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राम और सुग्रीव की मैत्री

रामचरितमानस · किष्किन्धाकाण्ड · राम और सुग्रीव की मैत्री

राम और सुग्रीव की मैत्री

ऋष्यमूक की चोटी पर बैठा हुआ एक डरा हुआ राजा, नीचे से गुज़रते हुए दो भाई, बीच में ब्राह्मण का वेष धरकर उतरा हुआ एक दूत, और अन्त में अग्नि को साक्षी बनाकर बाँधी गयी वह मैत्री जिसका दाम एक ही बाण है।

रामचरितमानस का चौथा सोपान कथा से शुरू नहीं होता। पहले संस्कृत के दो श्लोक आते हैं, फिर एक सोरठा, और उस सोरठे में काशी का नाम है। इसके बाद पहली चौपाई जो पहला काम करती है वह यह है कि एक पहाड़ का नाम ले लेती है, ऋष्यमूक, और उसी नाम के साथ यह काण्ड अपनी ज़मीन पर आ खड़ा होता है। इस पन्ने पर दोहा एक से छह तक की कथा है, और उसमें कुल जमा इतना होता है कि दो अजनबी एक पहाड़ के पास से गुज़रते हैं, ऊपर बैठा हुआ आदमी डर जाता है, और उसी दिन वही डरा हुआ आदमी उन्हीं अजनबियों का मित्र हो जाता है, आग को बीच में रखकर।

इस पन्ने पर तीन भेंटें हैं और तीनों का मिज़ाज अलग है। पहली एक जासूस और उसके लक्ष्य के बीच होती है, और बीच रास्ते में पलटकर सेवक और स्वामी की भेंट बन जाती है। दूसरी दो ऐसे लोगों के बीच होती है जिनमें से एक का सब कुछ छिन चुका है और दूसरे का बहुत कुछ, और वह भेंट एक शंका पर अटकती है जिसे एक तीसरा आदमी आग जलाकर हल करता है। और तीसरी भेंट कथा के भीतर की है, जब एक छूटा हुआ वस्त्र उस हाथ तक पहुँचता है जिसके लिये वह गिराया गया था। इसके बाद पन्ना एक पुरानी कहानी पर मुड़ जाता है, दो भाई, एक गुफा, एक शिला, और एक ऐसा डर जो सुरक्षित जगह पर बैठकर भी नहीं जाता।

यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं, और यह भेद इस पन्ने पर दो जगह साफ़ दिखता है। एक, यह पूरी कथा शंभु भवानी से कह रहे हैं, और हनुमान की पहचान के ठीक क्षण पर कहने वाला अपनी श्रोता की ओर मुड़कर कहता है कि यह सुख कहने में नहीं आता। दूसरे, यह पन्ना जितना कहता है उतना ही कहता है और उससे आगे एक शब्द नहीं। जो सीता को हर ले गया उसका नाम यहाँ नहीं है, वह केवल निसिचर है। और जिस शाप के कारण बालि इस पहाड़ तक नहीं आ पाता, वह शाप यहाँ केवल शाप है; किसका, किसने दिया, किस कारण दिया, इन चौपाइयों में नहीं लिखा।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • श्रीराम दशरथ के पुत्र, जो इस पन्ने पर अपना परिचय एक अनजान ब्राह्मण को देते हैं और अन्त में एक बाण का वचन देकर पन्ना बन्द करते हैं।
  • लक्ष्मण साथ चलने वाले भाई, जो इस प्रसंग में एक ही बड़ा काम करते हैं, और वह यह कि सुग्रीव को राम की पूरी कथा सुनाते हैं।
  • हनुमान सुग्रीव के मन्त्री, जो वेष बदलकर जाँचने भेजे जाते हैं और अपना असली शरीर खोलकर लौटते हैं। इसी पन्ने पर वे अपना पहला बड़ा काम करते हैं।
  • सुग्रीव वानरों के राजा, जिनका राज्य, धन और स्त्री छिन चुकी है, और जो एक पहाड़ पर इसलिये टिके हैं कि वहाँ तक शाप के कारण उनका भाई नहीं आ सकता।
  • बालि सुग्रीव के बड़े भाई, जो इस पन्ने पर एक बार भी सामने नहीं आते, और फिर भी हर पंक्ति पर जिनका साया पड़ा हुआ है।
  • मायावी मय दानव का पुत्र, जिसकी आधी रात की एक ललकार से दो भाइयों का वह प्रेम टूटा जिसे सुग्रीव अवर्णनीय कहते हैं।
  • उमा वह श्रोता जिनसे शंकर यह सारी कथा कह रहे हैं, और जिनका नाम ठीक उसी क्षण पर आता है जब हनुमान प्रभु को पहचानते हैं।

चौथे सोपान का मंगलाचरण

मानस का हर सोपान अपने द्वार पर संस्कृत रखता है। कथा जिस भाषा में कही जायगी वह अवधी है, पर दहलीज़ संस्कृत की है, और उस दहलीज़ पर जो कहा जाता है वह प्रायः आगे की पूरी कथा का सार होता है। चौथे सोपान के दो श्लोक इस नियम को बहुत साफ़ निभाते हैं। पहला श्लोक दोनों भाइयों का है, उसमें विशेषणों की एक लम्बी लड़ी है, और उस लड़ी के अन्त में जो दो बातें रखी गयी हैं, ठीक वे ही इस काण्ड का काम हैं।

कुन्देन्दीवरसुन्दरावतिबलौ विज्ञानधामावुभौ शोभाढ्यौ वरधन्विनौ श्रुतिनुतौ गोविप्रवृन्दप्रियौ। मायामानुषरूपिणौ रघुवरौ सद्धर्मवर्मौ हितौ सीतान्वेषणतत्परौ पथिगतौ भक्तिप्रदौ तौ हि नः॥ १॥
ब्रह्माम्भोधिसमुद्भवं कलिमलप्रध्वंसनं चाव्ययं श्रीमच्छम्भुमुखेन्दुसुन्दरवरे संशोभितं सर्वदा। संसारामयभेषजं सुखकरं श्रीजानकीजीवनं धन्यास्ते कृतिनः पिबन्ति सततं श्रीरामनामामृतम्॥ २॥

मंगलाचरण, श्लोक १ और २

पहला श्लोक कहता है: कुन्द के फूल और नीले कमल के समान सुन्दर, एक गौर और एक श्याम, अत्यन्त बलवान, विज्ञान के धाम, शोभा से भरे हुए, श्रेष्ठ धनुर्धर, वेदों के वन्दित, गौ और ब्राह्मणों के समूह के प्रिय, माया से मनुष्य का रूप धारण किये हुए, श्रेष्ठ धर्म के लिये कवच के समान, सबके हितकारी। यहाँ तक स्तुति है। और इसके बाद दो बातें आती हैं जो स्तुति नहीं, ख़बर हैं: सीता की खोज में लगे हुए, और रास्ते पर चलते हुए। रघुकुल के वे दोनों श्रेष्ठ हमें भक्ति दें।

