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स्वयंप्रभा, सम्पाति और समुद्र-तट

रामचरितमानस · किष्किन्धाकाण्ड · स्वयंप्रभा, सम्पाति और समुद्र-तट

स्वयंप्रभा, सम्पाति और समुद्र-तट

पानी ढूँढ़ते ढूँढ़ते एक गुफा मिलती है, गुफा से निकलते ही समुद्र मिलता है, और समुद्र के किनारे बैठी हुई मौत के सामने एक बूढ़ा गीध आकर सीता का पता बता जाता है।

खोज पर निकले हुए दल के पास अब सिर्फ़ गिनती बची है। जो अवधि दी गयी थी वह पूरी होने को है, दक्षिण दिशा अपने अन्तिम छोर तक देखी जा चुकी है, और सीता का कोई चिह्न नहीं मिला। इस प्रसंग की शुरुआत किसी शत्रु से नहीं होती और किसी युद्ध से नहीं होती। शुरुआत प्यास से होती है। इस पूरे काण्ड में जो संकट सबसे छोटा दिखता है, वही सबसे पहले इन सबकी जान लेने पर आ जाता है।

इसके बाद जो होता है वह एक के बाद एक ऐसे दरवाज़े हैं जो अपने आप खुलते चले जाते हैं। ज़मीन के भीतर एक गुफा मिलती है, गुफा के भीतर एक बगीचा, बगीचे में एक तपस्विनी, और उस तपस्विनी की एक ही आज्ञा उन्हें वहाँ ला खड़ा करती है जहाँ से आगे धरती नहीं है। धरती के अन्त पर बैठकर वे प्राण त्यागने का निश्चय करते हैं, और ठीक उसी क्षण पहाड़ की एक कन्दरा से वह प्राणी निकलता है जिसे उनका शोक नहीं, उनका आहार दिखायी देता है।

तुलसीदास इस पूरे हिस्से को बहुत कसकर बाँधते हैं। दोहा चौबीस से तीस तक, सात दोहों के भीतर, वह सब आ जाता है जिसे और कहीं बहुत लम्बा कहा गया है: गुफा, तपस्विनी, अनशन, सम्पाति की जीवनकथा, उसके पंखों का लौटना, लंका का पता, और अन्त में वह क्षण जिसके लिये यह पूरा काण्ड चला था। यहाँ जो कथा है वह मानस की अपनी कथा है, किसी और रामायण की नहीं, और इसी पाठ के भीतर रहकर कही गयी है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • हनुमान पवनसुत। इस प्रसंग के पहले हिस्से में वही सबको बचाते हैं, और अन्तिम हिस्से में उन्हें उनका अपना बल याद दिलाना पड़ता है।
  • अंगद बालि के पुत्र, युवराज। इस पन्ने पर सबसे ज़्यादा टूटने वाले यही हैं, और टूटकर भी सबसे काम की बात यही कहते हैं।
  • जाम्बवान् ऋक्षराज, रीछपति। सबसे बूढ़े, सबसे शान्त, और अन्त में सही आदमी की ओर उँगली उठाने वाले।
  • स्वयंप्रभा गुफा के भीतर तप में बैठी स्त्री। मूल चौपाई उन्हें नाम नहीं देती, नारि तप पुंज कहती है; नाम टीका से आता है।
  • सम्पाति जटायु का बड़ा भाई। बिना पंखों का बूढ़ा गीध, जिसकी आँख अब भी समुद्र के पार तक देख लेती है।
  • जटायु इस पन्ने पर मौजूद नहीं, सिर्फ़ याद किया हुआ। उसी की याद इस पूरे प्रसंग का ताला खोलती है।
  • चन्द्रमा मुनि वह मुनि जिन्होंने गिरे हुए सम्पाति को उठाया और बता दिया कि उसका बचा हुआ जीवन किस दिन के लिये है।
  • सीता इस पन्ने पर सिर्फ़ एक पंक्ति में दिखायी देती हैं, और वह एक पंक्ति ही सब कुछ बदल देती है।

प्यास, और ज़मीन में एक छेद

दक्षिण की ओर भेजा गया दल अब तक वह सब कर चुका है जो बल से किया जा सकता था। रास्ते में कहीं कोई राक्षस सामने पड़ जाता है तो बात आगे नहीं बढ़ती, एक ही चपत में उसके प्राण निकल जाते हैं। पर्वत एक एक करके छाने जा चुके हैं, वन छाने जा चुके हैं, और जहाँ कहीं कोई मुनि दिखायी दे जाता है वहाँ सारा दल उसे घेरकर खड़ा हो जाता है और वही एक प्रश्न पूछता है जिसका उत्तर अब तक किसी के पास नहीं निकला।

पर इस खोज में हार किसी शत्रु से नहीं आती। हार प्यास से आती है। घने जंगल में जल कहीं नहीं मिलता, चलते चलते रास्ता भी भूल जाता है, और जिन भुजाओं ने अभी अभी राक्षसों को गिराया था वे एक ऐसी चीज़ के आगे ढीली पड़ जाती हैं जिस पर तलवार नहीं चलती। सब अत्यन्त व्याकुल हैं। हनुमान उन्हें देखते हैं और मन ही मन हिसाब लगा लेते हैं कि जल के बिना यह पूरा दल यहीं समाप्त हो जायेगा।

