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लक्ष्मण का क्रोध और खोज का आरम्भ

रामचरितमानस · किष्किन्धाकाण्ड · लक्ष्मण का क्रोध और खोज का आरम्भ

लक्ष्मण का क्रोध और खोज का आरम्भ

बरसात बीत गई और कोई ख़बर नहीं आई। इसके बाद जो होता है उसमें एक चढ़ा हुआ धनुष है, एक काँपता हुआ नगर है, तीन लोग हैं जो बीच में आ जाते हैं, और अन्त में सबसे पीछे खड़े हुए एक सेवक के हाथ में रखी गई एक अँगूठी।

बरसात बीत गई। इस पन्ने की पहली पंक्ति इतनी सीधी है कि उस पर से फिसलकर आगे निकल जाना आसान है, और वही उसकी चाल है। जो मौसम बीता, वह इसी काण्ड में पीछे पूरे विस्तार से कहा जा चुका है। उसके बीतने का मतलब यह है कि अब कोई आड़ नहीं बची। पानी के दिनों में न सेना चलती है, न रास्ते खुलते हैं, न कोई किसी से हिसाब माँग सकता है। आसमान साफ़ होते ही वह छूट ख़त्म हो जाती है, और सबसे पहले यही सवाल लौटता है कि इतने महीनों में ख़बर क्यों नहीं आई।

राम यह सवाल किसी दरबार में नहीं उठाते। वे अपने छोटे भाई से कहते हैं, और जिस ढंग से कहते हैं उसमें शिकायत से पहले तड़प है। फिर एक वाक्य आता है जिसके बाद यह प्रसंग वह नहीं रह जाता जो अब तक था। वे कहते हैं कि जिस बाण से बालि मारा गया, कल उसी बाण से उस मूढ़ को मारूँगा। यह कोई इशारा नहीं है। यह नाम लेकर कही गई बात है, और जिसका नाम है वह मित्र है।

तुलसी यहाँ न सफ़ाई देते हैं और न छिपाते हैं। वे क्रोध को पूरा लिख देते हैं, फिर उसी चौपाई के दूसरे आधे में शिव उमा से एक सवाल पूछ लेते हैं, और फिर अगली ही पंक्ति में कह देते हैं कि इस चरित्र को वही जानते हैं जिन्होंने रघुवीर के चरणों में प्रीति जोड़ ली है। तीनों बातें एक के बाद एक, बिना किसी को हटाए। इस पन्ने पर हम तीनों को साथ रखेंगे, क्योंकि पाठ ने उन्हें साथ ही रखा है।

इसके बाद जो होता है वह एक कड़ी है। धनुष चढ़ता है, एक भाई नगर की ओर चलता है, नगर काँपता है, और तीन लोग बीच में आकर उस कड़ी को टूटने से बचा लेते हैं। अन्त में सेना जुटती है, चारों दिशाओं में बँटती है, और सबसे पीछे खड़ा हुआ एक वानर पास बुला लिया जाता है। उसके हाथ में जो चीज़ रखी जाती है, उसी से अगला काण्ड शुरू होगा।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • राम · जिनके लिये यह पूरा पन्ना एक ही सवाल है, कि सीता कहाँ हैं। इसी पन्ने पर वे क्रोध करते हैं, क्षमा करते हैं, और सेना के एक-एक वानर से कुशल पूछते हैं।
  • लक्ष्मण · जो प्रभु का क्रोध देखते ही धनुष चढ़ा लेते हैं। उन्हें जो आदेश मिलता है वह मारने का नहीं, केवल भय दिखाने का है, और वे उस आदेश की सीमा नहीं लाँघते।
  • सुग्रीव · किष्किन्धा के राजा, जिन्होंने राज्य, कोश, नगर और घर पाकर वह काम भुला दिया जिसके बल पर ये चीज़ें मिली थीं। इस पन्ने पर वे तीन बार अपनी भूल मानते हैं, और तीनों बार अलग ढंग से।
  • हनुमान · जो सबसे पहले, बिना किसी के कहे, सुग्रीव को जाकर समझाते हैं, और सबसे अन्त में सबके पीछे खड़े मिलते हैं। दोनों जगह वे एक ही आदमी हैं।
  • अंगद · जिन्हें दोहा एक ही शब्द में पहचनवाता है, बालिकुमार। चढ़े हुए धनुष के सामने नगर की ओर से जो पहला आदमी निकलता है, वह यही हैं।
  • तारा · जिन्हें सुग्रीव हनुमान के साथ भेजते हैं। पाठ उनका कोई परिचय नहीं देता, केवल नाम लेता है, और इतने से काम चल जाता है।
  • शिव और उमा · यह सारा वृत्तान्त शिव उमा से कह रहे हैं। इस पन्ने पर वे दो बार सामने आते हैं, एक बार क्रोध के बारे में सवाल लेकर और एक बार वानर सेना के बारे में गवाही लेकर।

बरसात बीत गई, और ख़बर नहीं आई

पिछले प्रसंग में जो मौसम बरस रहा था, वह इस पन्ने पर आते ही बीत जाता है। चौपाई उसे दो शब्दों में निपटा देती है और तीसरे शब्द पर वह चीज़ आ जाती है जिसके लिये यह सारा इन्तज़ार किया गया था। मौसम का बीतना यहाँ ऋतु-वर्णन नहीं है, यह एक तारीख़ है। पानी के दिनों में खोज शुरू नहीं हो सकती थी, इसलिये देर का एक कारण मौजूद था। अब वह कारण हट गया है, और जो बात अब तक उसकी आड़ में खड़ी थी वह बिना आड़ के सामने आ जाती है।

बरषा गत निर्मल रितु आई । सुधि न तात सीता कै पाई॥
एक बार कैसेहुँ सुधि जानौं । कालहु जीति निमिष महुँ आनौं॥

