लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish

तारा का विलाप, राज्याभिषेक और वर्षा-ऋतु

इस पृष्ठ पर

रामचरितमानसकिष्किन्धाकाण्डप्रसंग 3

बालि के मृतक-कर्म से लेकर शरद के निर्मल आकाश तक। तारा विलाप करती हैं और राम उन्हें ज्ञान देते हैं। सुग्रीव को राज्य मिलता है, और राम प्रवर्षण पर्वत पर लक्ष्मण से वर्षा और शरद का वर्णन उपमाओं के साथ करते हैं।

बालि राम के अपने धाम जा चुका है, और तारा विलाप कर रही हैं। राम उन्हें ज्ञान देते हैं, और वे उनसे एक वर माँगती हैं। फिर सुग्रीव को राज्य मिलता है। राम चौदह वर्ष तक नगर में नहीं जायेंगे, और वर्षा-ऋतु आ गयी है।

रामचरितमानस के चौथे सोपान में राम वन में सीता की खोज में हैं। लक्ष्मण नगर के लोगों और ब्राह्मणों को बुलाते हैं, और अंगद युवराज बनते हैं। सुग्रीव राजनीति की शिक्षा पाकर घर लौटते हैं। राम लक्ष्मण के साथ एक पर्वत पर ठहरते हैं, और बादल घिर आते हैं।

नगर में शोक, पर्वत पर निवास

  • तारा बालि की पत्नी। वे अनेक प्रकार से विलाप करती हैं, उनके बाल खुले हैं और देह की सँभाल नहीं है। राम उन्हें ज्ञान देते हैं, तब वे उनके चरणों में लगती हैं और परम भक्ति का वर माँग लेती हैं।
  • राम जो बालि को अपने धाम भेजते हैं, तारा को ज्ञान देते हैं और सुग्रीव को आज्ञा देते हैं। वे लक्ष्मण से सुग्रीव को राज्य देने को कहते हैं, और सुग्रीव को राजनीति सिखाते हैं। वे सुग्रीव से कहते हैं कि मैं चौदह वर्ष तक नगर में नहीं जाऊँगा। प्रवर्षण पर्वत पर वे लक्ष्मण से वर्षा और शरद का वर्णन उपमाओं के साथ करते हैं।
  • लक्ष्मण जिनसे राम सुग्रीव को राज्य देने को कहते हैं। वे तुरंत नगर के लोगों और ब्राह्मणों के समाज को बुलाते हैं, और सुग्रीव को राज्य और अंगद को युवराज-पद देते हैं। वे पर्वत पर राम के साथ रहते हैं और उनसे वर्षा और शरद का वर्णन सुनते हैं।
  • सुग्रीव जो बालि के डर से दिन-रात व्याकुल रहते थे, और जिनके शरीर पर बहुत से घाव थे। राम की आज्ञा के बाद मृतक-कर्म विधिपूर्वक होता है। उन्हें राज्य मिलता है और वे राजनीति की शिक्षा पाते हैं। राम उनसे अंगद के साथ राज्य करने और राम का काम सदा हृदय में रखने को कहते हैं, और वे घर लौट जाते हैं।
  • अंगद बालि का पुत्र। लक्ष्मण उसे युवराज-पद देते हैं, और राम सुग्रीव से उसके साथ राज्य करने को कहते हैं।
  • शिव और पार्वती शिव पार्वती से कहते हैं कि स्वामी राम सबको काठ की पुतली की तरह नचाते हैं। वे यह भी कहते हैं कि संसार में राम के समान हित करने वाला न गुरु है, न पिता, न माता, न बन्धु, न स्वामी।
  • प्रवर्षण पर्वत वह पर्वत जहाँ सुग्रीव के घर लौटने पर राम ठहरते हैं। देवताओं ने उस पर्वत की एक गुफा पहले से सुन्दर बना रखी थी। वहाँ स्फटिक की एक शिला है, और दोनों भाई सुख से बैठते हैं। वहीं वर्षा बीतती है और शरद आती है।

जिस स्त्री के सामने उसका पति पड़ा हुआ है

राम ने बालि को अपने धाम भेज दिया। नगर के सब लोग व्याकुल होकर दौड़े।

तारा अनेक प्रकार से विलाप करने लगीं। उनके बाल खुल गये थे, और देह की सँभाल नहीं रही थी।

तारा को व्याकुल देखकर राम ने उन्हें ज्ञान दिया और उनकी माया हर ली, जिसे टीका अज्ञान पढ़ती है। “पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु, इन पाँच से यह अत्यन्त अधम शरीर रचा गया है। वह शरीर तो प्रत्यक्ष आपके सामने सो रहा है, और जीव नित्य है। फिर आप किसके लिये रो रही हैं?”

