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तारा का विलाप, राज्याभिषेक और वर्षा-ऋतु

रामचरितमानस · किष्किन्धाकाण्ड · तारा का विलाप, राज्याभिषेक और वर्षा-ऋतु

तारा का विलाप, राज्याभिषेक और वर्षा-ऋतु

बालि के मृतक-कर्म से लेकर शरद के निर्मल आकाश तक, वह प्रसंग जिसमें राज्य किसी और को मिलता है और प्रतीक्षा राम के हिस्से आती है।

बालि गिर चुका है। जिस पेड़ की ओट से बाण आया था वह अब कथा में नहीं है, और जिस द्वन्द्वयुद्ध पर पिछला प्रसंग टिका हुआ था वह समाप्त हो चुका है। किष्किन्धा के फाटक खुल गये हैं और नगर के लोग बाहर की ओर दौड़ रहे हैं। यह प्रसंग ठीक वहीं से शुरू होता है जहाँ लड़ाई ख़त्म होती है, यानी उस मैदान से जिस पर एक देह पड़ी है, और उस देह के पास बैठी हुई एक स्त्री है जिसके बाल खुले हैं।

इसके बाद जो होता है, वह इस काण्ड की सबसे बड़ी पलटी है। कुछ ही चौपाइयों में राम एक रोती हुई स्त्री का शोक हर लेते हैं, एक भागे हुए आदमी को राजा बनवाते हैं, मरे हुए राजा के बेटे को युवराज बनवाते हैं, और फिर स्वयं नगर से बाहर एक पहाड़ पर जाकर बैठ जाते हैं। और उसके बाद पूरे प्रसंग का आधा हिस्सा ऐसा है जिसमें कोई घटना नहीं घटती। सिर्फ़ बादल आते हैं, बरसते हैं, और चले जाते हैं।

उस आधे हिस्से को जल्दी-जल्दी पढ़ जाने का मन करता है, और वहीं तुलसी सबसे ज़्यादा काम कर रहे हैं। वर्षा और शरद का यह पूरा वर्णन राम स्वयं लक्ष्मण से कह रहे हैं, और उसकी बनावट लगभग हर चौपाई में एक ही है: पहले प्रकृति का एक चित्र, फिर एक जिमि या एक जस, और फिर उस चित्र के भीतर छिपी हुई एक बात जो या तो मन की है या समाज की। यह ऋतु-वर्णन जितना आकाश का है, उतना ही उस आदमी की प्रतीक्षा का है जिसके पास इस समय करने को कुछ नहीं बचा।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • तारा बालि की पत्नी। इस प्रसंग का पहला स्वर उन्हीं का विलाप है, और उनका अन्तिम काम एक वर माँगना है, जो वे अपने पति के लिये नहीं माँगतीं।
  • श्रीराम जो युद्ध के तुरंत बाद न तो नगर में जाते हैं, न सिंहासन के पास। वे एक स्त्री को ज्ञान देते हैं, एक मित्र को राजनीति सिखाते हैं, और फिर पर्वत पर चले जाते हैं।
  • लक्ष्मण जिन्हें राज्याभिषेक की पूरी ज़िम्मेदारी सौंपकर अकेले नगर भेजा जाता है, और जो आगे इस पूरे ऋतु-वर्णन के इकलौते श्रोता हैं।
  • सुग्रीव जो कल तक बालि के डर से दिन-रात व्याकुल था, और जो इस प्रसंग में वानरों का राजा बनता है और राजनीति की शिक्षा पाता है।
  • अंगद बालि का पुत्र। जिस राज्य में उसके पिता का वध हुआ, उसी राज्य में उसे युवराज का पद मिलता है।
  • शिव और उमा यह पूरी कथा जिनके बीच कही जा रही है। दो बार शिवजी कथा रोककर उमा से सीधे बात करते हैं, और दोनों बार वे राम के स्वभाव पर बोलते हैं।
  • प्रवर्षण पर्वत वह पहाड़ जिसकी गुफा देवताओं ने पहले से सजा रखी थी, और जहाँ वर्षा और शरद दोनों बीत जाती हैं।

जिस स्त्री के सामने उसका पति पड़ा हुआ है

राम का बाण बालि को उसके परम धाम भेज चुका है। तुलसी इस बात को एक ही अर्धाली में निपटा देते हैं और तुरंत दृष्टि नगर की ओर मोड़ देते हैं, क्योंकि ऐसी ख़बर उस मैदान पर नहीं ठहरती। वह फाटक तक जाती है, और फिर पूरे नगर में फैल जाती है।

राम बालि निज धाम पठावा। नगर लोग सब ब्याकुल धावा॥
नाना बिधि बिलाप कर तारा । छूटे केस न देह सँभारा॥

चौपाई १

चार अर्धालियों में तीन दृश्य हैं। पहली में वह है जो जा चुका, दूसरी में पूरा नगर है, और तीसरी तथा चौथी में वह स्त्री है जिसके लिये यह राजनीति नहीं, घर है। नाना बिधि बिलाप कर तारा, यानी विलाप का कोई एक ढंग नहीं है, अनेकों ढंग हैं, और तारा सबसे होकर गुज़र रही हैं। और फिर वह आधी पंक्ति आती है जिसमें तुलसी शोक को बिना एक भी आँसू गिनाये दिखा देते हैं। छूटे केस न देह सँभारा: बाल खुलकर बिखर गये हैं और देह की सँभाल नहीं रही। जो स्त्री कल तक रानी थी, उसे इस समय यह भी याद नहीं कि वह किसके सामने बैठी है।

अब राम आगे बढ़ते हैं, और वे न सान्त्वना देते हैं, न सफ़ाई। जो वे करते हैं उसे तुलसी दो क्रियाओं में कहते हैं, और दोनों क्रियाएँ राम की हैं, तारा की नहीं।

तारा बिकल देखि रघुराया। दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया॥
छिति जल पावक गगन समीरा । पंच रचित अति अधम सरीरा॥

