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स्वयंप्रभा, सम्पाति और समुद्र-तट

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रामचरितमानसकिष्किन्धाकाण्डप्रसंग 5

पानी ढूँढ़ते ढूँढ़ते एक गुफा मिलती है, गुफा से निकलते ही समुद्र मिलता है। समुद्र के किनारे बैठी हुई मौत के सामने एक बूढ़ा गीध आकर सीता का पता बता जाता है।

खोज पर निकले दल के पास अब सिर्फ़ गिनती बची है। दी गयी अवधि पूरी होने को है, दक्षिण दिशा अपने अन्तिम छोर तक देखी जा चुकी है, और सीता का कोई चिह्न नहीं मिला। इस प्रसंग की शुरुआत किसी शत्रु या युद्ध से नहीं, प्यास से होती है। जो संकट सबसे छोटा दिखता है, वही सबसे पहले इन सबकी जान लेने पर आ जाता है।

इसके बाद एक के बाद एक दरवाज़े अपने आप खुलते हैं: ज़मीन के भीतर एक गुफा, गुफा के भीतर एक बगीचा, बगीचे में एक तपस्विनी। उसकी एक आज्ञा उन्हें वहाँ ला खड़ा करती है जहाँ से आगे धरती नहीं है। वहाँ बैठकर वे प्राण त्यागने का निश्चय करते हैं। उसी क्षण पहाड़ की एक कन्दरा से वह प्राणी निकलता है जिसे उनमें अपना आहार दिखता है।

यहाँ मानस गुफा, तपस्विनी, अनशन, सम्पाति की जीवनकथा, उसके पंखों का लौटना, लंका का पता, और वह क्षण कह देता है जिसके लिये यह पूरा काण्ड चला था। यह मानस की अपनी कथा है, किसी और रामायण की नहीं।

प्यासा दल और एक बूढ़ा गीध

  • हनुमान इस प्रसंग के पहले हिस्से में वही सबको बचाते हैं, और अन्तिम हिस्से में उन्हें उनका अपना बल याद दिलाना पड़ता है।
  • अंगद बालि के पुत्र, युवराज। तट पर सबसे ज़्यादा टूटने वाले यही हैं, और टूटकर भी सबसे काम की बात यही कहते हैं।
  • जाम्बवान् रीछों के राजा। सबसे बूढ़े, सबसे शान्त, और अन्त में सही आदमी की ओर उँगली उठाने वाले।
  • स्वयंप्रभा गुफा के भीतर तप में बैठी स्त्री। मानस उन्हें नाम नहीं देता, केवल तप की मूर्ति एक स्त्री कहता है। नाम टीका से आता है।
  • सम्पाति जटायु का बड़ा भाई। बिना पंखों का बूढ़ा गीध, जिसकी आँख अब भी समुद्र के पार तक देख लेती है।
  • जटायु तट पर मौजूद नहीं, सिर्फ़ याद किया हुआ। उसी की याद इस पूरे प्रसंग का ताला खोलती है।
  • चन्द्रमा मुनि वह मुनि जिन्होंने गिरे हुए सम्पाति को उठाया और बता दिया कि उसका बचा हुआ जीवन किस दिन के लिये है।
  • सीता इस प्रसंग में सिर्फ़ एक बार दिखायी देती हैं, और वह एक झलक सब कुछ बदल देती है।

प्यास, और ज़मीन में एक छेद

दक्षिण की ओर भेजा गया दल वह सब कर चुका है जो बल से किया जा सकता था। रास्ते में कोई राक्षस मिलता है तो एक ही चपत में उसके प्राण निकल जाते हैं। पर्वत और वन छाने जा चुके हैं। जहाँ कोई मुनि दिखता है, सारा दल उसे घेरकर वही एक प्रश्न पूछता है।

पर हार किसी शत्रु से नहीं, प्यास से आती है। घने जंगल में जल कहीं नहीं मिलता, रास्ता भी भूल जाता है, और जिन भुजाओं ने राक्षसों को गिराया था वे ढीली पड़ जाती हैं। सब अत्यन्त व्याकुल हैं। हनुमान समझ लेते हैं कि जल के बिना यह पूरा दल यहीं समाप्त हो जायेगा।

