रामचरितमानस · किष्किन्धाकाण्ड · मित्र का धर्म और बालि-वध
मित्र का धर्म और बालि-वध
पहले राम बताते हैं कि सच्चा मित्र किसे कहते हैं, और फिर वही बात धनुष पर चढ़कर किष्किन्धा के राजा के हृदय तक पहुँचती है।
इस प्रसंग की शुरुआत किसी ललकार से नहीं होती। शुरुआत एक परिभाषा से होती है। किष्किन्धाकाण्ड के सातवें दोहे तक पहुँचते पहुँचते राम के पास न सेना है, न नगर, न सिंहासन। उनके पास एक ही चीज़ है, एक मित्र, और वह मित्र भी डरा हुआ है। ऐसी घड़ी में तुलसीदास राम के मुँह से जो कहलवाते हैं वह किसी युद्ध की योजना नहीं है। वह यह है कि मित्र किसे कहते हैं, और जो मित्र नहीं है उसे किस निशानी से पहचाना जाता है। पूरे रामचरितमानस में मित्रता पर इससे साफ़ पंक्तियाँ और कहीं नहीं हैं, और वे ठीक यहीं इसलिये रखी गयी हैं कि आगे जो होने वाला है उसका आधार यही है।
आगे का हिस्सा उसी परिभाषा का दूसरा आधा है। सुग्रीव अपने भाई का बल गिनाते हैं, राम अपना बल बिना कुछ कहे दिखा देते हैं, और सुग्रीव का मन एक क्षण के लिये संसार से उचट जाता है। फिर धनुष उठता है, बालि के द्वार तक जाकर एक गरज होती है, दो भाई भिड़ते हैं, और एक बाण चलता है। बालि गिरता है, उठ बैठता है, और मरते मरते वह सवाल पूछता है जो इस काण्ड का सबसे कड़ा सवाल है। इस पन्ने पर वह सवाल और उसका उत्तर वैसे ही रखे गये हैं जैसे तुलसीदास ने रखे हैं। यह तुलसी की कथा है, वाल्मीकि की नहीं, और दोनों जगह बालि के मुँह के शब्द एक नहीं हैं।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- श्रीराम जो पहले मित्र का लक्षण गिनाते हैं और फिर उसी लक्षण के अनुसार धनुष उठाते हैं। इस प्रसंग में उनका सबसे बड़ा शस्त्र उनका वचन है।
- सुग्रीव वह मित्र जिसका घर छिन चुका है। बल में हारे हुए, मन में डरे हुए, और बीच में एक क्षण के लिये सब कुछ छोड़ देने को तैयार।
- बालि किष्किन्धा का राजा, महाबली और अत्यन्त रणधीर। तुलसी का बालि मरते समय जो कहता है, वही इस प्रसंग को ऊपर उठा देता है।
- तारा बालि की स्त्री, जो चरण पकड़कर उसे रोकती हैं और ठीक ठीक बता देती हैं कि सामने कौन खड़ा है।
- लक्ष्मण इस प्रसंग में एक ही बार नाम लेकर आते हैं, तारा की चेतावनी में, जहाँ दोनों भाइयों को तेज और बल की सीमा कहा गया है।
- अंगद बालि का पुत्र, जिसे बालि अपने अन्तिम वचनों में राम की बाँह में सौंप जाता है।
पहले यह तय होता है कि मित्र किसे कहते हैं
राम और सुग्रीव के बीच जो बात चल रही है, उसमें सुग्रीव का दुख सामने रखा जा चुका है। उत्तर में राम न कोई सान्त्वना देते हैं, न कोई योजना बताते हैं। वे सीधे वहीं से शुरू करते हैं जहाँ से मित्रता की असली जाँच होती है, यानी दुख से। सुख में साथ देने वाले की परीक्षा कभी होती ही नहीं, इसलिये तुलसीदास की पहली पंक्ति उसी आदमी पर आती है जो मित्र का दुख देखकर भी अपनी जगह से नहीं हिलता।
जे न मित्र दुख होहिं दुखारी । तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥
चौपाई १
निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना॥