चौपाई २

दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया: ज्ञान दिया और माया हर ली। पोद्दारजी इस माया को कोष्ठक में खोलकर अज्ञान कहते हैं, और यही इस पंक्ति का सारा भार है। तारा को समझाया नहीं गया, उनके भीतर से वह चीज़ हटा दी गयी जो शोक को टिकाये रखती है। और उसके बाद जो उपदेश आता है, वह एक ही साँस में सबसे छोटे से सबसे बड़े तक चला जाता है।

पहले शरीर की गिनती होती है। छिति जल पावक गगन समीरा, यानी पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु। पाँच चीज़ें, और इन्हीं पाँच से यह देह रची गयी है। तुलसी इसे अति अधम सरीरा कहते हैं, और यह कठोर लगता है जब तक यह याद न रहे कि यह बात किससे कही जा रही है। जिसके सामने अभी-अभी एक देह गिरी है, उसे यह बताया जा रहा है कि जो गिरा वह पाँच तत्त्वों का जोड़ था और उन्हीं पाँच में लौट गया।

प्रगट सो तनु तव आगें सोवा। जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा॥
उपजा ग्यान चरन तब लागी। लीन्हेसि परम भगति बर मागी॥

चौपाई ३

और अब वह प्रश्न आता है जिसका उत्तर कोई नहीं दे सकता। प्रगट सो तनु तव आगें सोवा, वह शरीर तो प्रत्यक्ष सामने पड़ा हुआ है, वह कहीं गया नहीं। जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा, और जीव नित्य है, वह भी कहीं नहीं गया। तो रोना किसके लिये हो रहा है? जो दिख रहा है वह यहीं है, और जो नहीं दिख रहा वह नष्ट ही नहीं होता। शोक के पास खड़े होने की जगह ही नहीं बचती।

इसके बाद की आधी चौपाई इस पूरे प्रसंग का सबसे चुपचाप हिस्सा है। तारा उठकर चरणों पर गिरती हैं, और जो माँगती हैं वह पति नहीं है। लीन्हेसि परम भगति बर मागी: उन्होंने परम भक्ति का वर माँग लिया और ले लिया। जिस स्त्री ने अभी सब कुछ खोया है, वह उस क्षण में वह चीज़ माँगती है जो खोयी नहीं जा सकती। तुलसी यहाँ न उनकी प्रशंसा करते हैं, न रुकते हैं। वे तुरंत आगे बढ़ जाते हैं।

उमा दारु जोषित की नाईं । सबहि नचावत रामु गोसाईं॥
तब सुग्रीवहि आयसु दीन्हा । मृतक कर्म बिधिवत सब कीन्हा॥

चौपाई ४

और यहाँ शिवजी कथा रोककर उमा से बात करने लगते हैं, जैसे वे इस प्रसंग में दो बार करते हैं। उमा दारु जोषित की नाईं, काठ की पुतली की तरह, स्वामी राम सबको नचाते हैं। यह वाक्य ठीक उस जगह रखा गया है जहाँ पाठक सोच सकता था कि तारा ने अपनी समझ से यह वर माँगा। शिवजी उस श्रेय को वहीं से उठाकर राम के पास रख देते हैं। और फिर, बिना किसी अन्तराल के, कथा ज़मीन पर लौट आती है: सुग्रीव को आज्ञा मिलती है और मृतक कर्म बिधिवत सब कीन्हा, बालि का सारा मृतक-कर्म विधिपूर्वक किया जाता है। जो भाई उसके भय से दिन-रात व्याकुल रहता था, उसी के हाथों उसका अन्तिम संस्कार होता है।

सार: बालि के जाने पर नगर उमड़ पड़ता है और तारा बिखरे बालों के साथ विलाप करती हैं। राम उन्हें समझाते नहीं, ज्ञान देकर उनका अज्ञान हर लेते हैं: देह पाँच तत्त्वों की है और सामने ही पड़ी है, जीव नित्य है, तो शोक किसका। तारा चरणों में गिरकर परम भक्ति का वर माँग लेती हैं। इसके बाद राम की आज्ञा से सुग्रीव बालि का सारा मृतक-कर्म विधिपूर्वक पूरा करते हैं।

राज्य, और वह आदमी जिसे वह मिलता है

अब राज्याभिषेक की बारी है, और यहाँ तुलसी एक बात बहुत जानबूझकर करते हैं। राम स्वयं नहीं जाते। वे छोटे भाई को समझाकर कहते हैं, राज देहु सुग्रीवहि जाई, जाकर सुग्रीव को राज्य दे दीजिये। जिस सिंहासन के लिये यह सारा युद्ध हुआ, उसके पास वह व्यक्ति एक बार भी नहीं जाता जिसके बाण ने उसे खाली किया था। सब लोग चरणों में मस्तक नवाकर चलते हैं, और तुलसी जोड़ देते हैं कि चले किसके बल पर, चले सकल प्रेरित रघुनाथा

लछिमन तुरत बोलाए पुरजन बिप्र समाज।
राजु दीन्ह सुग्रीव कहँ अंगद कहँ जुबराज॥ ११॥

दोहा ११

दोहे में दो शब्द ध्यान माँगते हैं। पहला, पुरजन बिप्र समाज। लक्ष्मण अकेले में यह काम नहीं करते। वे नगर के लोगों को और ब्राह्मणों के समाज को पहले बुलाते हैं, और तब आगे बढ़ते हैं। जिस राज्य की नींव अभी-अभी एक वध पर पड़ी है, उसे तुरंत गवाहों के सामने ले जाया जाता है। दूसरा शब्द है अंगद कहँ जुबराज। मारे गये राजा का बेटा उसी दरबार में युवराज बनाया जाता है, उसी दिन, उसी सभा में। यह दया नहीं है, यह हिसाब बराबर करना है। बालि का घर बालि के घर में ही रहेगा, और सुग्रीव उस घर का संरक्षक होकर बैठेगा।