यह हिसाब लगाना ही इस प्रसंग की पहली घटना है। बाक़ी सब बैठकर प्यास से लड़ रहे हैं, एक आदमी उठकर ऊपर चढ़ जाता है। वे पहाड़ की चोटी पर पहुँचकर चारों दिशाएँ देखते हैं, और नीचे पृथ्वी के भीतर जाता हुआ एक बिल दिखायी देता है। उस बिल के मुँह पर जो हो रहा है उसे तुलसीदास कौतुक कहते हैं। चकवे उड़ रहे हैं, बगुले उड़ रहे हैं, हंस उड़ रहे हैं, और बहुत सारे पक्षी उसी मुँह के भीतर घुसते चले जा रहे हैं।

पक्षी इस तरह जहाँ जाते हैं वहाँ जल होता है। यह बात किसी शास्त्र से नहीं आती, आँख से आती है, और यही इस पूरे काण्ड में हनुमान का ढंग है। वे कोई चमत्कार नहीं करते। वे ध्यान से देखते हैं।

चढ़ि गिरि सिखर चहूँ दिसि देखा। भूमि बिबर एक कौतुक पेखा॥
चक्रबाक बक हंस उड़ाहीं । बहुतक खग प्रबिसहिं तेहि माहीं॥

चौपाई १

पवनसुत पहाड़ से उतरकर नीचे आते हैं और सबको ले जाकर वह बिल दिखा देते हैं। आगे कौन चले, इस पर एक शब्द की बहस नहीं होती। सबने हनुमान को आगे कर लिया और पीछे पीछे भीतर घुस गये। देर नहीं की, यह तुलसीदास अलग से कह देते हैं, और यह छोटी सी बात बहुत कुछ बता जाती है। जो लोग प्यास से मर रहे हों उनके पास किसी अनजान अँधेरे के मुँह पर खड़े होकर सोचते रहने का समय नहीं होता।

भीतर जो मिलता है उसकी किसी को तैयारी नहीं थी। अँधेरे की जगह एक उपवन है। उत्तम बगीचा, उसके बीच एक तालाब, और तालाब में बहुत से कमल खिले हुए। वहीं एक सुन्दर मन्दिर है, और उस मन्दिर में एक स्त्री बैठी है। तुलसीदास उसका कोई नाम नहीं देते, कोई कुल नहीं बताते। वे उसके लिये सिर्फ़ तीन शब्द रखते हैं, नारि तप पुंज, एक स्त्री जो पूरी की पूरी तप की ढेरी है।

दीख जाइ उपबन बर सर बिगसित बहु कंज।
मंदिर एक रुचिर तहँ बैठि नारि तप पुंज॥ २४॥

दोहा २४

पानी की खोज उन्हें पृथ्वी के भीतर उतार ले जाती है। गुफा के भीतर बगीचा है, तालाब है, और मन्दिर में तप में बैठी एक स्त्री है, जिसका नाम मूल चौपाई नहीं देती।

गुफा के भीतर, और गुफा के बाहर

दल दूर से ही उन्हें सिर नवाता है। पास जाकर कोई ज़बरदस्ती नहीं, कोई माँग नहीं। पूछने पर उन्होंने अपना पूरा वृत्तान्त कह सुनाया, कि वे कौन हैं, किसके भेजे हुए हैं, और किसे खोज रहे हैं। उत्तर में उस स्त्री ने जो कहा वह इस प्रसंग का सबसे साधारण और सबसे सुन्दर वाक्य है: जलपान कीजिये, और भाँति भाँति के रसीले सुन्दर फल खाइये।

जिस संकट को हल करने के लिये वे भीतर घुसे थे वह एक वाक्य में हल हो जाता है। सबने स्नान किया, मीठे फल खाये, और फिर लौटकर उन्हीं के पास आ बैठे। तब उन्होंने अपनी कथा सुनायी, और साथ में एक बात ऐसी कही जो उस समय इनके काम की नहीं लगती थी: अब वे स्वयं वहाँ जायेंगी जहाँ रघुनाथ हैं।

और इसके बाद जो आज्ञा आती है वह इस पन्ने का सबसे विचित्र वाक्य है। आँखें मूँद लीजिये और गुफा छोड़कर बाहर निकल जाइये। सीता मिल जायेंगी, पछताइये नहीं। कैसे निकलेंगे, कहाँ निकलेंगे, इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं है। जिन लोगों ने महीने भर पहाड़ घिसे हैं उनसे कहा जा रहा है कि आँखें बन्द कर लीजिये और चल दीजिये।

मूदहु नयन बिबर तजि जाहू । पैहहु सीतहि जनि पछिताहू॥
नयन मूदि पुनि देखहिं बीरा । ठाढ़े सकल सिंधु कें तीरा॥

