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दूसरे अध्याय में कृष्ण ने ज्ञान की भी बात की और कर्म की भी। इससे अर्जुन के मन में एक नया असमंजस उठ खड़ा होता है। अगर समझ ही सबसे ऊँची चीज़ है, तो फिर मुझे इस ख़ूनी काम में क्यों धकेला जा रहा है? क्यों न सब छोड़ कर संन्यासी बन जाऊँ? तीसरा अध्याय इसी उलझन का जवाब है, और इसका नाम ही कर्म योग है, यानी काम करते हुए ही भीतर से मुक्त रहने की कला।
अर्जुन सीधे पूछते हैं, हे कृष्ण, अगर आपकी नज़र में समझ ही कर्म से ऊँची है, तो फिर मुझे इस भयानक काम में क्यों लगा रहे हैं? आपकी उलझी हुई सी बातें मेरी बुद्धि को और भरमा रही हैं, इसलिए कोई एक बात पक्की कर के बता दीजिए जिससे मेरा सच में कल्याण हो। कृष्ण का जवाब यहीं से इस अध्याय की रीढ़ बन जाता है।
कथा से मूल पाठ तक
इस अध्याय का गद्य गीता 3 के मुख्य तर्कों को साथ लेकर चलता है। नीचे दिए श्लोक उन खण्डों के आधार-पाठ हैं; यह प्रत्येक श्लोक का अलग अनुवाद नहीं है। यज्ञ और स्वधर्म जैसे शब्दों का अर्थ उनके प्रसंग में पढ़िए।
- अर्जुन का प्रश्न: ज्ञान और कर्म
3.1 से 4 - कर्म और बाहर-भीतर का संयम
3.5 से 8 - यज्ञ, परस्पर पोषण और अनासक्त कर्म
3.9 से 19 - लोकसंग्रह और आचरण का उदाहरण
3.20 से 26 - प्रकृति, अहंकार और कर्म का समर्पण
3.27 से 32 - स्वभाव, राग-द्वेष और स्वधर्म
3.33 से 35 - इच्छा से क्रोध तक: अर्जुन का दूसरा प्रश्न
3.36 से 43
संस्करण और तुलना: गीता प्रेस (भीष्म पर्व 27; भगवद्गीता 3.1 से 43); भक्तिवेदान्त बुक ट्रस्ट (भगवद्गीता 3.1 से 43)।
कर्म से भागा नहीं जा सकता
कृष्ण का जवाब दो-टूक है। काम छोड़ देना कोई रास्ता ही नहीं, क्योंकि छोड़ना ख़ुद एक करना है।
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥
कोई भी एक पल के लिए भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता, क्योंकि प्रकृति के गुण हर किसी से कोई न कोई काम करवा ही लेते हैं। चुपचाप बैठ जाना भी एक कर्म है। तो असली सवाल यह नहीं कि काम करें या न करें, सवाल यह है कि किस भाव से करें। जो ऊपर से सब त्याग कर बैठ जाता है पर मन ही मन विषयों में उलझा रहता है, वह ख़ुद को ही धोखा देता है।
यज्ञ की तरह काम
यहीं कृष्ण यज्ञ का विचार काम पर लगाते हैं। यज्ञ यानी अर्पण। जब हम अपना हर काम किसी बड़े उद्देश्य को अर्पित कर देते हैं, तब वही काम बंधन नहीं रहता, मुक्ति का साधन बन जाता है। अपने लिए बटोरा हुआ काम पीछे राख छोड़ता है, अर्पित किया हुआ काम भीतर को हल्का कर देता है। सृष्टि ख़ुद इसी लेन-देन पर चलती है, बादल जल देते हैं, धरती अन्न देती है, और हम भी उसी चक्र का एक हिस्सा हैं। जो सिर्फ़ अपनी थाली भरता है और लौटाता कुछ नहीं, वह इस चक्र से कट जाता है।
कृष्ण इसे एक घूमते पहिए की तरह दिखाते हैं। बादल से वर्षा होती है, वर्षा से अन्न उगता है, अन्न से प्राणी जीते हैं, और अर्पण से फिर वही वर्षा लौटती है। जो इस पहिए में अपना हिस्सा नहीं डालता, केवल अपनी इन्द्रियों के लिए जीता है, वह मानो व्यर्थ ही साँस लेता है। पर एक बात यहाँ साफ़ कर देनी ज़रूरी है, जो अपने भीतर ही तृप्त है, जिसे न कुछ पाना बाक़ी है न कुछ खोना, उसके लिए कोई काम बाक़ी नहीं रहता, फिर भी वह औरों की भलाई के लिए काम करता रहता है।
श्रेष्ठ जैसा करता है
फिर कृष्ण एक ज़िम्मेदारी की ओर इशारा करते हैं, जो ऊँचे स्थान पर बैठे हर इंसान के काम की है।
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