यह वाक्य कितना कड़ा है, इस पर एक क्षण रुकना चाहिये। तुलसी यह नहीं कहते कि ऐसा आदमी बुरा मित्र है। वे कहते हैं कि ऐसे लोगों को देख लेने भर से भारी पाप लगता है। और फिर वे तराजू ही उलट देते हैं। अपना दुख पहाड़ जितना बड़ा हो तो भी उसे धूल के बराबर जानना है, और मित्र का दुख धूल जितना छोटा हो तो भी उसे सुमेरु के बराबर मानना है। नाप वही रहता है, पलड़े बदल जाते हैं। जिस दिन आदमी अपने दुख को छोटा करके तौलना सीख जाये, उसी दिन वह मित्र होने के क़ाबिल हुआ।
इसके बाद वे मित्र का काम गिनाते हैं। बुरे रास्ते से रोककर अच्छे रास्ते पर चलाना, मित्र के गुण सबके सामने प्रकट करना और उसके अवगुण ढक देना। और जिनके भीतर यह बुद्धि स्वभाव से नहीं आयी, उनके लिये तुलसी का शब्द कठोर है: ऐसे लोग हठ करके मित्रता करते ही क्यों हैं। इसके तुरन्त बाद वह चौपाई आती है जिसे लोग सदियों से कथा से अलग करके भी दोहराते रहे हैं, क्योंकि उसमें मित्रता का पूरा आचरण चार टुकड़ों में रखा हुआ है।
देत लेत मन संक न धरई । बल अनुमान सदा हित करई॥
चौपाई २
बिपति काल कर सतगुन नेहा । श्रुति कह संत मित्र गुन एहा॥
चारों बातें रोज़ के बर्ताव की हैं, किसी ऊँचे सिद्धान्त की नहीं। देने लेने में मन में शंका न रखे, यानी भीतर ही भीतर यह हिसाब न जोड़ता रहे कि किसने कितना दिया और किसने कितना लिया। अपने बल के अनुमान से सदा हित करता रहे, और इस बल अनुमान पर ध्यान दीजिये: जितना बल है उतना करना है, न उससे कम, न मुँह से उससे बड़ा वादा। विपत्ति के समय स्नेह सौ गुना कर दे। और अन्त में तुलसीदास अपनी ओर से दस्तख़त नहीं करते, वे श्रुति का नाम लेते हैं। यह मेरा कहा नहीं, वेद का कहा है।
राम मित्रता की जाँच दुख से शुरू करते हैं। अपना दुख धूल के बराबर, मित्र का दुख सुमेरु के बराबर। मित्र का काम है कुमार्ग से रोकना, गुण प्रकट करना, अवगुण छिपाना, देने लेने में शंका न रखना, अपने बल भर हित करना और विपत्ति में स्नेह सौ गुना कर देना।
और फिर वह पहचान, जिससे बचना है
परिभाषा का दूसरा आधा हिस्सा उतना ही ज़रूरी है, क्योंकि जिसे मित्र चुनना है उसे कुमित्र पहचानना भी आना चाहिये। तुलसी यहाँ लम्बा वर्णन नहीं करते। वे एक चाल बता देते हैं और चित्र पूरा हो जाता है।
आगें कह मृदु बचन बनाई । पाछें अनहित मन कुटिलाई॥
चौपाई ३
जाकर चित अहि गति सम भाई । अस कुमित्र परिह्रेहिं भलाई॥
सामने आते ही बना बनाकर मीठे वचन, और पीठ पीछे बुराई। मन में टेढ़ापन। और उस टेढ़ेपन के लिये जो उपमा चुनी गयी है वह पढ़ने के बाद भूलती नहीं: साँप की चाल। साँप कभी सीधा नहीं चलता, फिर भी पहुँचता ठीक वहीं है जहाँ उसे जाना है। ऐसे मित्र के साथ सबसे बड़ी मुश्किल यही होती है कि दिशा दिखती ही नहीं, इसलिये बचाव का उपाय भी एक ही बताया गया है, और वह लड़ना नहीं है। छोड़ देना है।
सेवक सठ नृप कृपन कुनारी । कपटी मित्र सूल सम चारी॥
चौपाई ४
सखा सोच त्यागहु बल मोरें । सब बिधि घटब काज मैं तोरें॥
चार शूल गिनाये गये हैं: मूर्ख सेवक, कंजूस राजा, कुलटा स्त्री और कपटी मित्र। शूल यानी वह काँटा जो भीतर धँसकर लगातार चुभता रहे, एक बार में जान न ले और चैन भी न लेने दे। चारों की पहचान एक ही है कि वे पास रहते हैं, और उसी पास रहने से पीड़ा देते हैं। जिनसे दूरी हो वे कितना ही बुरा करें, शूल नहीं बनते।