इन दो बातों पर ठहरना चाहिये। मंगलाचरण में प्रायः वही रूप बाँधा जाता है जो सबसे ऊँचा हो, सभा के बीच बैठा हुआ, धनुष उठाये हुए, सिंहासन पर। यहाँ जो रूप बाँधा गया है वह पैदल चल रहा है और किसी को ढूँढ़ रहा है। जिस काण्ड में असल में एक ही काम होना है, खोज, उसके द्वार पर खोजने वाले का ही चित्र टाँग दिया गया है। और उस चित्र के नीचे जो माँगा गया है वह सिद्धि नहीं है, भक्ति है।

दूसरा श्लोक भाइयों से हटकर एक नाम पर चला जाता है। वेदरूपी समुद्र के मन्थन से जो निकला, जो कलियुग के मल को सर्वथा नष्ट कर देता है, जो अविनाशी है, जो शंकर के सुन्दर मुखरूपी चन्द्रमा पर सदा शोभा पाता है, जो जन्म और मरण रूपी रोग की औषध है, जो सबको सुख देता है और जो जानकी का जीवन है, वे पुण्यात्मा धन्य हैं जो उस रामनाम रूपी अमृत को निरन्तर पीते रहते हैं। इस श्लोक को याद रखिये। इसी पन्ने पर आगे एक स्त्री आकाश के रास्ते जाते हुए यही नाम पुकारेगी, और वही पुकार इस काण्ड की पहली सच्ची ख़बर बनकर नीचे गिरेगी।

श्लोकों के बाद सोरठा आता है, और वह इस काण्ड की सारी हलचल से मुँह मोड़कर एक नगर पर आ ठहरता है।

मुक्ति जन्म महि जानि ग्यान खानि अघ हानि कर।
जहँ बस संभु भवानि सो कासी सेइअ कस न॥

सोरठा

जहाँ शंभु और भवानी बसते हैं, उस काशी को मुक्ति की जन्मभूमि, ज्ञान की खान और पापों का नाश करने वाली जानकर उसका सेवन क्यों न किया जाय। इसी के साथ एक दूसरा सोरठा भी चलता है जो पूरी तरह शंकर की ओर मुड़ जाता है: जिस भीषण हलाहल से सारे देवता जल रहे थे उसे जिन्होंने स्वयं पी लिया, उनके समान कृपालु और कौन है, फिर हे मन्द मन, उन्हें भजता क्यों नहीं।

एक प्रश्न यहाँ स्वाभाविक है। जिस काण्ड में वानर हैं, एक पहाड़ है और दक्षिण का जंगल है, उसके द्वार पर काशी कहाँ से आ गयी। उत्तर उसी नाम में है जो सोरठे के अन्तिम चरण में आता है, शंभु और भवानी। यह पूरी कथा शंभु भवानी से कह रहे हैं, यानी सोपान के आरम्भ में जिनका घर याद किया गया है वे ही इस कथा के कहने वाले और सुनने वाले हैं।

चौथा सोपान दो संस्कृत श्लोकों से खुलता है। पहले में दोनों भाइयों का रूप बाँधकर अन्त में यह कहा गया है कि वे सीता की खोज में लगे हुए और रास्ते पर चलते हुए हैं। दूसरे में रामनाम को वेदरूपी समुद्र से निकला हुआ अमृत, कलिमल का नाश करने वाला और जानकी का जीवन कहा गया है। इसके बाद सोरठा काशी को मुक्ति की जन्मभूमि और ज्ञान की खान कहकर वहाँ बसने वाले शंभु और भवानी का नाम लेता है, और वे ही इस कथा के कहने वाले और सुनने वाले हैं।

ऋष्यमूक के पास, और ऊपर बैठा हुआ डर

अब कथा चलती है, और उसका पहला शब्द ही बता देता है कि यह कहीं से आगे बढ़ रही है, कहीं से शुरू नहीं हो रही।

आगें चले बहुरि रघुराया। रिष्यमूक पर्बत निअराया॥
तहँ रह सचिव सहित सुग्रीवा। आवत देखि अतुल बल सींवा॥

चौपाई १

श्रीरघुनाथजी फिर आगे चले, और ऋष्यमूक पर्वत निकट आ गया। एक ही अर्धाली में यात्रा भी है और मंज़िल भी। ध्यान दीजिये कि यहाँ पहाड़ का नाम ले लिया गया है। अब तक जंगल था, बिना नाम का, जिसमें दो भाई किसी को खोजते हुए चले जा रहे थे। नाम आते ही जगह बन जाती है, और जगह बनते ही कथा के पास एक पता हो जाता है। इसके बाद इस काण्ड की लगभग हर घटना इसी पते के आसपास घूमती है, और जिन्होंने यह पंक्ति नहीं पढ़ी उनके लिये यह पहाड़ बेनाम रह जाता है। तुलसीदास ने उसे बेनाम नहीं छोड़ा। उन्होंने काण्ड की पहली ही अर्धाली में उसे रिष्यमूक कहकर पुकारा है।

दूसरी अर्धाली ऊपर की ओर देखती है। वहाँ मन्त्रियों सहित सुग्रीव रहते थे। और जो शब्द उन दोनों भाइयों के लिये चुने गये हैं वे किसी तटस्थ की भाषा नहीं हैं: अतुल बल सींवा, यानी अतुलनीय बल की सीमा। जो ऊपर से देख रहा है वह पहली ही नज़र में नाप ले चुका है कि नीचे जो चले आ रहे हैं उनके बल की कोई तुलना नहीं है। और ठीक इसी नाप से डर पैदा होता है। जिसका सब कुछ छिन चुका हो, उसके लिये बल की हर नयी ख़बर एक नया ख़तरा होती है, चाहे वह बल किसी ओर भी हो।

अति सभीत कह सुनु हनुमाना । पुरुष जुगल बल रूप निधाना॥
धरि बटु रूप देखु तैं जाई । कहेसु जानि जियँ सयन बुझाई॥

चौपाई २

सुग्रीव अत्यन्त भयभीत होकर बोले। तुलसीदास ने उनके डर को छिपाया नहीं, पहले ही शब्द में रख दिया, अति सभीत। पर देखिये कि डरा हुआ आदमी भी क्या कह रहा है: ये दोनों पुरुष बल और रूप के निधान हैं। भय में भी उनकी आँख ठीक देख रही है, और जो देखा है उसे कम करके नहीं कहा जा रहा। फिर वे हनुमान को भेजते हैं और भेजने की पूरी विधि बता देते हैं। बटु रूप धरकर, यानी ब्रह्मचारी का वेष लेकर जाइये, देखिये, हृदय में उनकी असली बात जान लीजिये, और फिर मुझे इशारे से समझाकर कह दीजिये।

इस आख़िरी शर्त पर एक क्षण रुकिये। ख़बर बोलकर नहीं आनी है, इशारे से आनी है। यानी जो लौटेगा वह ऐसी जगह पर खड़ा होगा जहाँ बोलना ख़तरनाक हो सकता है। जिसे रोज़ यह हिसाब लगाना पड़ता हो कि कौन किसका भेजा हुआ है, वह मिलने से पहले संकेत की भाषा तय करता है।

