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रामचरितमानसकिष्किन्धाकाण्डप्रसंग 2
मित्र का धर्म और बालि-वध
पहले राम बताते हैं कि सच्चा मित्र किसे कहते हैं। फिर वे बालि के हृदय में बाण मारते हैं। बालि राम से विनती करता है कि वे उसके पुत्र अंगद को अपना दास बना लें।
राम सुग्रीव को वचन दे चुके हैं कि वे बालि को एक ही बाण से मारेंगे। सुग्रीव उनके मित्र हैं, और मन में अब भी डरे हुए हैं। रामचरितमानस के चौथे सोपान में अब राम बताते हैं कि मित्र किसे कहते हैं, और जो मित्र नहीं है उसकी पहचान क्या है।
सुग्रीव अपने भाई का बल बताते हैं, और राम बिना परिश्रम के दुंदुभि की हड्डियाँ और ताल के वृक्ष ढहा देते हैं। सुग्रीव के भीतर ज्ञान उपजता है, और वे सब छोड़कर राम का भजन करना माँगते हैं। फिर सुग्रीव गरजते हैं, दो भाई भिड़ते हैं, और राम का बाण बालि के हृदय में लगता है। बालि गिरता है, उठ बैठता है, और राम से पूछता है कि किस अवगुण से उन्होंने उसे मारा।
बालि का घर, राम की ओट
- राम जो सुग्रीव को सच्चे मित्र के गुण और कुमित्र की पहचान बताते हैं। वे बिना परिश्रम के हड्डियाँ और ताल के वृक्ष ढहा देते हैं। फिर सुग्रीव को दो बार भेजते हैं, वृक्ष की ओट से देखते हैं और बालि के हृदय में बाण मारते हैं। वे बालि के प्रश्न का उत्तर देते हैं, उसके सिर को अपने हाथ से छूते हैं और उसे प्राण रखने को कहते हैं।
- सुग्रीव राम के मित्र, जो बालि का बल बताते हैं और राम को प्रभु जानकर सब छोड़कर भजन करना माँगते हैं। राम के भेजने पर वे बालि से भिड़ते हैं और व्याकुल होकर भागते हैं। फिर राम की डाली हुई फूलों की माला गले में लिये वे दुबारा लड़ते हैं और भय मानकर हृदय से हार जाते हैं।
- बालि सुग्रीव का भाई, सुग्रीव के शब्दों में महाबली और अत्यन्त रणधीर। बाण लगने पर वह राम को पहचान लेता है और उनसे पूछता है कि किस अवगुण से उन्होंने उसे मारा। वह प्राण रखने का प्रस्ताव ठुकरा देता है, और राम से विनती करता है कि वे अंगद को अपना दास बना लें।
- तारा बालि की स्त्री, जो उसके चरण पकड़कर उसे समझाती हैं कि सुग्रीव जिनसे मिले हैं, वे दोनों भाई तेज और बल की सीमा हैं।
- लक्ष्मण जिन्हें तारा राम के साथ कोसलराज का पुत्र बताती हैं।
- अंगद बालि का पुत्र, बालि के अन्तिम वचनों में विनय और बल में उसके समान। बालि राम से विनती करता है कि वे उसकी बाँह पकड़कर उसे अपना दास बना लें।
पहले यह तय होता है कि मित्र किसे कहते हैं
बालि के वध का वचन देने के बाद राम आगे बोलते हैं। उनकी पहली बात उन पर है जो मित्र के दुख से दुखी नहीं होते।
वे कहते हैं कि ऐसे लोगों को देखने से ही भारी पाप लगता है। अपना पहाड़ जैसा दुख धूल के समान जानना चाहिये, और मित्र का धूल जैसा दुख मेरु के समान।
फिर वे कहते हैं कि जिनमें ऐसी बुद्धि स्वभाव से नहीं आयी, वे मूर्ख हठ करके मित्रता क्यों करते हैं? मित्र अपने मित्र को बुरे रास्ते से रोककर अच्छे रास्ते पर चलाता है। वह उसके गुण प्रकट करता है और अवगुण छिपाता है।
मित्र देने लेने में मन में शंका न रखे, अपने बल के अनुमान से सदा हित करे, और विपत्ति के समय सौ गुना स्नेह करे। राम कहते हैं कि वेद श्रेष्ठ मित्र के यही गुण बताते हैं।
और फिर वह पहचान, जिससे बचना है
फिर राम कुमित्र की पहचान बताते हैं। वह सामने बना बनाकर कोमल वचन कहता है, पीछे अहित करता है, और उसके मन में कुटिलता होती है। राम कहते हैं, “हे भाई, जिसका चित्त साँप की चाल जैसा है, ऐसे कुमित्र को छोड़ने में ही भलाई है।”
राम कहते हैं, “मूर्ख सेवक, कंजूस राजा, बुरी स्त्री और कपटी मित्र, ये चारों शूल के समान हैं। हे सखा, मेरे बल के भरोसे आप चिन्ता छोड़ दीजिये। मैं सब प्रकार से आपके काम आऊँगा।”