और अब इस पूरे पन्ने की सबसे बड़ी बात। जिस चौपाई में परिभाषा पूरी होती है, उसी चौपाई के दूसरे आधे में वचन दे दिया जाता है। सखा कहकर राम सुग्रीव से चिन्ता छोड़ने को कहते हैं, अपने बल के भरोसे, और कहते हैं कि वे हर प्रकार से उनके काम आयेंगे। यानी अभी अभी जो कहा गया था कि मित्र अपने बल के अनुमान से हित करता है, वह वादा उसी साँस में उठा लिया गया। आगे जो कुछ होगा, बाण तक, वह इसी एक पंक्ति का दाम है। मित्र के धर्म का यह प्रसंग बीच में आया हुआ कोई उपदेश नहीं है। बालि-वध का कारण यही है।
कुमित्र वह है जो सामने मीठा बोले और पीछे बुराई करे, जिसका मन साँप की चाल जैसा टेढ़ा हो। मूर्ख सेवक, कंजूस राजा, कुलटा स्त्री और कपटी मित्र, चारों शूल के समान हैं। और इसी चौपाई के दूसरे आधे में राम सुग्रीव को अपने बल पर निश्चिन्त कर देते हैं।
बालि का बल, और ताल के वृक्ष
वचन मिल जाने के बाद सुग्रीव जो करते हैं वह बहुत मनुष्य जैसा है। वे भरोसा नहीं कर पाते। जिसने वर्षों एक डर के नीचे काटे हों, उसे एक वाक्य से सुरक्षा नहीं मिल जाती। इसलिये वे बालि का बल गिनाने लगते हैं, और गिनाते गिनाते प्रमाण दिखाने पर उतर आते हैं।
कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा । बालि महाबल अति रनधीरा॥
चौपाई ५
दुंदुभि अस्थि ताल देखराए। बिनु प्रयास रघुनाथ ढहाए॥
पोद्दार जी की टीका बताती है कि वे हड्डियाँ दुंदुभि नामक राक्षस की थीं, और ताल के वे वृक्ष वही थे जिनसे बालि के बल की नाप ली जाती रही थी। सुग्रीव का तर्क साफ़ है: उसमें इतना बल है, अब आप स्वयं देख लीजिये। और राम इस तर्क का उत्तर शब्द से नहीं देते। बिनु प्रयास, यानी बिना ज़रा भी ज़ोर लगाये, वे उन्हें ढहा देते हैं। तुलसीदास पूरा दृश्य आधी पंक्ति में निपटा देते हैं। न कोई ललकार, न कोई बखान, न कोई गिनती कि कितने वृक्ष गिरे।
इसके तुरन्त बाद सुग्रीव के भीतर जो बदला, वह भी एक ही पंक्ति में रखा गया है। अपरिमित बल देखकर प्रीति बढ़ गयी, और यह विश्वास हो गया कि बालि का वध ये अवश्य करेंगे। वे बार बार चरणों में सिर नवाते हैं। और यहीं वह शब्द आता है जो प्रसंग का रुख़ मोड़ देता है: प्रभुहि जानि, प्रभु को पहचानकर कपीश का मन हर्षित हुआ। अब तक सामने एक बलवान मित्र था। अब सामने प्रभु हैं, और जिस क्षण यह पहचान होती है उसी क्षण सुग्रीव के मुँह से दूसरी ही भाषा निकलने लगती है।
सुग्रीव बालि का बल गिनाते हैं और प्रमाण के लिये दुंदुभि की हड्डियाँ तथा ताल के वृक्ष दिखाते हैं। राम उन्हें बिना परिश्रम गिरा देते हैं। यह बल देखकर सुग्रीव की प्रीति बढ़ जाती है, उन्हें बालि-वध का विश्वास हो जाता है, और वे प्रभु को पहचान लेते हैं।
एक वैराग्य, जो देर तक नहीं टिकता
पहचान होते ही सुग्रीव के भीतर ज्ञान उपजता है, और जो वचन निकलते हैं वे किसी हारे हुए राजा की भाषा नहीं हैं। थोड़ी देर पहले तक बात राज्य की, भाई की और बदले की चल रही थी। अब बात मन के ठहर जाने की चल रही है।
उपजा ग्यान बचन तब बोला। नाथ कृपाँ मन भयउ अलोला॥
चौपाई ६
सुख संपति परिवार बड़ाई । सब परिहरि करिहउँ सेवकाई॥
नाथ की कृपा से मन अलोल हो गया, यानी जो लगातार हिलता रहता था वह ठहर गया। और ठहरते ही वे सब कुछ छोड़ने को तैयार हैं: सुख, सम्पत्ति, परिवार, बड़ाई। आगे की पंक्ति में इसका कारण भी बताते हैं, और कारण अपना नहीं, संतों का हवाला देकर। जो लोग इन चरणों की आराधना करते हैं वे कहते हैं कि ये सब राम की भक्ति के बाधक हैं। संसार में जितने शत्रु मित्र हैं और जितने सुख दुख हैं, सब माया के बनाये हुए हैं, परमार्थ में उनका कोई अस्तित्व नहीं।
