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राम और सुग्रीव की मैत्री

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रामचरितमानसकिष्किन्धाकाण्डप्रसंग 1

ऋष्यमूक पर बैठा हुआ एक डरा हुआ वानर, और पास आते हुए दो भाई। बीच में ब्राह्मण का रूप धरकर गया हुआ एक दूत। और अन्त में अग्नि को साक्षी बनाकर जोड़ी गयी प्रीति, और एक ही बाण का वचन।

रामचरितमानस का चौथा सोपान कथा से पहले दो संस्कृत स्तुतियाँ और दो वन्दनाएँ रखता है, और पहली वन्दना में काशी का नाम है। फिर राम आगे चलते हैं, और ऋष्यमूक पर्वत निकट आ जाता है। वहाँ रहने वाले सुग्रीव दो अजनबियों को आते देखकर डर जाते हैं। फिर हनुमान अग्नि को साक्षी बनाकर उन्हीं अजनबियों से सुग्रीव की प्रीति जोड़ देते हैं।

सुग्रीव हनुमान को ब्रह्मचारी का रूप धरकर उन दोनों को देखने जाने को कहते हैं। हनुमान राम को पहचानकर उनके चरणों पर गिर पड़ते हैं। फिर सुग्रीव राम को वह वस्त्र देते हैं जो आकाश के मार्ग से जाती एक स्त्री ने गिराया था। फिर वे अपनी कथा कहते हैं, जिसमें दो भाई हैं, एक गुफा है, एक शिला है, और एक शाप है।

यही भेंट वाल्मीकि की रामायण में भी कही गयी है। हनुमान जिस क्षण राम को पहचानते हैं, उसी क्षण पार्वती से कहा जाता है कि वह सुख कहने में नहीं आता। जो सीता को हर ले गया, वह यहाँ एक निशाचर है। बालि एक शाप के कारण इस पहाड़ तक नहीं आता।

दो पथिक और पहाड़ के वानर

  • राम दशरथ के पुत्र, जो एक अनजान ब्राह्मण को अपना परिचय देते हैं और अन्त में एक बाण का वचन देते हैं।
  • लक्ष्मण साथ चलने वाले भाई, जो राम के साथ सुग्रीव से मिलते हैं और सुग्रीव को राम का सारा इतिहास सुनाते हैं।
  • हनुमान जिन्हें सुग्रीव वेष बदलकर उन दोनों को देखने जाने को कहते हैं, और जो अपना शरीर प्रकट करके दोनों को अपनी पीठ पर चढ़ा लेते हैं।
  • सुग्रीव बालि के भाई, जिनका सर्वस्व और स्त्री छिन चुके हैं। शाप के कारण उनका भाई इस पहाड़ पर नहीं आता।
  • बालि सुग्रीव के भाई, जिनकी कथा सुग्रीव सुनाते हैं, और जिन्हें राम एक ही बाण से मारने का वचन देते हैं।
  • मायावी मय दानव का पुत्र, जो आधी रात को नगर के फाटक पर आकर ललकारता है, और बालि से भागकर एक पर्वत की गुफा में जा घुसता है।
  • पार्वती जिनसे उस क्षण कहा जाता है कि वह सुख कहने में नहीं आता, जब हनुमान राम को पहचानते हैं।

चौथे सोपान का मंगलाचरण

पहली स्तुति दोनों भाइयों की है: एक गौर और एक श्याम, अत्यन्त बलवान, विज्ञान के धाम, श्रेष्ठ धनुर्धर, वेदों से वन्दित, धर्म के कवच और सबके हितकारी। उन्होंने माया से मनुष्य का रूप धरा है। वे सीता की खोज में लगे हैं, और रास्ते पर चल रहे हैं। स्तुति की प्रार्थना है, “रघुकुल के वे दोनों श्रेष्ठ हमें भक्ति दें।”