बालि का बल, और ताल के वृक्ष
सुग्रीव ने कहा, “हे राम, सुनिये। बालि महाबली और अत्यन्त रणधीर है।” फिर उन्होंने राम को दुंदुभि की हड्डियाँ और ताल के वृक्ष दिखाये।
राम ने बिना परिश्रम के उन्हें ढहा दिया। टीका दुंदुभि को राक्षस बताती है।
राम का अपरिमित बल देखकर सुग्रीव की प्रीति बढ़ गयी, और उन्हें विश्वास हो गया कि ये बालि का वध करेंगे। वे बार बार राम के चरणों में सिर नवाने लगे। राम को प्रभु के रूप में पहचानकर सुग्रीव का मन हर्षित हुआ।
सुग्रीव का वैराग्य
तब सुग्रीव के भीतर ज्ञान उपजा, और वे बोले।
“हे नाथ, आपकी कृपा से मेरा मन स्थिर हो गया। सुख, सम्पत्ति, परिवार और बड़ाई, सब छोड़कर मैं आपकी सेवा करूँगा। आपके चरणों की आराधना करने वाले संत कहते हैं कि ये सब राम की भक्ति के बाधक हैं। जगत में शत्रु मित्र और सुख दुख, सब माया के रचे हुए हैं। परमार्थ में ये नहीं हैं।”
“हे राम, बालि तो मेरा परम हितकारी है, जिसकी कृपा से आप मुझे मिले। उससे स्वप्न में लड़ाई हो जाय, तो जागने पर समझकर मन सकुचा जायगा।”
“हे प्रभु, अब ऐसी कृपा कीजिये कि सब छोड़कर मैं दिन रात आपका भजन करूँ।” सुग्रीव की वैराग्य भरी वाणी सुनकर हाथ में धनुष लिये राम मुसकरा दिये। टीका इस वैराग्य को क्षणिक पढ़ती है।
राम की हँसी, और वह वचन जो झूठा नहीं होता
राम बोले, “जो कुछ आपने कहा, सब सत्य है। हे सखा, मेरा वचन मिथ्या नहीं होता।” टीका इस वचन का अर्थ यह बताती है कि बालि मारा जायगा और सुग्रीव को राज्य मिलेगा।
टीका के अनुसार यहाँ काकभुशुण्डि गरुड़ से कहते हैं, “हे गरुड़, नट के बंदर की तरह राम सबको नचाते हैं। वेद ऐसा गाते हैं।”
बालि की ओर, और तारा की चेतावनी
सुग्रीव को साथ लेकर, हाथों में धनुष बाण लिये राम चले। तब राम ने सुग्रीव को भेजा। बल पाकर सुग्रीव निकट जाकर गरजे।
यह सुनते ही बालि क्रोध में भरकर दौड़ा। उसकी स्त्री ने उसके चरण पकड़कर उसे समझाया। टीका बताती है कि यह स्त्री तारा हैं। तारा बोलीं, “हे नाथ, सुनिये। सुग्रीव जिनसे मिले हैं, वे दोनों भाई तेज और बल की सीमा हैं। कोसलराज के पुत्र राम और लक्ष्मण संग्राम में काल को भी जीत सकते हैं।”
बालि ने कहा, “हे भीरु प्रिये, सुनिये। राम समदर्शी हैं। यदि कदाचित् वे मुझे मारें, तो मैं सनाथ हो जाऊँगा।” टीका सनाथ होने को परमपद पाना पढ़ती है।
पहला युद्ध, और गले में डाली गयी माला
ऐसा कहकर वह महाभिमानी सुग्रीव को तिनके के बराबर जानकर चल पड़ा। दोनों भिड़े। बालि ने ख़ूब धमकाया, घूँसा मारा और बड़े ज़ोर से गरजा।
बालि का घूँसा वज्र की तरह लगा, और सुग्रीव व्याकुल होकर भागे। सुग्रीव ने कहा, “हे राम, मैंने जो कहा था, यह मेरा भाई नहीं, काल है।” राम ने कहा, “आप दोनों भाइयों का रूप एक सा है। उसी भ्रम से मैंने उसे नहीं मारा।” फिर राम ने सुग्रीव के शरीर को हाथ से छुआ। सुग्रीव का शरीर वज्र हो गया, और सारी पीड़ा जाती रही।
फिर राम ने सुग्रीव के गले में फूलों की माला डाल दी, और बड़ा बल देकर उन्हें फिर भेजा। फिर अनेक प्रकार से युद्ध हुआ। राम वृक्ष की ओट से देख रहे थे।
वह बाण, और वह सवाल
सुग्रीव ने बहुत छल और बल किया, और भय मानकर हृदय से हार गये। तब राम ने तानकर बालि के हृदय में बाण मारा।
बाण लगते ही बालि व्याकुल होकर धरती पर गिर पड़ा। फिर राम को आगे देखकर वह उठ बैठा। राम का शरीर साँवला था, सिर पर जटा बनी थी, नेत्र लाल थे, और धनुष पर बाण चढ़ा था। बार बार देखकर बालि ने अपना चित्त उनके चरणों में लगा दिया। राम को पहचानकर उसने अपना जन्म सफल माना। उसके हृदय में प्रीति थी और मुख में कठोर वचन। वह राम की ओर देखकर बोला।
“हे गोसाईं, आपने धर्म के लिये अवतार लिया, और मुझे व्याध की तरह मारा। मैं वैरी और सुग्रीव प्यारा? हे नाथ, किस अवगुण से आपने मुझे मारा?”