बाक़ी सब बैठकर प्यास से लड़ रहे हैं, और हनुमान उठकर पहाड़ की चोटी पर चढ़ जाते हैं। वहाँ से चारों दिशाएँ देखने पर नीचे पृथ्वी के भीतर जाता हुआ एक बिल दिखता है। उसके मुँह पर एक आश्चर्य: चकवे, बगुले और हंस उड़ रहे हैं, और बहुत सारे पक्षी उसी मुँह के भीतर घुसते चले जा रहे हैं।

पक्षी इस तरह जहाँ जाते हैं वहाँ जल होता है। यह बात आँख से आती है, और इस काण्ड में हनुमान का यही ढंग है: वे चमत्कार नहीं करते, ध्यान से देखते हैं।

हनुमान उतरकर सबको वह बिल दिखा देते हैं। सबने उन्हें आगे कर लिया और पीछे पीछे भीतर घुस गये, और देर ज़रा भी नहीं की। जो प्यास से मर रहे हों, उनके पास अनजान अँधेरे के मुँह पर खड़े होकर सोचने का समय नहीं होता।

भीतर अँधेरे की जगह एक उत्तम उपवन है, उसके बीच एक तालाब, और तालाब में बहुत से कमल खिले हुए। वहीं एक सुन्दर मन्दिर है, और उसमें एक स्त्री बैठी है। कथा उसका कोई नाम या कुल नहीं बताती। वह बस एक तपोमूर्ति स्त्री है, पूरी की पूरी तप की ढेरी।

गुफा के भीतर, और गुफा के बाहर

दल दूर से ही उन्हें सिर नवाता है। पूछने पर वे अपना पूरा वृत्तान्त कह सुनाते हैं, कि वे कौन हैं, किसके भेजे हुए हैं, और किसे खोज रहे हैं। उत्तर में वह स्त्री कहती हैं, “जलपान कीजिये, और भाँति भाँति के रसीले सुन्दर फल खाइये।”

जिस संकट के लिये वे भीतर घुसे थे, वह एक वाक्य में हल हो जाता है। सबने स्नान किया, मीठे फल खाये, और फिर लौटकर उनके पास आ बैठे। तब उन्होंने अपनी कथा सुनायी, और एक बात ऐसी कही जो उस समय इनके काम की नहीं लगती थी: अब वे स्वयं वहाँ जायेंगी जहाँ राम हैं।

फिर उनकी आज्ञा आती है: “आँखें मूँद लीजिये और गुफा छोड़कर बाहर निकल जाइये। सीता मिल जायेंगी, पछताइये नहीं।” कैसे और कहाँ निकलेंगे, इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं।

आँखें खुलीं तो सब वीर समुद्र के तीर पर खड़े हैं। बीच का कोई दृश्य कथा नहीं दिखाती। एक पल वे गुफा के भीतर हैं और दूसरे पल समुद्र के किनारे। जिस दल को अब तक अपने बल पर भरोसा था, उसे यहाँ से हर क़दम किसी और के हाथ से मिलने वाला है।

और वह स्त्री अपने काम से चली जाती हैं। जाकर राम के चरणों पर मस्तक नवाती हैं, बहुत प्रकार से विनती करती हैं। राम उन्हें ऐसी भक्ति देते हैं जो कभी घटती नहीं, कभी छूटती नहीं।

टीका में इस स्त्री का नाम स्वयंप्रभा आता है। मानस स्वयं यह नाम एक बार भी नहीं लेता। वे राम की आज्ञा सिर पर धारण करती हैं, राम के उन युगल चरणों को हृदय में रखती हैं जिनकी ब्रह्मा और शिव तक वन्दना करते हैं। वे बदरीवन की ओर चली जाती हैं।

किनारे पर बैठा हुआ मरण

अब उनके सामने पानी ही पानी है, और उस पार क्या है, कोई नहीं जानता। अवधि बीत चुकी है और काम कुछ नहीं हुआ। बिना ख़बर लिये लौटकर भी करेंगे क्या?

