष तपस्वी को राज्य में ले आना। और उसे लाने का बीड़ा एक बूढ़ी गणिका उठाती है।

तैरता हुआ आश्रम और एक ऐसा अतिथि जिसे मुनि ने पहले कभी नहीं देखा था

लोमश ने कहा, ‘हे भरतवंशी, राजा का प्रयोजन सिद्ध करने के लिए उसने एक तैरता हुआ आश्रम बनवाया, क्योंकि राजा की आज्ञा भी यही थी और उसकी योजना भी यही माँगती थी। अनेक फूलों-फलों से सजे बनावटी वृक्ष, तरह-तरह की झाड़ियाँ और बेलें, चुने हुए स्वादिष्ट फल; वह तैरता आश्रम इतना रमणीय था मानो जादू से रचा गया हो। उसने अपनी नाव कश्यप-पुत्र के आश्रम से थोड़ी दूर बाँधी और यह जानने के लिए दूत भेजे कि मुनि नित्य कहाँ-कहाँ जाते हैं। अवसर देखकर, मन में योजना बनाकर, उसने अपनी पुत्री को आगे भेजा, जो व्यवसाय से गणिका और बुद्धि से तेज़ थी। वह चतुर स्त्री तपस्वी के पास पहुँची और आश्रम में मुनि-पुत्र को देखा।’

‘गणिका ने कहा, “हे मुनि, हम आशा करती हैं कि तपस्वियों का सब कुशल है, फल-मूल का भण्डार भरा है, और आप इस आश्रम में सुख से रहते हैं। हम यहाँ आपका दर्शन करने आई हैं। हम आशा करती हैं कि ऋषियों का तप बढ़ रहा है, आपके पिता का तेज मन्द नहीं पड़ा और वे आपसे प्रसन्न हैं। हे ब्राह्मण ऋष्यशृंग, हमें आशा है कि आप अपने योग्य अध्ययन में लगे हैं।” ऋष्यशृंग ने कहा, “आप प्रकाश के पुंज-सी दमक रही हैं, और हम आपको प्रणाम के योग्य मानते हैं। हम आपको पाँव धोने का जल और आपकी रुचि के फल-मूल देंगे, क्योंकि हमारा धर्म यही कहता है। कुश की इस चटाई पर, जिस पर काला मृगचर्म बिछा है, सुख से बैठिए। आपका आश्रम कहाँ है? हे ब्राह्मण, आप देवता-से दीखते हैं। यह कौन-सा व्रत है जो आप इस समय कर रहे हैं?” गणिका ने कहा, “हे कश्यप-पुत्र, उस पहाड़ के उस पार, जो तीन योजन में फैला है, हमारा आश्रम है, बड़ा रमणीय। वहाँ प्रणाम न लेना हमारा नियम है, और हम पाँव धोने का जल भी नहीं छूतीं। हम आप-जैसों के प्रणाम के योग्य नहीं; प्रणाम तो हमें आपको करना चाहिए। हे ब्राह्मण, हमारा व्रत यह है कि आप हमारी बाँहों में समा जाएँ।” ऋष्यशृंग ने कहा, “हम आपको पके फल दें: हरड़, आँवला, करूष, रेतीली भूमि के इंगुदी और गूलर। कृपा करके इनका आनन्द लीजिए।”’

‘उसने वे सब खाने की चीज़ें एक ओर सरका दीं और मुनि को ऐसे पदार्थ दिए जो उनके योग्य नहीं थे, पर देखने में अत्यन्त सुन्दर और स्वादिष्ट, और ऋष्यशृंग को बहुत भाए। उसने उन्हें बहुत सुगन्धित मालाएँ दीं, सुन्दर चमकते वस्त्र दिए, उत्तम पेय दिए, और फिर खेलने लगी, हँसने लगी, आनन्द करने लगी। उनके सामने वह गेंद से खेली, और खेलते हुए वह दो टुकड़ों में टूटी हुई बेल-सी लगती थी। उसने अपने शरीर से उनका शरीर छुआ और ऋष्यशृंग को बार-बार बाँहों में भरा। फिर झुककर उसने साल, अशोक और तिलक के फूलों से लदी टहनियाँ तोड़ीं, और मद में डूबी, लजाने का भाव धरे, वह महामुनि के पुत्र को लुभाती रही। जब उसने देखा कि ऋष्यशृंग का हृदय छू गया है, तो बार-बार अपना शरीर उनसे सटाकर, कटाक्ष करती हुई, अग्नि में आहुति देने का बहाना बनाकर धीरे-धीरे चली गई।’

‘उसके जाते ही ऋष्यशृंग प्रेम के वश हो गए और सुध खो बैठे। उनका मन बार-बार उसी की ओर लौटता और सूना पड़ जाता। वे आहें भरने लगे और बड़े व्याकुल दिखने लगे। उसी क्षण कश्यप-पुत्र विभाण्डक आ पहुँचे, जिनकी आँखें सिंह-सी पीली थीं, जिनका शरीर नखों की नोक तक बालों से ढँका था, जो अपने वर्ण के योग्य स्वाध्याय में रत थे और जिनका जीवन पवित्र ध्यान में बीतता था। उन्होंने आकर देखा कि पुत्र अकेला बैठा है, चिन्तित और उदास, विचलित मन, ऊपर उठी आँखों से बार-बार आहें भरता हुआ। विभाण्डक ने दुखी पुत्र से कहा, “हे पुत्र, आप ईंधन के लिए लकड़ी क्यों नहीं चीर रहे? आशा है आज आपने होम किया है, सुक्-स्रुवा माँजे हैं और बछड़े को उस गाय के पास ले गए हैं जिसका दूध आहुति में काम आता है। सचमुच आप अपनी सहज अवस्था में नहीं हैं। आप चिन्तित और सुध-बुध खोए हुए लगते हैं। आज आप इतने उदास क्यों हैं? हम पूछते हैं, आज यहाँ कौन आया था?”’

सार: गणिका आश्रम के व्रत की भाषा में ही बोलती है: उसका “व्रत” आलिंगन है, उसके “फल” मदिरा हैं। जिसने स्त्री देखी ही नहीं, वह अतिथि को एक तेजस्वी ब्रह्मचारी समझकर सत्कार करता है। उसके जाते ही खालीपन उतरता है, और पिता की आँखें उस खालीपन को पहली ही दृष्टि में पढ़ लेती हैं।

“एक जटाधारी ब्रह्मचारी आया था”: ऋष्यशृंग का वर्णन और पिता की चेतावनी

‘ऋष्यशृंग ने कहा, “आज यहाँ सिर पर केश-राशि वाला एक ब्रह्मचारी आया था। वह न छोटा था न लम्बा, तेजस्वी दृष्टि और सुनहरे रंग का, कमल-से बड़े नेत्रों वाला, देवता-सा चमकता और सुन्दर। उसका रूप सूर्य-सा दमकता था, उसकी काली आँखें अत्यन्त सुन्दर थीं। उसकी गुँथी हुई केश-राशि नीली-काली, सुघड़, लम्बी और सुगन्धित थी, सोने के धागों से बँधी। उसके गले में एक सुन्दर आभूषण चमक रहा था, आकाश में बिजली-सा। और गले के नीचे मांस के दो गोल उभार थे, जिन पर एक बाल भी न था, अत्यन्त सुन्दर आकार के। उसकी कमर बहुत पतली थी, नाभि सुघड़, और पसलियों का भाग चिकना। उसके वस्त्र के नीचे से सोने की एक डोरी झलकती थी, ठीक हमारी इस करधनी-सी। उसके पाँवों में अद्भुत आकार का कुछ था जो झनक उठता था, और कलाइयों पर भी वैसे ही झनकते हुए आभूषण बँधे थे, जो हमारी इस माला-से लगते थे। चलने पर उसके आभूषण ऐसे बजते जैसे जल पर प्रसन्न हंस बोलते हैं। उसके वस्त्र अद्भुत बनावट के थे; हमारे ये वस्त्र उनके सामने कुछ नहीं। उसका मुख देखने योग्य था और उसका स्वर हृदय को आनन्द देता था; उसकी वाणी कोयल के गीत-सी मधुर थी, और उसे सुनते हुए हम भीतर तक छू गए।”’