चौपाई २

आँखें खुलीं तो पैरों के नीचे रेत है और सामने समुद्र। बीच का कोई दृश्य तुलसीदास नहीं दिखाते। न कोई सुरंग, न कोई उड़ान, न कोई मन्त्र। एक पंक्ति में वे गुफा के भीतर हैं और दूसरी पंक्ति में सब वीर समुद्र के तीर पर खड़े हैं। इस चुप्पी में ही इस प्रसंग का संकेत छिपा है। जिस दल को अब तक अपने बल पर भरोसा था, उसे यहाँ से आगे हर क़दम किसी और के हाथ से मिलने वाला है।

और वह स्त्री अपने काम से चली जाती हैं। जाकर रघुनाथ के चरणकमलों पर मस्तक नवाती हैं, बहुत प्रकार से विनती करती हैं, और प्रभु उन्हें वह चीज़ देते हैं जिसे तुलसीदास अनपायनी भगति कहते हैं, ऐसी भक्ति जो कभी घटती नहीं, कभी छूटती नहीं।

टीका में इस स्त्री का नाम स्वयंप्रभा आता है। मूल चौपाई में वह नाम एक बार भी नहीं है, और यह चुप्पी अपने आप में कुछ कहती है। जिसने इस पूरी खोज को उसके अन्तिम किनारे तक पहुँचा दिया, उसका नाम पाठ में दर्ज करना ज़रूरी नहीं समझा गया। वे प्रभु की आज्ञा सिर पर धारण करती हैं, राम के उन युगल चरणों को हृदय में रखती हैं जिनकी ब्रह्मा और महेश तक वन्दना करते हैं, और बदरीवन की ओर निकल जाती हैं।

बदरीबन कहुँ सो गई प्रभु अग्या धरि सीस।
उर धरि राम चरन जुग जे बंदत अज ईस॥ २५॥

दोहा २५

गुफा में प्यास बुझती है और आज्ञा मिलती है। आँख खुलते ही सारा दल समुद्र के तट पर खड़ा है, और वह तपस्विनी राम के चरणों में अपनी विनती रखकर बदरीवन चली जाती हैं।

किनारे पर बैठा हुआ मरण

अब उनके सामने पानी ही पानी है, और उस पार क्या है यह किसी को नहीं मालूम। यहाँ आकर पहली बार वह गिनती सामने आ खड़ी होती है जिसे अब तक सब टालते रहे थे। जो अवधि दी गयी थी वह बीत चुकी है, और काम कुछ नहीं हुआ। आपस में जो बात होती है उसमें कोई बहादुरी नहीं है: बिना ख़बर लिये लौटकर भी करेंगे क्या।

अंगद की आँखों में जल भर आता है। वे जो कहते हैं वह किसी भी हारी हुई सेना के सबसे कठिन क्षण का सच है। दोनों तरफ़ से मृत्यु खड़ी है, और बीच में खड़े होने की कोई जगह नहीं बची।

कह अंगद लोचन भरि बारी । दुहुँ प्रकार भइ मृत्यु हमारी॥
इहाँ न सुधि सीता कै पाई । उहाँ गएँ मारिहि कपिराई॥

चौपाई ३

फिर वे वह बात कहते हैं जिसे इस काण्ड का सबसे तीखा वाक्य कहा जा सकता है। पिता के वध के बाद सुग्रीव उन्हें वहीं मार डालते; बचाया राम ने था, इसमें सुग्रीव का कोई एहसान नहीं। बालि के बेटे को यह बात कहने में भीतर से क्या गुज़री होगी, तुलसीदास उसका वर्णन नहीं करते। वे बस इतना लिखते हैं कि अंगद बार बार सबसे यही कहते रहे कि अब मरण हुआ, इसमें कुछ सन्देह नहीं।

वानर वीर सुनते हैं और कुछ बोल नहीं पाते। आँखों से जल बहता रहता है। एक क्षण के लिये सब सोच में डूब जाते हैं, और उसी एक क्षण में वह निर्णय बन जाता है जो इस पूरे दल का चरित्र बता देता है। वे युवराज को दिलासा नहीं देते, कोई नयी योजना नहीं बनाते, सुग्रीव को कोसते भी नहीं। वे सिर्फ़ इतना कहते हैं कि लौटेंगे नहीं।

हम सीता कै सुधि लीन्हें बिना। नहिं जैहैं जुबराज प्रबीना॥
अस कहि लवन सिंधु तट जाई । बैठे कपि सब दर्भ डसाई॥

चौपाई ४

दर्भ डसाई, यानी कुश बिछाकर। यह एक शब्द पूरी बात कह देता है। कुश बिछाकर बैठना प्राण त्यागने के संकल्प का आसन है। यह हार मान लेना नहीं है, यह हार को स्वीकार करने से इनकार है, इस शर्त पर कि फिर उठना नहीं होगा। जो दल सीता को खोजने निकला था वह अब लवणसागर के किनारे एक पंक्ति में बैठा हुआ अनशन है।

