लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish

लक्ष्मण का क्रोध और खोज का आरम्भ

इस पृष्ठ पर

रामचरितमानसकिष्किन्धाकाण्डप्रसंग 4

बरसात बीत गई और कोई ख़बर नहीं आई। इसके बाद जो होता है उसमें एक चढ़ा हुआ धनुष है, एक काँपता हुआ नगर है। तीन लोग हैं जो बीच में आ जाते हैं। और अन्त में सबसे पीछे खड़े हुए एक सेवक के हाथ में रखी गई एक अँगूठी।

बरसात बीत गई। कथा की यह पहली बात बहुत सीधी है, पर उसका अर्थ यह है कि अब कोई आड़ नहीं बची। पानी के दिनों में न सेना चलती है, न रास्ते खुलते हैं, न कोई किसी से हिसाब माँग सकता है। आसमान साफ़ होते ही वह छूट ख़त्म हो जाती है, और सबसे पहले यही सवाल लौटता है कि इतने महीनों में ख़बर क्यों नहीं आई।

राम यह सवाल किसी दरबार में नहीं, अपने छोटे भाई से कहते हैं, और उनके कहने में शिकायत से पहले तड़प है। फिर एक वाक्य आता है जिसके बाद यह प्रसंग बदल जाता है: “जिस बाण से मैंने बालि को मारा, कल उसी बाण से उस मूढ़ को मारूँगा।” यह कोई इशारा नहीं। यह नाम लेकर कही गई बात है, और जिसका नाम है वह मित्र है।

कथा क्रोध को पूरा कहती है। साथ ही शिव पार्वती से एक सवाल पूछ लेते हैं। फिर वे कहते हैं कि इस चरित्र को वही जानते हैं जिन्होंने राम के चरणों में प्रीति जोड़ ली है। तीनों बातें एक के बाद एक आती हैं, बिना किसी को हटाए।

इसके बाद एक कड़ी चलती है। धनुष चढ़ता है, एक भाई नगर की ओर चलता है, नगर काँपता है, और तीन लोग बीच में आकर उस कड़ी को टूटने से बचा लेते हैं। अन्त में सेना जुटती है, चारों दिशाओं में बँटती है, और सबसे पीछे खड़ा एक वानर पास बुला लिया जाता है। उसके हाथ में जो चीज़ रखी जाती है, उसी से अगला काण्ड शुरू होगा।

प्रवर्षण से किष्किन्धा तक

  • राम · जिनके मन में एक ही सवाल है, कि सीता कहाँ हैं। प्रवर्षण पर वे क्रोध करते हैं, क्षमा करते हैं, और सेना के एक-एक वानर से कुशल पूछते हैं।
  • लक्ष्मण · जो राम का क्रोध देखते ही धनुष चढ़ा लेते हैं। उन्हें आदेश मारने का नहीं, केवल भय दिखाने का मिलता है, और वे उसकी सीमा नहीं लाँघते।
  • सुग्रीव · किष्किन्धा के राजा, जिन्होंने राज्य, कोश, नगर और घर पाकर वह काम भुला दिया जिसके बल पर ये चीज़ें मिली थीं। इस प्रसंग में वे तीन बार अपनी भूल मानते हैं, तीनों बार अलग ढंग से।
  • हनुमान · जो सबसे पहले, बिना किसी के कहे, सुग्रीव को जाकर समझाते हैं, और सबसे अन्त में सबके पीछे खड़े मिलते हैं।
  • अंगद · जिन्हें कथा एक ही रिश्ते से पहचनवाती है, बालि का पुत्र। चढ़े हुए धनुष के सामने नगर की ओर से जो पहला आदमी निकलता है, वह यही हैं।
  • तारा · जिन्हें सुग्रीव हनुमान के साथ भेजते हैं। पाठ उनका कोई परिचय नहीं देता, केवल नाम लेता है।
  • शिव और पार्वती · यह सारा वृत्तान्त शिव पार्वती से कह रहे हैं। कथा के बीच शिव दो बार सामने आते हैं, एक बार क्रोध के बारे में सवाल लेकर और एक बार वानर सेना के बारे में गवाही लेकर।