और फिर वह वाक्य आता है जिसमें सुग्रीव की पूरी हालत खुल जाती है। यदि ये मन के मैले बालि के भेजे हुए हों, तो मैं तुरन्त ही इस पर्वत को छोड़कर भाग जाऊँ। योजना यही है। लड़ने की नहीं, भागने की। जिस आदमी के पास मन्त्री हैं, पहाड़ है और नाम के आगे राजा लगता है, उसकी सबसे तैयार योजना यह है कि सामान बाँधे बिना निकल लेना है। इसके तुरन्त बाद हनुमान ब्राह्मण का रूप धरकर वहाँ गये, और मस्तक नवाकर पूछने लगे।

दोनों भाई चलते हुए ऋष्यमूक के निकट आते हैं, जहाँ मन्त्रियों सहित सुग्रीव रहते हैं। उन्हें अतुलनीय बल की सीमा जानकर सुग्रीव अत्यन्त भयभीत हो जाते हैं और हनुमान को ब्रह्मचारी का वेष धरकर जाँचने भेजते हैं, इस हिदायत के साथ कि ख़बर इशारे से देनी है। उनका डर यह है कि कहीं ये बालि के भेजे हुए न हों, और उनकी योजना यह है कि ऐसा हुआ तो पहाड़ छोड़कर तुरन्त भाग जायँ। हनुमान ब्राह्मण का रूप धरकर जाते हैं और सिर नवाकर पूछते हैं।

एक ब्राह्मण के चार सवाल

जो पूछा गया वह सुनने में साधारण है और है नहीं। सवाल चार हैं, और वे चारों मिलकर एक सीढ़ी बना देते हैं जिसका हर डंडा पिछले से ऊपर है।

को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा । छत्री रूप फिरहु बन बीरा॥
कठिन भूमि कोमल पद गामी। कवन हेतु बिचरहु बन स्वामी॥

चौपाई ३

पहला सवाल रंग का है। हे वीर, साँवले और गोरे शरीर वाले आप कौन हैं। दूसरा वेष का है, जो क्षत्रिय के रूप में वन में फिर रहे हैं। यहाँ तक यह ठीक वही जाँच है जिसके लिये भेजा गया था, दो अजनबी, हथियारबन्द, जंगल में। और तीसरे सवाल पर आवाज़ बदल जाती है। कठोर भूमि पर कोमल चरणों से चलने वाले आप किस कारण वन में विचर रहे हैं। यह जासूस का प्रश्न नहीं है। यह उस आदमी का प्रश्न है जिसने सामने वाले के पैर देख लिये हैं और जिसे वह देखना अखर रहा है।

चौथा सवाल और आगे बढ़ जाता है। मन को हरने वाले आपके सुन्दर कोमल अंग हैं, और आप वन की दुःसह धूप और हवा सह रहे हैं। क्या आप ब्रह्मा, विष्णु और महेश, इन तीन देवताओं में से कोई हैं, या आप दोनों नर और नारायण हैं। जाँच के लिये भेजा गया आदमी अब देवताओं के नाम गिन रहा है। सीढ़ी का हर डंडा ऊपर की ओर है और पूछने वाला उस पर चढ़ता चला जा रहा है, बिना यह जाने कि वह किस छत पर पहुँचने वाला है।

जग कारन तारन भव भंजन धरनी भार।
की तुम्ह अखिल भुवन पति लीन्ह मनुज अवतार॥ १॥

दोहा १

दोहे में सीढ़ी अपने ऊपरी सिरे पर पहुँच जाती है। अथवा आप जगत् के मूल कारण और सम्पूर्ण लोकों के स्वामी स्वयं भगवान हैं, जिन्होंने लोगों को भवसागर से पार उतारने और पृथ्वी का भार नष्ट करने के लिये मनुष्य रूप में अवतार लिया है। जो पूछ रहा है वह अपना उत्तर स्वयं देता जा रहा है और उसे पता नहीं कि वह दे रहा है। यही इस प्रसंग की सबसे मीठी बात है। पहचान वेष के भीतर से पहले ही झाँक रही है, बस उसे कहने वाला शब्द अभी मुँह तक नहीं आया।

ब्राह्मण के वेष में हनुमान चार सवाल करते हैं और वे सवाल एक सीढ़ी की तरह ऊपर चढ़ते जाते हैं: साँवले और गोरे शरीर वाले आप कौन हैं, क्षत्रिय के वेष में वन में क्यों फिर रहे हैं, कोमल चरणों से कठोर भूमि पर क्यों चल रहे हैं, क्या आप तीन देवताओं में से कोई हैं या नर और नारायण हैं, अथवा सम्पूर्ण लोकों के स्वामी ही भवसागर से तारने और पृथ्वी का भार उतारने के लिये मनुष्य रूप में अवतार लेकर आये हैं।

उत्तर, और पहचान

उत्तर में जो आता है वह इस पूरी सीढ़ी को एक ही झटके में ज़मीन पर उतार देता है, और बहुत सादगी से उतारता है।

कोसलेस दसरथ के जाए । हम पितु बचन मानि बन आए॥
नाम राम लछिमन दोउ भाई । संग नारि सुकुमारि सुहाई॥

चौपाई ४

हम कोसलराज दशरथ के पुत्र हैं और पिता का वचन मानकर वन आये हैं। हमारे नाम राम और लक्ष्मण हैं, हम दोनों भाई हैं। हमारे साथ एक सुन्दर सुकुमारी स्त्री थी। जिनसे अभी अभी पूछा गया था कि क्या आप सम्पूर्ण लोकों के स्वामी हैं, वे अपना परिचय एक पिता, एक वचन और एक वनवास से दे रहे हैं। और वाक्य के अन्त में जो क्रिया आयी है वह सबसे भारी है। थी। साथ थी। अब नहीं है।

अगली अर्धाली में यह बात पूरी हो जाती है। यहाँ राक्षस ने वैदेही को हर लिया, हे ब्राह्मण, हम उसे ही खोजते फिरते हैं। ध्यान दीजिये कि हरने वाले का नाम यहाँ नहीं लिया गया। इन पंक्तियों में वह केवल निसिचर है, और उतना ही कहा गया है जितना उस घड़ी कहने वाले के मुँह से निकल सकता था। इसके बाद वे एक शिष्टाचार निभाते हैं जो इस पूरे प्रसंग को पलट देगा: हमने तो अपना चरित्र कह सुनाया, अब हे ब्राह्मण, अपनी कथा समझाकर कहिये।

प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना। सो सुख उमा जाइ नहिं बरना॥
पुलकित तन मुख आव न बचना । देखत रुचिर बेष कै रचना॥