अवधि बीत चुकी है। अंगद दोनों ओर मृत्यु देखते हैं, और सारा दल सीता की ख़बर लिये बिना न लौटने का निश्चय करके लवणसागर के तट पर कुश बिछाकर बैठ जाता है।

जाम्बवान् क्या करते हैं

ऐसे समय में सबसे बूढ़ा आदमी क्या करता है, यह देखने लायक़ है। जाम्बवान् अंगद का दुख देखते हैं और कोई सान्त्वना नहीं देते। वे सुग्रीव की सफ़ाई नहीं देते, बालि की बात नहीं उठाते, कोई नया उपाय नहीं सुझाते। वे कथाएँ कहने लगते हैं, और कथाओं के साथ विशेष उपदेश।

उन कथाओं का सार एक ही वाक्य में आ जाता है। जिसके पीछे यह सब हो रहा है, उसे आदमी मत समझिये।

तात राम कहुँ नर जनि मानहु । निर्गुन ब्रह्म अजित अज जानहु॥

चौपाई ५

यह मानस का अपना स्वर है, और यहीं वह और रामायणों से अलग खड़ा हो जाता है। जाम्बवान् के लिये राम अयोध्या के राजकुमार भर नहीं हैं। वे निर्गुण ब्रह्म हैं, अजित हैं, अजन्मा हैं, और जो रूप सामने चल फिर रहा है वह उसी का सगुण हो जाना है। इसके तुरन्त बाद वे जो कहते हैं वह डूबे हुए मन को उठाने का तुलसीदास का अपना तरीक़ा है: हम सब सेवक अत्यन्त बड़भागी हैं, क्योंकि हमारा मन निरन्तर उसी सगुण ब्रह्म में लगा हुआ है। दुख का उत्तर यहाँ आशा नहीं है, सौभाग्य है।

फिर वे यह भी बता देते हैं कि ऐसा रूप धरने की ज़रूरत ही क्यों पड़ती है। कोई कर्म का बन्धन प्रभु को नहीं खींचता। वे अपनी इच्छा से उतरते हैं, और किनके लिये उतरते हैं इसकी सूची तुलसीदास चार नामों में बाँध देते हैं: देवता, पृथ्वी, गौ और ब्राह्मण। और जो उपासक इस सगुण रूप से एक बार जुड़ जाते हैं, वे मोक्ष तक छोड़ देते हैं ताकि साथ बने रह सकें।

निज इच्छाँ प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि।
सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोच्छ सब त्यागि॥ २६॥

दोहा २६

जाम्बवान् उपदेश की कथाएँ कहते हैं: राम को मनुष्य न समझिये, निर्गुण ब्रह्म जानिये। प्रभु अपनी इच्छा से देवता, पृथ्वी, गौ और ब्राह्मण के लिये अवतार लेते हैं, और उनके उपासक सब प्रकार के मोक्ष त्यागकर उनके साथ रहते हैं।

कन्दरा से निकली हुई भूख

यह सारी बातचीत खुले तट पर हो रही है, और तट के पीछे पहाड़ है। पहाड़ की एक कन्दरा में कोई बैठा सुन रहा है। जाम्बवान् की कथाएँ जिसके कानों तक पहुँचती हैं उसे न राम में रुचि है, न सीता में। वह बाहर निकलकर देखता है तो उसे बहुत सारे वानर दिखायी देते हैं, और उसके मुँह से जो निकलता है उससे तट पर बैठा हर प्राणी सिहर उठता है।

बाहेर होइ देखि बहु कीसा। मोहि अहार दीन्ह जगदीसा॥

चौपाई ६

आज इन सबको खा जाऊँगा, वह कहता है। बहुत दिन बीत गये, आहार के बिना मर रहा था, पेट भर भोजन कभी नहीं मिलता, और आज विधाता ने एक ही बार में इतना सब भेज दिया। यह कोई राक्षस नहीं है और कोई देवता भी नहीं। यह एक बूढ़ा भूखा गीध है, और उसकी भूख उतनी ही सच्ची है जितनी थोड़ी देर पहले वानरों की प्यास थी। इस पूरे प्रसंग में सहायता भी और संकट भी, दोनों शरीर की एक साधारण ज़रूरत से शुरू होते हैं।

गीध के वचन कानों में पड़ते ही सब समझ जाते हैं कि अब सचमुच मरना हो गया। वे कुश छोड़कर उठ खड़े होते हैं। जाम्बवान् के मन में विशेष सोच होता है, क्योंकि वही जानते हैं कि जो दल प्राण त्यागने बैठा है वह लड़ नहीं सकता, और जो लड़ नहीं सकता उसके पास सिर्फ़ बोलना बचता है।

और यहीं इस काण्ड की सबसे बारीक़ चीज़ घटती है। अंगद किसी योजना से नहीं बोलते। वे मन में विचार करके एक ऐसी बात कहते हैं जिसका उस क्षण कोई काम नहीं है। उन्हें उस पक्षी की याद आ जाती है जो इसी काम में मारा गया था।