बरसात बीत गई, और ख़बर नहीं आई

पिछले प्रसंग में जो मौसम बरस रहा था, वह यहाँ आते ही बीत जाता है। कथा उसे बस इतना कहकर विदा कर देती है, और तुरन्त वह चीज़ आ जाती है जिसके लिये यह सारा इन्तज़ार था। मौसम का बीतना यहाँ एक तारीख़ है। पानी के दिनों में खोज शुरू नहीं हो सकती थी, इसलिये देर का एक कारण था। अब वह कारण हट गया है।

राम कहते हैं कि निर्मल शरद आ गयी, पर सीता की कोई ख़बर नहीं मिली। यहाँ दो चीज़ें साथ हैं, निर्मल ऋतु और न मिली हुई सुधि। ऊपर सब साफ़ है और भीतर कुछ भी साफ़ नहीं। वे यह छोटे भाई से कह रहे हैं। यह घोषणा नहीं, वह बात है जो आदमी उसी से कहता है जो पास बैठा हो।

फिर राम कहते हैं, “एक बार कैसे भी पता चल जाए, तो काल को भी जीतकर पल भर में ले आऊँ।” जिसके पास काल को जीत लेने की बात है, वह एक पते के लिये अटका हुआ है। यह विरोध बिना टिप्पणी के रखा गया है, और कथा आगे बढ़ जाती है। बल की कोई कमी नहीं, कमी सिर्फ़ सुधि की है, और यही एक शब्द इस पूरे काण्ड को आगे खींचता है।

अब वही शब्द पलटकर आता है। पहले सीता की सुधि नहीं मिली थी, अब राम कहते हैं कि सुग्रीव ने भी उनकी सुधि भुला दी। एक तरफ़ वह ख़बर है जो चाहिये, दूसरी तरफ़ वह याद जो किसी और ने छोड़ दी। फिर चार चीज़ें आती हैं जिनमें आरोप नहीं, सिर्फ़ गिनती है: राज्य, कोश, नगर और स्त्री। राम यह नहीं कहते कि इन्हीं चारों ने भुलाया। वे चारों को एक साथ रख देते हैं।

इससे ठीक पहले राम एक शर्त रख चुके हैं: “कहीं भी रहे, यदि जीवित हो, तो यत्न करके उसे ले आऊँगा।” यह शर्त इस प्रसंग में पहली बार खुलकर कही गई है। जो महीनों से ख़बर की राह देख रहा है, उसके भीतर यह सवाल भी बैठा रहता है। इसके तुरन्त बाद जो क्रोध आता है, वह इसी शर्त के पास खड़ा है।

जिस बाण से बालि मारा गया

अब वह बात आती है जिसकी वजह से यह प्रसंग याद रखा जाता है। राम कहते हैं, “जिस बाण से मैंने बालि को मारा था, उसी बाण से कल उस मूढ़ को मारूँ!” इसमें कुछ भी गोलमोल नहीं: हथियार का नाम है, निशाने का नाम है, और समय भी तय है।

बाण वही है जिससे बालि गिरा था, यानी धमकी के भीतर एक याद भी है। किष्किन्धा का सिंहासन जिस बाण से ख़ाली हुआ था, वही बाण अब उस सिंहासन पर बैठे आदमी की तरफ़ मुड़ा हुआ है।

और यहीं शिव बीच में आते हैं। वे पार्वती से एक सवाल पूछते हैं: जिनकी कृपा से मद और मोह छूट जाते हैं, उनको स्वप्न में भी क्रोध हो सकता है क्या? सवाल का जवाब नहीं दिया जाता। सवाल छोड़ दिया जाता है।

यहाँ दो रास्ते खुलते हैं, और कथा दोनों को खुला रहने देती है। एक कहता है कि यह लीला है और भीतर कुछ नहीं बदला। दूसरा वह है जो सामने लिखा है। पत्नी के न मिलने से एक आदमी इस हालत में आ गया है कि मित्र को मूढ़ कह रहा है और कल की तारीख़ दे रहा है। कथा दोनों में से किसी एक को चुनकर दूसरे को मिटाती नहीं।