चौपाई ५

प्रभु को पहचानकर वे चरण पकड़कर गिर पड़े। और ठीक यहाँ, इसी एक क्षण पर, कहने वाला कथा से बाहर निकलकर अपनी श्रोता की ओर मुड़ जाता है: हे उमा, वह सुख वर्णन नहीं किया जा सकता। पूरे पन्ने पर यही एक जगह है जहाँ शंभु अपना वर्णन रोककर भवानी से सीधी बात करते हैं, और वे यह कहने के लिये रोकते हैं कि जो हुआ वह कहने में नहीं आता। जिस काण्ड का मंगलाचरण काशी के नाम से शुरू हुआ था, उसकी पहली बड़ी घटना पर काशी के स्वामी चुप हो जाते हैं।

आगे की अर्धाली उस चुप्पी को थोड़ा खोलती है। शरीर पुलकित है, मुख से वचन नहीं निकलता, और वे प्रभु के सुन्दर वेष की रचना देख रहे हैं। यह आख़िरी बात बहुत सुन्दर है। जो आदमी स्वयं वेष बदलकर आया था, वह अब सामने वाले के वेष को देख रहा है, और उसे वेष नहीं, रचना कह रहा है। दोनों ओर भेस है। अन्तर इतना है कि एक भेस जाँचने के लिये बनाया गया था और दूसरा संसार को तारने के लिये।

पुनि धीरजु धरि अस्तुति कीन्ही । हरष हृदयँ निज नाथहि चीन्ही॥
मोर न्याउ मैं पूछा साईं । तुम्ह पूछहु कस नर की नाईं॥

चौपाई ६

फिर धीरज धरकर उन्होंने स्तुति की। अपने नाथ को पहचान लेने से हृदय में हर्ष भरा हुआ है। और इसके बाद वह उलाहना आता है जिसे सुनने वाले सदियों से दोहराते आये हैं। हे स्वामी, मैंने जो पूछा वह मेरा पूछना तो न्याय था। पर आप मनुष्य की तरह कैसे पूछ रहे हैं। यह प्रश्न सेवक ही पूछ सकता है, और वही पूछ सकता है जिसने अभी अभी चरण पकड़े हों। इसमें शिकायत है, और शिकायत के भीतर एक दावा है: मुझसे भूल हो सकती है, आपसे नहीं।

पर वे इस दावे को टिकने नहीं देते। अगली ही साँस में सारा दोष अपने ऊपर ले लेते हैं। मैं तो आपकी माया के वश भूला हुआ फिरता हूँ, इसीलिये मैंने अपने स्वामी को नहीं पहचाना। प्रश्न पूछकर वे स्वयं ही उसका उत्तर दे देते हैं, और उत्तर पूरी तरह अपने विरुद्ध जाता है। जिसने अभी अभी उलाहना दिया था, वही अब अपने ही उलाहने का बचाव तोड़ रहा है।

एकु मैं मंद मोहबस कुटिल हृदय अग्यान।
पुनि प्रभु मोहि बिसारेउ दीनबंधु भगवान॥ २॥

दोहा २

दोहे में वे अपनी सूची गिनाते हैं और उसमें चार चीज़ें हैं। एक तो मैं यों ही मन्द हूँ। दूसरे मोह के वश में हूँ। तीसरे हृदय का कुटिल हूँ। चौथे अज्ञान हूँ। यहाँ तक सब अपने ऊपर है। और फिर आख़िरी अर्धाली में तराज़ू का दूसरा पलड़ा रख दिया जाता है: फिर हे दीनबन्धु भगवान, आपने भी तो मुझे भुला दिया। यह उलाहना है, पर इसमें कहीं कोई कड़वाहट नहीं है। यह उस आदमी की भाषा है जो जानता है कि उलाहना देने का हक़ उसी को मिलता है जिसके पास कोई दूसरा ठिकाना नहीं।

राम अपना परिचय देते हैं, कोसलराज दशरथ के पुत्र, पिता का वचन मानकर वन आये हुए, राम और लक्ष्मण नाम के दो भाई, जिनके साथ एक सुकुमारी स्त्री थी और जिन्हें यहाँ एक निसिचर हर ले गया। ब्राह्मण से उसकी कथा पूछते ही हनुमान प्रभु को पहचानकर चरणों में गिर पड़ते हैं। शरीर पुलकित है और मुख से वचन नहीं निकलता। फिर धीरज धरकर स्तुति करते हैं और उलाहना देते हैं कि मेरा पूछना तो न्याय था, आप मनुष्य की तरह क्यों पूछते हैं। इसके बाद सारा दोष अपनी मन्दता, मोह, कुटिलता और अज्ञान पर रखकर कहते हैं कि दीनबन्धु ने भी उन्हें भुला दिया।

लक्ष्मण से दूने

उलाहने के बाद जो प्रार्थना आती है वह बहुत नपी हुई है। हे नाथ, यद्यपि मुझमें बहुत से अवगुण हैं, तथापि सेवक स्वामी की विस्मृति में न पड़े। यानी अवगुण गिनाने से कोई इनकार नहीं है, केवल एक निवेदन है कि अवगुणों के कारण भुला न दिया जाय। और इसके साथ ही वे अपनी बात को अपने से बड़ा कर देते हैं: हे नाथ, जीव आपकी माया से मोहित है, और वह आपकी ही कृपा से निस्तार पाता है। बात अब एक वानर की नहीं रही, हर जीव की हो गयी।

फिर वे वह कहते हैं जिसे प्रायः विनय समझ लिया जाता है और जो असल में अधिकार का दावा है। हे रघुवीर, मैं आपकी दुहाई देकर कहता हूँ कि मैं भजन और साधन कुछ नहीं जानता। इसके बाद वे दो उदाहरण रखते हैं जिनमें कोई साधना नहीं है, केवल सम्बन्ध है। सेवक स्वामी के भरोसे निश्चिन्त रहता है और पुत्र माता के भरोसे। और फिर वह अर्धाली, जिसमें सारा भार पलटकर दूसरी ओर चला जाता है: प्रभु को सेवक का पालन करते ही बनता है। यानी यह मेरा काम नहीं है, आपका काम है।

ऐसा कहकर वे अकुलाकर चरणों पर गिर पड़े और अपना असली शरीर प्रकट कर दिया। भेस यहाँ उतरता है, और ध्यान दीजिये कि किसी ने उसे उतारने को नहीं कहा था। जिस काम के लिये वह पहना गया था वह काम अधूरा छूट गया, और जो लौटकर बताया जाना था वह अब बताने लायक़ रहा ही नहीं। फिर रघुनाथ ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया और अपने नेत्रों के जल से सींचकर शीतल किया। यह आख़िरी क्रिया इस पन्ने की सबसे कोमल चीज़ है। जो अकुलाकर गिरा था, उसे ठंडा करने के लिये जो पानी आया वह किसी नदी का नहीं था।

सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना । तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना॥
समदरसी मोहि कह सब कोऊ। सेवक प्रिय अनन्यगति सोऊ॥