कह अंगद बिचारि मन माहीं । धन्य जटायू सम कोउ नाहीं॥
राम काज कारन तनु त्यागी। हरि पुर गयउ परम बड़भागी॥

चौपाई ७

यह वाक्य किसी को सुनाने के लिये नहीं कहा गया था। यह मरने से पहले एक मरे हुए साथी को दी गयी श्रद्धांजलि थी। पर तट पर खड़ा वह भूखा पक्षी उसमें से एक नाम पकड़ लेता है, और उसका सारा भूखा उत्साह एक साथ हर्ष और शोक में बदल जाता है। वह पास आता है। वानर डर जाते हैं, क्योंकि उनके लिये यह अब भी वही गीध है जो उन्हें खाने निकला था।

पर वह पहले उन्हें अभय देता है, फिर पास जाकर पूछता है, और तब वे उसे पूरी कथा सुनाते हैं: जटायु ने क्या देखा, क्या किया और कैसे गया। भाई की करनी सुनकर वह गीध चुप नहीं रहता। वह बहुत प्रकार से रघुनाथ की महिमा का वर्णन करने लगता है, और फिर एक सौदा रखता है जो सौदा कम और विनती ज़्यादा है। उसे समुद्र के किनारे ले चला जाये ताकि वह अपने छोटे भाई को तिलांजलि दे सके। बदले में वह वचन से सहायता करेगा, और जिसे वे खोज रहे हैं वह उन्हें मिल जायेगा।

सम्पाति उन्हें आहार समझकर बाहर निकलता है। अंगद के मुँह से जटायु का नाम सुनकर वह रुक जाता है, अभय देकर पूरी कथा पूछता है, और भाई की तिलांजलि के बदले वचन से सहायता का वादा करता है।

जटायु का भाई, और सूरज

समुद्र के तीर पर वह अपने छोटे भाई की क्रिया पूरी करता है। तिलांजलि दी जा चुकी, अब वह बैठकर अपनी कथा कहता है, और यह कथा इस पूरे पन्ने की सबसे निजी चीज़ है। दो भाई थे, दोनों उठती जवानी में, और एक दिन दोनों उड़ते उड़ते आकाश में सूर्य के पास तक चले गये।

छोटा भाई तेज नहीं सह सका और लौट आया। बड़े भाई ने लौटना अपनी शान के ख़िलाफ़ समझा। तुलसीदास उस पर कोई लम्बा दोष नहीं लगाते। वे सिर्फ़ एक शब्द रखते हैं, और वह शब्द सम्पाति अपने मुँह से अपने ही लिये कहता है।

तेज न सहि सक सो फिरि आवा। मैं अभिमानी रबि निअरावा॥
जरे पंख अति तेज अपारा । परेउँ भूमि करि घोर चिकारा॥

चौपाई ८

अभिमान का दण्ड यहाँ उपदेश से नहीं आता, आग से आता है। पंख जल जाते हैं और वह घोर चीख़ मारकर ज़मीन पर आ गिरता है। जो प्राणी आकाश के लिये बना था वह ज़मीन पर पड़ा है, और उसके पास न उड़ान बची है न वह देह जिस पर उसे घमण्ड था। इस पन्ने पर आगे जो कुछ सम्भव होने वाला है, उसकी जड़ इसी गिरने में है।

वहाँ चन्द्रमा नाम के एक मुनि थे। उन्हें उस गिरे हुए पक्षी को देखकर दया आयी, और उन्होंने जो किया वह मरहम लगाना नहीं था। उन्होंने बहुत प्रकार से ज्ञान सुनाया और उसका देह से जुड़ा अभिमान छुड़ा दिया। पंख बाद में लौटे। पहले वह चीज़ गयी जिसने पंख जलवाये थे।

और फिर मुनि ने उसे बता दिया कि उसका बचा हुआ जीवन किस दिन के लिये रखा गया है।

त्रेताँ ब्रह्म मनुज तनु धरिही । तासु नारि निसिचर पति हरिही॥
तासु खोज पठइहि प्रभु दूता। तिन्हहि मिलें तैं होब पुनीता॥

चौपाई ९

मुनि ने यह भी कहा कि पंख फिर उग आयेंगे, चिन्ता की कोई बात नहीं, और उन दूतों को सीता दिखा देनी है। एक वाक्य सुनकर एक अपंग पक्षी ने पूरा युग बिता दिया। जिस दिन तट पर यह दल आकर बैठा, उस दिन उसने कहा कि मुनि की वह वाणी आज सत्य हुई, और अब मेरे वचन सुनकर प्रभु का कार्य कीजिये। जिसे हम संयोग कहते हैं, उसे यह पक्षी अपनी प्रतीक्षा का फल कहता है।

सम्पाति अपनी कथा कहता है: सूर्य के पास जाकर पंख जल गये, चन्द्रमा मुनि ने ज्ञान देकर देह का अभिमान छुड़ाया, और बता दिया कि त्रेता में प्रभु के दूत आयेंगे और उन्हें सीता दिखानी है।