‘“जैसे वसन्त में वन तभी शोभा पाता है जब हवा उस पर से गुज़रती है, वैसे ही हे पिता, वह श्रेष्ठ और पवित्र गन्ध वाला अतिथि हवा से हिलता हुआ सुन्दर लगता था। उसकी केश-राशि सुघड़ बँधी थी, सिर और माथे पर बीच से दो भागों में बँटी हुई। उसकी दो आँखें मानो अत्यन्त सुन्दर चकवा पक्षियों से ढँकी थीं। वह अपनी दाहिनी हथेली पर एक अद्भुत गोल फल लिए था, जो धरती छूकर बार-बार आकाश की ओर उछल जाता; वह उसे मारता, घूम जाता, और हवा से हिलते वृक्ष-सा चक्कर काटता। हे पिता, उसे देखकर वह हमें देवताओं का पुत्र लगा, और हमारा आनन्द असीम हो गया। उसने हमें बाँहों में भरा, हमारी जटाएँ पकड़ीं, हमारा मुख झुकाया, और अपना मुख हमारे मुख से मिलाकर अत्यन्त मधुर ध्वनि की। उसे न पाँव धोने के जल की परवाह थी, न हमारे दिए फलों की; उसने कहा कि उसका व्रत ही ऐसा है। उसने हमें कई फल दिए, हमें बहुत स्वादिष्ट लगे; ये फल उनके बराबर नहीं, इनमें न छिलका था न गुठली। उस सुन्दर रूप वाले ने हमें अत्यन्त स्वादिष्ट जल पिलाया, और पीकर हमें बड़ा सुख हुआ, और धरती पाँवों के नीचे हिलती लगी। ये सुन्दर, सुगन्धित, रेशम में गुँथी मालाएँ उसी की हैं। वह तेजस्वी तपस्वी ये मालाएँ यहाँ बिखेरकर अपने आश्रम लौट गया। उसके जाने से हमारा हृदय उदास है और शरीर मानो जल रहा है। हमारी इच्छा है कि जितनी जल्दी हो, हम उसके पास जाएँ, और वह प्रतिदिन यहाँ आए। हे पिता, हमें इसी क्षण उसके पास जाने दीजिए। वह कौन-सा व्रत करता है? जैसा तप वह करता है, हम भी उसके साथ वैसा ही जीवन जीना चाहते हैं। उसे न देखा तो हमारी आत्मा तड़पेगी।”’

‘विभाण्डक ने कहा, “हे पुत्र, वे राक्षस हैं। वे ऐसे ही अद्भुत सुन्दर रूप में घूमते हैं। उनका बल अतुलनीय है और रूप महान्, और वे सदा तप में विघ्न सोचते हैं। हे पुत्र, वे सुन्दर रूप धरकर अनेक उपायों से लुभाते हैं। उन क्रूर प्राणियों ने वनवासी मुनियों को उनके पुण्य से जीते हुए लोकों से गिराया है। जो मुनि अपनी आत्मा को वश में रखता है और सज्जनों के लोक पाना चाहता है, उसे उनसे कोई नाता नहीं रखना चाहिए। उनके कर्म नीच हैं और तपस्वियों को विघ्न पहुँचाना उनका सुख; धर्मात्मा को उनकी ओर देखना भी नहीं चाहिए। और हे पुत्र, वे पेय पीने योग्य नहीं थे, वे तो अधर्मियों की मदिरा थे। और ये चमकीली, सुगन्धित, रंग-बिरंगी मालाएँ भी मुनियों के लिए नहीं हैं।” पुत्र को इस तरह मना करके कि वे दुष्ट राक्षस थे, विभाण्डक उसकी खोज में निकले। तीन दिन खोजकर भी जब उसका पता न पाया, तो अपने आश्रम लौट आए।’

‘इस बीच, जब कश्यप-पुत्र फल लेने बाहर गए, तो वही गणिका ऋष्यशृंग को पहले की तरह लुभाने फिर आई। उसे देखते ही ऋष्यशृंग प्रसन्न हुए और झटपट उसकी ओर दौड़कर बोले, “पिता के लौटने से पहले हम आपके आश्रम चलें।” तब हे राजन्, उन गणिकाओं ने युक्ति से कश्यप के उस इकलौते पुत्र को अपनी नाव पर चढ़ा लिया और नाव खोल दी। अनेक उपायों से उन्हें रिझाती हुई वे अन्त में अंगराज के पास पहुँचीं। राजा ने उस अत्यन्त श्वेत तैरती नाव को जल पर आश्रम के सामने ही रखवा दिया और वहाँ “तैरता आश्रम” नाम का एक सुन्दर वन रचवा दिया। विभाण्डक के उस इकलौते पुत्र को राजा ने अन्तःपुर में रखा ही था कि अचानक उसने देखा, आकाश से वर्षा बरस रही है और संसार जल से भर रहा है। मनोकामना पूरी होने पर लोमपाद ने अपनी पुत्री शान्ता ऋष्यशृंग को ब्याह दी। और उनके पिता का क्रोध शान्त करने के लिए उसने उस मार्ग पर, जिससे विभाण्डक पुत्र के पास आने वाले थे, गायें रखवाईं और खेत जुतवाए। राजा ने बहुत-से पशु और हट्टे-कट्टे ग्वाले भी रखे और उन्हें आज्ञा दी, “जब महर्षि विभाण्डक आपसे अपने पुत्र के बारे में पूछें, तो हाथ जोड़कर कहिए कि ये पशु और ये जुते खेत उनके पुत्र के हैं, और आप उनके दास हैं, जो आज्ञा हो, करने को तैयार।”’

‘उधर वे उग्र क्रोध वाले मुनि फल-मूल लेकर आश्रम लौटे और पुत्र को खोजा। न पाकर वे अत्यन्त क्रुद्ध हुए। क्रोध से जलते हुए उन्हें सन्देह हुआ कि यह राजा का काम है, और वे राजा, नगर और समूचे राज्य को जला डालने का निश्चय करके चम्पा नगरी की ओर चले। मार्ग में थके और भूखे वे पशुओं से भरी उन्हीं ग्वाल-बस्तियों में पहुँचे। ग्वालों ने यथोचित सत्कार किया और उन्होंने राजा-सी सुख-सुविधा में रात बिताई। बड़ा आतिथ्य पाकर उन्होंने पूछा, “हे ग्वालो, आप किसके हैं?” सब आगे आकर बोले, “यह सारा धन आपके पुत्र के लिए जुटाया गया है।” स्थान-स्थान पर ऐसा सम्मान पाते हुए उन्होंने अपने पुत्र को देखा, जो स्वर्ग में इन्द्र-सा लग रहा था, और पुत्रवधू शान्ता को, जो बादल से निकलती बिजली-सी थी। पुत्र के लिए बसी बस्तियाँ और गोशालाएँ, और शान्ता को देखकर उनका बड़ा रोष शान्त हो गया, और हे नरेश, विभाण्डक ने राजा से बड़ा सन्तोष प्रकट किया। सूर्य और अग्नि के बराबर तेज वाले उन महर्षि ने पुत्र को वहीं रखा और कहा, “जैसे ही आपके पुत्र हो और आप राजा का सब प्रिय कार्य कर चुकें, आपको वन में अवश्य लौट आना है।” ऋष्यशृंग ने पिता का कहा ठीक वैसा ही किया और पिता के पास लौट गए। और हे नरेश, शान्ता ने उनकी वैसी ही सेवा की जैसी आकाश में रोहिणी चन्द्रमा की करती है, या सौभाग्यवती अरुन्धती वसिष्ठ की, या लोपामुद्रा अगस्त्य की। जैसे दमयन्ती नल की आज्ञाकारिणी पत्नी थीं, या शची वज्रधारी इन्द्र की, या नारायण की पुत्री इन्द्रसेना मुद्गल की, वैसे ही शान्ता ने वन में रहते हुए ऋष्यशृंग की प्रेम से सेवा की। यह वही पवित्र आश्रम है जो उनका था; इस बड़े सरोवर को सुशोभित करता हुआ यह पवित्र यश रखता है। यहाँ स्नान कीजिए, आपकी कामना पूरी हो। शुद्ध होकर अन्य तीर्थों की ओर चलिए।’

समझने की कुंजी (एक दृष्टि): ऋष्यशृंग का वर्णन इस कथा की सबसे कोमल जगह है: जिसने कभी स्त्री नहीं देखी, वह उसे अपने ही जीवन की वस्तुओं से समझता है, करधनी, जपमाला, फल, व्रत। गेंद उसे “धरती छूकर आकाश को उछलता फल” लगती है। कथा उसका उपहास नहीं करती; वह उसकी निर्दोषता को उसी की आँख से दिखाती है, और पिता की चेतावनी को भी उसी गम्भीरता से।

सार: पिता उसे राक्षस बताते हैं और तीन दिन खोजते हैं; पुत्र दूसरी भेंट में स्वयं नाव पर चढ़ जाता है। चम्पा पहुँचते ही आकाश बरसता है, शान्ता ब्याही जाती है, और राजा मार्ग-भर गायें और जुते खेत बिछाकर क्रोधी पिता का क्रोध ठण्डा कर देता है। ऋष्यशृंग वचन के अनुसार वन लौटते हैं; शान्ता की सेवा की उपमा रोहिणी, अरुन्धती और लोपामुद्रा से दी जाती है।

गंगा-सागर, कलिंग की वैतरणी और वेदी बनी पृथ्वी

वैशम्पायन ने कहा, ‘हे जनमेजय, फिर पाण्डु-पुत्र कौशिकी नदी से चले और क्रम से सब पवित्र तीर्थों में गए। हे नरपाल, वे उस समुद्र तक आए जहाँ गंगा उसमें गिरती हैं, और वहाँ पाँच सौ नदियों के बीच में उन्होंने पवित्र स्नान किया। फिर भाइयों सहित वह वीर राजा समुद्र के किनारे-किनारे उस भूमि की ओर चला जहाँ कलिंग बसते हैं।’