फिर शिव एक शर्त लगा देते हैं: इस चरित्र को वे मुनि और ज्ञानी जानते हैं जिन्होंने राम के चरणों में प्रीति जोड़ ली है। शर्त लगाना और बात छिपाना दो अलग चीज़ें हैं। यहाँ शर्त लगी है, और बात ज्यों की त्यों खड़ी है।

इसके बाद कोई विचार नहीं, केवल एक हरकत है: लक्ष्मण ने राम को क्रोध में जाना, धनुष चढ़ाया, बाण हाथ में ले लिये। किसी ने उनसे कुछ कहा नहीं था। भाई का चेहरा देखा और हाथ चल पड़े। आगे किष्किन्धा तक जितनी दौड़-भाग होगी, उसका पहला कारण यही हरकत है। क्रोध किसी और का था और हथियार किसी और ने उठा लिया, और कथा इसे बिना टिप्पणी के कह देती है।

करुणा की सीमा, और एक शब्द जो नहीं बदला

अगर कथा यहीं आगे बढ़ जाती तो सीधी होती। पर अगली चीज़ इस प्रसंग में सबसे ज़रूरी है।

कथा राम को करुणा की सीमा कहती है। यह विशेषण ठीक उस बात के बाद आता है जिसमें उन्होंने कल मार डालने की बात कही थी। कथा दोनों के बीच कोई दूरी नहीं रखती। एक के तुरन्त बाद दूसरा आता है।

सारी बात आदेश में है: “भय दिखाकर सखा सुग्रीव को ले आइए।” मारने की बात नहीं, ले आने की बात है, और उसमें भी साधन केवल डर है। और जिसे लाना है उसे सखा कहा गया। वह शब्द नहीं बदला। अभी-अभी मूढ़ कहा गया था, और अब उसी के लिये सखा। गुस्से ने ज़बान बदल दी, रिश्ते का नाम नहीं बदला।

यही इस प्रसंग का सन्तुलन है: क्रोध रद्द नहीं किया गया, उसकी हद बाँध दी गई। लक्ष्मण चढ़े हुए धनुष के साथ जाएँगे, पर जो करके आना है वह पहले से तय है, और तय करने वाला वही है जिसका क्रोध था। आगे जो कुछ होगा, वह इसी बँधी हुई हद के भीतर होगा, और इसीलिये इस पूरे क्रोध में कोई मरता नहीं।

उधर किष्किन्धा में, इससे पहले

अब कथा वहाँ जाती है जहाँ यह सब पहुँचने वाला है। वहाँ एक बात पहले से दिखती है: किष्किन्धा में कोई पहले से जागा हुआ है।

शुरुआत हृदय से होती है, ज़बान से नहीं। हनुमान ने मन में विचार किया कि सुग्रीव राम का काम भुला बैठे हैं। किसी ने उनसे यह नहीं कहा था, न कोई दूत आया, न कोई आदेश। उन्होंने ख़ुद हिसाब लगाया कि मौसम बीत चुका है और काम जहाँ का तहाँ पड़ा है। किष्किन्धा में यही पहले हैं जिन्हें किसी के हिलाने की ज़रूरत नहीं पड़ी।

फिर उनका क्रम: पास जाकर चरणों में सिर नवाया, उसके बाद समझाया। पहले अधीनता, फिर बात। टीका बताती है कि चारों प्रकार की नीति कही गई, साम, दान, दण्ड और भेद। यानी मीठी बात भी, लालच भी, डर भी और फूट भी, और सब एक ही आदमी के मुँह से, बिना आवाज़ ऊँची किये।

सुग्रीव ने सुनकर बहुत भय माना, और उनका जवाब उनकी तीन स्वीकारोक्तियों में से पहली और सबसे छोटी है: “विषयों ने मेरा ज्ञान हर लिया।” न सफ़ाई, न बहाना। और यह बात वे अपने मन्त्री से कह रहे हैं, जिसने अभी उन्हें आईना दिखाया है। जिसके सामने ऐसी बात कही जा सके, वही असल में साथ का आदमी होता है।