यहाँ शिवजी दूसरी बार कथा रोकते हैं, और इस बार वे तुलना पर उतर आते हैं। उमा राम सम हित जग माहीं, संसार में राम जैसा हित करने वाला कोई नहीं है, और फिर वे गिनती कराते हैं: गुरु नहीं, पिता नहीं, माता नहीं, भाई नहीं, स्वामी नहीं। पाँच सम्बन्ध जिन्हें दुनिया सबसे भरोसेमन्द मानती है, पाँचों एक-एक करके नीचे रख दिये जाते हैं। और कारण भी वे साफ़ कहते हैं, स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती: देवता हों, मनुष्य हों या मुनि, रीति सबकी यही है कि प्रीति स्वार्थ के सहारे चलती है।

इस बात का सबूत सामने ही खड़ा है, और तुलसी उसे तुरंत दिखा देते हैं। जो सुग्रीव दिन-रात बालि के डर से व्याकुल रहता था, जिसके शरीर पर बहुत से घाव थे, और जिसकी छाती चिन्ता से जला करती थी, सोइ सुग्रीव कीन्ह कपिराऊ, उसी को वानरों का राजा बना दिया गया। बदले में राम को क्या मिला, यह पंक्ति पूछती ही नहीं। वह सिर्फ़ इतना कहकर रुक जाती है, अति कृपाल रघुबीर सुभाऊ। स्वभाव का काम है, सौदा नहीं।

और तब वह अर्धाली आती है जिसे तुलसी बिना नाम लिये छोड़ देते हैं। जानतहूँ अस प्रभु परिहरहीं, जो लोग जानते हुए भी ऐसे प्रभु को छोड़ देते हैं, वे विपत्ति के जाल में क्यों न फँसें। किसका नाम नहीं लिया गया, यह इस काण्ड का पाठक जानता है। इसके तुरंत बाद राम सुग्रीव को अलग बुलाते हैं और बहु प्रकार नृपनीति सिखाई, बहुत प्रकार से राजनीति सिखाते हैं। राज्य दे देना एक काम था, राज्य चलाना सिखाना दूसरा।

सार: राम स्वयं नगर नहीं जाते, लक्ष्मण को भेजते हैं। लक्ष्मण नगरवासियों और ब्राह्मणों के समाज के सामने सुग्रीव को राज्य और अंगद को युवराज-पद देते हैं। शिवजी उमा से कहते हैं कि जगत में राम जैसा हित करने वाला कोई नहीं, क्योंकि शेष सब प्रीति स्वार्थ से करते हैं। जो सुग्रीव कल तक भय से व्याकुल था, वही आज कपिराज है, और राम उसे राजनीति की शिक्षा भी देते हैं।

चौदह वर्ष की गिनती, और एक पर्वत

अब राम अपनी बात कहते हैं, और यह इस प्रसंग का वह मोड़ है जिसके बाद कथा धीमी पड़ जाती है। सिंहासन दिया जा चुका, नीति सिखायी जा चुकी, और अब उस आदमी को कहीं जाना है जिसके पास जाने को कोई नगर नहीं है।

कह प्रभु सुनु सुग्रीव हरीसा। पुर न जाउँ दस चारि बरीसा॥
गत ग्रीषम बरषा रितु आई । रहिहउँ निकट सैल पर छाई॥

चौपाई ५

पुर न जाउँ दस चारि बरीसा, यानी चौदह वर्ष तक मैं बस्ती में नहीं जाऊँगा। तुलसी चौदह को सीधे नहीं कहते, वे दस और चार कहते हैं, और पोद्दारजी की टीका पुर को गाँव या बस्ती कहकर खोलती है। ध्यान दीजिये कि यह प्रतिज्ञा उसी क्षण दोहरायी जा रही है जिस क्षण किष्किन्धा का राजपाट तय हुआ है। जो राज्य अभी-अभी सौंपा गया है, उसमें सौंपने वाले का अपना प्रवेश नहीं है। और फिर एक छोटा वाक्य ऋतु बता देता है, गत ग्रीषम बरषा रितु आई, ग्रीष्म बीत गया और वर्षा आ गयी। यही वाक्य आगे के पूरे पन्ने की हवा तय कर देता है।

सुग्रीव को अन्तिम दो निर्देश मिलते हैं। पहला, अंगद के साथ मिलकर राज्य कीजिये। दूसरा, संतत हृदयँ धरेहु मम काजू, मेरा काम हृदय में सदा रखियेगा। यह दूसरा वाक्य इस काण्ड का सबसे नाज़ुक धागा है, और अगले प्रसंग में यही धागा खिंचेगा। फिर सुग्रीव घर लौट जाते हैं, और उसी अर्धाली में राम पहाड़ पर चढ़ जाते हैं, रामु प्रबरषन गिरि पर छाए। दो लोग एक ही पंक्ति में दो दिशाओं में चले जाते हैं, एक अपने घर, दूसरा अपनी प्रतीक्षा में।

प्रथमहिं देवन्ह गिरि गुहा राखेउ रुचिर बनाइ।

दोहा १२, पहली पंक्ति

दोहे का यह आधा हिस्सा एक बात चुपके से बता देता है। पर्वत की गुफा पहले से सुन्दर बनाकर रख दी गयी थी। बनाने वाले देवता थे, और उन्होंने यह इस सोच से किया था कि कृपा के निधान राम कुछ दिन यहाँ आकर रहेंगे। जो आदमी बाहर से देखने पर बेघर है, उसके लिये घर पहले से तैयार है और उसे यह मालूम भी नहीं। तुलसी इस बात पर ज़ोर नहीं देते, वे इसे एक पंक्ति में रखकर आगे बढ़ जाते हैं।

उसके बाद का वन-वर्णन थोड़ा असाधारण है। गुंजत मधुप निकर मधु लोभा, मधु के लोभ से भौंरों के समूह गूँज रहे हैं, और कन्द, मूल, फल तथा पत्ते बहुत हो गये हैं, पर कब से, यह तुलसी जोड़ना नहीं भूलते: भए बहुत जब ते प्रभु आए। वन की समृद्धि की तारीख़ है, और वह तारीख़ किसी के आने की है। इसी तरह सेवा करने वाले भी साधारण नहीं हैं। मधुकर खग मृग तनु धरि देवा, देवता, सिद्ध और मुनि भौंरों, पक्षियों और पशुओं की देह धारण करके सेवा कर रहे हैं। जिस वन में दो आदमी अकेले बैठे दिखते हैं, वह वन असल में भरा हुआ है।