लोमश ने कहा, ‘हे कुन्ती-पुत्र, यह वह भूमि है जहाँ कलिंग रहते हैं। इसमें से वैतरणी नदी बहती है, जिसके तट पर स्वयं धर्म ने देवताओं की शरण लेकर यज्ञ किया था। यह उत्तर तट ऋषियों से बसा है, यज्ञ के योग्य, एक पर्वत से सुशोभित और द्विजों से भरा हुआ। पवित्रता में यह स्थान उस मार्ग की बराबरी करता है जिससे स्वर्ग के योग्य धर्मात्मा देवलोक जाता है। यहीं पुराने समय में अन्य ऋषियों ने भी यज्ञ करके अमरों की पूजा की थी। और यहीं, हे राजाओं के राजा, रुद्र ने यज्ञ-पशु को पकड़ लिया था और पुकारा था, “यह हमारा भाग है!” हे भरतश्रेष्ठ, जब शिव पशु को ले जा रहे थे, तो देवताओं ने उनसे कहा, “धर्म के सब नियमों को ठुकराकर दूसरों की सम्पत्ति पर लोभ की दृष्टि मत डालिए।” फिर उन्होंने रुद्र की मधुर स्तुति की, यज्ञ से उन्हें तृप्त किया और यथोचित सम्मान दिया। तब उन्होंने पशु छोड़ दिया और देवताओं के मार्ग से चले गए। रुद्र के विषय में फिर जो हुआ, वह सुनिए, हे युधिष्ठिर। रुद्र के भय से देवताओं ने सदा के लिए सब भागों में से श्रेष्ठ भाग, जो ताज़ा हो, बासी न हो, उनके लिए अलग कर दिया। जो कोई इस प्राचीन कथा का पाठ करते हुए यहाँ स्नान करता है, वह अपनी मर्त्य आँखों से देवलोक का मार्ग देख लेता है।’

वैशम्पायन ने कहा, ‘तब भाग्य के कृपापात्र पाण्डु के सब पुत्र और द्रुपद की पुत्री वैतरणी में उतरे और पितरों को जलांजलि दी।’ युधिष्ठिर ने कहा, ‘हे लोमश, पुण्य-कर्म का बल कितना बड़ा होता है! यहाँ विधिपूर्वक स्नान करके हमें लगता है कि हम अब मनुष्यों के लोक को छू ही नहीं रहे। हे धर्मात्मा मुनि, हमें सब लोक दिख रहे हैं। और यह वनवासी महात्माओं के स्वाध्याय की ध्वनि है।’ लोमश ने कहा, ‘हे युधिष्ठिर, जहाँ से यह ध्वनि आपके कानों तक आ रही है, वह स्थान निश्चय ही तीन लाख योजन दूर है। हे नरेश, चुप रहिए और एक शब्द मत बोलिए। हे राजन्, यह स्वयम्भू का दिव्य वन है जो अब हमारी दृष्टि में आया है। यहाँ भयंकर नाम वाले विश्वकर्मा ने यज्ञ किया था। उस महायज्ञ के अवसर पर स्वयम्भू ने पर्वतों और वनों सहित यह सारी पृथ्वी पुरोहित की दक्षिणा के रूप में कश्यप को दे दी थी। हे कुरु-पुत्र, दान की जाते ही पृथ्वी देवी मन में दुखी हुई और लोकों के स्वामी उन महान् प्रभु से क्रोध में बोली, “हे महादेव, हमें एक साधारण मर्त्य को दे देना आपके योग्य नहीं। आपका यह दान निष्फल होगा, क्योंकि हम पाताल की तह में उतर रही हैं।” जब भगवान् कश्यप ने पृथ्वी देवी को हताश और दुखी देखा, तो उन्होंने उसका क्रोध शान्त करने के लिए एक प्रायश्चित्त-कर्म किया। हे पाण्डु-पुत्र, उनके पुण्य-कर्म से पृथ्वी प्रसन्न हुई, जल के भीतर से फिर उठी और यज्ञ-वेदी के रूप में प्रकट हुई। हे राजन्, यही वह स्थान है जो स्पष्ट रूप से वेदी का आकार दिखाता है। हे महाराज, इस पर चढ़िए, आपको पराक्रम और बल मिलेगा। यह वही वेदी है जो समुद्र तक फैली है और उसकी छाती पर टिकी है। आपका मंगल हो; इस पर चढ़िए और स्वयं समुद्र पार कीजिए। आज जब आप इस पर चढ़ें, हम आपके लिए सब अमंगल दूर करने का अनुष्ठान करेंगे, क्योंकि यह वेदी मनुष्य का स्पर्श पाते ही समुद्र में समा जाती है।’

‘विश्व के रक्षक देव को नमस्कार! विश्व से परे आपको नमस्कार! हे देवों के स्वामी, इस समुद्र में अपनी उपस्थिति दीजिए। हे पाण्डु-पुत्र, आपको ये सत्य-वचन बोलने हैं, और बोलते हुए शीघ्र इस वेदी पर चढ़ना है: कि अग्नि और सूर्य और जनन-अंग और जल और देवी और विष्णु का बीज और अमृत की नाभि; कि अग्नि वह अंग है जिसने समुद्र को जन्म दिया, पृथ्वी उसका शरीर है, विष्णु ने वह बीज रखा जिससे वह हुआ, और वह अमृत की नाभि है। हे पाण्डु-पुत्र, ये सत्य-वचन ऊँचे स्वर में कहने हैं, और कहते हुए नदियों के स्वामी में उतरना है। हे कुन्ती-पुत्रों में श्रेष्ठ, अन्यथा दिव्य जन्म वाले इस जल के स्वामी को, पृथ्वी के जल के इस श्रेष्ठ भण्डार को, कुश की नोक से भी नहीं छूना चाहिए।’ वैशम्पायन ने कहा, ‘जब उनके लिए अमंगल दूर करने का अनुष्ठान पूरा हुआ, तो महात्मा युधिष्ठिर समुद्र में उतरे, मुनि का कहा सब किया, और महेन्द्र पर्वत की तलहटी में जाकर वहाँ रात बिताई।’

समझने की कुंजी (स्थान और संख्या): कलिंग आज का ओड़िशा है और वैतरणी वहाँ आज भी इसी नाम से बहती है; याम्य वैतरणी, जिसे यमलोक की सीमा-नदी कहा जाता है, उसी नाम की दूसरी, अलौकिक नदी है। “तीन लाख योजन”, यदि एक योजन लगभग 12 से 13 किलोमीटर मानें, तो पृथ्वी से चन्द्रमा की दूरी का लगभग दस गुना है: लोमश का कहना यह है कि युधिष्ठिर जो सुन रहे हैं, वह मनुष्य के कानों की दूरी से बाहर है। महेन्द्र वह पर्वत है जो पूर्वी घाट में परशुराम का निवास माना जाता है।

सार: यात्रा समुद्र-तट पकड़ती है। वैतरणी पर रुद्र यज्ञ का भाग छीनते हैं और देवता उन्हें सदा के लिए पहला भाग दे देते हैं। स्वयम्भू के वन में एक दान की हुई पृथ्वी पाताल में उतरने को थी और वेदी बनकर लौटी; उसी वेदी पर खड़े होकर, सत्य-वचन बोलते हुए, युधिष्ठिर समुद्र में उतरते हैं। अगला पड़ाव महेन्द्र पर्वत है, और वहाँ परशुराम रहते हैं।

महेन्द्र पर्वत पर अकृतव्रण: सहस्रबाहु अर्जुन, ऋचीक और बदले हुए पात्र

वैशम्पायन ने कहा, ‘पृथ्वीपति ने वहाँ एक रात बिताई और भाइयों सहित तपस्वियों का परम सम्मान किया। लोमश ने उन्हें सबके नाम बताए: भृगु, अंगिरा, वसिष्ठ और कश्यप के कुल के ऋषि। राजर्षि ने सबसे भेंट की और हाथ जोड़कर प्रणाम किया। फिर उन्होंने परशुराम के अनुयायी वीर अकृतव्रण से पूछा कि पूज्य परशुराम यहाँ के तपस्वियों को कब दर्शन देंगे, क्योंकि उस अवसर पर हम भृगुवंशी के दर्शन करना चाहते हैं।’

‘अकृतव्रण ने कहा, “आपकी यह यात्रा राम को पहले से ज्ञात है, जिनकी आत्मा स्वयं सब जानती है। वे आपसे सब प्रकार प्रसन्न हैं और सहज ही आपको दर्शन देंगे। यहाँ तप करने वाले ऋषियों को चतुर्दशी और अष्टमी को उनके दर्शन की अनुमति है। कल इस रात के अन्त में चतुर्दशी लगेगी। उस अवसर पर आप उन्हें देखेंगे, काला मृगचर्म पहने, जटाएँ बाँधे।” युधिष्ठिर ने कहा, “आप जमदग्नि के पुत्र महाबली राम के अनुयायी रहे हैं, इसलिए पुराने दिनों में उनके किए सब कर्मों के आप प्रत्यक्ष साक्षी होंगे। हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि बताइए, राम ने रणभूमि में क्षत्रियों को कैसे हराया, और उन संघर्षों का मूल कारण क्या था।”’