चौपाई ७

हे कपि, सुनिये, मन में ग्लानि न मानिये। और फिर वह वाक्य, जिसके आगे इस सम्बन्ध के बारे में कुछ कहने को बचता नहीं: आप मुझे लक्ष्मण से भी दूने प्रिय हैं। जिस भाई ने राज्य छोड़कर वन का रास्ता लिया, जो इसी क्षण दो क़दम की दूरी पर खड़ा है, उसी से दूने। यह नाप किसी तराज़ू पर नहीं टिकती, और तुलसीदास उसे टिकाने की कोशिश भी नहीं करते। वे बस उसे कह देते हैं और आगे बढ़ जाते हैं।

अगली अर्धाली उलटी दिशा से आती है और तराज़ू को ही हटा देती है। सब कोई मुझे समदर्शी कहते हैं, यानी मेरे लिये न कोई प्रिय है न अप्रिय। तो फिर दूना प्रिय कैसे। उत्तर उसी पंक्ति में रखा हुआ है: सेवक प्रिय है, क्योंकि वह अनन्यगति है। प्रीति का कारण प्रीति करने वाले में नहीं रखा गया, उसमें रखा गया है जिसके पास कोई दूसरा रास्ता ही नहीं।

सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत।
मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत॥ ३॥

दोहा ३

और फिर अनन्य की परिभाषा, जो दोहे के दो चरणों में पूरी हो जाती है। हे हनुमान, अनन्य वही है जिसकी ऐसी बुद्धि कभी नहीं टलती कि मैं सेवक हूँ और यह सारा चराचर जगत् मेरे स्वामी भगवान का रूप है। ध्यान दीजिये कि इस परिभाषा में भाव नहीं माँगा गया, बुद्धि माँगी गयी है, और वह भी ऐसी जो टले नहीं। भाव आता जाता रहता है, बुद्धि टिकती है। और दूसरा आधा उससे भी बड़ा है। सेवा एक व्यक्ति की नहीं रह जाती, पूरे जगत् की बन जाती है, क्योंकि जगत् उन्हीं का रूप है। इस पहाड़ पर जो मिला है वह एक स्वामी नहीं है, एक दृष्टि है।

हनुमान कहते हैं कि सेवक स्वामी की विस्मृति में न पड़े, जीव माया से मोहित है और कृपा से ही निस्तार पाता है, और वे स्वयं भजन-साधन कुछ नहीं जानते; जैसे पुत्र माता के भरोसे रहता है वैसे ही वे स्वामी के भरोसे हैं। अपना असली शरीर प्रकट करने पर राम उन्हें उठाकर हृदय से लगाते हैं और अपने नेत्रों के जल से शीतल करते हैं, फिर कहते हैं कि वे लक्ष्मण से दूने प्रिय हैं, क्योंकि सेवक अनन्यगति होता है। दोहे में अनन्य की परिभाषा दी जाती है, वह जिसकी बुद्धि इस बात से न टले कि मैं सेवक हूँ और यह सारा चराचर जगत् स्वामी का रूप है।

अग्नि की साक्षी में

स्वामी को अनुकूल देखकर पवनकुमार के हृदय में हर्ष छा गया और उनके सारे दुःख जाते रहे। और तुरन्त ही वे वह काम करते हैं जिसके लिये भेजे गये थे, पर पूरी उलटी दिशा में। हे नाथ, इस पर्वत पर वानरों के राजा रहते हैं, वे सुग्रीव हैं, और वे आपके दास हैं। जिस आदमी ने उन्हें जाँचने भेजा था, उसे उन्होंने बिना पूछे दास घोषित कर दिया है। जो नीचे भेजा गया था कि पता लगाकर आना कि ये अपने हैं या पराये, वह ऊपर यह ख़बर लेकर लौटा कि हम इनके हैं।

फिर वे सलाह देते हैं, और सलाह का क्रम देखने लायक़ है। हे नाथ, उनसे मित्रता कीजिये, और उन्हें दीन जानकर निर्भय कर दीजिये। पहला कारण दया का है। दूसरा कारण इसके बाद आता है: वे सीताजी की खोज करावेंगे और जहाँ तहाँ करोड़ों वानरों को भेजेंगे। काम की बात दूसरे नम्बर पर है, पहले नम्बर पर एक डरे हुए आदमी को निर्भय करना है। जो सेवक अपने स्वामी से अपने राजा की सिफ़ारिश कर रहा है, वह भी पहले उसकी दीनता गिनाता है और उसकी उपयोगिता बाद में।

इस प्रकार सब बातें समझाकर उन्होंने दोनों जनों को अपनी पीठ पर चढ़ा लिया। पहाड़ चढ़ना अब किसी का काम नहीं रहा। ऊपर पहुँचकर जब सुग्रीव ने राम को देखा तो अपने जन्म को अत्यन्त धन्य समझा, और चरणों में मस्तक नवाकर आदर सहित मिले। रघुनाथ भी छोटे भाई सहित उनसे गले लगकर मिले। और फिर वह पंक्ति आती है जो सुग्रीव को पूरा खोल देती है: मन में वे सोच रहे हैं कि हे विधाता, क्या ये मुझसे प्रीति करेंगे।

यह सवाल पूछने वाला वही आदमी है जिसे उसके अपने भाई ने शत्रु के समान मारा है और जिसका सब कुछ छिन चुका है। गले मिलने के बाद भी उसे भरोसा नहीं हो रहा। जिसे अपनों ने तोड़ा हो, वह अजनबियों की भलाई को पहली बार में सच नहीं मान पाता, और इसमें उसका कोई दोष भी नहीं। और यहीं, ठीक इसी संशय पर, हनुमान वह काम करते हैं जो इस पन्ने का केन्द्र है।

तब हनुमंत उभय दिसि की सब कथा सुनाइ।
पावक साखी देइ करि जोरी प्रीति दृढ़ाइ॥ ४॥

दोहा ४

तब हनुमान ने दोनों ओर की सारी कथा सुनाकर, पावक साखी देकर, यानी अग्नि को साक्षी बनाकर, प्रीति जोड़ दी और उसे दृढ़ कर दिया। तीन बातें इस दोहे में हैं। पहली, दोनों ओर की कथा सुनायी गयी, यानी किसी को दूसरे के बारे में अधूरा नहीं छोड़ा गया, और शंका के लिये जगह ही नहीं बची। दूसरी, बीच में आग रखी गयी। संसार में जो वचन आग के सामने दिया जाता है उसे लौटाया नहीं जा सकता, और यहाँ मैत्री को उसी दर्जे पर उठा दिया गया है जिस दर्जे पर विवाह होता है। और तीसरी, यह सब न किसी राजा ने कराया, न किसी पुरोहित ने। एक सेवक ने कराया, और उसी ने दोनों पक्षों की कथा भी कही।

हनुमान राम से कहते हैं कि इस पर्वत पर रहने वाले वानरराज सुग्रीव उनके दास हैं, उनसे मित्रता कीजिये और दीन जानकर निर्भय कीजिये, वे सीता की खोज करावेंगे और करोड़ों वानर भेजेंगे। फिर वे दोनों भाइयों को पीठ पर चढ़ाकर ऊपर ले जाते हैं। सुग्रीव अपना जन्म धन्य मानकर आदर से मिलते हैं, पर मन में सोचते रहते हैं कि क्या ये मुझसे प्रीति करेंगे। तब हनुमान दोनों ओर की सारी कथा सुनाकर अग्नि को साक्षी देकर उनकी प्रीति दृढ़ करा देते हैं।