चौपाई १

पहली अर्धाली में दो चीज़ें साथ रखी गई हैं, निर्मल ऋतु और न मिली हुई सुधि। ऊपर सब साफ़ है और भीतर कुछ भी साफ़ नहीं। और ध्यान दीजिए कि राम यह किससे कह रहे हैं। तात, यानी छोटे भाई से। यह घोषणा नहीं है, यह वह बात है जो आदमी उसी से कहता है जो पास बैठा हो।

दूसरी अर्धाली का दावा धीरे पढ़िए। एक बार कैसे भी पता चल जाए, तो काल को भी जीतकर पल भर में ले आऊँ। जिसके पास काल को जीत लेने की बात है, वह एक पते के लिये अटका हुआ है। तुलसी इस विरोध को बनाते नहीं, वे इसे एक ही चौपाई की दो अर्धालियों में रख देते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। बल की कोई कमी नहीं है। कमी सिर्फ़ सुधि की है, और यही एक शब्द इस पूरे काण्ड को आगे खींचता है।

कतहुँ रहउ जौं जीवति होई । तात जतन करि आनउँ सोई॥
सुग्रीवहुँ सुधि मोरि बिसारी । पावा राज कोस पुर नारी॥

चौपाई २

अब वही शब्द पलटकर आता है। पहली चौपाई में सीता की सुधि नहीं मिली, दूसरी में सुग्रीव ने अपनी सुधि भुला दी। एक ही शब्द, दो तरफ़। एक तरफ़ वह ख़बर है जो चाहिये, दूसरी तरफ़ वह याद है जो किसी और ने छोड़ दी। और उसके बाद चार शब्द आते हैं जिनमें आरोप नहीं है, सिर्फ़ गिनती है, राज, कोश, पुर, नारी। तुलसी यह नहीं कहते कि इन्हीं चारों ने भुलाया। वे चारों को एक पंक्ति में रख देते हैं और नतीजा पढ़ने वाले पर छोड़ देते हैं।

इसी चौपाई की पहली अर्धाली को भी मत छोड़िए। कहीं भी रहे, यदि जीवित हो। यह शर्त इस प्रसंग में पहली बार खुलकर कही गई है। जो आदमी महीनों से ख़बर की राह देख रहा है, उसके भीतर यह सवाल भी बैठा रहता है, और वह उसे ज़बान पर ले आता है। इसके तुरन्त बाद जो क्रोध आता है, उसे इसी शर्त के साथ पढ़ना चाहिये। जिसने अभी-अभी यह सोच लिया हो कि शायद वह जीवित न हो, उसके पास शान्त रहने की गुंजाइश कितनी बचती है।

सार: बरसात बीती, आसमान साफ़ हुआ, और सीता की कोई ख़बर नहीं आई। राम कहते हैं कि पता भर चल जाए तो काल को जीतकर ले आऊँ, और फिर कहते हैं कि राज, कोश, नगर और घर पाकर सुग्रीव ने मेरी सुधि भुला दी।

जिस बाण से बालि मारा गया

अब वह पंक्ति आती है जिसकी वजह से यह प्रसंग याद रखा जाता है। इसमें कुछ भी गोलमोल नहीं है। हथियार का नाम है, निशाने का नाम है, और समय भी तय है।

जेहिं सायक मारा मैं बाली। तेहिं सर हतौं मूढ़ कहँ काली॥
जासु कृपाँ छूटहिं मद मोहा । ता कहुँ उमा कि सपनेहुँ कोहा॥

चौपाई ३

काली यहाँ रंग नहीं है, कल है। और बाण वही है जिससे बालि गिरा था, यानी धमकी के भीतर एक याद भी रखी हुई है। किष्किन्धा का सिंहासन जिस बाण से ख़ाली हुआ था, वही बाण अब उस सिंहासन पर बैठे हुए आदमी की तरफ़ मुड़ा हुआ है। जिसने वह बाण चलते देखा हो, उसे समझाने के लिये और कुछ कहने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

और ठीक इसी चौपाई के दूसरे आधे में पाठ पलट जाता है। यह पूरा वृत्तान्त शिव उमा से कह रहे हैं, और यहाँ वे बीच में आकर एक सवाल पूछ लेते हैं। जिनकी कृपा से मद और मोह छूट जाते हैं, उनको स्वप्न में भी क्रोध हो सकता है क्या। सवाल का जवाब नहीं दिया जाता। सवाल छोड़ दिया जाता है।

यहाँ दो रास्ते खुलते हैं और तुलसी दोनों को खुला रहने देते हैं। एक रास्ता कहता है कि यह लीला है और भीतर कुछ नहीं बदला। दूसरा रास्ता वह है जो पंक्ति में लिखा हुआ है, और जिसे पढ़े बिना पन्ना पलटा नहीं जा सकता। पत्नी के न मिलने से एक आदमी इस हालत में आ गया है कि मित्र को मूढ़ कह रहा है और कल की तारीख़ दे रहा है। यह पन्ना दोनों में से किसी एक को चुनकर दूसरे को मिटाता नहीं।

जानहिं यह चरित्र मुनि ग्यानी। जिन्ह रघुबीर चरन रति मानी॥
लछिमन क्रोधवंत प्रभु जाना । धनुष चढ़ाइ गहे कर बाना॥

चौपाई ४

अगली चौपाई पहले आधे में एक शर्त लगा देती है। इस चरित्र को वे मुनि जानते हैं जिन्होंने रघुवीर के चरणों में प्रीति जोड़ ली है। यानी जिसने प्रीति नहीं जोड़ी, उसके लिये यह पंक्ति वही है जो दिखती है, और तुलसी उसे बदलकर कुछ और नहीं दिखा रहे। शर्त लगाना और बात छिपाना दो अलग चीज़ें हैं। यहाँ शर्त लगी है, और बात ज्यों की त्यों खड़ी है।