‘अकृतव्रण ने कहा, “हे भरत-पुत्र, हे राजाओं में श्रेष्ठ, हम प्रसन्नता से वह उत्तम कथा कहेंगे, भृगु-वंश में उत्पन्न जमदग्नि-पुत्र राम के देवतुल्य कर्मों की कथा। हम हैहय-वंश के महान् शासक के कर्म भी कहेंगे। हैहयों का वह प्रबल स्वामी, अर्जुन नाम का राजा, राम के हाथों मारा गया। हे पाण्डु-पुत्र, उसकी एक हज़ार भुजाएँ थीं, और दत्तात्रेय की कृपा से उसके पास सोने का एक दिव्य रथ भी था। उसका शासन पृथ्वी के सब प्राणियों पर था, वे जहाँ भी हों, और उस महाबली राजा का रथ हर ओर निर्बाध जाता था। वर के बल से अजेय होकर वह उस रथ पर चढ़ा हुआ देवताओं, यक्षों और ऋषियों को चारों ओर रौंदता फिरता था, और सब प्राणी उससे त्रस्त थे। तब देवता और कठोर व्रत वाले ऋषि मिलकर देवों के देव, दानव-संहारक, अमोघ पराक्रम वाले विष्णु के पास गए और बोले, ‘हे भगवन्, सब प्राणियों की रक्षा के लिए आवश्यक है कि अर्जुन आपके हाथों मारा जाए।’ और हैहयों का वह प्रबल स्वामी अपने दिव्य रथ पर चढ़कर इन्द्र का अपमान कर बैठा, जब वे देवता अपनी रानी शची के साथ विहार कर रहे थे। तब हे भरत-पुत्र, भगवान् ने कार्तवीर्य के पुत्र के नाश के लिए इन्द्र से मन्त्रणा की। उस अवसर पर प्राणियों के जगत् के हित की सब बात देवराज ने कही, और लोकपूजित भगवान् सब आवश्यक करने के लिए रमणीय बदरी-वन में गए, जो तप के लिए उनका अपना चुना हुआ स्थान था।”’

‘“उसी समय पृथ्वी पर कान्यकुब्ज देश में एक महाबली राजा था, जिसकी सेना अत्यन्त विशाल थी, और जिसका नाम गाधि संसार में प्रसिद्ध था। वह वन में रहने लगा था। वन में रहते हुए उसे स्वर्ग की अप्सरा-सी सुन्दर एक पुत्री हुई। भृगु-पुत्र ऋचीक ने उससे विवाह के लिए उसे माँगा। तब गाधि ने कठोर तप करने वाले उस ब्राह्मण से कहा, ‘हमारे वंश में एक कुल-रीति है, जिसे बीते युग के हमारे पूर्वजों ने चलाया। हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, जान लीजिए कि वर को शुल्क में एक हज़ार तेज़ अश्व देने होते हैं, जिनका रंग भूरा हो और हर एक का एक कान काला। पर हे भृगु-पुत्र, आप-जैसे पूज्य मुनि से यह माँगा नहीं जा सकता, और आप-जैसे महामना मुनि को हमारी पुत्री देने से इनकार भी नहीं किया जा सकता।’ ऋचीक ने कहा, ‘हम आपको भूरे रंग के, एक काले कान वाले एक हज़ार तेज़ अश्व देंगे; अपनी पुत्री हमें ब्याह दीजिए।’ यह वचन देकर वे वरुण के पास गए और बोले, ‘हमें भूरे रंग के, एक काले कान वाले एक हज़ार तेज़ अश्व दीजिए, हमें अपने विवाह के शुल्क के लिए चाहिए।’ वरुण ने तुरन्त एक हज़ार अश्व दिए। वे अश्व गंगा नदी से निकले थे, इसलिए वह स्थान अश्वतीर्थ कहलाया। कान्यकुब्ज नगर में गाधि की पुत्री सत्यवती का विवाह हुआ, और देवता स्वयं बारात में थे। ऋचीक ने इस तरह एक हज़ार अश्व पाए, देवताओं के दर्शन किए, और विधिपूर्वक पत्नी पाई।”’

‘“विवाह हो जाने पर उनके पिता भृगु पुत्र और पुत्रवधू को देखने आए और अपने प्रशंसनीय पुत्र को देखकर प्रसन्न हुए। पति-पत्नी ने उन सर्वदेव-पूजित का श्रेष्ठ सत्कार किया और उनके बैठने पर हाथ जोड़े पास खड़े रहे। तब प्रसन्न हृदय से भगवान् भृगु ने पुत्रवधू से कहा, ‘हे सुन्दरी पुत्री, आप जो चाहें, वर माँग लीजिए।’ उसने यह कृपा माँगी कि उसे और उसकी माता, दोनों को एक-एक पुत्र हो। भृगु ने कहा, ‘ऋतु के दिनों में आप और आपकी माता पुंसवन-विधि से स्नान कीजिए, और फिर अलग-अलग दो वृक्षों का आलिंगन कीजिए, वे पीपल का और आप गूलर का। हे धर्मपरायण पुत्री, ये दो पात्र चरु के हैं, जिन्हें हमने बड़े यत्न से बनाया है; सारा ब्रह्माण्ड छानकर जुटाई औषधियों का सार इस दूध-चावल में मिला है। इन्हें बड़ी सावधानी से खाना है।’ इतना कहकर वे अन्तर्धान हो गए। पर दोनों स्त्रियों ने चरु के पात्र भी बदल लिए और वृक्ष भी। बहुत दिन बीतने पर भगवान् भृगु फिर आए, दिव्य ज्ञान से सब जानते हुए, और अपनी पुत्रवधू सत्यवती से बोले, ‘हे धर्मपरायण पुत्री, हे सुन्दर भौंहों वाली, आपने गलत पात्र खाया और गलत वृक्ष का आलिंगन किया; आपकी माता ने आपको भ्रम में डाला। आपसे ऐसा पुत्र होगा जो ब्राह्मण होकर भी क्षत्रिय के स्वभाव का होगा; और आपकी माता से ऐसा महाबली पुत्र होगा जो जन्म से क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मण का जीवन अपनाएगा, और धर्मात्माओं के मार्ग पर चलेगा।’ तब उसने ससुर से बार-बार विनती की, ‘हमारा पुत्र ऐसा न हो, हमारा पौत्र भले ऐसा हो।’ हे पाण्डु-पुत्र, उन्होंने कहा, ‘ऐसा ही हो,’ और प्रसन्न होकर उसकी प्रार्थना मान ली। समय पर उसने जमदग्नि नाम का पुत्र जना। भृगु का वह पुत्र तेज और सौन्दर्य, दोनों से सम्पन्न था; वर्षों और बल में बढ़ता हुआ वह वेद-विद्या में अन्य ऋषियों से आगे निकल गया, और हे भरत-प्रमुख, सूर्य-से उस तेजस्वी को बिना सिखाए, स्वयं, समूची धनुर्विद्या और चारों प्रकार के अस्त्रों का ज्ञान मिल गया।”’

समझने की कुंजी (नाम): यहाँ “अर्जुन” पाण्डव अर्जुन नहीं, हैहय-राज कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्रबाहु) है, जो नर्मदा-तट की माहिष्मती का राजा था। बदले हुए चरु की यह कथा दो विपरीत पुत्रों को जन्म देती है: सत्यवती का पुत्र जमदग्नि, जिसका पुत्र परशुराम क्षत्रिय-स्वभाव का ब्राह्मण हुआ (वर की शर्त के अनुसार एक पीढ़ी आगे), और गाधि की पत्नी का पुत्र विश्वामित्र, जो क्षत्रिय होकर ब्रह्मर्षि हुआ। इस तरह परशुराम और विश्वामित्र मामा-भाँजे के नाते में बँधे हैं।

सार: महेन्द्र पर्वत पर परशुराम की कथा उनके जन्म से भी पहले से शुरू होती है: सहस्रबाहु अर्जुन का अत्याचार, विष्णु का बदरी-वन जाना, ऋचीक का हज़ार अश्वों का शुल्क, और भृगु के दिए दो पात्र जिन्हें माँ-बेटी बदल लेती हैं। एक अदला-बदली से दो वंशों का स्वभाव बदल जाता है।