आकाश से गिरा हुआ वस्त्र

आग की साक्षी के तुरन्त बाद जो पंक्ति आती है वह मैत्री की सबसे छोटी और सबसे बड़ी नाप है: दोनों ने प्रीति की, और बीच में कुछ भी नहीं रखा। कोई अन्तर नहीं, कोई हिसाब नहीं। इसके बाद लक्ष्मण ने राम का सारा इतिहास कह सुनाया। यह भी देखने लायक़ है कि यह कथा राम स्वयं नहीं कहते। जिनका दुःख है वे चुप हैं, और उनका छोटा भाई बोल रहा है।

सुनकर सुग्रीव की आँखों में पानी भर आया और उन्होंने कहा, हे नाथ, मिथिलेशकुमारी मिल जायँगी। यह वाक्य अभी किसी प्रमाण पर खड़ा नहीं है, यह अभी केवल एक मित्र का दिया हुआ ढाढ़स है। पर अगली ही साँस में सुग्रीव के पास से वह चीज़ निकल आती है जो प्रमाण है, और यही इस पूरे पन्ने का सबसे सुन्दर संयोग है। जिसे खोजा जा रहा था, उसकी पहली सच्ची ख़बर ठीक उसी आदमी के पास पड़ी थी जिससे आज आग के सामने मैत्री हुई है।

वे बताते हैं कि एक बार वे यहीं मन्त्रियों के साथ बैठे हुए कुछ विचार कर रहे थे। तभी उन्होंने आकाश के मार्ग से किसी को जाते देखा, पराये के वश में पड़ी हुई और बहुत विलाप करती हुई। उन्हें उस समय यह नहीं मालूम था कि वे कौन हैं या उन्हें कहाँ ले जाया जा रहा है।

राम राम हा राम पुकारी । हमहि देखि दीन्हेउ पट डारी॥
मागा राम तुरत तेहिं दीन्हा। पट उर लाइ सोच अति कीन्हा॥

चौपाई ८

हमें देखकर उन्होंने राम राम हा राम पुकारकर वस्त्र गिरा दिया। यहाँ ठहरिये। जिस स्त्री को आकाश के रास्ते ले जाया जा रहा है, उसके पास बचाव का कोई साधन नहीं है। नीचे एक पहाड़ पर कुछ वानर बैठे दिखे, और उन्होंने दो काम किये। एक नाम पुकारा, और एक कपड़ा गिरा दिया। नाम इसलिये कि वही उनका सहारा था, और कपड़ा इसलिये कि वही उनका इकलौता सन्देश हो सकता था। उन्हें यह भी नहीं पता था कि नीचे बैठे हुए ये लोग कौन हैं। उन्होंने बस इतना मान लिया कि जो देख रहा है, वह किसी दिन किसी को बता देगा।

और ठीक वही हुआ। राम ने वह वस्त्र माँगा, और सुग्रीव ने तुरन्त दे दिया। तुरन्त, यही शब्द पड़ा हुआ है। न कोई शर्त, न कोई मोल, न यह कि पहले मेरा काम हो जाय फिर देखा जायगा। वस्त्र को हृदय से लगाकर राम ने बहुत सोच किया। इस पूरे पन्ने पर उनका अपना दुःख सिर्फ़ यहाँ दिखता है, और वह भी एक ही क्रिया में। जो साथ थीं, उनका छूटा हुआ कपड़ा अब उनके सीने से लगा हुआ है, और उस कपड़े ने यहाँ तक का रास्ता अकेले तय किया है।

और अब उस दूसरे श्लोक को याद कीजिये जो इसी पन्ने के आरम्भ में था, जिसमें रामनाम को वेदरूपी समुद्र से निकला हुआ अमृत कहा गया था और जानकी का जीवन कहा गया था। आकाश से गिरते हुए जो पुकार निकली थी वह वही नाम था। मंगलाचरण में जिसे जानकी का जीवन कहा गया, कथा में वही जानकी के मुँह से निकला और इसी पहाड़ पर आकर गिरा। श्लोक और चौपाई के बीच इतनी ही दूरी है।

सुग्रीव फिर कहते हैं, हे रघुवीर सुनिये, सोच छोड़ दीजिये और मन में धीरज लाइये। मैं सब प्रकार से आपकी सेवा करूँगा, जिस उपाय से जानकी आकर आपसे मिलें। यह वचन उसी आदमी का है जिसका अपना सब कुछ छिना हुआ है और जो कुछ ही देर पहले भागने की योजना बना रहा था। उसके पास देने को कोई सेना नहीं है, कोई ख़ज़ाना नहीं है, इसलिये वह वही देता है जो उसके पास है: सब प्रकार।

सखा बचन सुनि हरषे कृपासिंधु बलसींव।
कारन कवन बसहु बन मोहि कहहु सुग्रीव॥ ५॥

दोहा ५

सखा के वचन सुनकर कृपा के समुद्र और बल की सीमा हर्षित हुए। और फिर उन्होंने वह पूछा जो इस पन्ने का दूसरा आधा खोल देता है: हे सुग्रीव, मुझे बताइये, आप वन में किस कारण रहते हैं। इस प्रश्न में जो शब्द सबसे भारी है वह सखा है, और वह प्रश्न से पहले आ चुका है। यानी कहानी सुनने से पहले मित्रता हो चुकी है। सहायता की शर्त यह नहीं रखी गयी कि पहले कारण बताइये, फिर तय होगा कि आप सहायता के लायक़ हैं या नहीं। पहले साथ, फिर सवाल।

प्रीति दृढ़ होने पर लक्ष्मण राम का सारा इतिहास सुनाते हैं। सुग्रीव नेत्रों में जल भरकर कहते हैं कि मिथिलेशकुमारी मिल जायँगी, और बताते हैं कि उन्होंने मन्त्रियों के साथ बैठे हुए आकाश के मार्ग से विलाप करती हुई सीता को जाते देखा था, जिन्होंने उन्हें देखकर राम का नाम पुकारकर वस्त्र गिरा दिया था। राम वह वस्त्र माँगते हैं, सुग्रीव तुरन्त दे देते हैं, और राम उसे हृदय से लगाकर बहुत सोच करते हैं। सुग्रीव के धीरज बँधाने पर राम सखा कहकर पूछते हैं कि वे वन में किस कारण रहते हैं।

दो भाई, एक गुफा और एक शिला

उत्तर में जो कथा शुरू होती है, वह प्रेम से शुरू होती है। हे नाथ, बालि और मैं दो भाई हैं, और हम दोनों में ऐसी प्रीति थी कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। जिस आदमी ने अभी अभी अपना सब कुछ खोया है, वह अपनी कथा अपने भाई की बुराई से शुरू नहीं कर रहा, अपने भाई के प्रेम से शुरू कर रहा है। और इसके बाद जो नाम आता है वह बाहर का है: मय दानव का एक पुत्र था, उसका नाम मायावी था, और एक बार वह हमारे गाँव में आया।