और अब उस बात पर आइये जो इस पूरे प्रसंग की सबसे सुन्दर पलटी है। जिस भाई को मारने के लिये यह सारी बात चल रही थी, उसी भाई के बारे में सुग्रीव अगली साँस में क्या कहते हैं।
बालि परम हित जासु प्रसादा। मिलेहु राम तुम्ह समन बिषादा॥
चौपाई ७
सपनें जेहि सन होइ लराई । जागें समुझत मन सकुचाई॥
बालि परम हितकारी है, क्योंकि उसी की कृपा से यह मिलना हुआ। यह वैर न होता तो यह भेंट भी न होती, और शोक मिटाने वाले ये कभी सामने न आते। और फिर वह पंक्ति, जिसके आगे किसी की क्षमा नहीं जाती: अब उससे स्वप्न में भी लड़ाई हो जाये तो जागने पर मन सकुचा जायगा। ध्यान दीजिये कि यहाँ सुग्रीव बालि को क्षमा नहीं कर रहे। वे उसे उपकारी मान रहे हैं, जो क्षमा से भी आगे की चीज़ है।
इसी रौ में वे अन्तिम प्रार्थना रखते हैं, कि अब ऐसी कृपा हो कि सब छोड़कर दिन रात भजन ही होता रहे। और तुलसीदास इस वैराग्य पर जो टिप्पणी करते हैं वह एक क्रिया भर में है। यह सुनकर हाथ में धनुष लिये राम मुसकरा दिये। उस हँसी में ठट्ठा नहीं है। जो जानता है कि यही मन थोड़ी देर बाद फिर राज्य के लिये लड़ने जायगा, और फिर भी जिसने उसे राज्य दिलाने का वचन दे रखा है, वही ऐसी हँसी हँस सकता है।
प्रभु को पहचानकर सुग्रीव में ज्ञान उपजता है। वे सुख, सम्पत्ति, परिवार और बड़ाई छोड़कर सेवा करने की बात कहते हैं, शत्रु मित्र तथा सुख दुख को मायारचित बताते हैं, और बालि को अपना परम हितकारी कह देते हैं। यह सुनकर धनुष धारण किये राम मुसकरा देते हैं।
राम की हँसी, और वह वचन जो झूठा नहीं होता
हँसी के बाद जो उत्तर आता है वह दो हिस्सों में है, और दोनों हिस्से एक दूसरे को काटते नहीं, सँभालते हैं।
जो कछु कहेहु सत्य सब सोई । सखा बचन मम मृषा न होई॥
चौपाई ८
नट मरकट इव सबहि नचावत। रामु खगेस बेद अस गावत॥
पहला हिस्सा पूरा समर्थन है। जो कहा गया, सब सत्य है। संसार सचमुच माया का बनाया हुआ है और शत्रु मित्र सचमुच गढ़े हुए हैं, इसमें कोई खंडन नहीं। पर इसके बाद जो वाक्य आता है वह उससे भी बड़ा है: सखा, मेरा वचन मिथ्या नहीं होता। यानी वैराग्य अपनी जगह ठीक है, पर वचन दिया जा चुका है, और दिये हुए वचन के आगे वैराग्य की भी नहीं चलती। बालि मारा जायगा और राज्य मिलेगा, इसलिये नहीं कि सुग्रीव अब भी वह चाहते हैं, बल्कि इसलिये कि कहा जा चुका है।
दूसरे हिस्से में तुलसीदास अचानक कथा से बाहर निकल जाते हैं। हे पक्षियों के राजा, नट अपने बंदर को जैसे नचाता है वैसे ही राम सबको नचाते हैं, वेद ऐसा गाते हैं। यह वाक्य काकभुशुण्डि गरुड़ से कह रहे हैं, और इसे ठीक यहाँ रखने का कारण है। अभी अभी एक वानर ने सब छोड़ देने की बात की, और थोड़ी देर बाद वही वानर राज्य के लिये लड़ने जायगा, हारेगा, भागेगा और फिर लौटेगा। नट का बंदर वही है। डोर किसके हाथ में है, यह भी उसी पंक्ति में बता दिया गया है।
राम सुग्रीव की बात को पूरा सत्य मानते हैं, पर अपना वचन याद दिलाते हैं, जो मिथ्या नहीं होता। इसी के साथ वह पंक्ति आती है कि नट के बंदर की तरह राम सबको नचाते हैं, और वेद यही गाते हैं।
किष्किन्धा की ओर, और तारा की चेतावनी