रेणुका, परशु का पहला प्रहार, और कार्तवीर्य की हज़ार भुजाएँ

‘अकृतव्रण ने कहा, “जमदग्नि ने वेदाध्ययन और तप में अपने को लगाया और अपनी कठोर तपस्या के लिए प्रसिद्ध हुए। क्रमबद्ध अध्ययन से उन्होंने सम्पूर्ण वेद पर अधिकार पाया। हे राजन्, वे प्रसेनजित् के पास गए और रेणुका का हाथ माँगा, और राजा ने यह प्रार्थना मान ली। भृगु-कुल के आनन्द जमदग्नि ने रेणुका को पत्नी बनाकर उसके साथ आश्रम में निवास किया और उसकी सहायता से तप करने लगे। उससे चार पुत्र हुए, और पाँचवें राम। सबसे छोटे होकर भी राम गुणों में सबसे बड़े थे। एक बार, जब पुत्र फल लेने बाहर गए थे, पवित्र और तपस्विनी रेणुका स्नान करने गई। हे राजन्, लौटते हुए उसकी दृष्टि मार्तिकावत के राजा चित्ररथ पर पड़ गई। राजा अपनी रानियों के साथ जल में था, छाती पर कमल की माला पहने, क्रीड़ा में मग्न। उसका भव्य रूप देखकर रेणुका के मन में कामना जागी। वह इस अनुचित कामना को रोक न सकी, जल के भीतर ही दूषित हो गई, और भयभीत हृदय से आश्रम लौटी। पति ने उसकी दशा तुरन्त भाँप ली। महाबली, प्रबल और क्रोधी स्वभाव के उन मुनि ने जब देखा कि वह विचलित है और पातिव्रत्य का तेज उसे छोड़ गया है, तो ‘धिक्’ कहकर उसकी भर्त्सना की।”’

‘“उसी क्षण जमदग्नि का ज्येष्ठ पुत्र रुमण्वान् आया, फिर सुषेण, फिर वसु, फिर विश्वावसु। महामुनि ने एक-एक करके सबको आज्ञा दी कि अपनी माता के प्राण ले लें। पर वे किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए, उनका साहस टूट गया, और वे एक शब्द न बोल सके। तब क्रोध में उन्होंने उन्हें शाप दिया, और शाप पाते ही वे सुध खो बैठे, जड़ पदार्थ-से हो गए, आचरण में पशु-पक्षियों के समान। तब शत्रु-वीरों के संहारक राम सबसे अन्त में आश्रम आए। महातपस्वी महाबाहु जमदग्नि ने उनसे कहा, ‘हे पुत्र, बिना हिचक अपनी इस दुष्ट माता को मार डालिए।’ राम ने तत्क्षण परशु उठाया और माता का सिर काट दिया। तब हे महाराज, महात्मा जमदग्नि का क्रोध तुरन्त शान्त हो गया, और प्रसन्न होकर वे बोले, ‘हे पुत्र, धर्म जानने वाले आपने हमारी आज्ञा से यह कठिन कार्य किया है। इसलिए आपके हृदय में जो कामनाएँ हों, हम सब देने को तैयार हैं। माँगिए।’ तब राम ने माँगा कि माता जीवित हो जाएँ; कि इस क्रूर कर्म की स्मृति उन्हें न सताए; कि उन्हें कोई पाप न लगे; कि भाई अपनी पहली अवस्था पा लें; कि रणभूमि में उनका कोई प्रतिद्वन्द्वी न हो; और कि उन्हें दीर्घ आयु मिले। हे भरत-पुत्र, कठोरतम तप वाले जमदग्नि ने पुत्र की ये सब कामनाएँ पूरी कीं।”’

‘“पर एक दिन, हे प्रभु, जब पुत्र पहले की तरह बाहर गए थे, समुद्र-तट के देश का स्वामी, कार्तवीर्य का पराक्रमी पुत्र, आश्रम आ पहुँचा। मुनि की पत्नी ने उसका सत्कार किया। पर योद्धा के अभिमान में मतवाला वह उस सत्कार से तनिक प्रसन्न न हुआ, और बल से, सब विरोध को ठुकराकर, आश्रम से उस मुख्य गाय को पकड़कर ले गया जिसके दूध से यज्ञ का घी बनता था, उसके ज़ोर-ज़ोर से रँभाने की उसे परवाह न थी। और उसने मनमाने ढंग से वन के बड़े-बड़े वृक्ष गिरा दिए। राम घर लौटे तो पिता ने स्वयं उन्हें सब बताया। जब राम ने देखा कि गाय अपने बछड़े के लिए कैसे रँभा रही है, तो उनके हृदय में रोष उठा। वे कार्तवीर्य के उस पुत्र की ओर दौड़े, जिसके अन्तिम क्षण निकट आ चुके थे। तब शत्रु-वीरों के संहारक भृगुवंशी ने रणभूमि में अपना पराक्रम दिखाया और सुन्दर धनुष से छूटे चपटी नोक वाले तीखे बाणों से अर्जुन की वे भुजाएँ काट डालीं, जो संख्या में एक हज़ार थीं और द्वार की अर्गला-सी मोटी। मृत्यु के हाथ से छुआ हुआ वह अपने शत्रु राम से पराजित हुआ।”’

‘“तब अर्जुन के कुटुम्बी, राम पर क्रोध से भरे हुए, राम की अनुपस्थिति में आश्रम में जमदग्नि पर टूट पड़े। उन्होंने वहीं उनका वध कर दिया, क्योंकि महाबली होते हुए भी वे उस समय तप में लगे थे और लड़ना नहीं चाहते थे। शत्रुओं से घिरे हुए वे असहाय, करुण स्वर में बार-बार राम का नाम पुकारते रहे। हे युधिष्ठिर, कार्तवीर्य के पुत्रों ने जमदग्नि को बाणों से बींध दिया और इस तरह शत्रु को दण्ड देकर चले गए। उनके जाने पर, जमदग्नि के प्राण छूट जाने पर, भृगु-कुल के आनन्द राम यज्ञ के लिए ईंधन बाँहों में उठाए आश्रम लौटे। और उस वीर ने देखा कि पिता मारे जा चुके हैं। अत्यन्त दुखी होकर वे उस अयोग्य मृत्यु पर विलाप करने लगे जिसने पिता को गिरा दिया था।”’

समझने की कुंजी (एक कठिन क्षण): कथा रेणुका के “दूषित” होने को स्पष्ट रखती है और उसे बचाती नहीं: एक क्षण की कामना, और पति उसे प्राणदण्ड देता है। व्यास न जमदग्नि को दोषमुक्त करते हैं, न राम को; राम आज्ञा मानते हैं और फिर पहला वर यही माँगते हैं कि माता जीवित हों और इस कर्म की स्मृति उन्हें न सताए। इसी क्षण से परशुराम का परशु उनके नाम में जुड़ता है।

सार: रेणुका की एक दृष्टि, जमदग्नि का क्रोध, चार भाइयों का जड़ हो जाना, और राम का परशु। फिर एक गाय: कार्तवीर्य का पुत्र होम-धेनु छीन ले जाता है, राम उसकी हज़ार भुजाएँ काट देते हैं, और प्रतिशोध में उसके कुटुम्बी तप में बैठे निहत्थे जमदग्नि को बाणों से बींध देते हैं। राम ईंधन उठाए लौटते हैं और पिता का शव पाते हैं।

इक्कीस बार क्षत्रिय-संहार, समन्तपंचक के पाँच सरोवर, और चतुर्दशी का दर्शन

‘राम ने कहा, “हे पिता, दोष हमारा है कि कार्तवीर्य के उन नीच और मूर्ख पुत्रों ने आपको वन के मृग की तरह बाणों से मार डाला। हे पिता, आप धर्मात्मा थे, धर्म के मार्ग से न डिगने वाले, किसी प्राणी को न सताने वाले; विधाता ने कैसे होने दिया कि आप इस तरह मरें? उन्होंने कैसा घोर पाप किया होगा, जिन्होंने सैकड़ों तीखे बाणों से आपको मारा, जबकि आप वृद्ध थे, उस समय तप में लगे थे और उनसे लड़ने की कोई इच्छा न रखते थे। वे निर्लज्ज अपने मित्रों और सेवकों को किस मुँह से यह कर्म सुनाएँगे कि उन्होंने एक असहाय, प्रतिरोध न करने वाले धर्मात्मा को मार डाला?” हे नरपाल, महातपस्वी राम इस तरह करुण विलाप करते रहे, और फिर दिवंगत पिता की अन्त्येष्टि की। शत्रु-नगरों के विजेता राम ने चिता पर पिता का दाह किया और, हे भरतवंशी, समूचे क्षत्रिय-वर्ग के संहार की प्रतिज्ञा की। रणभूमि में अपार बल वाले, वीर आत्मा के योग्य पराक्रम वाले, स्वयं मृत्यु-देव के समान उन्होंने क्रोध में शस्त्र उठाया और अकेले कार्तवीर्य के पुत्रों को मार डाला। हे क्षत्रिय-प्रमुख, शत्रुओं को हराने वालों के अग्रणी राम ने कार्तवीर्य-पुत्रों के सब क्षत्रिय अनुयायियों को तीन बार गिराया, और सात बार, अर्थात् इक्कीस बार, उस प्रबल स्वामी ने पृथ्वी के क्षत्रिय-कुलों का संहार किया। समन्तपंचक नाम की भूमि में उन्होंने रक्त के पाँच सरोवर भरे। वहाँ भृगु-कुल के उस महाबली ने अपने पूर्वजों, भृगुओं को तर्पण दिया, और ऋचीक ने प्रत्यक्ष प्रकट होकर उन्हें परामर्श के वचन कहे। तब भयंकर नाम वाले जमदग्नि-पुत्र ने महान् यज्ञ किया, देवराज को तृप्त किया, और पृथ्वी ऋत्विजों को दे दी। हे नरपाल, उन्होंने सोने की एक वेदी बनवाई, दस व्याम चौड़ी और नौ व्याम ऊँची, और वह महात्मा कश्यप को दान कर दी। तब कश्यप की आज्ञा से ब्राह्मणों ने वेदी को अनेक भागों में बाँट लिया, और इस कारण वे खाण्डवायन, यानी भाग लेने वाले, कहलाए। अपार बल वाले क्षत्रिय-संहारक ने पृथ्वी महात्मा कश्यप को दे दी और फिर अत्यन्त कठोर तप में लग गए। अब वे इस पर्वतराज महेन्द्र पर रहते हैं। इस तरह उनका और पृथ्वी के सब क्षत्रियों का वैर हुआ, और अपार बल वाले राम ने इस तरह सारा संसार जीता।’