उसने आधी रात को नगर के फाटक पर आकर ललकारा। बालि शत्रु के बल को सह नहीं सका, वह दौड़ा, और उसे देखते ही मायावी भाग खड़ा हुआ। मैं भी भाई के साथ लगा चला गया। इन दो पंक्तियों में दोनों का चरित्र खुल जाता है। बालि वह है जो ललकार सुनकर आधी रात को दौड़ पड़ता है, और सुग्रीव वह है जो बिना सोचे भाई के पीछे लग जाता है। न किसी ने पूछा कि यह कौन है, न किसी ने रुककर सोचा कि जो सामने आकर ललकारता है और देखते ही भागता है, वह बुलाने आया हो सकता है।

गिरिबर गुहाँ पैठ सो जाई । तब बालीं मोहि कहा बुझाई॥
परिखेसु मोहि एक पखवारा । नहिं आवौं तब जानेसु मारा॥

चौपाई ९

वह मायावी एक बड़े पर्वत की गुफा में जा घुसा। तब बालि ने मुझे समझाकर कहा: एक पखवाड़े तक मेरी बाट देखना, और यदि मैं उतने दिनों में न आऊँ तो जान लेना कि मैं मारा गया। इस वाक्य को ध्यान से पढ़िये, क्योंकि आगे की सारी तबाही इसी के दो हिस्सों से निकलती है। पहले एक संख्या दी गयी, पन्द्रह दिन। और उस संख्या के बाद की अनुपस्थिति को पढ़ने का एक नियम भी दे दिया गया: न लौटूँ तो मरा हुआ जानना। भाई ने भाई को एक हिसाब सौंपकर गुफा में प्रवेश किया, और वह हिसाब ही आगे दोनों को खा गया।

पर हुआ यह कि हिसाब ज़रूरत से ज़्यादा निभा दिया गया। हे खरारि, मैं वहाँ महीने भर रहा। पखवाड़ा बताया गया था और महीना बिताया गया, यानी जितना कहा गया था उसका दूना इन्तज़ार किया गया। और फिर उस गुफा में से रक्त की बड़ी भारी धारा निकली। उस धार को देखकर जो समझा गया वह वही था जो कोई भी समझता: उसने बालि को मार डाला, अब बाहर निकलकर मुझे मारेगा। इसलिये वहाँ, गुफा के द्वार पर, एक शिला लगाकर वे भाग आये।

यह शिला इस पूरी कथा की धुरी है। जिस आदमी ने पन्द्रह दिन की जगह तीस दिन रुककर इन्तज़ार किया, उसी के हाथ से वह पत्थर रखा गया जिसने आगे सब कुछ तय कर दिया। और ध्यान दीजिये कि इन पंक्तियों में सुग्रीव कहीं यह नहीं कहते कि उन्होंने राज्य के लोभ से ऐसा किया। वे केवल यह कहते हैं कि उन्होंने क्या देखा और उससे क्या समझा।

मन्त्रियों ने नगर को बिना स्वामी का देखा और मुझे ज़बर्दस्ती राज्य दे दिया। इस अर्धाली में एक शब्द ऐसा है जिसे छोड़ा नहीं जा सकता, ज़बर्दस्ती। सिंहासन माँगा नहीं गया था, थोपा गया था। फिर बालि उस मायावी को मारकर घर लौट आया, और मुझे वहाँ देखकर उसने जी में भेद बढ़ाया। गुफा से जीवित निकला हुआ आदमी घर आकर जो पहला दृश्य देखता है वह यह है कि जिसे वह अपना पहरेदार समझकर छोड़ गया था, वह उसकी गद्दी पर बैठा है। उसने जो पढ़ा वही उस दृश्य में दिख रहा था।

आगे की पंक्तियाँ छोटी हैं और उनमें कुछ बचाया नहीं गया है। उसने मुझे शत्रु के समान बहुत भारी मारा, और मेरा सर्वस्व तथा मेरी स्त्री भी छीन ली। हे कृपालु रघुवीर, मैं उसके भय से समस्त लोकों में बेहाल होकर फिरता रहा। तीन चीज़ें गिनायी गयी हैं: मार, सर्वस्व और स्त्री। और चौथी चीज़ इन तीनों से बड़ी है। वह भय है, जो सब कुछ छिन जाने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ता, क्योंकि उसके पास छीनने को अब कुछ बचा ही नहीं है।

इहाँ साप बस आवत नाहीं । तदपि सभीत रहउँ मन माहीं॥
सुनि सेवक दुख दीनदयाला । फरकि उठीं द्वै भुजा बिसाला॥

चौपाई १०

यहाँ शाप के कारण वह नहीं आता, तो भी मैं मन में भयभीत रहता हूँ। इस अर्धाली पर एक बात साफ़ कह देनी चाहिये। तुलसीदास यहाँ इतना ही कहते हैं कि एक शाप है और उसी के कारण बालि इस पहाड़ तक नहीं आ सकता। वह शाप किसका है, किसने दिया और किस कारण दिया, इन चौपाइयों में नहीं लिखा, और जो इनमें नहीं है उसे यहाँ जोड़ना नहीं है। कथा को उसकी ज़रूरत भी नहीं, क्योंकि जो बात यहाँ रखनी थी वह शाप नहीं है, वह इसके बाद वाला आधा हिस्सा है: सुरक्षा मिल जाने पर भी डर नहीं गया।

और फिर सुनने वाले की देह बोल पड़ती है। सेवक का दुःख सुनकर दीनों पर दया करने वालों की दोनों विशाल भुजाएँ फड़क उठीं। अभी कोई वचन नहीं दिया गया, अभी कोई निर्णय नहीं सुनाया गया। पहले बाँहें हिलीं। इस पूरे पन्ने पर राम का उत्तर दो बार शरीर से आया है, पहले नेत्रों के जल से और अब भुजाओं की फड़कन से, और दोनों बार वह मुँह से पहले आया।

सुग्रीव अपनी कथा कहते हैं। बालि और उनमें अवर्णनीय प्रीति थी। मय का पुत्र मायावी आधी रात को नगर के फाटक पर ललकारने आया, बालि दौड़ा, वह भागकर पर्वत की गुफा में घुस गया। बालि ने एक पखवाड़े तक बाट देखने को कहा था, पर सुग्रीव महीने भर रुके, फिर रक्त की धारा देखकर समझा कि भाई मारा गया और गुफा के द्वार पर शिला लगाकर लौट आये। मन्त्रियों ने उन्हें ज़बर्दस्ती राज्य दे दिया। लौटकर बालि ने भेद माना, उन्हें शत्रु के समान मारा और सर्वस्व तथा स्त्री छीन ली। शाप के कारण बालि इस पर्वत पर नहीं आता, फिर भी सुग्रीव मन में भयभीत रहते हैं, और यह सुनकर राम की दोनों विशाल भुजाएँ फड़क उठती हैं।