मंगलरूप भयउ बन तब ते । कीन्ह निवास रमापति जब ते॥
फटिक सिला अति सुभ्र सुहाई । सुख आसीन तहाँ द्वौ भाई॥

चौपाई ६

मंगलरूप भयउ बन तब ते, वन मंगलरूप हो गया, और फिर से वही शर्त: जब से रमापति ने वहाँ निवास किया। और तब वह चित्र आता है जिस पर आगे का सारा ऋतु-वर्णन टिका है। फटिक सिला अति सुभ्र सुहाई, स्फटिक की एक शिला है, अत्यन्त उज्ज्वल, और उस पर दोनों भाई सुखपूर्वक बैठे हैं। इस पूरे पन्ने का बाक़ी हिस्सा इसी शिला से देखा गया आकाश है। आगे जो कुछ बरसेगा, जो कुछ हरा होगा, जो कुछ सूखेगा, वह सब इन्हीं दो बैठे हुए लोगों की आँख से आयेगा।

सार: राम सुग्रीव से कहते हैं कि चौदह वर्ष तक वे किसी बस्ती में नहीं जायेंगे, ग्रीष्म बीत चुका है और वर्षा आ गयी है, इसलिये वे पास के पर्वत पर ही रहेंगे। सुग्रीव को अंगद के साथ राज्य करने और राम का काम हृदय में रखने का निर्देश मिलता है। सुग्रीव घर लौटते हैं और राम प्रवर्षण पर्वत पर जा ठहरते हैं, जहाँ देवताओं ने गुफा पहले से सजा रखी थी और जहाँ स्फटिक शिला पर दोनों भाई बैठते हैं।

और तब बादल आ जाते हैं

शिला पर बैठकर राम जो करते हैं, वह पहले एक अर्धाली में बताया जाता है: वे छोटे भाई से अनेकों कथाएँ कहते हैं, और उनके विषय गिनाये जाते हैं, भगति बिरति नृपनीति बिबेका। भक्ति, वैराग्य, राजनीति और विवेक। इसके ठीक बाद की अर्धाली में बिना किसी संकेत के आकाश आ जाता है, बरषा काल मेघ नभ छाए, और गरजते हुए बादल गरजत लागत परम सुहाए कहे जाते हैं। कथा कहते-कहते बात ऊपर चली गयी है, और अगले कई दोहों तक वहीं रहेगी।

लछिमन देखु मोर गन नाचत बारिद पेखि।
गृही बिरतिरत हरष जस बिष्नुभगत कहुँ देखि॥ १३॥

दोहा १३

यह इस पन्ने का पहला जस है, और यही आगे की पूरी विधि तय कर देता है। ऊपर मोरों के झुंड हैं जो बादल देखकर नाच रहे हैं। नीचे, उपमा में, एक गृहस्थ है जो वैराग्य में अनुरक्त है और जिसे कहीं कोई विष्णुभक्त दिख गया है। दोनों में एक ही बात समान है: जो चीज़ जिसकी प्यास है, उसका पहला चिह्न दिखते ही देह अपने आप नाचने लगती है। और ध्यान रहे कि यह उपमा किसी टीकाकार की जोड़ी हुई नहीं है, यह दोहे के भीतर ही रखी हुई है। आगे जितने चित्र आयेंगे, हर चित्र अपनी व्याख्या अपने साथ लेकर आयेगा।

घन घमंड नभ गरजत घोरा । प्रिया हीन डरपत मन मोरा॥
दामिनि दमक रह न घन माहीं । खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं॥

चौपाई ७

और यहाँ, इस पूरे ऋतु-वर्णन में सिर्फ़ एक बार, बोलने वाला अपनी बात कह देता है। प्रिया हीन डरपत मन मोरा: आकाश में बादल घुमड़कर घोर गर्जना कर रहे हैं, और प्रिया के बिना मेरा मन डर रहा है। इसके आगे और इसके पीछे सैकड़ों पंक्तियाँ ऐसी हैं जो दुनिया की बात करती हैं, खल की, संत की, ज्ञानी की, राजा की। बीच में यह एक अर्धाली है जो किसी और की बात नहीं करती। जब कोई प्रतीक्षा में होता है तो ऋतुएँ इसी तरह बोलती हैं, ज़्यादातर समय किसी और के बारे में, और कभी-कभी अचानक अपने बारे में।

उसी चौपाई का दूसरा आधा फिर बाहर लौट आता है। बिजली चमकती है और बादलों में टिकती नहीं, खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं, जैसे दुष्ट की प्रीति स्थिर नहीं रहती। चमक असली है, रोशनी असली है, पर ठहरने का कोई इरादा नहीं है। यहीं से वह लम्बा सिलसिला शुरू होता है जिसमें आकाश हर बार किसी न किसी स्वभाव की तरह दिखने लगता है।

सार: शिला पर बैठे राम लक्ष्मण से भक्ति, वैराग्य, राजनीति और विवेक की कथाएँ कहते हैं, और बात आकाश पर चली जाती है। दोहा तेरह में मोर बादल देखकर नाचते हैं, जैसे वैराग्य में लगा गृहस्थ किसी विष्णुभक्त को देखकर हर्षित होता है। और घनघोर गर्जन के बीच राम एक बार अपनी बात कह देते हैं, कि प्रिया के बिना उनका मन डर रहा है।

वर्षा, और उसके भीतर रखी हुई बातें

अब जो चौपाइयाँ आती हैं उन्हें एक सूची की तरह पढ़ना सबसे आसान है और सबसे ग़लत। ये एक के बाद एक आते हुए दिन हैं, और हर दिन आकाश कुछ अलग करता है। बादल नीचे उतरकर धरती के पास आकर बरसते हैं, और उपमा है जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ, जैसे विद्या पाकर विद्वान झुक जाते हैं। ऊँचाई पर रहकर बरसना सम्भव नहीं है, नीचे आना पड़ता है। उसी चौपाई का दूसरा आधा पहाड़ों पर चला जाता है, जो बूँदों की चोट सहते रहते हैं, खल के बचन संत सह जैसें, जैसे संत दुष्टों के वचन सहते हैं। चोट रुकती नहीं, और पहाड़ हिलता भी नहीं।