वैशम्पायन ने कहा, ‘फिर चतुर्दशी के दिन उचित घड़ी में महात्मा राम ने उन ब्राह्मणों को, और धर्मात्मा राजा को उनके छोटे भाइयों सहित, दर्शन दिए। हे राजाओं के राजा, राजा ने भाइयों सहित राम की पूजा की, और हे नरपालों में धर्मात्मा, उन सब द्विजों को उसने परम सम्मान दिया। जमदग्नि-पुत्र की पूजा करके और उनसे प्रशंसा के वचन पाकर, उनके निर्देश से उसने महेन्द्र पर्वत पर रात बिताई, और फिर दक्षिण दिशा की यात्रा पर चल पड़ा।’

समझने की कुंजी (संख्या-आधुनिक-समतुल्य): “तीन बार” और “सात बार” मूल के “त्रिःसप्तकृत्वः” के दो टुकड़े हैं, जिसका अर्थ तीन-गुना-सात, यानी इक्कीस बार है; यही परम्परा का प्रसिद्ध अंक है। एक व्याम मनुष्य की फैली हुई दोनों बाँहों की नाप है, लगभग 1.8 मीटर; इसलिए वह सोने की वेदी लगभग 18 मीटर चौड़ी और 16 मीटर ऊँची ठहरती है। समन्तपंचक वही भूमि है जिसे आगे कुरुक्षेत्र कहा जाएगा; इसीलिए महाभारत का युद्ध उस भूमि पर लड़ा गया जहाँ पहले ही रक्त के पाँच सरोवर भर चुके थे।

सार: पिता की चिता पर राम एक वर्ग के विनाश की प्रतिज्ञा करते हैं और उसे इक्कीस बार निभाते हैं। फिर वही हाथ, जिसने पृथ्वी को क्षत्रियों से खाली किया, उसे कश्यप को दान कर देता है और तप में लौट जाता है। पाण्डव इसी तपस्वी के दर्शन चतुर्दशी को महेन्द्र पर करते हैं और दक्षिण को मुड़ते हैं।

गोदावरी से प्रभास तक, और मिट्टी में लिपटे पाण्डवों को देखकर वृष्णियों के आँसू

वैशम्पायन ने कहा, ‘महामना राजा ने यात्रा जारी रखी और समुद्र-तट के अनेक स्थानों पर पवित्र, रमणीय और ब्राह्मणों से भरे स्नान-तीर्थों के दर्शन किए। हे परीक्षित-पुत्र, छोटे भाइयों सहित उसने उनमें विधिपूर्वक स्नान किया और फिर सब नदियों में पवित्रतम एक उत्तम नदी पर गया। वहाँ भी उसने स्नान किया, पितरों और देवताओं को तर्पण दिया, और द्विज-श्रेष्ठों में धन बाँटा। फिर वह गोदावरी गया, जो सीधे समुद्र में गिरती है; वहाँ वह पापों से मुक्त हुआ। द्रविड़ देश में समुद्र तक पहुँचकर उसने अगस्त्य के नाम वाले उस पवित्र स्थान के दर्शन किए, जो अत्यन्त पवित्र और असाधारण रूप से शुद्ध था। वीर राजा ने नारी-तीर्थों के दर्शन किए। यहाँ उसने धनुर्धरों में श्रेष्ठ अर्जुन के उस प्रसिद्ध पराक्रम की कथा सुनी, जो मनुष्यों की शक्ति से परे था। यहाँ ऋषि-श्रेष्ठों ने उसकी प्रशंसा की और पाण्डु-पुत्र को परम आनन्द हुआ। हे पृथ्वीपति, द्रौपदी सहित उसने उन तीर्थों में स्नान किया और अर्जुन के पराक्रम की प्रशंसा करता हुआ वहाँ आनन्द से समय बिताया। समुद्र-तट के उन तीर्थों पर उसने हज़ारों गायें दान कीं और भाइयों के साथ प्रसन्न होकर बताया कि अर्जुन ने कैसे गोदान किया था। हे राजन्, समुद्र-तट के उन तीर्थों और अन्य अनेक पवित्र स्थानों में एक-एक करके जाकर उसने अपनी कामना पूरी की, और अन्त में उस पवित्रतम स्थान तक आया जो शूर्पारक नाम से प्रसिद्ध है।’

‘फिर समुद्र-तट का एक भाग पार करके वह पृथ्वी पर विख्यात एक वन में पहुँचा। वहाँ पुराने समय में देवताओं ने तप किया था और धर्मात्मा राजाओं ने यज्ञ। वहाँ उस दीर्घबाहु ने ऋचीक-पुत्र की प्रसिद्ध वेदी देखी, जो सब धनुर्धरों में अग्रणी थे; वह वेदी तपस्वियों के समूहों से घिरी थी और धर्मात्माओं के पूजने योग्य। फिर राजा ने सब देवताओं के पवित्र और रमणीय स्थान देखे: वसुओं के, मरुतों के, दोनों अश्विनी कुमारों के, सूर्य-पुत्र यम के, धनपति कुबेर के, इन्द्र के, विष्णु के, प्रजापति के, शिव के, चन्द्रमा के, सूर्य के, वरुण के, साध्यों के, ब्रह्मा के, पितरों के, गणों सहित रुद्र के, सरस्वती के, सिद्धों के, और अन्य अनेक अमर देवताओं के। उन स्थानों में राजा ने अनेक व्रत किए और बहुत-से रत्न दान किए। सब तीर्थों में स्नान करके वह फिर शूर्पारक आया, और समुद्र के उसी घाट से सहोदर भाइयों के साथ आगे बढ़कर उस पवित्र स्थान प्रभास पहुँचा, जिसकी कीर्ति महान् ब्राह्मणों ने संसार-भर में फैलाई है। वहाँ उस बड़ी लाल आँखों वाले राजा ने सब छोटे भाइयों सहित स्नान किया और पितरों और देवताओं को तर्पण दिया; और वैसा ही द्रौपदी ने और लोमश सहित सब ब्राह्मणों ने किया। बारह दिन वह केवल वायु और जल पर रहा। दिन-रात स्नान करता और चारों ओर जलाई अग्नियों से घिरा रहता। इस तरह वह धर्मात्माओं में श्रेष्ठ तप में लगा रहा।’

‘वह ऐसा कर ही रहा था कि बलराम और कृष्ण, दोनों को समाचार मिला कि राजा अत्यन्त कठोर तप कर रहा है, और समूचे वृष्णि-कुल के वे दोनों नेता सेना सहित अजमीढ़-वंशी युधिष्ठिर के पास आए। जब वृष्णियों ने देखा कि पाण्डु के पुत्र भूमि पर लेटे हैं, उनके शरीर पर मिट्टी लिपटी है, और द्रुपद की पुत्री दयनीय दशा में है, तो उनका शोक बड़ा था और वे ज़ोर से विलाप किए बिना न रह सके। तब राजा ने, जिसका साहस ऐसा था कि विपत्ति उसे कभी गिरा नहीं सकी, बलराम, कृष्ण, कृष्ण-पुत्र साम्ब, शिनि के पौत्र सात्यकि और अन्य वृष्णियों से हृदय से भेंट की और यथोचित सम्मान दिया। उन्होंने भी पृथा के सब पुत्रों का सम्मान किया और पाण्डवों से वैसे ही सम्मानित हुए। वे युधिष्ठिर के चारों ओर ऐसे बैठे, हे राजन्, जैसे देवगण इन्द्र के चारों ओर बैठते हैं। अत्यन्त प्रसन्न होकर राजा ने उन्हें अपने शत्रुओं के सब षड्यन्त्र सुनाए, वन में अपना निवास बताया, और यह भी कि अर्जुन अस्त्र-विद्या सीखने इन्द्र के लोक गए हैं; यह सब उसने प्रसन्न हृदय से कहा। वे यह सब समाचार जानकर सुखी हुए, पर जब उन्होंने पाण्डवों को इतना दुबला देखा, तो तेजस्वी और महामना वृष्णि अपनी पीड़ा से उमड़ते आँसू रोक न सके।’