दूसरी स्तुति भाइयों से हटकर रामनाम पर जाती है। वह नाम वेदरूपी समुद्र के मन्थन से निकला अमृत है, कलियुग के मल को नष्ट करता है, अविनाशी है। वह शिव के मुखरूपी चन्द्रमा पर सदा शोभा पाता है, जन्म और मरण के रोग की औषध है, सबको सुख देता है और सीता का जीवन है। धन्य हैं वे पुण्यात्मा जो उसे निरन्तर पीते हैं।

जहाँ शिव और पार्वती बसते हैं, उस काशी को मुक्ति की जन्मभूमि, ज्ञान की खान और पापों का नाश करने वाली जानकर उसका सेवन क्यों न किया जाय। इसके बाद मन से कहा जाता है, “जिस भीषण हलाहल से सारे देवता जल रहे थे, उसे जिन्होंने पी लिया, हे मन्द मन, क्या आप उन्हें नहीं भजते? शिव के समान कृपालु और कौन है?”

ऋष्यमूक के पास, और ऊपर बैठा हुआ डर

राम फिर आगे चले, और ऋष्यमूक पर्वत निकट आ गया।

वहाँ मन्त्रियों सहित सुग्रीव रहते थे। उन्होंने अतुलनीय बल की सीमा उन दोनों भाइयों को आते देखा।

सुग्रीव अत्यन्त भयभीत होकर बोले, “हे हनुमान, सुनिये, ये दोनों पुरुष बल और रूप के निधान हैं। आप ब्रह्मचारी का वेष धरकर जाइये। जाकर देखिये, हृदय में उनकी असली बात जान लीजिये, और फिर मुझे इशारे से समझाकर कह दीजिये। यदि ये मन के मैले बालि के भेजे हुए हों, तो मैं तुरन्त ही इस पर्वत को छोड़कर भाग जाऊँ।”

हनुमान ब्राह्मण का रूप धरकर वहाँ गये, और मस्तक नवाकर इस प्रकार पूछने लगे।

एक ब्राह्मण के सवाल

हनुमान पूछते हैं, “हे वीर, साँवले और गोरे शरीर वाले आप कौन हैं, जो क्षत्रिय के रूप में वन में फिर रहे हैं? हे स्वामी, कठोर भूमि पर कोमल चरणों से चलने वाले आप किस कारण वन में विचर रहे हैं? आपके अंग कोमल, मनोहर और सुन्दर हैं, और आप वन की दुःसह धूप और हवा सह रहे हैं। क्या आप तीन देवताओं में से कोई हैं, या आप दोनों नर और नारायण हैं? या आप जगत् के कारण, भवसागर से पार उतारने वाले, पृथ्वी का भार नष्ट करने वाले, सब लोकों के स्वामी हैं, जिन्होंने मनुष्य रूप में अवतार लिया है?” टीका तीन देवताओं को ब्रह्मा, विष्णु और शिव कहती है।

उत्तर, और पहचान

टीका यह उत्तर राम का बताती है, “हम कोसलराज दशरथ के पुत्र हैं और पिता का वचन मानकर वन आये हैं। हमारे नाम राम और लक्ष्मण हैं, हम दोनों भाई हैं। हमारे साथ एक सुन्दर सुकुमारी स्त्री थी।”

फिर राम कहते हैं, “यहाँ एक निशाचर ने सीता को हर लिया। हे ब्राह्मण, हम उसी को खोजते फिरते हैं। हमने तो अपना चरित्र कह सुनाया। अब हे ब्राह्मण, आप अपनी कथा समझाकर कहिये।”

राम को पहचानकर हनुमान उनके चरण पकड़कर धरती पर गिर पड़े। शिव पार्वती से कहते हैं कि वह सुख वर्णन नहीं किया जा सकता।

हनुमान का शरीर पुलकित है, मुख से वचन नहीं निकलता, और वे राम के सुन्दर वेष की रचना देख रहे हैं।

फिर धीरज धरकर हनुमान ने स्तुति की। अपने स्वामी को पहचान लेने से उनका हृदय हर्ष से भरा है। फिर वे कहते हैं, “हे स्वामी, मैंने जो पूछा वह मेरा पूछना तो न्याय था, पर आप मनुष्य की तरह कैसे पूछ रहे हैं? मैं तो आपकी माया के वश भूला फिरता हूँ, इसीलिये मैंने प्रभु को नहीं पहचाना। एक तो मैं मन्द हूँ, मोह के वश में हूँ, हृदय का कुटिल हूँ और अज्ञानी हूँ। फिर हे राम, प्रभु ने मुझे भुला दिया।”