फिर छोटी नदियों की बारी आती है, जो भरकर किनारे तोड़ती हुई चल पड़ती हैं, जस थोरेहुँ धन खल इतराई, जैसे थोड़े से धन पर भी दुष्ट इतरा जाता है। पोद्दारजी इस इतराने को मर्यादा छोड़ देना कहते हैं, और नदी के लिये किनारा ही मर्यादा है। इसके बाद पानी ज़मीन पर पड़ता है और गँदला हो जाता है, जनु जीवहि माया लपटानी, मानो शुद्ध जीव से माया लिपट गयी हो। पानी वही है, ऊपर से गिरा हुआ वही है, पर जिस पर गिरा उसका रंग उसमें उतर आया है।

समिटि समिटि जल भरहिं तलावा। जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा॥
सरिता जल जलनिधि महुँ जाई। होइ अचल जिमि जिव हरि पाई॥

चौपाई ८

यह वर्षा-वर्णन का सबसे ऊँचा बिन्दु है, और यह दो चालों में आता है। पहले जल इधर-उधर से सिमट-सिमटकर तालाबों में भरता है, जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा, जैसे सद्गुण एक-एक करके सज्जन के पास चले आते हैं। कोई एक झटके में सज्जन नहीं होता, गुण बूँद-बूँद जमा होते हैं। और फिर दूसरी चाल, जिसमें सारा पानी एक ही दिशा में चला जाता है। नदी का जल समुद्र में पहुँचकर अचल हो जाता है, होइ अचल जिमि जिव हरि पाई, जैसे जीव हरि को पाकर अचल हो जाता है। पोद्दारजी इस अचल को आवागमन से मुक्त होना कहते हैं। बहती हुई नदी को कोई रोकता नहीं, वह अपने आप रुक जाती है, क्योंकि जहाँ पहुँचना था वहाँ पहुँच गयी।

इसके बाद दोहा चौदह आता है, और उसका पहला चित्र ज़मीन पर है। धरती घास से इतनी भर गयी है कि हरी हो गयी है, और उस हरियाली में रास्ते समझ में नहीं आते। पगडंडियाँ मिटी नहीं हैं, वे वहीं हैं, बस दिखनी बन्द हो गयी हैं। और इसके साथ जो उपमा रखी गयी है, वह इस पूरे प्रसंग में सबसे तीखी है।

जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ॥ १४॥

दोहा १४, दूसरी पंक्ति

जैसे पाखण्ड और वाद के प्रचार से सद्ग्रन्थ गुप्त हो जाते हैं। ध्यान दीजिये कि तुलसी यह नहीं कहते कि सद्ग्रन्थ नष्ट हो गये। वे कहते हैं गुप्त हो गये, छिप गये। जैसे घास के नीचे रास्ता वैसे का वैसा पड़ा रहता है और चलने वाले को नहीं मिलता, वैसे ही ग्रन्थ अपनी जगह रहते हैं और खोजने वाले को नहीं दिखते। घास उगाने के लिये किसी को कुछ मिटाना नहीं पड़ता, बस बहुत सारा शोर उगा देना काफ़ी होता है।

सार: बादल नीचे उतरकर बरसते हैं जैसे विद्या पाकर विद्वान झुकते हैं, पहाड़ बूँदों की चोट सहते हैं जैसे संत दुष्टों के वचन। छोटी नदियाँ किनारे तोड़ती हैं जैसे थोड़े धन पर दुष्ट इतराता है, और गिरा हुआ पानी गँदला हो जाता है जैसे जीव से माया लिपट जाती है। जल सिमटकर तालाबों में भरता है जैसे सज्जन के पास सद्गुण, और नदी समुद्र में पहुँचकर अचल हो जाती है जैसे जीव हरि को पाकर। दोहा चौदह में घास से ढकी धरती के रास्ते खो जाते हैं, जैसे पाखण्ड के प्रचार से सद्ग्रन्थ गुप्त हो जाते हैं।

जब धरती पर हर चीज़ बोलने लगती है

अब तक आकाश बोल रहा था। इस हिस्से में ज़मीन बोलती है, और सबसे पहले वह आवाज़ आती है जिसे वर्षा की सबसे मामूली आवाज़ माना जाता है।

दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई॥
नव पल्लव भए बिटप अनेका। साधक मन जस मिलें बिबेका॥

चौपाई ९

चारों दिशाओं से मेढकों की ध्वनि आ रही है, और तुलसी उसे सुहावनी कहते हैं। फिर उपमा, बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई, मानो विद्यार्थियों के समुदाय वेद पढ़ रहे हों। जिसने किसी पाठशाला के बाहर खड़े होकर सुना हो, उसे यह तुरंत समझ आयेगा: बहुत सारी आवाज़ें, एक ही लय में, बेतरतीब और फिर भी एक साथ। और उसी चौपाई का दूसरा आधा पेड़ों पर जाता है, जिनमें नये पत्ते आ गये हैं, साधक मन जस मिलें बिबेका, जैसे विवेक मिल जाने पर साधक का मन हो जाता है। पेड़ वही है, जड़ वही है, ऊपर से सब कुछ नया है।

इसके बाद तुलसी उलटी तरफ़ से देखते हैं, यानी उस पर जो वर्षा में नहीं बचता। मदार और जवासा पत्तों से रहित हो गये, जस सुराज खल उद्यम गयऊ, जैसे अच्छे राज्य में दुष्टों का उद्यम जाता रहता है। और धूल खोजने पर भी कहीं नहीं मिलती, करइ क्रोध जिमि धरमहि दूरी, जैसे क्रोध धर्म को दूर कर देता है। पोद्दारजी यहाँ जोड़ते हैं कि क्रोध का आवेश आने पर धर्म का ज्ञान बचता ही नहीं। जो चीज़ सबसे साधारण थी, वही सबसे पहले ग़ायब है।