समझने की कुंजी (स्थान): यह यात्रा का दक्षिणी और पश्चिमी चाप है: गोदावरी का मुहाना, द्रविड़ देश का अगस्त्य-तीर्थ, फिर पश्चिमी तट पर शूर्पारक (आज का नालासोपारा, मुम्बई के पास; परशुराम की वेदी वहीं है) और प्रभास (सोमनाथ के पास, सौराष्ट्र), जो द्वारका से इतना निकट है कि वृष्णि सेना सहित आ पहुँचते हैं। “अर्जुन का पराक्रम” जो दक्षिण के तीर्थों में सुनाया जाता है, वह उनकी बारह वर्ष की तीर्थयात्रा का प्रसंग है, जो आदि पर्व में आ चुका है।

सार: समुद्र-तट के तीर्थों की लम्बी माला के अन्त में प्रभास पर युधिष्ठिर बारह दिन वायु और जल पर, अग्नियों से घिरे बैठते हैं। समाचार द्वारका पहुँचता है। जो कुल तीनों लोकों की रक्षा कर सकता है, वह मिट्टी में लिपटे अपने मित्रों को देखकर रो पड़ता है।

प्रभास पर तीन स्वर: बलराम का सन्देह, सात्यकि का युद्ध-आह्वान, और युधिष्ठिर का सत्य

जनमेजय ने पूछा, ‘हे तपोधन, जब पाण्डु के पुत्र और वृष्णि प्रभास तीर्थ पर मिले, तो उन्होंने क्या किया और क्या बातें हुईं? वे सब महात्मा थे, सब विद्याओं में निपुण, और वृष्णि और पाण्डव एक-दूसरे को मित्र-भाव से देखते थे।’ वैशम्पायन ने कहा, ‘समुद्र-तट के पवित्र घाट प्रभास पर पहुँचकर वृष्णियों ने पाण्डु-पुत्रों को घेर लिया और उनकी सेवा में लगे। तब बलराम, जिनका रंग गाय के दूध, कुन्द के फूल, चन्द्रमा, चाँदी और कमल की जड़ के समान था, जो वनफूलों की माला पहने थे और जिनका शस्त्र हल था, कमलनयन कृष्ण से बोले, “हे कृष्ण, हमें नहीं दिखता कि धर्म का आचरण किसी भले की ओर ले जाता है या अधर्म किसी बुरे की ओर, जब महात्मा युधिष्ठिर इस दयनीय दशा में हैं, जटाएँ बढ़ाए, वनवासी, वल्कल पहने। और दुर्योधन पृथ्वी पर राज कर रहा है, और धरती उसे निगलती नहीं। इससे अल्पबुद्धि मनुष्य मानेगा कि दुष्ट जीवन धर्म के जीवन से अच्छा है। जब दुर्योधन फल-फूल रहा है और राज्य से वंचित युधिष्ठिर यह सब सह रहे हैं, तब लोग क्या करें? यही सन्देह आज सब मनुष्यों को उलझाए है। यह धर्म से जन्मा नरेश धर्म के मार्ग पर अडिग है, सत्यनिष्ठ और उदार हृदय। पृथा का यह पुत्र राज्य और सुख छोड़ देगा, पर उन्नति के लिए धर्म से नहीं डिगेगा। भीष्म, कृप, ब्राह्मण द्रोण और कुल के वृद्ध राजा, पृथा के पुत्रों को निकालकर, सुख से कैसे जी रहे हैं? धिक्कार है भरत-वंश के उन दुष्ट-बुद्धि नेताओं को! वह पापी पृथ्वीपति परलोक में अपने दिवंगत पूर्वजों से क्या कहेगा? अपने निर्दोष पुत्रों को सिंहासन से गिराकर क्या वह कह सकेगा कि उसने उनके साथ निर्दोष व्यवहार किया? वह अपने मन की आँख से अब भी नहीं देखता कि वह इस पृथ्वी के राजाओं में किस कर्म से अन्धा हुआ है। क्या इसलिए नहीं कि उसने कुन्ती के पुत्र को राज्य से निकाला? हमें सन्देह नहीं कि विचित्रवीर्य के उस पुत्र ने, जब उसने अपने पुत्रों के साथ यह अमानवीय कर्म किया, श्मशान में सोने के रंग के फूलते वृक्ष देखे होंगे। जब वे लाल-लाल आँखें फाड़े, कन्धे आगे झुकाए उसके सामने खड़े थे, उसने उनसे पूछा होगा और उनकी कुमन्त्रणा सुनी होगी, तभी तो उसने निर्भय होकर युधिष्ठिर को वन भेज दिया, जो अपने सब शस्त्र लिए थे और भाइयों के साथ थे।”’

‘“यह भीम, जिसकी भूख भेड़िये-सी है, बिना किसी शस्त्र के, केवल अपनी भुजाओं के बल से शत्रु-सेना का भयानक व्यूह नष्ट कर सकता है। उसकी युद्ध-गर्जना सुनकर रणभूमि की सेनाएँ निष्प्राण हो जाती थीं। और अब वह बलवान् भूख-प्यास से पीड़ित है, कठिन यात्राओं से दुबला। पर जब वह हाथ में बाण और अन्य शस्त्र उठाकर रणभूमि में शत्रुओं से मिलेगा, तब उसे अपने अत्यन्त दुखद वन-जीवन के कष्ट याद आएँगे, और वह एक भी शत्रु न छोड़ेगा; हमें इसका पूरा निश्चय है। संसार-भर में एक प्राणी नहीं जो बल और पराक्रम में उसकी बराबरी का दावा कर सके। और उसका शरीर, हाय, सर्दी, धूप और हवा से सूख गया है। इस महारथी भीम ने अकेले पूर्व के सब राजाओं और उनके अनुगामियों को जीता और उन युद्धों से सुरक्षित लौटा; वही भीम आज वल्कल में लिपटा वन में दयनीय जीवन जी रहा है। इस बलशाली सहदेव ने दक्षिण के सब राजाओं को जीता, समुद्र-तट पर जुटे उन नरपतियों को; उसे आज तपस्वी के वेश में देखिए। रण में वीर नकुल ने अकेले पश्चिम के राजाओं को जीता; वह आज जटाएँ बढ़ाए, मिट्टी लिपटे शरीर से फल-मूल पर जीता वन में घूमता है। यह राजकुमारी, जो यज्ञ की धूमधाम में वेदी के नीचे से प्रकट हुई, सदा सुख की आदी रही; वह इस वन में यह अत्यन्त दुखद जीवन कैसे सह रही है! और धर्म का पुत्र, जो धर्म जीवन के सब पुरुषार्थों में पहला है, और वायु का पुत्र, और देवराज का पुत्र, और अश्विनी कुमारों के दो पुत्र, इन सब देवताओं के पुत्र होकर और सदा सुख के आदी होकर, इस वन में सब सुविधाओं से वंचित कैसे जी रहे हैं? जब धर्म के पुत्र की पराजय हुई, जब उसकी पत्नी, भाई, अनुयायी और वह स्वयं निकाल दिए गए, और दुर्योधन फलने-फूलने लगा, तब पर्वतों सहित पृथ्वी धँस क्यों नहीं गई?”’