लक्ष्मण से दूने

हनुमान आगे कहते हैं, “हे नाथ, यद्यपि मुझमें बहुत से अवगुण हैं, तथापि सेवक स्वामी की विस्मृति में न पड़े। हे नाथ, जीव आपकी माया से मोहित है, और आपकी ही कृपा से निस्तार पाता है।”

फिर वे कहते हैं, “हे राम, मैं आपकी दुहाई देकर कहता हूँ कि मैं भजन और साधन कुछ नहीं जानता। सेवक स्वामी के भरोसे निश्चिन्त रहता है, और पुत्र माता के भरोसे। स्वामी को सेवक का पालन करते ही बनता है।”

ऐसा कहकर हनुमान अकुलाकर चरणों पर गिर पड़े और अपना असली शरीर प्रकट कर दिया। फिर राम ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया और अपने नेत्रों के जल से सींचकर शीतल किया।

राम कहते हैं, “हनुमान, सुनिये, मन में ग्लानि न मानिये। आप मुझे लक्ष्मण से दूने प्रिय हैं। सब कोई मुझे समदर्शी कहते हैं। मुझे सेवक प्रिय है, वह अनन्यगति होता है। हे हनुमान, अनन्य वही है जिसकी ऐसी बुद्धि नहीं टलती कि मैं सेवक हूँ, और यह चराचर जगत् स्वामी भगवान् का रूप है।”

टीका समदर्शी को यों पढ़ती है कि राम के लिये न कोई प्रिय है न अप्रिय।

अग्नि की साक्षी में

स्वामी को अनुकूल देखकर हनुमान के हृदय में हर्ष छा गया और उनके सारे दुःख जाते रहे। वे कहते हैं, “हे नाथ, इस पर्वत पर वानरों के राजा सुग्रीव रहते हैं। वे आपके दास हैं।”

फिर हनुमान कहते हैं, “हे नाथ, उनसे मित्रता कीजिये, और उन्हें दीन जानकर निर्भय कर दीजिये। वे सीता की खोज करायेंगे और जहाँ तहाँ करोड़ों वानर भेजेंगे।”

इस प्रकार सब बातें समझाकर हनुमान ने दोनों भाइयों को अपनी पीठ पर चढ़ा लिया। जब सुग्रीव ने राम को देखा तो अपने जन्म को अत्यन्त धन्य समझा, और चरणों में मस्तक नवाकर आदर सहित मिले। राम भी छोटे भाई सहित उनसे गले लगकर मिले। सुग्रीव मन में सोच रहे हैं, “हे विधाता, क्या ये मुझसे प्रीति करेंगे?”

तब हनुमान ने दोनों ओर की सारी कथा सुनाकर, अग्नि को साक्षी बनाकर, दोनों की प्रीति जोड़ दी और उसे दृढ़ कर दिया। टीका इसे यों पढ़ती है कि अग्नि की साक्षी देकर प्रतिज्ञापूर्वक उनकी मैत्री करवा दी गयी।

आकाश से गिरा हुआ वस्त्र

दोनों ने प्रीति की, और बीच में कुछ भी नहीं रखा। इसके बाद लक्ष्मण ने राम का सारा इतिहास कह सुनाया।

सुनकर सुग्रीव की आँखों में पानी भर आया और उन्होंने कहा, “हे नाथ, सीता मिल जायँगी।”

सुग्रीव बताते हैं कि एक बार वे यहीं मन्त्रियों के साथ बैठे हुए कुछ विचार कर रहे थे। तभी उन्होंने आकाश के मार्ग से किसी स्त्री को जाते देखा, पराये के वश में पड़ी हुई और बहुत विलाप करती हुई।

सुग्रीव कहते हैं, “हमें देखकर उन्होंने ‘राम, राम, हा राम’ पुकारकर वस्त्र गिरा दिया था।”

