लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish

किष्किन्धाकाण्ड

तुलसीदासरामचरितमानसचतुर्थ सोपान

वह काण्ड जिसमें राम के पास कोई सेना नहीं है, सिर्फ़ एक मित्र है। और वह मित्र भी पहले अपना घर वापस माँगता है।

रामचरितमानस का चौथा सोपान सबसे छोटा है, और शायद इसीलिये सबसे कम पढ़ा जाता है। पर कथा की दृष्टि से यही वह जगह है जहाँ राम अकेले रहना छोड़ते हैं। अब तक वन में दो भाई थे। यहाँ से आगे एक सेना है। उस सेना का पहला सूत्र एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ता है जो स्वयं भागा हुआ है।

ऋष्यमूक के पास अपने असली रूप में प्रकट हनुमान प्रभु के चरणों में गिरे हैं, और राम उन्हें उठाकर हृदय से लगाते हैं। लक्ष्मण पास खड़े हैं।

यहाँ हर प्रसंग अपना पूरा पन्ना है। उसकी हिन्दी कथा गीता प्रेस के पाठ और हनुमानप्रसाद पोद्दार की टीका के सहारे लिखी गयी है।

प्रसंग-दर-प्रसंग पढ़िए

  1. राम और सुग्रीव की मैत्रीदोहा 1 से 6
    ऋष्यमूक की चोटी पर बैठा हुआ एक डरा हुआ राजा, नीचे से गुज़रते हुए दो भाई। बीच में ब्राह्मण का वेष धरकर उतरा हुआ एक दूत। और अन्त में अग्नि को साक्षी बनाकर बाँधी गयी वह मैत्री जिसका दाम एक ही बाण है।
  2. मित्र का धर्म और बालि-वधदोहा 7 से 10
    पहले राम बताते हैं कि सच्चा मित्र किसे कहते हैं। फिर वही बात धनुष पर चढ़कर किष्किन्धा के राजा के हृदय तक पहुँचती है।
  3. तारा का विलाप, राज्याभिषेक और वर्षा-ऋतुदोहा 11 से 17
    बालि के मृतक-कर्म से लेकर शरद के निर्मल आकाश तक। इस प्रसंग में राज्य किसी और को मिलता है और प्रतीक्षा राम के हिस्से आती है।
  4. लक्ष्मण का क्रोध और खोज का आरम्भदोहा 18 से 23
    बरसात बीत गई और कोई ख़बर नहीं आई। इसके बाद जो होता है उसमें एक चढ़ा हुआ धनुष है, एक काँपता हुआ नगर है। तीन लोग हैं जो बीच में आ जाते हैं। और अन्त में सबसे पीछे खड़े हुए एक सेवक के हाथ में रखी गई एक अँगूठी।
  5. स्वयंप्रभा, सम्पाति और समुद्र-तटदोहा 24 से सोरठा 30 (ख)
    पानी ढूँढ़ते ढूँढ़ते एक गुफा मिलती है, गुफा से निकलते ही समुद्र मिलता है। समुद्र के किनारे बैठी हुई मौत के सामने एक बूढ़ा गीध आकर सीता का पता बता जाता है।

यह तुलसी का राम-चरित है, वाल्मीकि का नहीं

इस स्थल पर वाल्मीकि रामायण अलग से पूरी पढ़ी जा सकती है। दोनों को एक मान लेना ठीक नहीं होगा। तुलसीदास सोलहवीं शताब्दी में अवधी में लिख रहे थे, वाल्मीकि उनसे बहुत पहले संस्कृत में। कई प्रसंग दोनों में हैं, पर उनका रंग, क्रम और कभी-कभी ब्योरा भी अलग है। जहाँ यहाँ कुछ कहा गया है, वह तुलसी का कहा हुआ है।

आधार: श्रीरामचरितमानस, चतुर्थ सोपान (किष्किन्धाकाण्ड), गीता प्रेस संस्करण, हनुमानप्रसाद पोद्दार की टीका के साथ पढ़ा गया।