ज्ञान उपजा, तब तारा राम के चरणों में लगीं, और उन्होंने परम भक्ति का वर माँग लिया।

शिव पार्वती को कथा सुनाते हुए कहते हैं कि स्वामी राम सबको काठ की पुतली की तरह नचाते हैं। तब राम ने सुग्रीव को आज्ञा दी, और बालि का सब मृतक-कर्म विधिपूर्वक किया गया।

राज्य, और वह आदमी जिसे वह मिलता है

राम ने छोटे भाई लक्ष्मण को समझाकर कहा, “जाकर सुग्रीव को राज्य दे दीजिये।” राम की प्रेरणा से सब लोग उनके चरणों में मस्तक नवाकर चले।

लक्ष्मण ने तुरंत नगर के लोगों और ब्राह्मणों के समाज को बुलाया, और सुग्रीव को राज्य और अंगद को युवराज-पद दिया।

“संसार में राम के समान हित करने वाला न गुरु है, न पिता, न माता, न बन्धु, न स्वामी,” पार्वती से कहा जाता है। “देवता, मनुष्य और मुनि, सबकी यह रीति है कि स्वार्थ के लिये ही सब प्रीति करते हैं। सुग्रीव बालि के डर से दिन-रात व्याकुल रहते थे। उनके शरीर पर बहुत से घाव थे, और उनकी छाती चिन्ता से जला करती थी। उन्हीं सुग्रीव को राम ने वानरों का राजा बना दिया। राम का स्वभाव अत्यन्त कृपालु है। जो लोग जानते हुए भी ऐसे स्वामी को छोड़ देते हैं, वे विपत्ति के जाल में क्यों न फँसें?”

फिर राम ने सुग्रीव को बुला लिया, और बहुत प्रकार से उन्हें राजनीति की शिक्षा दी।

चौदह वर्ष की गिनती, और एक पर्वत

राम ने कहा, “हे सुग्रीव, सुनिये। मैं चौदह वर्ष तक नगर में नहीं जाऊँगा। ग्रीष्म बीत गया और वर्षा-ऋतु आ गयी है। मैं पास ही पर्वत पर टिककर रहूँगा। आप अंगद के साथ राज्य कीजिये, और मेरे काम का हृदय में सदा ध्यान रखियेगा।” टीका इस नगर को गाँव या बस्ती पढ़ती है।

जब सुग्रीव घर लौट आये, तब राम प्रवर्षण पर्वत पर जा टिके।

देवताओं ने पहले से ही उस पर्वत की एक गुफा को सुन्दर बना रखा था। राम आकर कुछ दिन वहाँ रहने वाले थे।

सुन्दर वन फूला हुआ है और अत्यन्त शोभा पा रहा है। मधु के लोभ से भौंरों के समूह गूँज रहे हैं। जब से राम आये, तब से सुन्दर कन्द, मूल, फल और पत्ते बहुत हो गये। मनोहर और अनुपम पर्वत को देखकर राम छोटे भाई के साथ वहाँ रह गये। देवता, सिद्ध और मुनि भौंरों, पक्षियों और पशुओं के शरीर धारण करके राम की सेवा करने लगे।

जब से राम ने वहाँ निवास किया, तब से वन मंगलरूप हो गया। स्फटिक की एक अत्यन्त उज्ज्वल और सुहावनी शिला है, और वहाँ दोनों भाई सुख से बैठे हैं।

और तब बादल आ जाते हैं

राम छोटे भाई से भक्ति, वैराग्य, राजनीति और विवेक की अनेक कथाएँ कहते हैं। वर्षा-काल में आकाश में मेघ छा गये, और गरजते हुए वे परम सुहावने लगते हैं।

राम ने कहा, “हे लक्ष्मण, देखिये। मोरों के झुंड बादलों को देखकर नाच रहे हैं, जैसे वैराग्य में अनुरक्त गृहस्थ किसी विष्णुभक्त को देखकर हर्षित होते हैं।”

“आकाश में बादल घुमड़कर घोर गर्जना कर रहे हैं। प्रिया के बिना मेरा मन डर रहा है। बिजली की चमक बादलों में ठहरती नहीं, जैसे दुष्ट की प्रीति स्थिर नहीं रहती।”