इसके बाद कथा तेज़ हो जाती है। हाथों में धनुष बाण लेकर रघुनाथ चले और सुग्रीव साथ चले। पास पहुँचकर राम सुग्रीव को आगे भेजते हैं, और यह भेजना ही युद्ध की घोषणा है। बल पाकर सुग्रीव बालि के निकट जाकर गरजते हैं। तुलसी यह लिखना नहीं भूलते कि गरज बल पाकर निकली, यानी वह आवाज़ सुग्रीव की थी और उसके पीछे का बल किसी और का था।
सुनत बालि क्रोधातुर धावा। गहि कर चरन नारि समुझावा॥
चौपाई ९
सुनु पति जिन्हहि मिलेउ सुग्रीवा। ते द्वौ बंधु तेज बल सींवा॥
सुनते ही बालि क्रोध में भरकर दौड़ा, और तभी वह हाथ उठा जो इस पूरे काण्ड में सबसे समझदार है। टीका बताती है कि यह स्त्री तारा हैं। वे चरण पकड़ लेती हैं, और जो कहती हैं उसमें न विनती है न रोना, सिर्फ़ ख़बर है: सुग्रीव जिनसे मिले हैं वे दोनों भाई तेज और बल की सीमा हैं। अगली अर्धाली में वे नाम भी ले लेती हैं, कोसलराज के पुत्र राम और लक्ष्मण, और यह भी जोड़ देती हैं कि वे संग्राम में काल को भी जीत सकते हैं।
इस प्रसंग में सामने खड़े ख़तरे को सबसे पहले और सबसे ठीक ठीक अगर किसी ने पहचाना, तो तारा ने पहचाना। राजा नहीं पहचान पाया, न कोई मंत्री, न सेना। और उत्तर में बालि जो कहता है, वही तुलसी के बालि को अलग खड़ा कर देता है।
कह बाली सुनु भीरु प्रिय समदरसी रघुनाथ।
दोहा ७
जौं कदाचि मोहि मारहिं तौ पुनि होउँ सनाथ॥ ७॥
प्रिये को भीरु कहकर, यानी डरपोक कहकर, वह चेतावनी टाल देता है, पर किसी तर्क से नहीं। वह कहता है कि रघुनाथ समदर्शी हैं। और फिर वह वाक्य आता है जिसे धीरे से पढ़ना चाहिये: कदाचित् वे मुझे मार ही दें तो मैं सनाथ हो जाऊँगा। युद्ध के लिये दौड़ता हुआ आदमी, जिसे अभी अभी बताया गया है कि सामने कौन खड़ा है, जाते जाते कह जाता है कि उसी के हाथों मरने में उसका कल्याण है। मरने से पहले ही उसने अपना अन्त चुन लिया, और उस अन्त को उसने हानि नहीं कहा, सनाथ हो जाना कहा।
सुग्रीव की ललकार सुनकर बालि क्रोध में दौड़ता है। तारा चरण पकड़कर बताती हैं कि सुग्रीव जिनसे मिले हैं वे दोनों भाई तेज और बल की सीमा हैं और संग्राम में काल को भी जीत सकते हैं। बालि उन्हें भीरु कहकर टाल देता है और कहता है कि समदर्शी रघुनाथ के हाथों मरना भी सनाथ हो जाना है।
पहला युद्ध, और गले में डाली गयी माला
ऐसा कहकर वह महाभिमानी चल पड़ा, सुग्रीव को तिनके के बराबर जानकर। दोनों भिड़े। बालि ने ख़ूब धमकाया, घूँसा मारा और बड़े जोर से गरजा। लड़ाई का यह हिस्सा तुलसी दो पंक्तियों में समेट देते हैं, क्योंकि इसमें था ही कुछ नहीं। यह युद्ध नहीं था, यह नाप थी।
तब सुग्रीव बिकल होइ भागा। मुष्टि प्रहार बज्र सम लागा॥
चौपाई १०
मैं जो कहा रघुबीर कृपाला। बंधु न होइ मोर यह काला॥
घूँसा वज्र की तरह लगा और सुग्रीव व्याकुल होकर भागे। लौटकर जो कहा उसमें उलाहना है: मैंने पहले ही कह दिया था, वह मेरा भाई नहीं, काल है। और राम का उत्तर वह है जो आगे की सारी योजना तय कर देता है। दोनों भाइयों का रूप एक जैसा है, इसी भ्रम में बाण नहीं छोड़ा गया। इसके बाद वे सुग्रीव के शरीर को हाथ से छूते हैं, देह वज्र जैसी हो जाती है और सारी पीड़ा जाती रहती है। मार खाकर लौटे हुए मित्र को पहले ठीक किया गया, उलाहने का उत्तर बाद में दिया गया।
मेली कंठ सुमन कै माला। पठवा पुनि बल देइ बिसाला॥
चौपाई ११
पुनि नाना बिधि भई लराई । बिटप ओट देखहिं रघुराई॥