उसी चौपाई की दूसरी अर्धाली में कोई विचार नहीं है, केवल एक हरकत है। लक्ष्मण ने प्रभु को क्रोध में जाना, धनुष चढ़ाया, बाण हाथ में ले लिये। किसी ने उनसे कुछ कहा नहीं था। भाई का चेहरा देखा और हाथ चल पड़े। इस पन्ने पर आगे जितनी भी दौड़-भाग होगी, उसका पहला कारण यही एक अर्धाली है। क्रोध किसी और का था और हथियार किसी और ने उठा लिया, यह घरों में रोज़ होता है, और तुलसी इसे बिना टिप्पणी के दर्ज कर लेते हैं।

सार: राम कहते हैं कि जिस बाण से बालि मारा था, कल उसी से उस मूढ़ को मारूँगा। उसी चौपाई में शिव उमा से पूछते हैं कि जिनकी कृपा से मद और मोह छूटते हैं उन्हें स्वप्न में भी क्रोध कैसा। और लक्ष्मण, प्रभु को क्रोध में देखकर, धनुष चढ़ाकर बाण हाथ में ले लेते हैं।

करुणा की सीमा, और एक शब्द जो नहीं बदला

अगर यह प्रसंग यहीं आगे बढ़ जाता तो कहानी सीधी होती। पर अगली चीज़ जो होती है, वह इस पूरे पन्ने की सबसे ज़रूरी चीज़ है, और वह एक दोहा है। ध्यान इस पर दीजिए कि दोहा शुरू ही किस नाम से होता है और भेजने वाला किस विशेषण के साथ आता है।

तब अनुजहि समुझावा रघुपति करुना सींव।
भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव॥ १८॥

दोहा १८

दोहा उस आदमी को करुना सींव कहता है, करुणा की सीमा, और यह विशेषण ठीक उस पंक्ति के बाद आता है जिसमें उसी आदमी ने कल मार डालने की बात कही थी। तुलसी दोनों को अलग-अलग पन्नों पर नहीं रखते। वे एक के तुरन्त बाद दूसरा रख देते हैं, और पढ़ने वाले को दोनों के बीच से गुज़रना पड़ता है।

फिर आदेश देखिए, क्योंकि आदेश में ही सारी बात है। भय दिखाकर ले आइए। मारने की बात नहीं है, ले आने की बात है, और उसमें भी साधन केवल डर है। और जिसे लाना है उसे किस नाम से पुकारा गया, यह देखिए। सखा। वह शब्द नहीं बदला। एक ही साँस में मूढ़ कहा गया था, और अब उसी आदमी के लिये सखा कहा जा रहा है। गुस्से ने ज़बान बदल दी, रिश्ते का नाम नहीं बदला।

यही इस प्रसंग का असली सन्तुलन है। क्रोध रद्द नहीं किया गया, उसकी हद बाँध दी गई। लक्ष्मण चढ़े हुए धनुष के साथ जाएँगे, पर जो करके आना है वह पहले से तय है, और तय करने वाला वही है जिसका क्रोध था। जिसे अपने क्रोध की सीमा ख़ुद बाँधनी आती हो, उसका क्रोध बाक़ी लोगों के क्रोध जैसा नहीं चलता। आगे जो कुछ होगा, वह इसी बँधी हुई हद के भीतर होगा, और इसीलिये इस पन्ने पर कोई मरता नहीं।

सार: करुणा की सीमा कहे गए राम अपने छोटे भाई को समझाकर भेजते हैं कि केवल भय दिखाकर सखा सुग्रीव को ले आइए। मूढ़ कहने के बाद भी सखा शब्द अपनी जगह बना रहता है।

उधर किष्किन्धा में, इससे पहले

अब पाठ हमें वहाँ ले जाता है जहाँ यह सब पहुँचने वाला है, और वहाँ पहुँचते ही एक बात दिखा देता है जो पढ़ने वाले को चैन देती है। किष्किन्धा में कोई पहले से जागा हुआ है।

इहाँ पवनसुत हृदयँ बिचारा । राम काजु सुग्रीवँ बिसारा॥
निकट जाइ चरनन्हि सिरु नावा। चारिहु बिधि तेहि कहि समुझावा॥

चौपाई ५

शुरुआत हृदय से होती है, ज़बान से नहीं। पवनसुत ने मन में विचार किया कि सुग्रीव राम का काम भुला बैठे हैं। किसी ने उनसे यह नहीं कहा था। न कोई दूत आया, न कोई आदेश। उन्होंने ख़ुद हिसाब लगाया कि मौसम बीत चुका है और काम जहाँ का तहाँ पड़ा है। इस पन्ने पर जितने लोग हैं, उनमें से पहला यही है जिसे किसी हिलाने की ज़रूरत नहीं पड़ी।

और फिर वे जो करते हैं, उसका क्रम देखने लायक़ है। पास जाकर चरणों में सिर नवाया, उसके बाद समझाया। पहले अधीनता, फिर बात। जिसे समझाना हो और जिसके पास ताक़त भी हो, उसके लिये यह क्रम आसान नहीं होता। टीका बताती है कि चारों प्रकार की नीति कही गई, साम, दान, दण्ड और भेद। यानी मीठी बात भी, लालच भी, डर भी और फूट भी। सब कुछ कहा गया, और सब एक ही आदमी के मुँह से, बिना आवाज़ ऊँची किये।

सुनि सुग्रीवँ परम भय माना। बिषयँ मोर हरि लीन्हेउ ग्याना॥
अब मारुतसुत दूत समूहा । पठवहु जहँ तहँ बानर जूहा॥

चौपाई ६

सुग्रीव का जवाब इस पन्ने की तीन स्वीकारोक्तियों में से पहली है, और सबसे छोटी है। विषयों ने मेरा ज्ञान हर लिया। न सफ़ाई, न बहाना, न यह कि मैं भूल गया था। सीधे यह कि जो चीज़ चाहिये थी वह किसी और ने छीन ली। और यह बात वे उस आदमी से कह रहे हैं जो उनका अपना मन्त्री है और जिसने अभी-अभी उन्हें आईना दिखाया है। जिसके सामने ऐसी बात कही जा सके, वही असल में साथ का आदमी होता है।