अंगद की आँखों में जल भर आता है। वे किसी भी हारी हुई सेना के सबसे कठिन क्षण का सच कहते हैं: “दोनों तरह से हमारी मृत्यु हो गयी। यहाँ सीता की सुधि नहीं मिली, और वहाँ लौटे तो वानरराज मार डालेंगे।”

फिर वे इस काण्ड का सबसे तीखा वाक्य कहते हैं: पिता के वध के बाद सुग्रीव उन्हें वहीं मार डालते। बचाया राम ने था, इसमें सुग्रीव का कोई एहसान नहीं। और वे बार बार सबसे यही कहते रहे, “अब मरण हुआ, इसमें कुछ सन्देह नहीं।”

वानर वीर सुनते हैं और कुछ बोल नहीं पाते। आँखों से जल बहता रहता है। एक क्षण सब सोच में डूबे रहते हैं, और फिर न युवराज को दिलासा देते हैं, न कोई योजना बनाते हैं, न सुग्रीव को कोसते हैं। वे सिर्फ़ इतना कहते हैं, “युवराज, हम सीता की सुधि लिये बिना नहीं लौटेंगे।”

ऐसा कहकर सब वानर लवणसागर के तट पर कुश बिछाकर बैठ जाते हैं। कुश बिछाकर बैठना प्राण त्यागने के संकल्प का आसन है। हार मान लेना नहीं, इस शर्त पर हार से इनकार कि फिर उठना नहीं होगा।

जाम्बवान् क्या करते हैं

ऐसे समय सबसे बूढ़े जाम्बवान् अंगद का दुख देखते हैं, और न सान्त्वना देते हैं, न सुग्रीव की सफ़ाई, न कोई नया उपाय। वे कथाएँ कहने लगते हैं, और साथ में विशेष उपदेश।

उन कथाओं का सार एक वाक्य में है: “तात, राम को मनुष्य मत समझिये।”

यह मानस का अपना स्वर है। जाम्बवान् के लिये राम अयोध्या के राजकुमार भर नहीं। वे निर्गुण ब्रह्म हैं, अजेय हैं, अजन्मा हैं, और सामने चलता फिरता रूप उसी का सगुण हो जाना है। फिर वे डूबे मन को उठाते हैं: “हम सब सेवक अत्यन्त बड़भागी हैं, क्योंकि हमारा मन निरन्तर उसी सगुण ब्रह्म में लगा है।” दुख का उत्तर यहाँ आशा नहीं, सौभाग्य है।

कोई कर्म का बन्धन राम को नहीं खींचता। वे अपनी इच्छा से देवता, पृथ्वी, गौ और ब्राह्मण के लिये उतरते हैं। जो उपासक इस सगुण रूप से जुड़ जाते हैं, वे साथ बने रहने के लिये मोक्ष तक छोड़ देते हैं।

कन्दरा से निकली हुई भूख

यह बातचीत खुले तट पर हो रही है, और पीछे पहाड़ की एक कन्दरा में सम्पाति बैठा सुन रहा है। उसे न राम में रुचि है, न सीता में। वह बाहर निकलकर बहुत सारे वानर देखता है।

“जगदीश ने मुझे आहार भेज दिया,” वह कहता है, “आज इन सबको खा जाऊँगा। बहुत दिन आहार के बिना मर रहा था, पेट भर भोजन कभी नहीं मिलता, और आज विधाता ने एक ही बार में इतना सब भेज दिया।” यह न राक्षस है, न देवता। एक बूढ़ा भूखा गीध है, और उसकी भूख उतनी ही सच्ची है जितनी वानरों की प्यास थी।

यह सुनते ही सब समझ जाते हैं कि अब सचमुच मरना हो गया, और कुश छोड़कर उठ खड़े होते हैं। जाम्बवान् के मन में विशेष सोच होता है, क्योंकि प्राण त्यागने बैठा दल लड़ नहीं सकता।

तब अंगद मन में विचार करके एक ऐसी बात कहते हैं जिसका उस क्षण कोई काम नहीं। उन्हें उस पक्षी की याद आती है जो इसी काम में मारा गया था।

“जटायु के समान धन्य कोई नहीं,” अंगद कहते हैं, “जो राम के काम के लिये शरीर छोड़कर भगवान् के धाम गया, परम बड़भागी।” यह मरने से पहले एक मरे हुए साथी को दी गयी श्रद्धांजलि थी। पर वह भूखा पक्षी उसमें से एक नाम पकड़ लेता है, और उसका भूखा उत्साह हर्ष और शोक में बदल जाता है। वह पास आता है, और वानर डर जाते हैं।