अपार दृष्टि, और एक नाम

अब वह वही करता है जिसके लिये उसे इतने बरस रोका गया था। वह बताता है कि त्रिकूट पर्वत के ऊपर लंका बसी है, और वहाँ रावण रहता है, जिसे तुलसीदास सहज असंका कहते हैं, स्वभाव से ही निडर, जिसे किसी से डर लगता ही नहीं। और उसी लंका में एक बगीचा है जिसका नाम अशोक है।

गिरि त्रिकूट ऊपर बस लंका। तहँ रह रावन सहज असंका॥
तहँ असोक उपबन जहँ रहई । सीता बैठि सोच रत अहई॥

चौपाई १०

इस एक पंक्ति के लिये यह पूरा काण्ड चला है। महीनों की खोज, बालि का वध, सुग्रीव की दी हुई अवधि, चारों दिशाओं के दल, गुफा, समुद्र, अनशन, यह सब इसी एक सूचना पर आकर ठहरता है कि वे कहाँ हैं और किस हाल में हैं। सीता जीवित हैं। वे लंका में हैं। वे अशोक नाम के उपवन में बैठी हैं और सोच में डूबी हुई हैं। इसके आगे इस काण्ड को और कुछ नहीं चाहिये।

सम्पाति यह भी साफ़ कर देता है कि यह ख़बर उसके पास आयी कहाँ से। वह उन्हें इसी समय देख रहा है, और तट पर खड़ा कोई और नहीं देख सकता, क्योंकि गीध की दृष्टि अपार होती है। इसी साँस में वह अपनी सीमा भी बता देता है। वह बूढ़ा हो चुका है, नहीं तो कुछ सहायता स्वयं भी कर देता। जिस प्राणी के पास आँख है उसके पास पंख का बल नहीं है, और जिनके पास बल है उनके पास वह आँख नहीं है। इस पूरे काण्ड में कोई अकेला पूरा नहीं है, और शायद यही इसका सबसे बड़ा सबक़ है।

और तब वह वह शर्त रखता है जिससे इस कथा का अगला पूरा सोपान निकलता है।

जो नाघइ सत जोजन सागर। करइ सो राम काज मति आगर॥

चौपाई ११

सौ योजन, यानी चार सौ कोस। यह संख्या तुलसीदास एक बार रखते हैं और फिर आगे हर जगह उसी की छाया पड़ती रहती है। ध्यान देने की बात यह है कि शर्त में सिर्फ़ बल नहीं है। जो लाँघेगा वह मति आगर भी हो, बुद्धि का भण्डार हो। समुद्र पार करना आधा काम है। उस पार पहुँचकर क्या करना है और क्या नहीं करना है, यह दूसरा आधा है, और आगे चलकर यही आधा भारी पड़ता है।

अन्त में वह गीध उन्हें अपनी ओर देखने को कहता है। जो शरीर बिना पंखों के बेहाल पड़ा था वह राम की कृपा से देखते ही देखते ऐसा हो गया। जिनका नाम स्मरण करके पापी तक अपार भवसागर तर जाते हैं, उन्हीं के दूत होकर कायरता कैसी। राम को हृदय में धारण करके उपाय कीजिये। इतना कहकर वह चला जाता है, और तट पर फिर वही दल बचता है, अब एक पते के साथ और एक नाप के साथ।

सम्पाति लंका, अशोक उपवन और सीता का पता बता देता है, अपनी वृद्धावस्था की सीमा स्वीकार करता है, और शर्त रख देता है कि जो सौ योजन समुद्र लाँघ सके और बुद्धि का भण्डार हो, वही यह काम कर सकेगा।

किसमें कितना बल है

गीध के जाते ही वानरों के मन में बड़ा विस्मय हुआ। फिर वह होता है जो ऐसी सभाओं में हमेशा होता है। हर कोई अपना अपना बल बताने लगता है। तुलसीदास इस पूरे दृश्य को आधी पंक्ति में निपटा देते हैं, और उसी आधी पंक्ति में उसका नतीजा भी रख देते हैं: पार जाने में सबने सन्देह रखा। बल सबके पास था। भरोसा किसी के पास नहीं था।

ऋक्षराज जाम्बवान् सबसे पहले अपनी गिनती से बाहर हो जाते हैं। वे कहते हैं कि अब बूढ़े हो गये, शरीर में पहले वाले बल का लेश भी नहीं बचा। और फिर वे एक याद सुनाते हैं जो इस समुद्र को उसकी असली जगह पर बिठा देती है। जब खरारि ने वामन से त्रिविक्रम होकर बलि को बाँधा था, तब ये जवान थे और इनमें बड़ा बल था। प्रभु उस समय इतने बढ़े कि उस देह का वर्णन ही नहीं हो सकता, और दो ही घड़ी में इन्होंने दौड़कर उस देह की सात परिक्रमाएँ पूरी कर ली थीं।