फिर आँख फिर से खेत की ओर जाती है। अन्न से लहलहाती धरती की शोभा उपकारी कै संपति जैसी कही जाती है, जैसे किसी उपकारी पुरुष की सम्पत्ति। और उसी चौपाई में रात आ जाती है, जिसके घने अन्धकार में जुगनू चमकते हैं, जनु दंभिन्ह कर मिला समाजा, मानो दम्भियों का समाज जुट गया हो। दो चित्र एक ही चौपाई में, एक दिन का और एक रात का, और दोनों में रोशनी है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि पहली रोशनी किसी काम की है और दूसरी बस दिखने के काम की।

भारी वर्षा से खेतों की क्यारियाँ फूट चलती हैं, और तुलसी उसकी उपमा में कहते हैं कि जैसे स्वतन्त्र हो जाने पर स्त्रियाँ बिगड़ जाती हैं। उसी चौपाई का दूसरा आधा फिर खेत पर लौट आता है, जहाँ चतुर किसान खेतों को निरा रहे हैं, यानी घास-फूस चुनकर बाहर फेंक रहे हैं, जिमि बुध तजहिं मोह मद माना, जैसे विद्वान मोह, मद और मान को छोड़ देते हैं। खेत में उगी हर चीज़ फ़सल नहीं होती, और यही बात मन पर भी लागू है।

फिर दो चौपाइयाँ ऐसी आती हैं जो एक ही साँस में चार बातें कह जाती हैं। चकवे दिखायी नहीं देते, कलिहि पाइ जिमि धर्म पराहीं, जैसे कलियुग को पाकर धर्म भाग जाते हैं। ऊसर में वर्षा तो होती है पर घास तक नहीं उगती, जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा, जैसे हरिभक्त के हृदय में काम उत्पन्न नहीं होता। यही इस पूरे वर्णन का सबसे सुन्दर उलटफेर है: जहाँ कुछ न उगना अभाव था, वहीं यह उपमा उसे गुण बना देती है। इसके बाद धरती अनेक प्रकार के जीवों से भरी हुई शोभा पाती है, प्रजा बाढ़ जिमि पाइ सुराजा, जैसे सुराज पाकर प्रजा बढ़ती है, और जहाँ-तहाँ थके हुए पथिक ठहरे हुए हैं, जिमि इंद्रिय गन उपजें ग्याना, जैसे ज्ञान उत्पन्न होने पर इन्द्रियाँ शिथिल होकर ठहर जाती हैं। रास्ते में रुका हुआ यात्री बुरा नहीं लगता, बस चलना बन्द हो जाता है।

कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं।
जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं॥ १५ (क)॥
कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग।
बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग॥ १५ (ख)॥

दोहा १५ (क)

यहाँ पहली बार वर्षा अपने ही विरुद्ध जाती है। कभी-कभी वायु बहुत ज़ोर से चलने लगती है और बादल जहाँ-तहाँ ग़ायब हो जाते हैं, जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं, जैसे एक कुपुत्र के उत्पन्न हो जाने से पूरे कुल के उत्तम आचरण नष्ट हो जाते हैं। पीढ़ियों में जमा हुई चीज़ को बिखेरने के लिये एक ही झोंका काफ़ी है। इसी दोहे का दूसरा भाग पन्द्रह ख के रूप में दिन और अन्धकार की बात करता है, कि कभी दिन में घोर अँधेरा छा जाता है और कभी सूर्य प्रकट हो जाते हैं, जैसे कुसंग पाकर ज्ञान नष्ट हो जाता है और सुसंग पाकर फिर उत्पन्न हो जाता है। जो नष्ट हो सकता है वह लौट भी सकता है, और दोनों का कारण एक ही जगह से आता है, यानी संगति से।

सार: मेढकों की ध्वनि वेद पढ़ते विद्यार्थियों जैसी लगती है, नये पत्ते विवेक पाये साधक के मन जैसे। मदार और जवासा के पत्ते झड़ जाते हैं जैसे सुराज में दुष्टों का उद्यम, धूल नहीं मिलती जैसे क्रोध में धर्म। जुगनू दम्भियों के समाज जैसे चमकते हैं, ऊसर में वर्षा पर घास नहीं उगती जैसे हरिभक्त के हृदय में काम नहीं उपजता, और थके पथिक वैसे ठहरते हैं जैसे ज्ञान पाकर इन्द्रियाँ। दोहा पन्द्रह में तेज़ हवा बादलों को बिखेर देती है, जैसे एक कुपुत्र कुल के सद्धर्म को।

शरद आती है, और सब कुछ साफ़ हो जाता है

और फिर, बिना किसी घोषणा के, ऋतु बदल जाती है। इस पूरे ऋतु-वर्णन में यही इकलौता मोड़ है, और वह भी किसी के करने से नहीं आता।

बरषा बिगत सरद रितु आई । लछिमन देखहु परम सुहाई॥
फूलें कास सकल महि छाई । जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई॥

चौपाई १०

पहली अर्धाली सम्बोधन से शुरू होती है, यानी वही सुनने वाला अब भी पास बैठा है। वर्षा बीत गयी और परम सुहावनी शरद आ गयी। और इसके साथ जो चित्र आता है वह इस पूरे प्रसंग में सबसे कोमल है। फूले हुए काँस से सारी धरती छा गयी है, जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई, मानो वर्षा-ऋतु ने अपना बुढ़ापा प्रकट कर दिया हो। सफ़ेद काँस उस ऋतु के पके हुए बाल हैं जो अभी-अभी बीती है। जाने वाली ऋतु को तुलसी मरती हुई नहीं, बूढ़ी होती हुई दिखाते हैं, और यह अन्तर छोटा नहीं है।