राम ने कहा, “हे मूर्ख, सुनिये। छोटे भाई की स्त्री, बहन, पुत्र की स्त्री और कन्या, ये चारों समान हैं। इन्हें जो कोई बुरी दृष्टि से देखता है, उसे मारने में कोई पाप नहीं होता। हे मूढ़, आपको अत्यन्त अभिमान है। आपने स्त्री की सीख पर कान नहीं दिया। सुग्रीव को मेरी भुजाओं के बल का आश्रित जानकर, हे अधम अभिमानी, आपने उसे मारना चाहा।”
अन्तिम विनती, और वह वर जो माँगा गया
बालि ने कहा, “हे राम, सुनिये। स्वामी के सामने मेरी चतुराई नहीं चलती। हे प्रभु, अन्तकाल में आपकी गति पाकर क्या मैं अब भी पापी हूँ?”
बालि की अत्यन्त कोमल वाणी सुनकर राम ने उसके सिर को अपने हाथ से छुआ। “मैं आपके शरीर को अचल कर दूँ। आप प्राण रखिये।” बालि ने कहा, “हे राम, सुनिये।”
“मुनि जन्म जन्म में यत्न करते हैं, और अन्त में उनके मुँह से राम नहीं निकलता। जिनके नाम के बल से शिव काशी में सबको समान रूप से अविनाशी गति देते हैं, वही मेरी आँखों के सामने आ गये हैं। हे प्रभु, क्या फिर ऐसा बन पड़ेगा?”
“वे मेरे सामने हैं। श्रुतियाँ नेति कहकर सदा उनका गुणगान करती हैं। प्राण और मन को जीतकर, इन्द्रियों को नीरस करके, मुनि ध्यान में उन्हें कभी कभी पाते हैं। मुझे अत्यन्त अभिमान के वश जानकर प्रभु ने कहा कि शरीर रख लीजिये। ऐसा मूर्ख कौन होगा जो हठ करके कल्पवृक्ष काटकर बबूल की बाड़ लगाये?”
“हे नाथ, अब करुणा करके मेरी ओर देखिये, और जो वर मैं माँगता हूँ वह दीजिये। कर्मवश मैं जिस योनि में जन्म लूँ, वहीं राम के चरणों में मेरा अनुराग हो। यह मेरा पुत्र अंगद विनय और बल में मेरे समान है। हे प्रभु, इसे ले लीजिये। इसकी बाँह पकड़कर इसे अपना दास बना लीजिये।”
गले से गिरती हुई माला
राम के चरणों में दृढ़ प्रीति करके बालि ने शरीर ऐसे त्याग दिया, जैसे हाथी को अपने गले से फूलों की माला के गिरने का पता नहीं चलता।
सच्चा मित्र, बाण और माला
राम ने पहले सच्चे मित्र के गुण और कुमित्र की पहचान बतायी। सुग्रीव ने बालि का बल बताया, और राम ने बिना परिश्रम के हड्डियाँ और ताल के वृक्ष ढहा दिये। सुग्रीव ने राम को प्रभु जानकर सब छोड़कर भजन करना माँगा। दो युद्ध हुए, और दूसरे युद्ध में राम का बाण बालि के हृदय में लगा। बालि ने अपना प्रश्न पूछा और राम ने उत्तर दिया। बालि ने प्राण रखने का प्रस्ताव ठुकराया, राम के चरणों में अनुराग का वर माँगा, और विनती की कि राम अंगद को अपना दास बना लें। फिर उसने शरीर त्याग दिया।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, किष्किन्धाकाण्ड, दोहा 7 से 10, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।