पर वह पहले उन्हें अभय देता है, फिर पूछता है, और वे उसे पूरी कथा सुनाते हैं: जटायु ने क्या देखा, क्या किया और कैसे गया। भाई की करनी सुनकर वह बहुत प्रकार से राम की महिमा कहता है। फिर वह विनती करता है कि उसे समुद्र के किनारे ले चला जाय ताकि वह छोटे भाई को तिलांजलि दे सके। बदले में वह वचन से सहायता करेगा, और जिसे वे खोज रहे हैं वह उन्हें मिल जायेगा।

जटायु का भाई, और सूरज

समुद्र के तीर पर वह छोटे भाई की क्रिया पूरी करता है, और फिर अपनी कथा कहता है। दो भाई थे, दोनों उठती जवानी में, और एक दिन उड़ते उड़ते आकाश में सूर्य के पास तक चले गये।

छोटा भाई तेज नहीं सह सका और लौट आया। बड़े भाई ने लौटना अपनी शान के ख़िलाफ़ समझा। सम्पाति अपने ही लिये एक शब्द कहता है: “मैं अभिमानी सूर्य के पास चला गया।”

अभिमान का दण्ड यहाँ उपदेश से नहीं, आग से आता है। अपार तेज से पंख जल जाते हैं और वह घोर चीख़ मारकर ज़मीन पर आ गिरता है।

वहाँ चन्द्रमा नाम के एक मुनि थे। उन्हें उस पर दया आयी, और उन्होंने बहुत प्रकार से ज्ञान सुनाकर उसका देह से जुड़ा अभिमान छुड़ा दिया। पंख बाद में लौटे। पहले वह चीज़ गयी जिसने पंख जलवाये थे।

और फिर मुनि ने उसे बता दिया कि उसका बचा हुआ जीवन किस दिन के लिये रखा गया है।

मुनि ने कहा था कि त्रेता में परब्रह्म मनुष्य का शरीर धरेंगे, उनकी स्त्री को राक्षसों का राजा हर ले जायगा। उनकी खोज में वे दूत भेजेंगे, और उनसे मिलकर सम्पाति पवित्र हो जायगा। पंख फिर उग आयेंगे, और उन दूतों को सीता दिखा देनी है। एक वाक्य के सहारे एक अपंग पक्षी ने पूरा युग बिता दिया। अब वह कहता है, “मुनि की वह वाणी आज सत्य हुई। अब मेरे वचन सुनकर राम का कार्य कीजिये।”

अपार दृष्टि, और एक नाम

अब वह वही करता है जिसके लिये उसे इतने बरस रोका गया था। वह बताता है कि त्रिकूट पर्वत के ऊपर लंका बसी है, और वहाँ स्वभाव से ही निडर रावण रहता है। और उसी लंका में अशोक नाम का एक उपवन है।

इस एक ख़बर के लिये यह पूरा काण्ड चला है: महीनों की खोज, बालि का वध, सुग्रीव की अवधि, चारों दिशाओं के दल, गुफा, समुद्र, अनशन। सीता जीवित हैं, लंका में हैं, अशोक नाम के उपवन में बैठी हैं, और सोच में डूबी हुई हैं।

सम्पाति बताता है कि वह उन्हें इसी समय देख रहा है, क्योंकि गीध की दृष्टि अपार होती है। वह यह भी बताता है कि वह बूढ़ा हो चुका है, नहीं तो कुछ सहायता स्वयं भी कर देता। जिसके पास आँख है उसके पास पंख का बल नहीं, और जिनके पास बल है उनके पास वह आँख नहीं।

साँझ के समय दक्षिण समुद्र के तट पर पंख जले बूढ़े गीध सम्पाति समुद्र के पार त्रिकूट पर्वत की ओर देखते हैं, और अंगद, जाम्बवान्, हनुमान और वानर उनकी बात सुन रहे हैं।

और तब वह शर्त रखता है जिससे कथा का अगला पूरा सोपान निकलता है।

“जो सौ योजन समुद्र लाँघ सकेगा और बुद्धि का भण्डार होगा, वही राम का कार्य कर सकेगा।” सौ योजन यानी चार सौ कोस। शर्त में बल के साथ बुद्धि भी है। समुद्र पार करना आधा काम है, उस पार क्या करना है और क्या नहीं, यह दूसरा आधा।