और अब वह उपाय, जो इतना छोटा है कि पढ़ने वाला प्रायः उस पर से निकल जाता है। गले में फूलों की माला डाल दी गयी। इसी माला से दो एक जैसे शरीर अलग पहचाने जायँगे। जिस समस्या का हल बल से नहीं निकल रहा था, उसका हल एक निशानी से निकला। फिर बड़ा भारी बल देकर उन्हें दुबारा भेजा जाता है, युद्ध अनेक प्रकार से होता है, और रघुनाथ वृक्ष की ओट से देखते रहते हैं। यह ओट याद रखिये। थोड़ी ही देर में इसी ओट पर सवाल उठने वाला है।
पहले युद्ध में बालि का घूँसा वज्र जैसा लगता है और सुग्रीव भागकर लौटते हैं। राम बताते हैं कि दोनों का रूप एक जैसा होने के भ्रम से बाण नहीं चला। वे सुग्रीव की देह को छूकर वज्र जैसी कर देते हैं, गले में फूलों की माला डालते हैं, बड़ा बल देकर फिर भेजते हैं, और स्वयं वृक्ष की ओट से देखते हैं।
वह बाण, और वह सवाल
दूसरे युद्ध का अन्त भी वहीं होता है जहाँ पहले का हुआ था, पर इस बार तुलसी उससे आगे की एक पंक्ति और लिखते हैं।
बहु छल बल सुग्रीव कर हियँ हारा भय मानि।
दोहा ८
मारा बालि राम तब हृदय माझ सर तानि॥ ८॥
सुग्रीव ने बहुत छल किये, बहुत बल लगाया, और अन्त में भय मानकर हृदय से हार गये। इस क्रम पर ठहरिये। बाण इसके बाद चलता है, पहले नहीं। जब तक मित्र अपने बल से लड़ता रहा, हाथ नहीं उठा। जिस क्षण वह हृदय से हारा, उसी क्षण तानकर बाण हृदय में मारा गया। यह क्रम ही उस परिभाषा का पालन है जो इस पन्ने के आरम्भ में कही गयी थी, कि विपत्ति के समय स्नेह सौ गुना हो जाता है। सहायता तब आती है जब अपना बल चुक जाता है, उससे पहले नहीं।
परा बिकल महि सर के लागें । पुनि उठि बैठ देखि प्रभु आगें॥
चौपाई १२
स्याम गात सिर जटा बनाएँ । अरुन नयन सर चाप चढ़ाएँ॥
बाण लगते ही वह व्याकुल होकर धरती पर गिरा, और फिर उठ बैठा, क्योंकि सामने प्रभु दिखे। तुलसी अब जो चार चीज़ें गिनाते हैं वे मरते हुए आदमी की आँखों से देखी गयी हैं: साँवला शरीर, सिर पर बनी हुई जटा, लाल नेत्र, और धनुष पर चढ़ा हुआ बाण। जिसने अभी अभी मारा है, उसी का रूप इतने ठहराव से देखा जा रहा है। इसके बाद वह बार बार उधर देखता है और अपना चित्त उन चरणों में लगा देता है। प्रभु को पहचानकर उसने अपना जन्म सफल माना। और तब वह पंक्ति आती है जिस पर यह पूरा प्रसंग टिका हुआ है: हृदय में प्रीति है, और मुख में कठोर वचन।
मुख से जो निकलता है वह उलाहना है। धर्म की रक्षा के लिये अवतार लेकर व्याध की तरह छिपकर क्यों मारा। मैं वैरी और सुग्रीव प्यारा? किस अवगुण पर यह दण्ड मिला? सवाल सीधा है और इससे बचा नहीं जा सकता, और तुलसी बचते भी नहीं। पर जिस मुँह से यह निकल रहा है उसके भीतर क्या है, यह कवि पहले ही बता चुका है। इसलिये यह अभियोग नहीं है। यह उस आदमी का अन्तिम हठ है जो हार भी चुका है और पहचान भी चुका है, और जिसे अब कहने के लिये बस इतना ही बचा है।
अनुज बधू भगिनी सुत नारी । सुनु सठ कन्या सम ए चारी॥
चौपाई १३
इन्हहि कुदृष्टि बिलोकइ जोई । ताहि बधें कछु पाप न होई॥
उत्तर में राम कोई सफ़ाई नहीं देते। न ओट की, न बाण की। वे धर्म की एक धारा सामने रख देते हैं। छोटे भाई की स्त्री, बहन, पुत्र की स्त्री और कन्या, ये चारों बराबर हैं, और जो इन्हें बुरी दृष्टि से देखता है उसे मारने में कोई पाप नहीं होता। बालि का अपराध यहाँ नाम लिये बिना गिना दिया गया है। इसके आगे वे और पास आ जाते हैं: अत्यन्त अभिमान था, स्त्री की सीख पर कान नहीं दिया, और सुग्रीव को अपनी भुजाओं के बल का आश्रित जानते हुए भी उसे मारना चाहा। तारा की वही चेतावनी, जो प्रसंग के बीच में एक शब्द से टाल दी गयी थी, यहाँ अभियोग बनकर लौट आती है।