डर लगते ही राजा हुक्म चलाता है। “हनुमान, दूतों के समूह जहाँ-तहाँ भेजिए, जहाँ वानरों के यूथ रहते हैं,” सुग्रीव कहते हैं। वे शर्त जोड़ते हैं: “एक पखवाड़े में जो न आए, उसका मेरे हाथों वध होगा।” पन्द्रह दिन और मौत, किष्किन्धा में आदेश इसी भाषा में चलते हैं। थोड़ी देर बाद राम भी हुक्म देंगे, और वहाँ मरने की कोई बात नहीं होगी।

हनुमान उस हुक्म को जैसे का तैसा आगे नहीं बढ़ाते। वे दूतों को बुलाते हैं, सबका बहुत सम्मान करते हैं, और तब भय, प्रीति और नीति तीनों दिखाते हैं। डर अकेला नहीं भेजा जाता, उसके साथ प्रीति भी जाती है, और दोनों के बीच नीति, ताकि आदमी समझ सके कि करना क्या है। सब चरणों में सिर नवाकर चल देते हैं। पहला काम शुरू हो चुका है, और शुरू करने वाले ने अपने राजा की भाषा सुधारकर आगे बढ़ाई है।

नगर में चढ़ा हुआ धनुष

और ठीक उसी घड़ी, जब दूत निकल रहे हैं, दूसरी तरफ़ से कोई नगर में घुसता है।

ठीक इसी मौक़े पर लक्ष्मण नगर में आये। जिस दिन किष्किन्धा ने अपना काम शुरू किया, उसी दिन उसकी सज़ा भी दरवाज़े तक आ पहुँची। ख़बर पहुँचने में देर होती है और गुस्सा उससे तेज़ चलता है। लक्ष्मण को कुछ कहना नहीं पड़ा। क्रोध देखकर बंदर जहाँ-तहाँ भागे, और यह एक बात पूरे नगर का नक़्शा खींच देती है।

पहले धमकी आती है, फिर उसका असर। धनुष चढ़ाकर लक्ष्मण कहते हैं, “नगर को जलाकर अभी राख कर दूँगा।” इसके बाद कुछ करना नहीं पड़ता, नगर ख़ुद व्याकुल हो जाता है। और तब जो सामने आता है, उसका परिचय कथा एक ही रिश्ते से देती है: बालि का पुत्र अंगद।

जिस घर का मालिक उसी धनुष से गिराया गया था, उसी घर का लड़का नगर की तरफ़ से सबसे पहले बाहर आता है। न उसे भेजा गया, न किसी ने सलाह दी। नगर को व्याकुल देखा और वह चल पड़ा। और आकर वह लड़ता नहीं, चरणों में सिर नवाकर विनती करता है।

लक्ष्मण का जवाब भी उतना ही सीधा है: उन्होंने उसे अभय बाँह दी, यानी भुजा उठाकर कह दिया कि डर की कोई बात नहीं। जिसने अभी नगर जला देने की बात कही थी, वह सामने आए लड़के को सबसे पहले अभय देता है। आदेश की सीमा याद है। भय दिखाना था, नाश करना नहीं, और जो सामने झुक गया उसके लिये भय का काम पूरा हो चुका।

तीन लोग जो बीच में आ गए

अब बात सुग्रीव तक पहुँचती है। उन्होंने अपने कानों से सुना कि लक्ष्मण क्रोध में हैं, और वे भय से अकुला गए। राजा हैं, नगर उनका है, सेना उनकी है, और वे ख़ुद बाहर नहीं निकलते।

“हनुमान, तारा को साथ लेकर जाइए, और विनती करके राजकुमार को समझाइए,” सुग्रीव कहते हैं। हनुमान अकेले नहीं जाएँगे, तारा साथ जाएँगी। पाठ यह नहीं बताता कि उन्हें साथ क्यों भेजा जा रहा है। वह केवल नाम लेकर आगे बढ़ जाता है।

हनुमान तारा के साथ जाकर लक्ष्मण के चरणों की वन्दना करते हैं और राम के सुयश का बखान करने लगते हैं। वे सफ़ाई नहीं देते, सुग्रीव की तरफ़ से कोई दलील नहीं रखते। वे क्रोध में खड़े आदमी के सामने उसी के भाई की महिमा कहने लगते हैं। क्रोध बहस से नहीं, याद से ठंडा होता है, और यह याद लक्ष्मण के सबसे नरम हिस्से में जाकर लगती है।