डर लगते ही राजा वह करता है जो राजा करता है, हुक्म चलाता है। दूतों के समूह जहाँ-तहाँ भेजिए, जहाँ वानरों के यूथ रहते हैं। फिर जो शर्त जोड़ी जाती है, वह बता देती है कि किष्किन्धा में आदेश किस भाषा में चलते हैं। एक पखवाड़े में जो न आए, उसका मेरे हाथों वध होगा। पन्द्रह दिन और मौत, इससे कम में बात नहीं बनती। इसी पन्ने पर आगे राम भी हुक्म देंगे, और वहाँ मरने की कोई बात नहीं होगी। दोनों को साथ रखकर पढ़िए।

हनुमान उस हुक्म को जैसे का तैसा आगे नहीं बढ़ाते। वे दूतों को बुलाते हैं, सबका बहुत सम्मान करते हैं, और तब भय, प्रीति और नीति तीनों दिखाते हैं। डर अकेला नहीं भेजा जाता, उसके साथ प्रीति भी भेजी जाती है, और दोनों के बीच नीति रखी जाती है ताकि आदमी समझ सके कि करना क्या है। सब चरणों में सिर नवाकर चल देते हैं। पहला काम शुरू हो चुका है, और शुरू करने वाले ने अपने राजा की भाषा सुधारकर आगे बढ़ाई है।

सार: बिना किसी के कहे हनुमान सुग्रीव के पास जाते हैं, चरणों में सिर नवाकर चारों नीतियों से समझाते हैं। सुग्रीव मानते हैं कि विषयों ने उनका ज्ञान हर लिया, और दूत भेजने का आदेश देते हैं, जिसमें पखवाड़े भर की अवधि और वध की धमकी दोनों हैं।

नगर में चढ़ा हुआ धनुष

और ठीक उसी घड़ी, जब दूत निकल रहे हैं, दूसरी तरफ़ से कोई नगर में घुसता है।

भय अरु प्रीति नीति देखराई । चले सकल चरनन्हि सिर नाई॥
एहि अवसर लछिमन पुर आए। क्रोध देखि जहँ तहँ कपि धाए॥

चौपाई ७

एहि अवसर, यानी ठीक इसी मौक़े पर। समय का यह मेल तुलसी जान-बूझकर बनाते हैं। जिस दिन किष्किन्धा ने अपना काम शुरू किया, उसी दिन उसकी सज़ा भी दरवाज़े तक आ पहुँची। खबर पहुँचने में देर होती है और गुस्सा उससे तेज़ चलता है, यह इस चौपाई की सबसे सादी सीख है। लक्ष्मण को कुछ कहना नहीं पड़ा। क्रोध देखकर बंदर जहाँ-तहाँ भागे, यह आधी पंक्ति पूरे नगर का नक़्शा खींच देती है।

धनुष चढ़ाइ कहा तब जारि करउँ पुर छार।
ब्याकुल नगर देखि तब आयउ बालिकुमार॥ १९॥

दोहा १९

दोहे की पहली पंक्ति में धमकी है और दूसरी में उसका असर। नगर को जलाकर अभी राख कर दूँगा। यह कहने के बाद कुछ करना नहीं पड़ता, नगर ख़ुद व्याकुल हो जाता है। और तब जो आदमी सामने आता है, उसका परिचय दोहा एक ही शब्द में देता है, बालिकुमार।

इस एक शब्द पर ठहरना चाहिये। जिस घर का मालिक उसी धनुष से गिराया गया था जिसका ज़िक्र अभी-अभी हुआ है, उसी घर का लड़का नगर की तरफ़ से सबसे पहले बाहर आता है। न उसे भेजा गया, न किसी ने सलाह दी। नगर को व्याकुल देखा और वह चल पड़ा। और आकर वह जो करता है, वह लड़ाई नहीं है। चरणों में सिर नवाकर विनती।

लक्ष्मण का जवाब भी उतना ही सीधा है। उन्होंने उसे अभय बाँह दी, यानी भुजा उठाकर कह दिया कि डर की कोई बात नहीं। जिस आदमी ने अभी नगर जला देने की बात कही थी, वह सामने आए हुए लड़के को सबसे पहले अभय देता है। आदेश की सीमा याद है। भय दिखाना था, नाश करना नहीं, और जो सामने झुक गया उसके लिये भय का काम पूरा हो चुका।

सार: दूतों के निकलते ही लक्ष्मण नगर में आते हैं, बंदर भाग खड़े होते हैं, और धनुष चढ़ाकर वे नगर जला देने की बात कहते हैं। नगर व्याकुल देखकर बालिपुत्र अंगद सामने आते हैं, विनती करते हैं, और लक्ष्मण उन्हें अभय बाँह देते हैं।

तीन लोग जो बीच में आ गए

अब बात सुग्रीव तक पहुँचती है, और पहली बार हमें दिखता है कि डर आदमी को किस हालत में ले आता है। उन्होंने अपने कानों से सुना कि लक्ष्मण क्रोध में हैं, और वे भय से अकुला गए। राजा हैं, नगर उनका है, सेना उनकी है, और वे ख़ुद बाहर नहीं निकलते। जो हुक्म वे देते हैं, उसी में उनकी सारी समझ भी दिख जाती है।

सुनु हनुमंत संग लै तारा । करि बिनती समुझाउ कुमारा॥
तारा सहित जाइ हनुमाना । चरन बंदि प्रभु सुजस बखाना॥

चौपाई ८

हनुमान अकेले नहीं जाएँगे। तारा साथ जाएँगी। पाठ यह नहीं बताता कि तारा कौन हैं, वह केवल नाम लेता है और आगे बढ़ जाता है, क्योंकि जो इस काण्ड को यहाँ तक पढ़ आया है वह जानता है। और यह भी नहीं बताया जाता कि उन्हें साथ क्यों भेजा जा रहा है। कुछ बातें भेजने वाले और भेजी जाने वाली के बीच ही रह जाती हैं, और तुलसी उन्हें वहीं रहने देते हैं।