शरद का पहला काम सुखाना है। अगस्त्य का तारा उदय होकर रास्तों का पानी सोख लेता है, जिमि लोभहि सोषइ संतोषा, जैसे सन्तोष लोभ को सोख लेता है। और फिर नदियों तथा तालाबों का जल निर्मल हो जाता है, संत हृदय जस गत मद मोहा, जैसे मद और मोह से रहित संतों का हृदय। यही जल धीरे-धीरे सूखता भी है, ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी, जैसे ज्ञानी ममता का त्याग करते हैं। रस रस, यानी बूँद-बूँद करके। त्याग भी एक झटके का काम नहीं है, जैसे संचय नहीं था।

फिर पक्षी लौट आते हैं। शरद को पहचानकर खंजन आ गये, पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए, जैसे समय पाकर सुन्दर पुण्य प्रकट हो जाते हैं। धरती पर अब न कीचड़ है न धूल, नीति निपुन नृप कै जसि करनी, और वह ऐसी शोभा दे रही है जैसी नीति में निपुण राजा की करनी। पर उसी चौपाई में एक जीव है जिसके लिये यह सफ़ाई अच्छी ख़बर नहीं है। पानी घट जाने से मछलियाँ व्याकुल हो रही हैं, अबुध कुटुंबी जिमि धनहीना, जैसे धन के बिना एक अविवेकी गृहस्थ व्याकुल होता है। एक ही ऋतु किसी के लिये निर्मलता है और किसी के लिये घटता हुआ पानी।

बिनु घन निर्मल सोह अकासा। हरिजन इव परिहरि सब आसा॥
कहुँ कहुँ बृष्टि सारदी थोरी । कोउ एक पाव भगति जिमि मोरी॥

चौपाई ११

बिना बादल का निर्मल आकाश ऐसा शोभित है हरिजन इव परिहरि सब आसा, जैसे भगवद्भक्त सब आशाएँ छोड़कर शोभित होते हैं। पूरे वर्षा-वर्णन में आकाश भरा हुआ था, गरजता हुआ था, बोझ से झुका हुआ था। यहाँ वह ख़ाली है, और ख़ाली होना ही उसकी शोभा है। और इसके बाद वह आधी पंक्ति आती है जिसमें बोलने वाला दूसरी बार अपने बारे में कुछ कह देता है। कहीं-कहीं शरद की थोड़ी सी वर्षा हो जाती है, कोउ एक पाव भगति जिमि मोरी, जैसे कोई विरला ही मेरी भक्ति पाता है। मोरी, यानी मेरी। जो अब तक ऋतु का वर्णन था, उसमें एक बार फिर वही व्यक्ति बोल पड़ता है जिसकी प्रतीक्षा में यह सारा मौसम बीत रहा है।

चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि।
जिमि हरिभगति पाइ श्रम तजहिं आश्रमी चारि॥ १६॥

दोहा १६

शरद का असर दोहे में मनुष्यों पर उतरता है, और चारों नाम एक ही पंक्ति में गिनाये जाते हैं: राजा, तपस्वी, व्यापारी और भिखारी। चारों हर्षित होकर नगर छोड़कर चल पड़े। पोद्दारजी टीका में बताते हैं कि किस काम के लिये, यानी क्रमशः विजय, तप, व्यापार और भिक्षा। वर्षा के महीनों में चारों रुके हुए थे, और अब रास्ते खुल गये हैं। उपमा भी उसी चार की गिनती पर चलती है, जिमि हरिभगति पाइ श्रम तजहिं आश्रमी चारि, जैसे हरि की भक्ति पाकर चारों आश्रम वाले अपने-अपने श्रम छोड़ देते हैं। जो जहाँ रुका हुआ था, वहाँ से चल दिया।

सार: वर्षा बीतती है और शरद आती है। फूले काँस से ढकी धरती ऐसी लगती है मानो बीती ऋतु ने अपना बुढ़ापा दिखा दिया हो। अगस्त्य का उदय रास्तों का पानी सोख लेता है जैसे सन्तोष लोभ को, जल निर्मल होता है जैसे संत का हृदय, और घटते पानी में मछलियाँ व्याकुल होती हैं जैसे धनहीन अविवेकी गृहस्थ। बादलरहित आकाश आशा छोड़े हुए भक्त जैसा है, और राजा, तपस्वी, व्यापारी तथा भिखारी नगर छोड़कर निकल पड़ते हैं।

आख़िरी रातें, और एक दोहा जो सब समेट लेता है

अन्तिम चौपाइयों में शरद अपनी पूरी खुली हुई हालत में है, और तुलसी एक बार फिर जल से शुरू करते हैं। जो मछलियाँ अथाह जल में हैं वे सुखी हैं, जिमि हरि सरन न एकउ बाधा, जैसे हरि की शरण में चले जाने पर एक भी बाधा नहीं रहती। ठीक पिछली चौपाई में मछलियाँ घटते पानी से व्याकुल थीं, और यहाँ गहरे पानी में वही मछलियाँ सुखी हैं। एक ही जीव, दो जगह, और सारा अन्तर इस बात का कि नीचे कितना पानी है।

फिर कमल खिलते हैं और तालाब की शोभा के लिये तुलसी वह उपमा उठाते हैं जो इस काण्ड में और कहीं नहीं आती, निर्गुन ब्रह्म सगुन भएँ जैसा, जैसे निर्गुण ब्रह्म सगुण होने पर शोभित होता है। पानी पहले भी था, और दिखने को कुछ नहीं था। फूल खिलते ही वही तालाब देखने लायक़ हो जाता है। जो बात पूरे रामचरितमानस की धुरी है, वह यहाँ एक कमल के बहाने आधी पंक्ति में रख दी गयी है।

इसके बाद आवाज़ें लौटती हैं। भौंरे अनुपम शब्द करते हुए गूँज रहे हैं, पक्षियों के नाना प्रकार के सुन्दर स्वर हैं। और उन्हीं के बीच एक पक्षी है जिसे रात अच्छी नहीं लगती। चकवा रात देखकर दुखी होता है, जिमि दुर्जन पर संपति देखी, जैसे दूसरे की सम्पत्ति देखकर दुष्ट को होता है। उसी क्रम में पपीहा है, जिसकी रट लगी हुई है और प्यास बहुत बड़ी है, जिमि सुख लहइ न संकरद्रोही, जैसे शंकर से द्रोह करने वाले को सुख नहीं मिलता।