एक ही बाण

और अब वह दोहा जिस पर यह पन्ना बन्द होता है। इसमें एक वचन है, एक संख्या है, और एक ऐसी बात है जो सुनने वाले ने पूछी ही नहीं थी।

सुनु सुग्रीव मारिहउँ बालिहि एकहिं बान।
ब्रह्म रुद्र सरनागत गएँ न उबरिहिं प्रान॥ ६॥

दोहा ६

हे सुग्रीव, सुनिये, मैं एक ही बाण से बालि को मार डालूँगा। संख्या पर ध्यान दीजिये: एकहिं बान। जिस भाई का बल गिनाते गिनाते सुग्रीव की साँस नहीं भरती, उसके लिये यहाँ एक से ज़्यादा की ज़रूरत नहीं बतायी गयी। और इसके बाद वह अर्धाली आती है जो किसी सवाल का जवाब नहीं है, क्योंकि वह सवाल पूछा ही नहीं गया था: ब्रह्मा और रुद्र की शरण में जाने पर भी उसके प्राण न बचेंगे।

यह दूसरी अर्धाली किसके लिये है। सुग्रीव ने यह नहीं पूछा था कि वह कहीं किसी की शरण में तो नहीं चला जायगा। पर जिस आदमी की सारी कथा भागने की है, वह यही सोचता रहता है। इसलिये उत्तर में दो सबसे बड़ी शरणें नाम लेकर बन्द कर दी गयीं। यह वचन बल का नहीं है, भरोसे का है, और वह भरोसा ठीक उसी जगह दिया गया है जहाँ सुनने वाले के भीतर सबसे बड़ा छेद था।

और इस दोहे की सबसे कड़ी बात वह है जो इसमें नहीं है। यहाँ यह नहीं पूछा गया कि बालि का अपना पक्ष क्या है, न यह कि दोनों भाइयों के बीच का हिसाब कहाँ से बिगड़ा। जो कथा सुनी गयी वह एक ही ओर से सुनी गयी, और वचन उसी पर दे दिया गया। अग्नि की साक्षी में जो मैत्री बँधी थी उसका पहला फल यही है। इस पन्ने की शुरुआत एक डर से हुई थी और अन्त एक वचन पर हो रहा है, और बीच में जो कुछ भी हुआ, वह सब उसी आग के इर्द गिर्द हुआ जिसे एक सेवक ने जलाया था।

राम कहते हैं कि वे एक ही बाण से बालि को मार डालेंगे, और ब्रह्मा तथा रुद्र की शरण में जाने पर भी उसके प्राण न बचेंगे। यह वचन कथा का एक ही पक्ष सुनकर दिया गया है, और यह उसी मैत्री का पहला फल है जो अग्नि को साक्षी बनाकर बाँधी गयी थी।

और अन्त में, अपनी ओर

इस पन्ने को एक साथ पढ़ने पर जो बात सबसे ऊपर रह जाती है वह भेस की है। यह प्रसंग एक भेस से शुरू होता है। एक डरा हुआ राजा अपने सबसे भरोसेमन्द आदमी को ब्रह्मचारी का वेष देकर नीचे भेजता है, इस हिदायत के साथ कि पहचानकर आना और ख़बर इशारे से देना। इसमें कुछ भी अनुचित नहीं है, क्योंकि भेजने वाला सचमुच ख़तरे में है। और वह भेस अपने काम में असफल रहता है, इस तरह असफल कि उससे बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता था। जो यह पूछने गया था कि ये कहीं शत्रु के भेजे हुए तो नहीं, वह जाँच पूरी करने से पहले ही चरणों में जा पड़ता है और अपना असली शरीर स्वयं खोल देता है।

दूसरी बात क्रम की है, और यह क्रम इस पन्ने पर चार बार दोहराया गया है। हनुमान को पहले हृदय से लगाया गया, उपदेश उसके बाद दिया गया। सुग्रीव से पहले मित्रता हुई, उनकी कथा उसके बाद सुनी गयी। सीता का वस्त्र पहले हृदय से लगाया गया, उपाय की बात उसके बाद हुई। और सुग्रीव का दुःख सुनकर पहले भुजाएँ फड़कीं, वचन उसके बाद निकला। इस कथा में सहायता का फ़ैसला कारण जानने के बाद नहीं होता। वह उससे पहले हो चुका होता है, और कारण केवल इतना तय करता है कि सहायता किस रूप में जायगी।

तीसरी बात उस डर की है जिससे यह पन्ना शुरू हुआ था। सुग्रीव एक ऐसे पहाड़ पर बैठे हैं जहाँ शाप के कारण उनका भाई आ नहीं सकता, यानी वे सुरक्षित हैं, और फिर भी वे अपने ही शब्दों में मन के भीतर भयभीत रहते हैं। सुरक्षा और निर्भयता एक चीज़ नहीं हैं, और यह पन्ना उन्हें एक भी नहीं मानता। इसीलिये हनुमान की सलाह में मित्रता के साथ साथ एक और शब्द जुड़ा हुआ था: दीन जानकर निर्भय कर दीजिये। जिस आदमी को चाहिये था वह पहरा नहीं था, भरोसा था, और भरोसा किसी पहाड़ से नहीं आता।

और एक बात उस कपड़े की, जो इस कथा में सबसे कम बोलता है और सबसे दूर तक जाता है। एक स्त्री को आकाश के रास्ते ले जाया जा रहा था। नीचे एक पहाड़ पर कुछ वानर बैठे दिखे, जिन्हें वे नहीं जानती थीं और जिनका नाम तक उन्हें मालूम नहीं था। उन्होंने एक नाम पुकारा और अपना वस्त्र गिरा दिया। उस घड़ी उस काम में कोई योजना नहीं थी, बस इतनी सी उम्मीद थी कि जो देख रहा है वह किसी दिन किसी को बता देगा। और वह वस्त्र ठीक उसी हाथ तक पहुँचा जिसके लिये गिराया गया था, इसलिये नहीं कि किसी ने उसका रास्ता बनाया था, बल्कि इसलिये कि इस बीच नीचे बैठे हुए उन्हीं अजनबियों में से एक ने आग को साक्षी बनाकर एक मित्रता कर ली थी।

यह तुलसीदास की कथा है, और तुलसीदास इस पूरे प्रसंग में एक बार भी यह नहीं बताते कि कौन ठीक था और कौन ग़लत। वे केवल यह बताते हैं कि किसने किसे कब पहचाना। हनुमान ने प्रभु को पहचाना और अपना भेस छोड़ दिया। सुग्रीव ने मित्र को पहचाना और अपना डर कह दिया। और जिन्हें पहचाना गया, उन्होंने पहचाने जाने के बदले में जो दिया वह कोई उपदेश नहीं था, एक वचन था। इस पन्ने पर वह वचन दिया गया है, चुकाया नहीं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, किष्किन्धाकाण्ड, दोहा १ से ६, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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