हनुमान जाकर जो करते हैं, वह बहुत बारीक़ चीज़ है। वे चरणों की वन्दना करते हैं और प्रभु के सुयश का बखान करने लगते हैं। सफ़ाई नहीं देते। सुग्रीव की तरफ़ से कोई दलील नहीं रखते। वे क्रोध में खड़े आदमी के सामने उसी के अपने भाई की महिमा कहने लगते हैं। क्रोध को बहस से ठंडा नहीं किया जाता, याद से किया जाता है, और जिस याद का सहारा लिया गया वह उस आदमी के सबसे नरम हिस्से में जाकर लगती है।

इसके बाद जो होता है वह एक घर का दृश्य है। विनती करके वे उन्हें महल में ले आते हैं, चरण धोकर पलँग पर बैठाते हैं। तब जाकर सुग्रीव उनके चरणों में सिर नवाते हैं, और लक्ष्मण हाथ पकड़कर उन्हें गले से लगा लेते हैं। न कोई शर्त रखी गई, न कोई सफ़ाई माँगी गई। जिस भुजा ने अभी धनुष चढ़ाया था, वही भुजा गले में पड़ जाती है। और यह सब होने के बाद सुग्रीव बोलते हैं।

नाथ बिषय सम मद कछु नाहीं । मुनि मन मोह करइ छन माहीं॥
सुनत बिनीत बचन सुख पावा। लछिमन तेहि बहु बिधि समुझावा॥

चौपाई ९

यह दूसरी स्वीकारोक्ति है, और पहली से बड़ी है। विषय के समान कोई मद नहीं, यह मुनियों के मन में भी क्षण भर में मोह पैदा कर देता है। इसमें अपने को कोई छूट नहीं दी जा रही। जो कहा जा रहा है वह इतना है कि जिस चीज़ ने मुझे गिराया, वह मुनियों तक को गिरा देती है, इसलिये मेरे गिरने पर हैरान होने की ज़रूरत नहीं। लक्ष्मण को इस विनय से सुख मिलता है और वे बहुत प्रकार से समझाते हैं। जो आदेश लेकर वे चले थे, वह यहाँ पूरा हो जाता है, और चढ़े हुए धनुष का काम एक विनम्र वाक्य ने कर दिया।

बीच में हनुमान एक और काम करते हैं जिस पर ध्यान कम जाता है। वे सारा हाल सुना देते हैं कि दूतों के समूह किस तरह भेजे जा चुके हैं। यानी क्षमा माँगने से पहले यह दिखा दिया जाता है कि काम शुरू हो चुका है। माफ़ी के साथ जब काम की रसीद भी रख दी जाए तो माफ़ी का वज़न बदल जाता है, और यह सलीक़ा किसी को सिखाया नहीं जाता।

सार: सुग्रीव डर से घबराकर हनुमान को तारा के साथ भेजते हैं। हनुमान लक्ष्मण के चरणों की वन्दना करके प्रभु का सुयश कहते हैं, उन्हें महल में लाया जाता है, सुग्रीव सिर नवाते हैं और लक्ष्मण उन्हें गले लगा लेते हैं। सुग्रीव कहते हैं कि विषय के समान कोई मद नहीं।

आपकी माया बहुत प्रबल है

अब सब लोग वहाँ चलते हैं जहाँ राम हैं, और चलने के ढंग में भी एक बात छिपी है। सुग्रीव हर्षित होकर चले, अंगद आदि वानर साथ थे, और राम के छोटे भाई को उन्होंने आगे कर लिया। जिसे डराने के लिये भेजा गया था, उसी के पीछे-पीछे चलकर वे पहुँचते हैं। रास्ते की ढाल भी वही है और पहुँचने की वजह भी वही।

नाइ चरन सिरु कह कर जोरी । नाथ मोहि कछु नाहिन खोरी॥
अतिसय प्रबल देव तव माया। छूटइ राम करहु जौं दाया॥

चौपाई १०

पहला वाक्य चौंकाता है। नाथ, मुझे कुछ भी दोष नहीं है। यह क्षमा माँगने की शुरुआत नहीं लगती। पर अगली ही साँस में वजह आ जाती है, और वजह के साथ पूरा वाक्य बदल जाता है। आपकी माया अत्यन्त प्रबल है, और वह तभी छूटती है जब आप दया करें। दोष न होने का मतलब यह नहीं कि भूल नहीं हुई। मतलब यह है कि भूल से बचने का बल मेरे पास था ही नहीं, और जिसके पास वह बल है वही सामने खड़ा है।

इसके बाद सुग्रीव अपने ऊपर जो शब्द लगाते हैं, वे कड़े हैं। देवता, मनुष्य और मुनि सब विषयों के वश में हैं, और मैं तो पामर पशु हूँ, पशुओं में भी अत्यन्त कामी बंदर। इतना कहकर वे तीन कसौटियाँ रख देते हैं। जिसे स्त्री का नयन-बाण न लगा हो। जो क्रोध की घोर अँधेरी रात में भी जागता रहा हो। और जिसने लोभ की फाँसी से अपना गला न बँधाया हो। जो इन तीनों से बचा रहे, वह मनुष्य आप ही के समान है।

और फिर वह पंक्ति आती है जो इस पूरे पन्ने की सबसे साफ़ बात कह देती है। ये गुण साधन से नहीं आते, आपकी कृपा से कोई-कोई इन्हें पाता है। यह तीसरी और आख़िरी स्वीकारोक्ति है। पहली हनुमान के सामने थी और दो शब्दों की थी। दूसरी लक्ष्मण के सामने थी और उसमें मुनि भी शामिल कर लिये गए थे। तीसरी राम के सामने है, और इसमें सुग्रीव अपने को अकेला नहीं छोड़ते, पूरी सृष्टि को एक ही तराज़ू पर रख देते हैं और ख़ुद उसी में खड़े हो जाते हैं।