फिर एक घर का दृश्य है। विनती करके वे लक्ष्मण को महल में ले आते हैं, चरण धोकर पलँग पर बैठाते हैं। तब सुग्रीव उनके चरणों में सिर नवाते हैं, और लक्ष्मण हाथ पकड़कर उन्हें गले से लगा लेते हैं। न कोई शर्त रखी गई, न सफ़ाई माँगी गई। जिस भुजा ने अभी धनुष चढ़ाया था, वही गले में पड़ जाती है। और तब सुग्रीव बोलते हैं।

यह दूसरी स्वीकारोक्ति है, और पहली से बड़ी: “नाथ, विषय के समान कोई मद नहीं। यह मुनियों के मन में भी क्षण भर में मोह पैदा कर देता है।” इसमें सुग्रीव अपने को कोई छूट नहीं दे रहे। वे इतना कह रहे हैं कि जिसने उन्हें गिराया, वह मुनियों तक को गिरा देता है। लक्ष्मण को इस विनय से सुख मिलता है और वे बहुत प्रकार से समझाते हैं। जो आदेश लेकर वे चले थे वह यहाँ पूरा होता है, और चढ़े हुए धनुष का काम एक विनम्र वाक्य ने कर दिया।

बीच में हनुमान एक और काम करते हैं। वे सारा हाल सुना देते हैं कि दूतों के समूह किस तरह भेजे जा चुके हैं। क्षमा माँगने से पहले दिखा दिया जाता है कि काम शुरू हो चुका है। माफ़ी के साथ काम की रसीद रख दी जाए तो माफ़ी का वज़न बदल जाता है।

आपकी माया बहुत प्रबल है

अब सब वहाँ चलते हैं जहाँ राम हैं। सुग्रीव हर्षित होकर चले, अंगद आदि वानर साथ थे, और राम के छोटे भाई को उन्होंने आगे कर लिया। जिसे डराने के लिये भेजा गया था, उसी के पीछे-पीछे चलकर वे पहुँचते हैं।

राम के चरणों में सिर नवाकर, हाथ जोड़कर सुग्रीव पहला वाक्य कहते हैं, “नाथ, मुझे कुछ भी दोष नहीं है,” और यह क्षमा माँगने की शुरुआत नहीं लगती। पर अगली ही साँस में वजह आ जाती है: “देव, आपकी माया अत्यन्त प्रबल है। वह तभी छूटती है जब आप दया करें।” दोष न होने का मतलब यह नहीं कि भूल नहीं हुई। मतलब यह है कि भूल से बचने का बल उनके पास था ही नहीं, और जिसके पास वह बल है वही सामने खड़ा है।

इसके बाद सुग्रीव अपने ऊपर कड़े शब्द लगाते हैं: “स्वामी, देवता, मनुष्य और मुनि सब विषयों के वश में हैं। और मैं तो पामर पशु हूँ, पशुओं में भी अत्यन्त कामी बंदर।” फिर वे तीन कसौटियाँ रखते हैं: जिसे स्त्री का नयन-बाण न लगा हो, जो क्रोध की घोर अँधेरी रात में भी जागता रहा हो। और जिसने लोभ की फाँसी से अपना गला न बँधाया हो। जो इन तीनों से बचा रहे, वह मनुष्य राम ही के समान है।

और फिर सुग्रीव की विनती की सबसे साफ़ बात: ये गुण साधन से नहीं आते, राम की कृपा से कोई-कोई इन्हें पाता है। यह तीसरी और आख़िरी स्वीकारोक्ति है। पहली हनुमान के सामने थी और बहुत छोटी थी। दूसरी लक्ष्मण के सामने थी और उसमें मुनि भी शामिल कर लिये गए थे। तीसरी राम के सामने है, और इसमें सुग्रीव पूरी सृष्टि को एक ही तराज़ू पर रखकर ख़ुद उसी में खड़े हो जाते हैं।