राम ने वह वस्त्र माँगा, और सुग्रीव ने तुरन्त दे दिया। वस्त्र को हृदय से लगाकर राम ने बहुत सोच किया।

सुग्रीव फिर कहते हैं, “हे राम, सुनिये, सोच छोड़ दीजिये और मन में धीरज लाइये। मैं सब प्रकार से आपकी सेवा करूँगा, जिस उपाय से सीता आकर आपसे मिलें।”

सखा के वचन सुनकर राम हर्षित हुए। उन्होंने पूछा, “सुग्रीव, मुझे बताइये, आप वन में किस कारण रहते हैं?”

दो भाई, एक गुफा और एक शिला

उत्तर में सुग्रीव कहते हैं, “हे नाथ, बालि और मैं दो भाई हैं। हम दोनों में ऐसी प्रीति थी कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।” फिर वे बताते हैं कि मय दानव का एक पुत्र था, नाम मायावी, जो एक बार उनके गाँव में आया।

उसने आधी रात को नगर के फाटक पर आकर ललकारा। बालि शत्रु की ललकार सह नहीं सका और दौड़ा, उसे देखते ही मायावी भाग खड़ा हुआ, और सुग्रीव भी भाई के साथ लगे चले गये।

मायावी एक बड़े पर्वत की गुफा में जा घुसा। तब बालि ने सुग्रीव को समझाकर कहा, “एक पखवाड़े तक मेरी बाट देखियेगा। यदि उतने दिनों में न आऊँ तो जान लीजियेगा कि मैं मारा गया।”

सुग्रीव कहते हैं, “मैं वहाँ महीने भर रहा। वहाँ रक्त की बड़ी भारी धारा निकली। उसने बालि को मार डाला, अब आकर मुझे मारेगा। इसलिये मैं वहाँ एक शिला लगाकर भाग आया।” टीका बीच के वाक्य को सुग्रीव की उस समय की समझ पढ़ती है।

सुग्रीव आगे कहते हैं, “मन्त्रियों ने नगर को बिना स्वामी का देखा, और मुझे ज़बर्दस्ती राज्य दे दिया। बालि उसे मारकर घर आ गया। मुझे देखकर उसने जी में भेद बढ़ाया।”

फिर सुग्रीव कहते हैं, “उसने मुझे शत्रु के समान बहुत भारी मारा, और मेरा सर्वस्व और मेरी स्त्री भी छीन ली। हे राम, मैं उसके भय से समस्त लोकों में बेहाल होकर फिरता रहा।”

फिर सुग्रीव कहते हैं, “यहाँ शाप के कारण वह नहीं आता, तो भी मैं मन में भयभीत रहता हूँ।”

सेवक का दुःख सुनकर राम की दोनों विशाल भुजाएँ फड़क उठीं।

एक ही बाण

राम कहते हैं, “सुग्रीव, सुनिये, मैं एक ही बाण से बालि को मार डालूँगा। ब्रह्मा और रुद्र की शरण में जाने पर भी उसके प्राण न बचेंगे।”

हनुमान, मैत्री और एक बाण

सोपान स्तुतियों, काशी और मन से कही गयी बात से खुला। फिर राम ऋष्यमूक के निकट आये, और डरे हुए सुग्रीव ने हनुमान को ब्रह्मचारी के वेष में देखने जाने को कहा। हनुमान ने राम को पहचाना और चरणों पर गिर पड़े। राम ने उन्हें उठाकर हृदय से लगाया और लक्ष्मण से दूना प्रिय कहा। हनुमान ने दोनों को पीठ पर चढ़ाया और अग्नि को साक्षी बनाकर प्रीति जोड़ दी। सुग्रीव ने आकाश से गिरा वस्त्र राम को दिया, और अपनी कथा कही। सुनकर राम की भुजाएँ फड़क उठीं, और उन्होंने एक बाण का वचन दिया।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, किष्किन्धाकाण्ड, आरम्भ के श्लोक और सोरठे, और दोहा 1 से 6, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।