तब रघुपति बोले मुसुकाई । तुम्ह प्रिय मोहि भरत जिमि भाई॥
अब सोइ जतनु करहु मन लाई । जेहि बिधि सीता कै सुधि पाई॥

चौपाई ११

जवाब में कोई उपदेश नहीं आता। मुस्कराहट आती है, और एक वाक्य जिसमें सज़ा का नामोनिशान नहीं है। आप मुझे भरत के समान प्रिय हैं। जिस आदमी ने कल मार डालने की बात कही थी, वह उसी आदमी को उस भाई के बराबर रख देता है जिसका नाम इस पूरी रचना में प्रेम का दूसरा नाम है। और उसके तुरन्त बाद काम की बात, बिना एक भी शब्द ख़र्च किये। अब मन लगाकर वही उपाय कीजिए जिससे सीता की सुधि मिले।

यही वह जगह है जहाँ इस पन्ने का क्रोध ख़त्म होता है, और उसका अन्त किसी सज़ा से नहीं होता। जिसे डराने के लिये धनुष चढ़ा था, उसे भरत के बराबर कह दिया जाता है, और मामला वहीं बन्द हो जाता है। न कोई शर्त, न कोई ताना, न बीती बात का कोई ज़िक्र। बस वह वाक्य, और उसके बाद सीधे काम।

सार: सुग्रीव राम के चरणों में सिर नवाकर कहते हैं कि दोष उनका नहीं, माया प्रबल है, और वह कृपा से ही छूटती है। राम मुस्कराकर कहते हैं कि आप मुझे भरत के समान प्रिय हैं, और अब मन लगाकर सीता की सुधि का उपाय कीजिए।

जिसे गिनना चाहे वह मूर्ख है

बातचीत चल ही रही थी कि वानरों के यूथ आने लगे। दोहा इसे इतने ही में कह देता है और फिर एक पंक्ति में सारा दृश्य खड़ा कर देता है, कि अनेक रंगों के वानर-दल सब दिशाओं में दिखायी देने लगे। रंग की बात मामूली नहीं है। यह एक जगह की सेना नहीं है, यह हर तरफ़ से आया हुआ जमावड़ा है, और वह क्षितिज तक फैला हुआ है। जिस राजा पर अभी-अभी भूलने का इलज़ाम लगा था, उसके बुलाने पर यह आया है।

बानर कटक उमा मैं देखा। सो मूरुख जो करन चह लेखा॥
आइ राम पद नावहिं माथा। निरखि बदनु सब होहिं सनाथा॥

चौपाई १२

यहाँ शिव दूसरी बार सामने आते हैं, और इस बार सवाल लेकर नहीं, गवाही लेकर। उमा, वह वानर सेना मैंने देखी थी। कहने वाला ख़ुद मौजूद था। और उसके बाद वे गिनने वालों के बारे में जो कहते हैं, वह इस पन्ने की सबसे चुटीली पंक्ति है। जो उसकी गिनती करना चाहे वह मूर्ख है।

गिनती की यह मनाही हिसाब से चिढ़ नहीं है। यह पैमाने का बयान है। जिस चीज़ का हिसाब लगाया जा सके, यह उससे बड़ी है, और जो हिसाब लगाने बैठेगा वह अपनी ही मेहनत बरबाद करेगा। और फिर उस सेना का काम आता है। सब वानर आ-आकर राम के चरणों में मस्तक नवाते हैं और श्रीमुख देखकर सनाथ हो जाते हैं, यानी जिनका कोई नहीं था उनका कोई हो जाता है। इतना ही कहा गया है, और इससे ज़्यादा कहने की ज़रूरत भी नहीं।

अगली चौपाई में तुलसी एक ऐसी बात कह देते हैं जिसे कोई भी लिखने वाला छोड़ सकता था। सेना में एक भी वानर ऐसा नहीं था जिससे राम ने कुशल न पूछी हो। जिस भीड़ को गिनना मूर्खता बताया गया, उसी भीड़ में से एक-एक से बात की गई। और जब पढ़ने वाला हिसाब लगाने बैठता है कि यह कैसे हुआ होगा, तो अगली अर्धाली उसे रोक देती है। यह प्रभु के लिये कोई बड़ी बात नहीं है, क्योंकि रघुनाथ विश्वरूप हैं और सर्वव्यापक।

दो पंक्तियों में दो चीज़ें साथ खड़ी हैं। एक तरफ़ वह आदमी जिसके हाथ में धनुष है और जिसकी पत्नी नहीं मिल रही। दूसरी तरफ़ वह, जो एक ही समय में सब जगह है। इस पन्ने पर तुलसी बार-बार यही करते हैं और कभी एक को दूसरे से मिटाते नहीं। जिसे सब जगह होना कहा गया है, उसी को एक पते की तलाश है, और यह विरोध हल किये बिना छोड़ दिया गया है।

सार: बातचीत के बीच वानरों के यूथ आ जाते हैं, अनेक रंगों के, सब दिशाओं में। शिव कहते हैं कि उस सेना को गिनना चाहे वह मूर्ख है, और यह भी कि सेना में एक भी वानर ऐसा नहीं था जिससे राम ने कुशल न पूछी हो।

चारों दिशाएँ, और एक महीने की अवधि

आज्ञा मिलते ही सब जहाँ-तहाँ खड़े हो जाते हैं, और सुग्रीव सबको समझाकर कहते हैं। उनके वाक्य में दो चीज़ें साथ हैं। यह राम का कार्य है, और यह मेरा निहोरा है। निहोरा, यानी अनुरोध, एहसान की तरह माँगी गई बात। राजा चाहता तो सिर्फ़ हुक्म दे सकता था। वह हुक्म के साथ अपना अनुरोध भी रख देता है, क्योंकि जिस काम में देर उसी से हुई है उसे वह अच्छी तरह जानता है।