अन्त में सम्पाति कहता है, “मुझे देखकर मन में धीरज धरिये। देखिये, राम की कृपा से मेरा शरीर कैसा हो गया।” बिना पंखों का बेहाल शरीर देखते ही देखते फिर पंखों वाला हो गया, जैसा मुनि ने कहा था। फिर वह कहता है, “जिनका नाम स्मरण करके पापी तक भवसागर तर जाते हैं, उन्हीं के दूत होकर कायरता कैसी? राम को हृदय में धारण करके उपाय कीजिये।” इतना कहकर वह चला जाता है, और तट पर दल रह जाता है, अब एक पते और एक नाप के साथ।

किसमें कितना बल है

गीध के जाते ही वानरों को बड़ा विस्मय हुआ, और फिर हर कोई अपना अपना बल बताने लगा। कथा उसी साँस में नतीजा भी रख देती है: पार जाने में सबने सन्देह किया। बल सबके पास था, भरोसा किसी के पास नहीं।

जाम्बवान् सबसे पहले अपनी गिनती से बाहर हो जाते हैं: “मैं अब बूढ़ा हो गया। शरीर में पहले वाले बल का लेश भी नहीं बचा।” फिर वे एक याद सुनाते हैं जो इस समुद्र को उसकी असली जगह पर बिठा देती है। जब राम वामन बने थे और बलि को बाँधा था, तब जाम्बवान् जवान थे और उनमें बड़ा बल था। राम उस समय इतने बढ़े कि उस देह का वर्णन ही नहीं हो सकता। जाम्बवान् ने दो ही घड़ी में दौड़कर उस देह की सात परिक्रमाएँ पूरी कर ली थीं।

यह डींग नहीं, पैमाना है। जिस शरीर की सात परिक्रमाएँ दो घड़ी में हो जाती थीं, उसके सामने चार सौ कोस पानी कोई बड़ी दूरी नहीं। जो असम्भव लग रहा है वह जाम्बवान् की आँखों के सामने पहले भी हुआ है।

अंगद कहते हैं कि पार तो वे चले जायेंगे, पर लौटने के बारे में मन में कुछ सन्देह है। जाम्बवान् उन्हें सब प्रकार से योग्य मानते हैं और फिर भी रोक देते हैं, क्योंकि अंगद सबके नायक हैं, और नायक को दूत बनाकर नहीं भेजा जाता।

अब सब बोल चुके हैं। एक आदमी शुरू से चुप बैठा है, वही जिसने पहाड़ पर चढ़कर बिल खोजा था। जाम्बवान् उसी की ओर मुड़ते हैं।

“हनुमान, बलवान होकर आप चुप क्यों साधे बैठे हैं?” जाम्बवान् कोई वरदान, अस्त्र या मन्त्र नहीं देते। वे सिर्फ़ वह बताते हैं जो पहले से सच है: पवन के पुत्र, बल में पवन के समान, बुद्धि, विवेक और विज्ञान की खान। जगत् में कौन सा कठिन काम है जो उनसे न हो सके। और उनका अवतार ही राम के काम के लिये हुआ है। चमत्कार यहाँ एक याद दिलाने से होता है।

सुनते ही वह याद देह में उतर आती है। हनुमान पर्वत के आकार के हो जाते हैं, सोने का सा रंग, शरीर पर ऐसा तेज मानो पर्वतों का दूसरा राजा खड़ा हो। वे बार बार सिंहनाद करते हैं और कहते हैं, “मैं इस खारे समुद्र को खेल में ही लाँघ सकता हूँ। और सहायकों समेत रावण को मारकर त्रिकूट पर्वत को उखाड़कर यहीं ला सकता हूँ।”

अभी इसी तट पर उस पक्षी की कथा सुनी गयी है जिसका अभिमान उसे सूरज तक ले गया था। पर हनुमान अपना वाक्य पूरा करते ही जाम्बवान् से पूछते हैं कि उन्हें उचित सीख दी जाय, करना क्या है। बल बोल चुका, और बोलते ही आज्ञा माँगने लगा। सम्पाति की जवानी और हनुमान की छलाँग के बीच का फ़र्क़ यही है।