हृदय से हारे हुए सुग्रीव को देखकर राम तानकर बालि के हृदय में बाण मारते हैं। बालि गिरकर उठ बैठता है, प्रभु का रूप देखता है, चित्त उनके चरणों में लगा देता है, और मुख से कठोर उलाहना देता है कि व्याध की तरह छिपकर क्यों मारा। उत्तर में राम अनुज की स्त्री, बहन, पुत्र की स्त्री और कन्या को समान बताते हैं, और अभिमान तथा तारा की सीख न मानने का दोष गिनाते हैं।
अन्तिम विनती, और वह वर जो माँगा गया
उत्तर सुनकर बालि लड़ता नहीं। उसके भीतर जो पहले से भरा था वही अब बाहर आ जाता है, और सबसे पहले वह अपनी चतुराई का हथियार डाल देता है।
सुनहु राम स्वामी सन चल न चातुरी मोरि।
दोहा ९
प्रभु अजहूँ मैं पापी अंतकाल गति तोरि॥ ९॥
स्वामी के सामने मेरी चतुराई नहीं चलती। और फिर वह प्रश्न, जिसमें उलाहना और प्रार्थना दोनों घुले हुए हैं: अन्तकाल में आपकी गति पा लेने के बाद भी क्या मैं पापी ही रहा? यही वह जगह है जहाँ कठोर वचन गिर जाते हैं। थोड़ी देर पहले जो मुँह अभियोग लगा रहा था, वही अब शरण माँग रहा है, और दोनों के बीच किसी ने उसे समझाया नहीं है।
अत्यन्त कोमल हो चुकी इस वाणी को सुनते ही राम उसके सिर को अपने हाथ से छूते हैं, और जो कहते हैं वह इस काण्ड का सबसे बड़ा प्रस्ताव है: शरीर को अचल कर दें, प्राण बने रहें। यानी यह बाण, यह मृत्यु, वापस ली जा सकती है। जिस आदमी ने अभी अभी उलाहना दिया, उसी को उसी हाथ से जीवन दिया जा रहा है। और बालि उसे लेने से मना कर देता है।
जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं । अंत राम कहि आवत नाहीं॥
चौपाई १४
जासु नाम बल संकर कासी । देत सबहि सम गति अबिनासी॥
मना करने का कारण वह मुनियों की ओर देखकर बताता है। जन्म जन्म तक साधन करते रहते हैं, और अन्तकाल में मुँह से राम नहीं निकलता। जिनके नाम के बल से शंकर काशी में सबको समान रूप से अविनाशी गति देते हैं, वही इस समय आँखों के सामने खड़े हैं। इसके बाद वह वही प्रश्न पूछता है जिसका उत्तर किसी के पास नहीं है: ऐसा संयोग क्या फिर कभी बन पड़ेगा।
छंद में उसकी बात अपने शिखर पर पहुँचती है। जिनका गुणगान श्रुतियाँ नेति नेति कहकर करती रहती हैं, जिन्हें मुनि प्राण और मन को जीतकर तथा इन्द्रियों को नीरस बनाकर ध्यान में कभी कभार ही पाते हैं, वे सामने प्रकट खड़े हैं और कह रहे हैं कि शरीर रख लो। इस पर बालि जो उपमा देता है वह भूलती नहीं: ऐसा मूर्ख कौन होगा जो कल्पवृक्ष को हठपूर्वक काटकर उससे बबूल की बाड़ लगाये। जो सब कुछ दे सकता है उसके सामने खड़े होकर यह नश्वर देह माँग लेना ठीक वही मूर्खता है।
और तब वह वर माँगता है। पहली माँग अपने लिये है, पर उसमें अपने लिये कुछ है नहीं: कर्मवश जिस योनि में जन्म मिले, उसी में राम के चरणों में अनुराग बना रहे। दूसरी माँग पिता की है। यह पुत्र अंगद विनय और बल में मेरे ही समान है, इसे स्वीकार कीजिये, बाँह पकड़कर अपना दास बना लीजिये। जिस आदमी ने अभी अभी अपना राज्य, अपना बल और अपना शरीर तक छोड़ दिया, उसने अन्त में जो सँभालकर रखा वह अपना बेटा है, और उसे भी अपने पास नहीं रखा, राम के हाथ में रख दिया।