पर्वत, नदी और तालाब पर वर्षा

राम ने आगे कहा, “बादल धरती के पास आकर बरस रहे हैं, जैसे विद्या पाकर विद्वान झुक जाते हैं। बूँदों की चोट पर्वत कैसे सहते हैं, जैसे दुष्टों के वचन संत सहते हैं।”

“छोटी नदियाँ भरकर तोड़ती हुई चल पड़ीं, जैसे थोड़े धन से भी दुष्ट इतरा जाते हैं। धरती पर पड़ते ही पानी गँदला हो गया, मानो जीव से माया लिपट गयी हो।” टीका दुष्टों के इतराने को मर्यादा छोड़ना पढ़ती है।

“जल सिमट-सिमटकर तालाबों में भर रहा है, जैसे सद्गुण सज्जन के पास चले आते हैं। नदी का जल समुद्र में जाकर अचल हो जाता है, जैसे जीव भगवान् को पाकर अचल हो जाता है।” टीका इस अचल होने को आवागमन से मुक्त होना पढ़ती है।

“धरती घास से भरकर हरी हो गयी है, और रास्ते समझ में नहीं आते, जैसे पाखण्ड के वाद से सद्ग्रन्थ गुप्त हो जाते हैं।” टीका इस गुप्त होने को लुप्त होना पढ़ती है।

मेढक, खेत और हवा

राम ने आगे कहा, “चारों दिशाओं में मेढकों की ध्वनि सुहावनी लगती है, मानो विद्यार्थियों के समुदाय वेद पढ़ रहे हों। अनेक वृक्षों में नये पत्ते आ गये हैं, जैसे विवेक मिलने पर साधक का मन हो जाता है।”

“मदार और जवासा बिना पत्तों के हो गये, जैसे सुराज में दुष्टों का उद्यम जाता रहा। धूल खोजने पर भी कहीं नहीं मिलती, जैसे क्रोध धर्म को दूर कर देता है।” टीका जोड़ती है कि क्रोध का आवेश होने पर धर्म का ज्ञान नहीं रह जाता।

“अन्न से भरी धरती कैसी शोभा पा रही है, जैसी उपकारी पुरुष की सम्पत्ति। रात के घने अन्धकार में जुगनू शोभा पा रहे हैं, मानो दम्भियों का समाज जुट गया हो।”

“भारी वर्षा से खेतों की क्यारियाँ फूट चली हैं, जैसे स्वतन्त्र होने पर स्त्रियाँ बिगड़ जाती हैं। चतुर किसान खेतों को निरा रहे हैं, जैसे विद्वान मोह, मद और मान को छोड़ देते हैं।”

“चकवे पक्षी दिखायी नहीं देते, जैसे कलियुग को पाकर धर्म भाग जाते हैं। ऊसर में वर्षा होती है, पर घास तक नहीं उगती, जैसे भगवद्भक्त के हृदय में काम नहीं उपजता। धरती अनेक प्रकार के जीवों से भरी हुई शोभा पा रही है, जैसे सुराज पाकर प्रजा बढ़ती है। जहाँ-तहाँ अनेक पथिक थककर ठहरे हुए हैं, जैसे ज्ञान उपजने पर इन्द्रियाँ ठहर जाती हैं।”

“कभी-कभी वायु बड़े ज़ोर से चलती है, और बादल जहाँ-तहाँ ग़ायब हो जाते हैं, जैसे कुपुत्र के उत्पन्न होने से कुल के उत्तम धर्म नष्ट हो जाते हैं। कभी दिन में घोर अन्धकार छा जाता है और कभी सूर्य प्रकट हो जाते हैं, जैसे कुसंग पाकर ज्ञान नष्ट हो जाता है और सुसंग पाकर उपजता है।”

शरद आती है, और जल निर्मल हो जाता है

राम ने आगे कहा, “वर्षा बीत गयी और शरद-ऋतु आ गयी। हे लक्ष्मण, देखिये, यह परम सुहावनी है। फूले हुए काँस से सारी धरती छा गयी है, मानो वर्षा-ऋतु ने अपना बुढ़ापा प्रकट कर दिया हो।” टीका इस काँस को उस बुढ़ापे के सफ़ेद बाल पढ़ती है।

“अगस्त्य ने उदय होकर रास्तों का जल सोख लिया, जैसे सन्तोष लोभ को सोख लेता है। नदियों और तालाबों का निर्मल जल ऐसी शोभा पा रहा है, जैसे मद और मोह से रहित संतों का हृदय। नदियों और तालाबों का जल रस-रस सूख रहा है, जैसे ज्ञानी ममता का त्याग करते हैं।” टीका इस अगस्त्य को अगस्त्य का तारा पढ़ती है।