यह डींग नहीं है, यह पैमाना है। जिस शरीर की सात परिक्रमाएँ दो घड़ी में हो जाती थीं, उसके सामने चार सौ कोस पानी कोई बड़ी दूरी नहीं है। जाम्बवान् इस याद के बहाने असल में यह कह रहे हैं कि जो काम असम्भव लग रहा है वह इस सृष्टि में पहले भी हुआ है, और उन्हीं की आँखों के सामने हुआ है। बूढ़े आदमी की सबसे बड़ी सम्पत्ति यही होती है कि उसने बड़ी चीज़ों को घटते देखा है।

अंगद कहते हैं कि पार तो वे चले जायेंगे, पर लौटते समय के बारे में मन में कुछ सन्देह है। जाम्बवान् उन्हें सब प्रकार से योग्य मानते हैं और फिर भी रोक देते हैं, और कारण वही है जो हर समझदार सेनापति को रोकता है: अंगद सबके नायक हैं, और नायक को दूत बनाकर नहीं भेजा जाता।

और अब वह क्षण आता है जो इस पूरे काण्ड का असली अन्त है। सब बोल चुके हैं। एक आदमी है जो शुरू से चुप बैठा है, वही जिसने पहाड़ पर चढ़कर बिल खोजा था और जिसे सबने आगे करके अनजान गुफा में डाल दिया था। ऋक्षराज उसी की ओर मुड़ते हैं।

कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना॥
पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥

चौपाई १२

कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥
राम काज लगि तव अवतारा । सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥

चौपाई १३

इन दो चौपाइयों में कहीं कोई नया वरदान नहीं है, कोई अस्त्र नहीं है, कोई मन्त्र नहीं है। जाम्बवान् सिर्फ़ वह बताते हैं जो पहले से सच है। पवन का पुत्र, बल में पवन के समान, बुद्धि और विवेक और विज्ञान की खान, और यह अवतार ही राम के काम के लिये हुआ है। इस काण्ड का सबसे बड़ा चमत्कार किसी वरदान से नहीं होता। वह एक याद दिलाने से होता है।

और सुनते ही वह याद देह में उतर आती है। हनुमान पर्वत के आकार के हो जाते हैं। सोने का सा रंग, शरीर पर तेज ऐसा मानो पर्वतों का दूसरा राजा खड़ा हो। वे बार बार सिंहनाद करते हैं और कहते हैं कि इस खारे समुद्र को खेल में ही लाँघ जायेंगे, और चाहें तो सहायकों समेत रावण को मारकर त्रिकूट पर्वत को उखाड़कर यहीं ले आयें।

यह वह क्षण है जहाँ बात बिगड़ भी सकती थी। अभी अभी इसी तट पर एक ऐसे पक्षी की कथा सुनी गयी है जिसका अभिमान उसे सूरज तक ले गया था और पंख जलाकर वापस लाया था। पर हनुमान अपना वाक्य पूरा करते ही मुड़कर पूछते हैं कि उन्हें उचित सीख दी जाये, कि करना क्या है। बल बोल चुका, और बोलते ही आज्ञा माँगने लगा। यही एक बात सम्पाति की जवानी और हनुमान की छलाँग के बीच का पूरा फ़र्क़ है।

और जाम्बवान् जो आज्ञा देते हैं वह इस पूरे पन्ने की सबसे संयत पंक्ति है।

एतना करहु तात तुम्ह जाई । सीतहि देखि कहहु सुधि आई॥

चौपाई १४

इतना ही करना है। जाकर सीता को देख लीजिये और लौटकर ख़बर कह दीजिये। रावण को मारना, लंका को उखाड़ना, यह सब उस दिन कमलनयन राम अपनी भुजाओं के बल से करेंगे, और वानरों की सेना साथ केवल खेल के लिये लेंगे। जो काम सबसे बड़ा लग रहा था, उसे सबसे बूढ़े आदमी ने काटकर उसके असली नाप पर ला दिया: देखना, और लौट आना।

सब अपना अपना बल बताते हैं और सब पार जाने में सन्देह करते हैं। जाम्बवान् अपनी याद से समुद्र का नाप बदल देते हैं, अंगद को नायक होने के कारण रोकते हैं, और हनुमान को उनका अपना बल याद दिलाते हैं। हनुमान पर्वत के आकार के हो जाते हैं और आज्ञा माँगते हैं, और आज्ञा मिलती है सिर्फ़ इतनी कि देखकर लौट आइये।

सोपान यहीं बन्द होता है

इसके बाद तुलसीदास कथा को एक क़दम आगे नहीं ले जाते। जाम्बवान् का वाक्य पूरा होते ही छन्द आ जाता है, और छन्द में वे वह दृश्य दिखा देते हैं जो अभी घटा ही नहीं है: वानरों की सेना साथ लेकर राक्षसों का संहार करके राम सीता को ले आयेंगे, देवता और नारद आदि मुनि उस सुयश का बखान करेंगे जो तीनों लोकों को पवित्र करता है, और जिसे सुनने, गाने, कहने और समझने से मनुष्य परमपद पा जाता है। उसी यश को रघुवीर के चरणकमलों का भ्रमर तुलसीदास गाता है।