जनकसुता कहुँ खोजहु जाई । मास दिवस महँ आएहु भाई॥
अवधि मेटि जो बिनु सुधि पाएँ । आवइ बनिहि सो मोहि मराएँ॥

चौपाई १३

अवधि एक महीना है, और अवधि के साथ सज़ा जुड़ी हुई है। जो अवधि बिताकर बिना पता लगाए लौट आएगा, उसे मरवाना ही पड़ेगा। यह इस पन्ने पर दूसरी बार है जब सुग्रीव के मुँह से मौत की बात निकलती है। पहली बार पन्द्रह दिन थे, अब तीस। जिस आदमी को अभी-अभी माफ़ किया गया है, वह अपने लोगों के साथ इसी भाषा में बात करता है। और इसी पन्ने पर उसी आदमी से कहा गया था कि आप मुझे भरत के समान प्रिय हैं। दोनों वाक्य पास-पास खड़े हैं और पाठ उन पर कोई टिप्पणी नहीं करता।

वचन सुनते ही सब वानर तुरन्त निकल जाते हैं। तब सुग्रीव अंगद, नल और हनुमान को अलग से बुलाते हैं। पूरी सेना चारों तरफ़ जा चुकी है, और अब उसके भीतर से एक दल अलग बनाया जा रहा है। इस दल के लिये जो कहा जाता है, वह बाक़ी सबसे अलग है।

सुनहु नील अंगद हनुमाना। जामवंत मतिधीर सुजाना॥
सकल सुभट मिलि दच्छिन जाहू । सीता सुधि पूँछेहु सब काहू॥

चौपाई १४

दल में चार नाम हैं, नील, अंगद, जाम्बवान् और हनुमान, और दिशा एक है, दक्षिण। पाठ यहाँ कोई कारण नहीं बताता कि दक्षिण ही क्यों। वह सिर्फ़ इतना कहता है कि सब श्रेष्ठ योद्धा मिलकर जाएँ और जो भी मिले उससे सीता का पता पूछें। जो आगे होने वाला है, उसकी पूरी नींव इसी एक चौपाई में रख दी गई है, और रखते समय उस पर कोई निशान नहीं लगाया गया।

इसके बाद सुग्रीव जो कहते हैं, वह आदेश से निकलकर उपदेश में चला जाता है। मन, वचन और कर्म से उसी का उपाय सोचिए, रामचन्द्र का कार्य सँवारिए। सूर्य का सेवन पीठ की ओर से होता है और अग्नि का सामने से, पर स्वामी की सेवा छल छोड़कर सर्वभाव से करनी चाहिये। ताप की दुनिया में हर चीज़ का एक कोण होता है, कितना पास जाएँ और किस तरफ़ से जाएँ। सेवा की दुनिया में कोई कोण नहीं होता।

और फिर बात अचानक बहुत दूर तक चली जाती है। माया छोड़कर परलोक का सेवन कीजिए, जिससे भव से पैदा हुए सारे शोक मिट जाएँ। देह धारण करने का यही फल है कि सब कामनाएँ छोड़कर राम का भजन किया जाए। गुणों को पहचानने वाला और बड़भागी वही है जो रघुवीर के चरणों का प्रेमी है। जिस मुँह से अभी अवधि और वध की बात निकली थी, उसी मुँह से यह निकलता है, और तुलसी इस पर कोई टिप्पणी नहीं करते। आज्ञा माँगकर, चरणों में फिर सिर नवाकर, सब हर्षित होकर चल पड़ते हैं।

सार: सुग्रीव सबको चारों ओर भेजते हैं, एक महीने की अवधि और उसके बाद वध की चेतावनी के साथ। फिर नील, अंगद, जाम्बवान् और हनुमान को दक्षिण भेजते हैं, और उन्हें छल छोड़कर सर्वभाव से स्वामी की सेवा करने का उपदेश देते हैं।

सबसे पीछे खड़ा हुआ एक सेवक

अब भीड़ छँट चुकी है। जो जाना था वह जा चुका, जो कहना था वह कहा जा चुका। और तब पाठ एक आदमी पर आकर रुकता है जो अब तक इस दृश्य में कहीं नहीं दिखा था, क्योंकि वह सबके पीछे खड़ा था।

पाछें पवन तनय सिरु नावा । जानि काज प्रभु निकट बोलावा॥
परसा सीस सरोरुह पानी । करमुद्रिका दीन्हि जन जानी॥

चौपाई १५

सबसे पीछे पवनसुत ने सिर नवाया। जो सबसे पहले जागा था और जिसने बिना कहे काम शुरू किया था, वह क़तार में सबसे आख़िर में खड़ा है। और यहीं वह वाक्य आता है जिस पर यह पूरा काण्ड घूम जाता है। कार्य का विचार करके प्रभु ने उन्हें पास बुलाया। बुलाने की वजह जान-पहचान नहीं है, सिफ़ारिश नहीं है, क़तार में जगह नहीं है। वजह काम है। जिसे काम की समझ हो, वह भीड़ में से उसी को छाँटता है जो काम कर सकता है।

फिर तीन हरकतें, एक के बाद एक। कर-कमल से सिर का स्पर्श। अपना जन जानकर पहचान। और हाथ की अँगूठी उतारकर दे देना। स्पर्श से भरोसा दिया गया, पहचान से रिश्ता तय हुआ, और अँगूठी से वह चीज़ मिली जो सैकड़ों कोस दूर किसी अजनबी जगह पर सबूत का काम करेगी। इस अँगूठी के बिना सुन्दरकाण्ड का सबसे ज़रूरी दृश्य हो ही नहीं सकता, और यहाँ उसे एक अर्धाली में दे दिया जाता है, बिना किसी ताम-झाम के।

साथ की हिदायत भी उतनी ही छोटी है। सीता को बहुत प्रकार से समझाइएगा, मेरा बल और मेरा विरह कहिएगा, और जल्दी लौट आइएगा। इसमें एक भी शब्द रास्ते के बारे में नहीं है, समुद्र के बारे में नहीं है, लंका के बारे में नहीं है। जिस आदमी को भेजा जा रहा है, उससे रास्ते की बात नहीं की जाती। हनुमान अपना जन्म सफल मानते हैं और कृपानिधान को हृदय में रखकर चल देते हैं।