जवाब में कोई उपदेश नहीं आता, मुस्कराहट आती है। राम मुस्कराकर कहते हैं, “भाई, आप मुझे भरत के समान प्रिय हैं।” जिसने कल मार डालने की बात कही थी, वह उसी को उस भाई के बराबर रख देता है जिसका नाम इस पूरी रचना में प्रेम का दूसरा नाम है। और उसके तुरन्त बाद काम की बात: “अब मन लगाकर वही उपाय कीजिए जिससे सीता की सुधि मिले।”

प्रवर्षण पर उठा क्रोध यहीं ख़त्म होता है, और उसका अन्त किसी सज़ा से नहीं होता। जिसे डराने के लिये धनुष चढ़ा था, उसे भरत के बराबर कह दिया जाता है। मामला वहीं बन्द हो जाता है: न कोई शर्त, न कोई ताना, न बीती बात का कोई ज़िक्र।

जिसे गिनना चाहे वह मूर्ख है

बातचीत चल ही रही थी कि वानरों के यूथ आने लगे, और अनेक रंगों के वानर-दल सब दिशाओं में दिखायी देने लगे। रंग की बात मामूली नहीं। यह एक जगह की सेना नहीं, हर तरफ़ से आया हुआ जमावड़ा है, जो क्षितिज तक फैला है। जिस राजा पर अभी भूलने का इलज़ाम लगा था, उसके बुलाने पर यह आया है।

यहाँ शिव दूसरी बार सामने आते हैं, इस बार सवाल नहीं, गवाही लेकर: “पार्वती, वह वानर सेना मैंने देखी थी।” कहने वाला ख़ुद मौजूद था। और फिर वे गिनने वालों के बारे में इस प्रसंग की सबसे चुटीली बात कहते हैं: जो उसकी गिनती करना चाहे वह मूर्ख है।

गिनती की यह मनाही पैमाने का बयान है। यह सेना हिसाब में आने वाली चीज़ से बड़ी है। फिर सेना का काम आता है। सब वानर आ-आकर राम के चरणों में मस्तक नवाते हैं और उनका मुख देखकर सनाथ हो जाते हैं, यानी जिनका कोई नहीं था उनका कोई हो जाता है।

सेना में एक भी वानर ऐसा नहीं था जिससे राम ने कुशल न पूछी हो। जिस भीड़ को गिनना मूर्खता बताया गया, उसी में से एक-एक से बात की गई। यह कैसे हुआ, इसका उत्तर कथा स्वयं देती है: यह राम के लिये कोई बड़ी बात नहीं, क्योंकि वे विश्वरूप और सर्वव्यापक हैं।

यहाँ दो चीज़ें साथ खड़ी हैं: एक तरफ़ वह आदमी जिसके हाथ में धनुष है और जिसकी पत्नी नहीं मिल रही। दूसरी तरफ़ वह जो एक ही समय में सब जगह है। कथा एक को दूसरे से मिटाती नहीं। जिसे सब जगह होना कहा गया है, उसी को एक पते की तलाश है, और यह विरोध हल किये बिना छोड़ दिया गया है।

चारों दिशाएँ, और एक महीने की अवधि

आज्ञा पाकर सब जहाँ-तहाँ खड़े हो जाते हैं, और सुग्रीव सबको समझाकर कहते हैं, “यह राम का कार्य है, और मेरा अनुरोध है। वानरों के यूथ, आप चारों ओर जाइए।” राजा चाहता तो सिर्फ़ हुक्म दे सकता था। वह हुक्म के साथ अपना अनुरोध भी रख देता है, क्योंकि जानता है कि देर उसी से हुई है।

वे कहते हैं, “सीता को खोजने जाइए और एक महीने में लौट आइए। जो अवधि बिताकर बिना पता लगाए लौटेगा, उसे मुझे मरवाना ही पड़ेगा।” यह दूसरी बार है जब सुग्रीव के मुँह से मौत की बात निकलती है: पहली बार पन्द्रह दिन थे, अब तीस। जिसे अभी माफ़ किया गया है और भरत के समान प्रिय कहा गया है, वह अपने लोगों से इसी भाषा में बात करता है। दोनों वाक्य पास-पास खड़े हैं और पाठ उन पर कोई टिप्पणी नहीं करता।