फिर अन्तिम दोहा आता है, और वह कथा के किसी पात्र से नहीं, सीधे पढ़ने वाले से बात करता है।

भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिं जे नर अरु नारि।
तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि॥ ३० (क)॥

दोहा ३० (क)

इसके साथ एक सोरठा और है, जिसमें उस श्याम शरीर का स्मरण है जो नीले कमल जैसा है, जिसकी शोभा करोड़ों कामदेवों से भी अधिक है, और जिसका नाम पापरूपी पक्षियों के लिये बहेलिये का काम करता है। उसके बाद पाठ पर वह चिह्न पड़ता है जो वर्षभर की मासपारायण में इस दिन का विश्राम बताता है, तेईसवाँ विश्राम, और फिर वह पुष्पिका जो कहती है कि कलियुग के सारे पापों का नाश करने वाले श्रीरामचरितमानस का चौथा सोपान समाप्त हुआ।

समाप्त तो हुआ, पर रुका कहीं नहीं। किष्किन्धाकाण्ड अपनी अन्तिम पंक्ति उस आदमी पर छोड़ देता है जो तट पर खड़ा है, जिसका नाप लिया जा चुका है, जो आज्ञा ले चुका है, और जो अभी कूदा नहीं है।

छन्द आगे का सारा युद्ध पहले ही दिखा देता है, अन्तिम दोहा और सोरठा पढ़ने वाले को सम्बोधित करते हैं, और मासपारायण के तेईसवें विश्राम के साथ चौथा सोपान समाप्त हो जाता है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस पूरे प्रसंग में कोई किसी को नयी शक्ति नहीं देता, और यह बात ध्यान खींचती है। स्वयंप्रभा जल और फल देती हैं, फिर आँख मूँदने को कह देती हैं। चन्द्रमा मुनि पंख वापस नहीं लगाते, अभिमान उतारते हैं और प्रतीक्षा का दिन बता देते हैं। सम्पाति लड़ने नहीं आता, सिर्फ़ देखकर पता बता जाता है। जाम्बवान् किसी को बलवान नहीं बनाते, एक आदमी को यह याद दिलाते हैं कि वह पहले से क्या है। सहायता यहाँ हर बार सूचना, आज्ञा और स्मरण के रूप में आती है, और हर बार काम कर जाती है।

दूसरी बात उस चुप्पी की है जो हनुमान इस पूरे काण्ड में साधे रहते हैं। वे पहाड़ पर चढ़ते हैं, बिल खोजते हैं, सबको आगे आगे लेकर भीतर जाते हैं, और जब समुद्र के किनारे सब अपना अपना बल गिना रहे होते हैं तब वे एक शब्द नहीं बोलते। जाम्बवान् का प्रश्न इसीलिये इतना सीधा है, कि चुप क्यों साध रखी है। जिनके पास सचमुच बल होता है वे प्रायः उसकी गिनती में सबसे पीछे खड़े मिलते हैं, और उन्हें कोई बाहर से बुलाकर आगे करता है।

और तीसरी बात अंगद की है, जिन्हें यह काण्ड चुपचाप सबसे ऊँचा उठा देता है। वे टूटे हुए हैं, रो रहे हैं, प्राण त्यागने का निश्चय कर चुके हैं, और उसी हालत में उनके मुँह से जटायु के लिये प्रशंसा निकलती है। उस एक वाक्य से सम्पाति रुका, कथा खुली, और लंका का पता मिला। जिस समय अपने लिये कुछ नहीं बचा था, उस समय किसी और के लिये कही गयी एक अच्छी बात ने पूरा रास्ता खोल दिया। इस काण्ड में जो कुछ बल से नहीं हुआ, वह इसी तरह हुआ।

काण्ड यहीं समाप्त हो जाता है, और साँस वहीं की वहीं रुकी रह जाती है। समुद्र के तट पर एक विशाल देह खड़ी है, उसके पीछे वह दल बैठा है जिसने कुश बिछाकर मरना तय कर लिया था और अब जीने का कारण पा गया है, और सामने वह चार सौ कोस पानी है जिसके उस पार एक उपवन में कोई सोच में डूबा बैठा है। इसके आगे जो कुछ भी होगा, वह इसी एक छलाँग पर टिका है।

वह छलाँग अगले सोपान की पहली पंक्ति है। सुन्दरकाण्ड इसी तट से शुरू होता है, और इस संग्रह में वह पूरा का पूरा मौजूद है, नौ प्रसंगों में, उसी गीता प्रेस पाठ और उसी टीका के साथ। जो कुछ यहाँ अधूरा छूटा है, वह वहीं जाकर पूरा होता है।

और इस काण्ड को इसी अधूरेपन पर छोड़ देना तुलसीदास का अपना चुनाव है। मानस का सबसे छोटा सोपान अपना सबसे बड़ा काम अपने बाद वाले के हाथ में रखकर चुप हो जाता है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, किष्किन्धाकाण्ड, दोहा २४ से ३०, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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