इसी जगह पाठ एक बात और कह देता है, कि यद्यपि प्रभु सब जानते हैं, फिर भी वे राजनीति की मर्यादा रख रहे हैं। जो सब जानता हो, वह ढूँढ़ने क्यों भेजेगा, इस सवाल का जवाब यही आधी पंक्ति है। जिस दुनिया में काम आदमियों के हाथों होता है, उस दुनिया का तरीक़ा आदमियों वाला ही रहेगा, वरना न कोई भेजा जाएगा, न कोई जाएगा, न किसी को कुछ मिलेगा।

चले सकल बन खोजत सरिता सर गिरि खोह।
राम काज लयलीन मन बिसरा तन कर छोह॥ २३॥

दोहा २३

दोहा जो गिनाता है वह जगहों की सूची है, वन, नदी, तालाब, पर्वत और पर्वतों की कन्दराएँ। और आख़िरी अर्धाली में वह कहता है कि मन राम के काम में लवलीन है और शरीर तक का छोह भूल गया है। छोह, यानी वह ममता जो आदमी सबसे पहले अपने ही शरीर से करता है। भूख, प्यास, थकान और चोट का हिसाब रखने वाली चीज़ यही होती है, और खोज पर निकले हुए लोगों को उसका ख़याल ही नहीं रहा। जिस पन्ने की शुरुआत एक आदमी के भीतर की तड़प से हुई थी, वह अब सैकड़ों लोगों के पैरों में उतर चुकी है।

सार: सबसे पीछे खड़े हनुमान को राम कार्य का विचार करके पास बुलाते हैं, कर-कमल से उनका सिर छूते हैं और अपना सेवक जानकर हाथ की अँगूठी उतारकर देते हैं। सब वानर वन, नदी, पर्वत और कन्दराओं में खोजते हुए चल पड़ते हैं, शरीर तक की सुध भुलाकर।

और अन्त में, अपनी ओर

इस पन्ने पर एक सवाल बार-बार लौटता है। जिसके बारे में शिव कहते हैं कि उसे स्वप्न में भी क्रोध नहीं हो सकता, वह मित्र को मूढ़ क्यों कह रहा है। तुलसी ने इसका जवाब देने का मौक़ा दो बार छोड़ दिया। पहली बार सवाल पूछकर चुप हो गए, दूसरी बार यह कहकर कि इस चरित्र को वही जानते हैं जिनकी प्रीति उन चरणों में है। पन्ना इसी अधूरेपन के साथ खड़ा रहता है, और शायद इसी वजह से इतने बरसों टिका हुआ है। जो रचना हर बात समझा देती है, उसे दोबारा पढ़ने की ज़रूरत कम पड़ती है।

पर एक चीज़ पूरे पन्ने में खुलकर दिखती है, और वह जवाब से ज़्यादा काम की है। इस क्रोध का कोई शिकार नहीं बना। धनुष चढ़ा, नगर काँपा, अंगद बाहर आए, तारा गईं, हनुमान गए, और अन्त में बात गले लगने और मुस्कराने पर ख़त्म हुई। जिस आदेश के साथ लक्ष्मण भेजे गए थे, उसमें मारने की इजाज़त थी ही नहीं। क्रोध को उसी आदमी ने बाँध रखा था जिसे वह हुआ था, और बाँधने का काम उसने गुस्सा उतरने के बाद नहीं, गुस्से के ठीक बीच में किया।

दूसरी चीज़ यह कि इस पन्ने पर काम बचाया किसने। राजा ने नहीं, आदेश ने नहीं, सेना ने नहीं। एक आदमी ने, जिसे किसी ने कुछ कहा नहीं था, और जो अन्त में सबके पीछे खड़ा मिला। भूल सुधारने की शुरुआत उसी से हुई और चलने की शुरुआत भी उसी से। बीच में जो कुछ हुआ, क्रोध, भय, विनती और क्षमा, वह सब उसी एक काम के इर्द-गिर्द घूमता रहा जिसे वह पहले दिन से पकड़े हुए था। और जब सब कुछ शान्त हो गया, तो हाथ में अँगूठी भी उसी के आई।

तीसरी चीज़ सुग्रीव की तरफ़ से है, और वह हमारे ज़्यादा क़रीब पड़ती है। उन्होंने जो किया, वह कोई बड़ा विश्वासघात नहीं था। उन्होंने सिर्फ़ देर की। घर मिला, आराम मिला, और जो काम बाहर पड़ा था वह कल पर टलता चला गया। इस भूल के लिये पाठ ने जो शब्द चुना वह भी बड़ा नरम है, सुधि भुला दी। और इसी नरम शब्द के पीछे एक चढ़ा हुआ धनुष और एक काँपता हुआ नगर खड़ा हो गया। देर करने की क़ीमत कभी-कभी देर करने वाले की समझ से बहुत बड़ी निकलती है।

एक बात और, जो पढ़ते हुए आसानी से छूट जाती है। इस पूरे प्रसंग में सीता एक बार भी सामने नहीं आतीं। उनका नाम पहली पंक्ति में आता है और आख़िरी हिदायत में। बीच का सारा हिस्सा उन लोगों का है जो उन्हें ढूँढ़ नहीं पा रहे। जो मौजूद नहीं है, वही सारे पन्ने को चला रहा है, और यही इस काण्ड का ढंग है।

अगली बार जब यही लोग हमें मिलेंगे, वे दक्षिण की तरफ़ बहुत दूर निकल चुके होंगे, महीने की अवधि सिर पर होगी, और पता अब भी नहीं लगा होगा। और क़तार में सबसे पीछे वही चल रहा होगा, जिसके हाथ में अँगूठी है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, किष्किन्धाकाण्ड, दोहा १८ से २३, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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