और जाम्बवान् जो आज्ञा देते हैं, वह इस सभा की सबसे संयत बात है।

“तात, आप जाकर इतना ही कीजिये: सीता को देखकर लौट आइये और ख़बर कह दीजिये।” रावण को मारना, लंका को उखाड़ना, यह सब उस दिन राम अपनी भुजाओं के बल से करेंगे, और वानरों की सेना साथ केवल खेल के लिये लेंगे। जो काम सबसे बड़ा लग रहा था, उसे सबसे बूढ़े आदमी ने उसके असली नाप पर ला दिया: देखना, और लौट आना।

सोपान यहीं बन्द होता है

इसके बाद कथा एक क़दम आगे नहीं जाती। फिर कवि वह दृश्य दिखा देता है जो अभी घटा ही नहीं: वानरों की सेना साथ लेकर, राक्षसों का संहार करके, राम सीता को ले आयेंगे। देवता और नारद आदि मुनि उस यश का बखान करेंगे जो तीनों लोकों को पवित्र करता है। उसे सुनने, गाने, कहने और समझने से मनुष्य परमपद पाता है। अन्त में तुलसीदास अपने को राम के चरणों का भ्रमर कहकर उसी यश को गाते हैं।

फिर कवि कथा के किसी पात्र से नहीं, सुनने वाले से बात करता है: राम का यश जन्म और मरण के रोग की दवा है। और जो पुरुष और स्त्री इसे सुनेंगे, राम उनके सब मनोरथ सिद्ध करेंगे।

साथ ही वह राम के नीले कमल जैसे श्याम शरीर का स्मरण करता है, और उनके नाम को पापरूपी पक्षियों के लिये बहेलिया कहता है। ठीक यहीं मासपारायण का तेईसवाँ विश्राम आता है। फिर वह पुष्पिका आती है जो कहती है कि कलियुग के सारे पापों का नाश करने वाले रामचरितमानस का चौथा सोपान समाप्त हुआ।

समाप्त तो हुआ, पर रुका कहीं नहीं। किष्किन्धाकाण्ड अपनी अन्तिम बात उस आदमी पर छोड़ देता है जो तट पर खड़ा है। उसका नाप लिया जा चुका है, वह आज्ञा ले चुका है, और वह अभी कूदा नहीं है।

जो पहले से था

इस प्रसंग में कोई किसी को नयी शक्ति नहीं देता। स्वयंप्रभा जल, फल और आँख मूँदने की आज्ञा देती हैं। चन्द्रमा मुनि अभिमान उतारते हैं और प्रतीक्षा का दिन बताते हैं। सम्पाति देखकर पता बता जाता है। जाम्बवान् एक आदमी को याद दिलाते हैं कि वह पहले से क्या है। सहायता हर बार सूचना, आज्ञा और स्मरण के रूप में आती है।

दूसरी बात हनुमान की चुप्पी की है। वे पहाड़ पर चढ़ते हैं, बिल खोजते हैं, सबको लेकर भीतर जाते हैं। और जब सब अपना अपना बल गिना रहे होते हैं तब एक शब्द नहीं बोलते। जिनके पास सचमुच बल होता है वे प्रायः गिनती में सबसे पीछे खड़े मिलते हैं, और उन्हें कोई बाहर से बुलाकर आगे करता है।

तीसरी बात अंगद की है। टूटे हुए, रोते हुए, प्राण त्यागने का निश्चय कर चुके अंगद के मुँह से जटायु के लिये प्रशंसा निकलती है। उसी एक वाक्य से सम्पाति रुका, कथा खुली, और लंका का पता मिला।

काण्ड यहीं समाप्त होता है। समुद्र के तट पर एक विशाल देह खड़ा है। उसके पीछे वह दल है जिसने कुश बिछाकर मरना तय किया था और अब जीने का कारण पा गया है। सामने चार सौ कोस पानी है, जिसके उस पार एक उपवन में सीता सोच में डूबी बैठी हैं। इसके आगे जो कुछ होगा, वह इसी एक छलाँग पर टिका है।

वह छलाँग अगले सोपान की पहली घटना है। सुन्दरकाण्ड इसी तट से शुरू होता है, और जो कुछ यहाँ अधूरा छूटा है, वह वहीं जाकर पूरा होता है।

मानस का सबसे छोटा सोपान अपना सबसे बड़ा काम अपने बाद वाले सोपान के हाथ में रखकर चुप हो जाता है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, किष्किन्धाकाण्ड, दोहा 24 से सोरठा 30 (ख), और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।