“शरद-ऋतु जानकर खंजन पक्षी आ गये, जैसे समय पाकर सुन्दर सुकृत आ जाते हैं। न कीचड़ है न धूल, और धरती ऐसी शोभा दे रही है जैसे नीति में निपुण राजा की करनी। जल के कम हो जाने से मछलियाँ व्याकुल हो रही हैं, जैसे मूर्ख कुटुम्बी धन के बिना व्याकुल होता है।”

“बिना बादलों का निर्मल आकाश ऐसा शोभित है, जैसे भगवद्भक्त सब आशाओं को छोड़कर शोभित होते हैं। कहीं-कहीं शरद की थोड़ी सी वर्षा हो रही है, जैसे कोई विरला ही मेरी भक्ति पाता है।”

“राजा, तपस्वी, व्यापारी और भिखारी हर्षित होकर नगर छोड़कर चल पड़े, जैसे भगवान् की भक्ति पाकर चारों आश्रमों वाले श्रम छोड़ देते हैं।” टीका बताती है कि ये चारों क्रमशः विजय, तप, व्यापार और भिक्षा के लिये चले।

कमल, चन्द्रमा और सद्गुरु

राम ने आगे कहा, “जो मछलियाँ अथाह जल में हैं, वे सुखी हैं, जैसे भगवान् की शरण में एक भी बाधा नहीं रहती।”

“कमलों के खिलने से तालाब कैसी शोभा दे रहा है, जैसे निर्गुण ब्रह्म सगुण होने पर शोभित होता है।”

“भौंरे अनुपम शब्द करते हुए गूँज रहे हैं, और पक्षियों के नाना प्रकार के सुन्दर स्वर हैं। रात देखकर चकवे के मन में दुःख होता है, जैसे दूसरे की सम्पत्ति देखकर दुष्ट को होता है। पपीहा रट लगाये है, उसे बड़ी प्यास है, जैसे शिव से द्रोह करने वाले को सुख नहीं मिलता।”

“शरद के ताप को रात में चन्द्रमा हर लेता है, जैसे संतों के दर्शन से पाप टल जाते हैं। चन्द्रमा को देखकर चकोरों के समूह टकटकी लगाये हैं, जैसे भगवद्भक्त भगवान् को पाकर देखते रहते हैं। मच्छर और डाँस जाड़े के डर से चले गये, जैसे ब्राह्मण से वैर करने पर कुल का नाश हो जाता है।”

“धरती पर जो जीव भर गये थे, वे शरद-ऋतु पाकर चले गये, जैसे सद्गुरु के मिलने पर संशय और भ्रम के समुदाय चले जाते हैं।”

तारा का वर, राज्य और ऋतुएँ

राम ने तारा को ज्ञान दिया, और तारा ने माँगकर परम भक्ति का वर पाया। राम की आज्ञा के बाद मृतक-कर्म हुआ। राम के कहने पर लक्ष्मण ने नगर के लोगों और ब्राह्मणों को बुलाया, और सुग्रीव को राज्य और अंगद को युवराज-पद दिया। राम ने सुग्रीव को राजनीति सिखायी, और कहा कि मैं चौदह वर्ष तक नगर में नहीं जाऊँगा। वे प्रवर्षण पर्वत पर ठहरे, जहाँ देवताओं ने पहले से गुफा सुन्दर बना रखी थी। वहाँ दोनों भाई सुख से बैठे, और राम ने छोटे भाई से भक्ति, वैराग्य, राजनीति और विवेक की कथाएँ कहीं।

बादल घिर आये। राम ने लक्ष्मण से मोरों को देखने को कहा, और उनके साथ एक उपमा रखी। उन्होंने कहा कि प्रिया के बिना उनका मन डर रहा है। फिर बिजली, छोटी नदियों, गँदले पानी, मेढकों, जुगनुओं, किसानों और पथिकों के साथ उपमाएँ आयीं। शरद आयी, और जल और आकाश निर्मल हो गये। काँस, खंजन, मछलियों, पपीहे, चन्द्रमा और चकोरों के साथ भी उपमाएँ आयीं। अन्तिम चित्र धरती पर भरे उन जीवों का था जो शरद पाकर चले गये, जैसे सद्गुरु के मिलने पर संशय और भ्रम चले जाते हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, किष्किन्धाकाण्ड, दोहा 11 से 17, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।