वचन सुनते ही सब वानर तुरन्त निकल जाते हैं। तब सुग्रीव अंगद, नल और हनुमान को अलग से बुलाते हैं। पूरी सेना चारों तरफ़ जा चुकी है, और अब उसके भीतर से एक दल अलग बनाया जा रहा है।

दल में चार नाम हैं, नील, अंगद, जाम्बवान् और हनुमान, और दिशा एक है, दक्षिण। सुग्रीव उनसे कहते हैं कि सब श्रेष्ठ योद्धा मिलकर जाएँ और जो भी मिले उससे सीता का पता पूछें। पाठ यहाँ कोई कारण नहीं बताता कि दक्षिण ही क्यों। जो आगे होने वाला है, उसकी पूरी नींव इसी आदेश में बिना किसी निशान के रख दी गई है।

फिर सुग्रीव आदेश से उपदेश पर आते हैं: मन, वचन और कर्म से उसी का उपाय सोचिए, और राम का कार्य सँवारिए। सूर्य का सेवन पीठ की ओर से होता है और अग्नि का सामने से, पर स्वामी की सेवा छल छोड़कर सर्वभाव से करनी चाहिये। ताप की दुनिया में हर चीज़ का एक कोण होता है। सेवा की दुनिया में कोई कोण नहीं होता।

और फिर बात बहुत दूर तक चली जाती है। सुग्रीव कहते हैं कि माया छोड़कर परलोक का सेवन कीजिए, जिससे भव से पैदा हुए सारे शोक मिट जाएँ। वे यह भी कहते हैं कि देह धारण करने का यही फल है कि सब कामनाएँ छोड़कर राम का भजन किया जाए। और गुणों को पहचानने वाला और बड़भागी वही है जो राम के चरणों का प्रेमी है। जिस मुँह से अभी अवधि और वध की बात निकली थी, उसी से यह निकलता है, और कथा इस पर कोई टिप्पणी नहीं करती। आज्ञा माँगकर, चरणों में फिर सिर नवाकर, सब हर्षित होकर चल पड़ते हैं।

सबसे पीछे खड़ा हुआ एक सेवक

अब भीड़ छँट चुकी है। जो जाना था वह जा चुका, जो कहना था वह कहा जा चुका। और तब कथा एक आदमी पर आकर रुकती है जो अब तक इस दृश्य में नहीं दिखा था, क्योंकि वह सबके पीछे खड़ा था।

सबसे पीछे हनुमान ने सिर नवाया। जो सबसे पहले जागा था और जिसने बिना कहे काम शुरू किया था, वह क़तार में सबसे आख़िर में खड़ा है। और यहीं वह वाक्य आता है जिस पर यह पूरा काण्ड घूम जाता है: कार्य का विचार करके राम ने उन्हें पास बुलाया। बुलाने की वजह जान-पहचान नहीं, सिफ़ारिश नहीं, क़तार में जगह नहीं। वजह काम है।

फिर तीन हरकतें, एक के बाद एक: राम ने अपने हाथ से उनका सिर छुआ, उन्हें अपना सेवक जाना, और हाथ की अँगूठी उतारकर दे दी। स्पर्श से भरोसा दिया गया, पहचान से रिश्ता तय हुआ, और अँगूठी से वह चीज़ मिली जो सैकड़ों कोस दूर किसी अजनबी जगह पर सबूत का काम करेगी। इस अँगूठी के बिना सुन्दरकाण्ड का सबसे ज़रूरी दृश्य हो ही नहीं सकता। यहाँ वह एक ही क्षण में, बिना किसी ताम-झाम के, दे दी जाती है।

प्रवर्षण पर्वत पर खोज को निकलते वानर और भालू दलों के बीच राम सिर झुकाकर घुटने के बल बैठे हनुमान का सिर अपने हाथ से छूते हैं और अपनी अँगूठी उनके हाथों में रख देते हैं।

साथ की हिदायत भी उतनी ही छोटी है: “सीता को बहुत प्रकार से समझाइएगा, मेरा बल और मेरा विरह कहिएगा, और जल्दी लौट आइएगा।” इसमें एक भी शब्द रास्ते, समुद्र या लंका के बारे में नहीं है। हनुमान अपना जन्म सफल मानते हैं और राम को हृदय में रखकर चल देते हैं।