‘सात्यकि ने कहा, “हे राम, यह विलाप का समय नहीं है; जो उचित है और इस अवसर के योग्य है, वह करें, भले युधिष्ठिर एक शब्द न बोलें। जिनके हितैषी होते हैं, वे स्वयं कुछ नहीं उठाते; उनका काम दूसरे करते हैं, जैसे शैब्य आदि ने ययाति के लिए किया। हे राम, जिनके पास अपने उत्तरदायित्व पर काम करने वाले नियुक्त लोग हैं, उन्हें सच्चे संरक्षक प्राप्त हैं, और वे असहायों की तरह कठिनाई में नहीं पड़ते। जब पृथा के पुत्रों के संरक्षक ये दो पुरुष हैं, राम और कृष्ण, और दो और, प्रद्युम्न और साम्ब, और हम भी, जो संरक्षक तीनों लोकों की रक्षा कर सकते हैं, तब पृथा का पुत्र भाइयों सहित वन में क्यों रहे? उचित है कि आज ही दाशार्हों की सेना अनेक शस्त्रों और चितकबरे कवचों से सज्जित होकर निकले। धृतराष्ट्र के पुत्र वृष्णियों की सेना से दब जाएँ और अपने मित्रों सहित यमलोक जाएँ। सींग के धनुष वाले आप अकेले, यदि उभर पड़ें, तो सारी पृथ्वी को घेर सकते हैं। हम आपसे कहते हैं, धृतराष्ट्र के पुत्र को उसके सब लोगों सहित वैसे ही मारिए जैसे देवराज इन्द्र ने वृत्र को मारा। पृथा का पुत्र अर्जुन हमारा भाई है, मित्र है, गुरु है, और कृष्ण का दूसरा आत्मा-सा है। इसी के लिए मनुष्य योग्य पुत्र चाहते हैं और गुरु ऐसा शिष्य ढूँढ़ता है जो उसका विरोध न करे। इसीलिए उस उत्तम कार्य का समय आ गया है, जो सब कार्यों में श्रेष्ठ है और कठिन है। हम दुर्योधन के बाणों की बौछारों को अपने श्रेष्ठ शस्त्रों से व्यर्थ कर देंगे। रणभूमि में हम सबको दबा देंगे। क्रोध में हम सर्प, विष और अग्नि से कुछ ही कम अपने तीखे बाणों से उसका सिर काट देंगे, और तलवार की धार से रणभूमि में बलपूर्वक उसका सिर धड़ से अलग कर देंगे; फिर उसके अनुयायियों को, दुर्योधन को, और कुरु-वंश के सबको मार डालेंगे। हे रोहिणी-पुत्र, जब हम रणभूमि में शस्त्र उठाएँ और कुरुओं के श्रेष्ठ योद्धाओं को ऐसे मारते चलें जैसे प्रलय में अग्नि घास के ढेर जलाती है, तब भीम के अनुयायी प्रसन्न हृदय से हमें देखें। कृप, द्रोण, विकर्ण और कर्ण प्रद्युम्न के तीखे बाण नहीं सह सकते। हम अर्जुन के पुत्र का बल जानते हैं; वह रणभूमि में कृष्ण के पुत्र-सा आचरण करता है। साम्ब अपनी भुजाओं के बल से दुःशासन को दण्ड दे; उसे, उसके सारथि और रथ को बलपूर्वक नष्ट करे। जब जाम्बवती का पुत्र युद्ध में अजेय हो जाता है, तो उसके वेग को कुछ नहीं रोक सकता। बालक होते हुए ही उसने शम्बर दानव की सेना को भगा दिया था, और युद्ध में उस अश्वचक्र को मारा जिसकी जाँघें गोल और भुजाएँ अत्यन्त लम्बी थीं। रथ पर चढ़े उस महान् योद्धा साम्ब के रथ तक कौन बढ़ सकता है? जैसे मृत्यु के पंजे में आया मनुष्य बच नहीं सकता, वैसे रणभूमि में उसके पंजे में आया कौन जीवित लौट सकता है? वसुदेव का पुत्र अपने अग्नि-बाणों की बौछारों से सब शत्रु-सेनाओं को, और उन दो महारथियों भीष्म और द्रोण को, और सब पुत्रों सहित सोमदत्त को जला डालेगा। देवताओं सहित सारे संसार में ऐसा क्या है जिसका सामना कृष्ण बराबरी से न कर सकें, जब वे शस्त्र उठाते हैं, हाथ में उत्तम बाण लेते हैं, चक्र से सज्जित होते हैं, और युद्ध में अद्वितीय हो जाते हैं? फिर अनिरुद्ध भी ढाल और तलवार उठाए, और पृथ्वी की सतह को धृतराष्ट्र के पुत्रों से ढँक दे, सिर धड़ से अलग, शरीर चेतना-हीन, जैसे यज्ञ में वेदी कुश से ढँकी होती है। और गद, उलूक, बाहुक, भानु, नीथ, युद्ध में वीर युवा निशठ, सारण और युद्ध में दुर्धर्ष चारुदेष्ण, ये अपने कुल के योग्य पराक्रम दिखाएँ। सात्वतों और शूरों की, वृष्णियों, भोजों और अन्धकों के श्रेष्ठ योद्धाओं की संयुक्त सेना रणभूमि में धृतराष्ट्र के उन पुत्रों को मारे और संसार में अपनी कीर्ति फैलाए। तब अभिमन्यु तब तक संसार पर राज करे जब तक धर्मात्माओं में श्रेष्ठ महात्मा युधिष्ठिर अपना व्रत पूरा करने में लगे हैं, वह व्रत जो कुरु-श्रेष्ठ ने उस प्रसिद्ध द्यूत के अवसर पर स्वीकार और घोषित किया था। बाद में धर्मात्मा राजा पृथ्वी की रक्षा करेगा, उसके सब शत्रु हमारे छोड़े बाणों से युद्ध में हारे हुए। तब पृथ्वी पर धृतराष्ट्र का कोई पुत्र नहीं बचेगा, न सूत-पुत्र। यही हमारा सबसे बड़ा काम है, और इसी से यश मिलेगा।”’

‘कृष्ण ने कहा, “हे मधुवंशी, इसमें सन्देह नहीं कि आप जो कहते हैं, सत्य है; हे कभी न थकने वाले साहस वाले, हम आपके वचन स्वीकार करते हैं। पर कुरु-कुल का यह श्रेष्ठ पुरुष पृथ्वी का राज्य कभी स्वीकार न करेगा, जब तक वह अपनी भुजाओं के पराक्रम से न जीता जाए। न सुख के लिए, न भय से, न लोभ से, युधिष्ठिर कभी क्षत्रिय-धर्म के नियम छोड़ेंगे; न ये दो महारथी वीर भीम और अर्जुन, न ये दोनों जुड़वाँ, न द्रुपद की पुत्री कृष्णा। भेड़िये-सी भूख वाला भीम और धनंजय अर्जुन, दोनों संसार-भर में युद्ध में अद्वितीय हैं। और यह राजा सारे संसार पर क्यों न राज करे, जब माद्री के दो पुत्र उसके पक्ष में हैं? पांचाल का महात्मा राजा, केकय का राजा, और हम भी अपना संयुक्त बल लगाएँ, तब युधिष्ठिर के शत्रु नष्ट होंगे।” युधिष्ठिर ने कहा, “हे मधुवंशी, आप ऐसा कहें, यह विचित्र नहीं; पर हमें सत्य पहला विचार लगता है, अपनी राज-सत्ता से भी ऊपर। और केवल कृष्ण ठीक-ठीक जानते हैं कि हम क्या हैं; और केवल हम ठीक-ठीक जानते हैं कि कृष्ण क्या हैं। हे पराक्रमी, हे मधुवंशी, ज्यों ही ये देखेंगे कि पराक्रम के कर्मों का समय आ गया है, हे शिनि-वंश के वीर, त्यों ही ये सुन्दर केशों वाले कृष्ण सुयोधन को हराएँगे। दाशार्ह वंश के वीर पुरुष आज लौट जाएँ। वे हमारे संरक्षक हैं, मनुष्यों में अग्रणी, और यहाँ हमसे मिलने आए। हे अपार बल वालो, धर्म के मार्ग से कभी मत गिरिए। हम आपको फिर देखेंगे, जब आप सुख से एकत्र होंगे।” तब परस्पर अभिवादन करके, बड़ों को प्रणाम और छोटों का आलिंगन करके यदु-वंश के वे वीर और पाण्डु के पुत्र अलग हुए। यादव अपने घर लौटे और पाण्डव तीर्थों की यात्रा पर आगे बढ़े। कृष्ण से विदा लेकर धर्मात्मा राजा भाइयों, सेवकों और लोमश सहित पवित्र पयोष्णी नदी पर गया, जिसका सुन्दर घाट विदर्भ के राजा ने बनवाया था। वह पयोष्णी के तट पर रहने लगा, जिसका जल सोम-रस से मिला हुआ था। वहाँ अनेक द्विज-श्रेष्ठों ने, जो उसे देखकर प्रसन्न थे, उत्तम स्तुति-वचनों से महात्मा युधिष्ठिर का स्वागत किया।’

समझने की कुंजी (नाम): यहाँ “राम” बलराम हैं, रोहिणी के पुत्र, हलधर; दाशार्ह, सात्वत, वृष्णि, भोज और अन्धक यादव-कुल की शाखाएँ हैं जिनका नेतृत्व कृष्ण और बलराम करते हैं। प्रद्युम्न और साम्ब कृष्ण के पुत्र हैं (साम्ब जाम्बवती से), अनिरुद्ध प्रद्युम्न का पुत्र, और सात्यकि (शिनि के पौत्र, युयुधान) अर्जुन के शिष्य। बलराम के कठोर वचन धृतराष्ट्र के विरुद्ध हैं; कथा उन्हें भी बिना काटे रखती है।

सार: प्रभास पर तीन स्वर उठते हैं। बलराम धर्म पर ही प्रश्न उठा देते हैं: यदि धर्म का फल यह है, तो लोग क्या समझें? सात्यकि आज ही युद्ध चाहते हैं और पूरे यादव-कुल की सेना गिना देते हैं। कृष्ण दोनों को सच मानकर भी एक बात रखते हैं: युधिष्ठिर जीता हुआ राज्य ही लेंगे। और युधिष्ठिर अपने व्रत को हर सिंहासन से ऊपर रखकर मित्रों को विदा कर देते हैं। यह वह क्षण है जहाँ वनवास एक विवशता से एक चुनाव बन जाता है।

मूल: महाभारत (कृष्णद्वैपायन व्यास), वन पर्व, तीर्थयात्रा-पर्व, अध्याय 103-161; पाठान्तर में गीता प्रेस का क्रम रखा गया है। नामों, क्रम और मुख्य घटनाओं की जाँच के लिए किसोरी मोहन गांगुली के सम्पूर्ण अंग्रेज़ी अनुवाद का उपयोग हुआ है।

आधार: महाभारत, वेदव्यास (गीता प्रेस, गोरखपुर)