और फिर चन्द्रमा आता है, और उसके साथ इस पन्ने की सबसे सीधी-सादी बात। शरद का ताप रात में चन्द्रमा हर लेता है, संत दरस जिमि पातक टरई, जैसे संतों के दर्शन से पाप टल जाते हैं। उसी चन्द्रमा को चकोरों के समूह टकटकी लगाकर देखते हैं, चितवहिं जिमि हरिजन हरि पाई, जैसे भगवद्भक्त भगवान को पाकर पलक झपकाये बिना देखते रहते हैं। एक ही चन्द्रमा है, और दो काम कर रहा है, एक का ताप हर रहा है और दूसरे की आँख बाँध रहा है। इसी चौपाई के अन्त में मच्छर और डाँस जाड़े के डर से नष्ट हो जाते हैं, जिमि द्विज द्रोह किएँ कुल नासा, जैसे ब्राह्मण से वैर करने पर कुल का नाश हो जाता है।

भूमि जीव संकुल रहे गए सरद रितु पाइ।
सदगुर मिलें जाहिं जिमि संसय भ्रम समुदाइ॥ १७॥

दोहा १७

और यह दोहा पूरे ऋतु-वर्णन को एक गाँठ में बाँध देता है। वर्षा के महीनों में धरती अनगिनत जीवों से भर गयी थी, और वही धरती शरद आते ही ख़ाली हो जाती है। सदगुर मिलें, सद्गुरु के मिल जाने पर, संशय और भ्रम के पूरे समुदाय उसी तरह चले जाते हैं। ध्यान दीजिये कि यहाँ लड़ाई किसी से नहीं हुई। कीड़े मारे नहीं गये, वे ऋतु बदलते ही नहीं रहे। संशय भी वैसे ही जाते हैं, एक-एक का उत्तर देकर नहीं, बल्कि उस हवा के बदल जाने से जिसमें वे पनपते थे।

सार: गहरे पानी की मछलियाँ सुखी हैं जैसे हरि की शरण में आया हुआ जीव, और खिले कमलों से तालाब ऐसा शोभित है जैसे निर्गुण ब्रह्म सगुण होकर। चकवा रात देखकर दुखी होता है जैसे दुष्ट दूसरे की सम्पत्ति देखकर, चन्द्रमा ताप हरता है जैसे संत-दर्शन पाप। दोहा सत्रह में वर्षा के जीव शरद आते ही वैसे नहीं रहते जैसे सद्गुरु के मिलने पर संशय और भ्रम।

और अन्त में, अपनी ओर

इस प्रसंग को पढ़ते हुए एक बात बार-बार खटकती है। सात दोहों में जो सबसे बड़ी घटना घटती है, वह पहले दो दोहों में निपट जाती है, और बाक़ी पाँच दोहे मौसम पर ख़र्च हो जाते हैं। कथा कहने वाला कोई भी आदमी ऐसा नहीं करेगा। कोई रावण की ओर बढ़ेगा, कोई सीता की खोज पर आयेगा, कोई सेना जुटाता दिखायेगा। तुलसी इनमें से कुछ नहीं करते। वे राम को एक पहाड़ पर बैठाकर पूरी बरसात दिखाते हैं।

यह चूक नहीं है, यह पूरे काण्ड का सबसे ईमानदार हिस्सा है। जिस आदमी की पत्नी उठा ली गयी है, उसके लिये वर्षा के वे महीने खोये हुए महीने हैं। कुछ नहीं हो सकता, कहीं नहीं जाया जा सकता, और रास्ते सचमुच घास से ढके पड़े हैं। ऐसे समय में जो किया जा सकता है वह यही है कि बैठकर देखा जाए, और देखी हुई हर चीज़ में कोई अर्थ खोजा जाए। राम यही करते हैं। हर बादल, हर मेढक, हर जुगनू, हर चकवा किसी न किसी बात का उदाहरण बन जाता है, और यह कोई पण्डिताई नहीं है। यह प्रतीक्षा का वह ढंग है जिससे प्रतीक्षा कटती है।

और इसीलिये उपमाएँ किसी क्रम में नहीं हैं। खल, संत, ज्ञानी, दम्भी, कुपुत्र, सुराज, कलियुग, सद्गुरु: जो सामने आया, उसी से जुड़ गया। मन जब बहुत देर तक ख़ाली बैठा होता है तो वह ऐसे ही चलता है, इधर से उधर, बिना किसी तरतीब के, और हर छलाँग में कुछ न कुछ सच निकल आता है।

इस पन्ने से जाते हुए एक चीज़ साथ ले जाने लायक़ है, और वह दोहा सत्रह है। तुलसी वहाँ संशय मिटाने का कोई तरीक़ा नहीं बताते। वे यह भी नहीं कहते कि संशय बुरे हैं। वे सिर्फ़ इतना दिखाते हैं कि वर्षा में जो असंख्य जीव धरती पर भर गये थे, वे किसी के मारने से नहीं गये, ऋतु बदलने से नहीं रहे। संशय भी उसी तरह जाते हैं। उनसे बहस करके नहीं, उस मौसम के बदल जाने से जिसमें वे पैदा होते थे।

और तारा वाली बात भी वहीं जाकर मिलती है। उनसे कुछ मनवाया नहीं गया, उनके भीतर से अज्ञान हटा दिया गया, और उसके बाद वे स्वयं वह माँगने लगीं जो पहले माँगने का ख़याल भी नहीं आ सकता था। दोनों जगह विधि एक ही है। जो नहीं चाहिये उसे हटाने पर ध्यान है, जो चाहिये उसे जोड़ने पर नहीं। इसके आगे का प्रसंग इसी शान्ति के टूटने का है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, किष्किन्धाकाण्ड, दोहा ११ से १७, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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