इसी जगह पाठ एक बात और कह देता है: यद्यपि राम सब जानते हैं, फिर भी वे राजनीति की मर्यादा रख रहे हैं। जो सब जानता हो वह ढूँढ़ने क्यों भेजेगा, इस सवाल का जवाब यही बात है। जिस दुनिया में काम आदमियों के हाथों होता है, उसका तरीक़ा आदमियों वाला ही रहेगा।

सब वानर खोजते हुए चल पड़ते हैं, और जगहों की सूची लम्बी है: वन, नदी, तालाब, पर्वत और पर्वतों की कन्दराएँ। सबका मन राम के काम में लवलीन है और शरीर तक की ममता भूल गयी है। यह वह ममता है जो आदमी सबसे पहले अपने ही शरीर से करता है, जो भूख, प्यास, थकान और चोट का हिसाब रखती है। खोज पर निकले लोगों को उसका ख़याल ही नहीं रहा। जो तड़प कथा की शुरुआत में एक आदमी के भीतर थी, वह अब सैकड़ों लोगों के पैरों में उतर चुकी है।

देर की क़ीमत

एक सवाल बार-बार लौटता है: जिनके बारे में शिव कहते हैं कि उन्हें स्वप्न में भी क्रोध नहीं हो सकता, वे मित्र को मूढ़ क्यों कह रहे हैं? पाठ इसका जवाब दो बार छोड़ देता है। एक बार शिव सवाल पूछकर चुप हो जाते हैं। दूसरी बार शिव कहते हैं कि इस चरित्र को वही जानते हैं जिनकी प्रीति उन चरणों में है। यह प्रसंग इसी अधूरेपन के साथ खड़ा रहता है।

पर एक चीज़ शुरू से अन्त तक खुलकर दिखती है: इस क्रोध का कोई शिकार नहीं बना। धनुष चढ़ा, नगर काँपा, अंगद बाहर आए, तारा गईं, हनुमान गए, और अन्त में बात गले लगने और मुस्कराने पर ख़त्म हुई। लक्ष्मण के आदेश में मारने की इजाज़त थी ही नहीं। क्रोध को उसी ने बाँध रखा था जिसे वह हुआ था, और गुस्से के ठीक बीच में बाँधा था।

दूसरी चीज़ यह कि काम बचाया किसने। राजा ने नहीं, आदेश ने नहीं, सेना ने नहीं, एक आदमी ने, जिसे किसी ने कुछ कहा नहीं था, और जो अन्त में सबके पीछे खड़ा मिला। भूल सुधारने की शुरुआत उसी से हुई और चलने की भी, और जब सब शान्त हो गया, तो हाथ में अँगूठी भी उसी के आई।

तीसरी चीज़ सुग्रीव की है। उन्होंने कोई बड़ा विश्वासघात नहीं किया था, सिर्फ़ देर की थी। घर मिला, आराम मिला, और बाहर पड़ा काम कल पर टलता चला गया। इस भूल के लिये पाठ का शब्द भी नरम है, सुधि भुला दी। इसी नरम शब्द के पीछे एक चढ़ा हुआ धनुष और एक काँपता हुआ नगर खड़ा हो गया। देर करने की क़ीमत कभी-कभी देर करने वाले की समझ से बहुत बड़ी निकलती है।

इस पूरे प्रसंग में सीता एक बार भी सामने नहीं आतीं। उनका नाम शुरू में आता है और आख़िरी हिदायत में। बीच का सारा हिस्सा उन लोगों का है जो उन्हें ढूँढ़ नहीं पा रहे। जो मौजूद नहीं है, वही सारी कथा को चला रहा है।

अगले प्रसंग में यही लोग दक्षिण की तरफ़ बहुत दूर निकल चुके होंगे, महीने की अवधि सिर पर होगी, और पता अब भी नहीं लगा होगा। और क़तार में सबसे पीछे वही चल रहा होगा, जिसके हाथ में अँगूठी है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, किष्किन्धाकाण्ड, दोहा 18 से 23, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।