बालि मानता है कि स्वामी के आगे उसकी चतुराई नहीं चलती। राम उसका सिर छूकर शरीर अचल कर देने और प्राण रख लेने को कहते हैं, पर वह मना कर देता है, क्योंकि जो मुनियों को जन्म जन्म में नहीं मिलते वे सामने खड़े हैं। वह वर माँगता है कि जिस योनि में जन्म हो वहीं राम के चरणों में अनुराग रहे, और अपने पुत्र अंगद को राम के हाथ सौंप देता है।
गले से गिरती हुई माला
और फिर वह दोहा आता है जिसमें मृत्यु का कोई शोर नहीं है। न कोई चीख़, न कोई ऐंठन, न कोई अन्तिम वाक्य। सिर्फ़ एक उपमा।
राम चरन दृढ़ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग।
दोहा १०
सुमन माल जिमि कंठ ते गिरत न जानइ नाग॥ १०॥
उपमा पर ठहरिये। हाथी के गले में फूलों की माला पड़ी हो और चलते चलते गिर जाये, तो उसे पता तक नहीं चलता। इतना बड़ा शरीर, और उतनी हल्की माला। तुलसीदास बालि की देह को वही माला बना देते हैं। जिस शरीर के बल का हिसाब पूरे प्रसंग में लगाया जाता रहा, दुंदुभि की हड्डियों से, ताल के वृक्षों से, वज्र जैसे घूँसे से, वही शरीर अन्त में इतना हल्का निकला कि गिरते समय उसकी आहट तक नहीं हुई। और यह हल्कापन कहाँ से आया, यह दोहे के पहले ही आधे में लिख दिया गया है। राम के चरणों में की गयी दृढ़ प्रीति से।
राम के चरणों में दृढ़ प्रीति करके बालि शरीर छोड़ देता है, वैसे ही सहज जैसे हाथी को अपने गले से फूलों की माला का गिरना पता नहीं चलता।
और अन्त में, अपनी ओर
इस प्रसंग को एक साथ पढ़ने पर जो बात सबसे ऊपर रह जाती है, वह यह है कि यहाँ कही गयी बात और की गयी बात के बीच कोई दूरी नहीं है। जिस पन्ने पर मित्र का लक्षण गिनाया गया, उसी पन्ने पर उस लक्षण का पूरा दाम चुकाया गया। कहा गया था कि अपने बल के अनुमान से सदा हित करे, और विपत्ति के समय स्नेह सौ गुना कर दे। फिर सचमुच वह घड़ी आयी जब मित्र छल भी लगा चुका था, बल भी लगा चुका था और हृदय से हार चुका था, और ठीक उसी घड़ी हाथ उठा। परिभाषा और बाण के बीच इस प्रसंग में कोई तीसरी चीज़ नहीं है।
दूसरी बात तारा की है। उस घर में सबसे ठीक बात सबसे कम अधिकार वाले मुँह से निकली, और उसे एक शब्द में, भीरु कहकर, टाल दिया गया। थोड़ी देर बाद वही बात मरते हुए आदमी के सामने दोष बनकर रखी गयी, कि स्त्री की सीख पर कान नहीं दिया। जो चेतावनी समय पर सुन ली जाये वह सलाह बनी रहती है। टाल दी जाये तो वही चेतावनी बाद में अभियोग बन जाती है, और तब उसे सुनने के लिये न समय बचता है न शरीर।
और तीसरी बात उस मुँह और उस हृदय की है, जिनके बीच तुलसीदास ने पूरी एक पंक्ति रख दी। हृदय में प्रीति, मुख में कठोर वचन। बालि मरते समय भी सवाल पूछता है, और वही बालि उसी साँस में चित्त चरणों में लगा चुका है। इसीलिये उसे जीवन का प्रस्ताव मिलता है, और इसीलिये वह उसे ठुकरा देता है। तुलसी का यह बालि वाल्मीकि के बालि से अलग खड़ा है, और यह अन्तर जान लेना ज़रूरी है, क्योंकि इसी अन्तर में इस काण्ड का सुर छिपा हुआ है। इस कथा में जो हारता है वह भी अन्त में सनाथ ही होता है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, किष्किन्धाकाण्ड, दोहा ७ से १०, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।