श्रेष्ठ इंसान जैसा आचरण करता है, बाक़ी लोग भी वैसा ही करते हैं। वह जिसे कसौटी बना लेता है, सारी दुनिया उसी के पीछे चलती है। इसीलिए जो आगे खड़ा है, उसके हर काम का असर औरों पर पड़ता है, और उतनी ही बड़ी उसकी ज़िम्मेदारी भी होती है। कृष्ण अपनी ही मिसाल देते हैं, उन्हें ख़ुद कुछ पाना बाक़ी नहीं, फिर भी वे काम में लगे रहते हैं, ताकि लोग सही राह देख सकें। राजा जनक जैसे ज्ञानी भी इसीलिए जीवन भर कर्म करते रहे, केवल लोक की भलाई के लिए। इसी भलाई को लोकसंग्रह कहते हैं, और यही समझदार इंसान के काम करते रहने का असली कारण है।
असली करने वाला कौन
अब कृष्ण उस भ्रम की जड़ पकड़ते हैं जिससे काम बंधन बनता है।
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥
सारे काम असल में प्रकृति के गुणों से हो रहे हैं, मगर अहंकार में भरा हुआ इंसान समझ बैठता है कि मैं ही करने वाला हूँ। जैसे ही यह मैंने किया वाली पकड़ ढीली होती है, काम अपने-आप हल्का हो जाता है। हम माध्यम भर हैं, और यही समझ हमें हर काम के बोझ से बचा लेती है। गुण अपना काम कर रहे हैं, यह देख लेने वाला न कामयाबी से फूलता है, न नाकामी से टूटता है।
अपना धर्म ही अपना
अध्याय का सबसे बड़ा व्यावहारिक सबक यही है, अपनी जगह पहचानिए और उसी को निभाइए।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥
अपना धर्म अधूरा भी हो तो वह दूसरे के अच्छे से निभाए धर्म से बेहतर है। अपने धर्म में मर जाना भी कल्याणकारी है, दूसरे का धर्म तो डर पैदा करने वाला है। दूसरे की भूमिका कितनी ही चमकदार क्यों न लगे, उसे अपनी मत बना लीजिए। यह बात गीता में इतनी अहम है कि आगे अठारहवें अध्याय में भी लौट कर आती है।
सार
अध्याय के आख़िर में अर्जुन पूछते हैं कि आख़िर वह कौन है जो इंसान से न चाहते हुए भी पाप करवा देता है। कृष्ण का जवाब सीधा है, वह इच्छा है, वही भूख जो पूरी होने पर और भड़कती है, और यही इस राह का असली दुश्मन है। पूरे अध्याय का निचोड़ इतना-सा है, कर्म से बचा नहीं जा सकता, बस उसका ढंग बदला जा सकता है। काम को अर्पण की तरह कीजिए, मैंने किया कहना छोड़िए, और अपनी भूमिका को अपनी ही रहने दीजिए। यही निष्काम कर्म है, और यही कर्म योग है। दुनिया को छोड़ कर भाग जाने में नहीं, उसी के बीच सधे रह कर काम करने में ही असली त्याग छिपा है।
आधार: श्रीमद्भगवद्गीता
यही कथा वहाँ भी
- अध्याय 5: कर्म संन्यास योग
भगवद्गीता अध्याय 5: कर्म-संन्यास योग - निर्णय लेने वालों के लिए कर्मयोग
निर्णय लेने वालों के लिए कर्मयोग: पठन-मार्गदर्शिका - अनुगीता · अश्वमेध पर्व
अनुगीता (अश्वमेध पर्व): कृष्ण का कर्म पर पुनः विवेचन
श्लोक-दर-श्लोक
इस अध्याय के सभी 43 श्लोक: देवनागरी मूल, रोमन लिप्यन्तरण, पदच्छेद, अन्वय और सीधा अर्थ। हर श्लोक की अपनी कड़ी है, जैसे lulla.net/bhagavad-gita/3/1/। ऊपर की कथा-व्याख्या पढ़ने के बाद यहाँ मूल तक उतरिए।
3.1ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन
अर्जुन उवाच
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन ।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥1॥
jyāyasī cet karmaṇas te matā buddhir janārdana |
tat kiṃ karmaṇi ghore māṃ niyojayasi keśava
- ज्यायसी
- श्रेष्ठ
- चेत्
- यदि
- कर्मणः
- कर्म से
- ते
- आपकी
- मता
- मानी गई है
- बुद्धिः
- बुद्धि (ज्ञान)
- जनार्दन
- हे जनार्दन
- तत्
- तो
- किम्
- क्यों
- कर्मणि
- कर्म में
- घोरे
- घोर (भयानक)
- माम्
- हमें
- नियोजयसि
- लगाते हैं
- केशव
- हे केशव
अन्वय: जनार्दन, चेत् ते बुद्धिः कर्मणः ज्यायसी मता, तत् केशव, किम् माम् घोरे कर्मणि नियोजयसि।
हे जनार्दन, यदि आप बुद्धि को कर्म से श्रेष्ठ मानते हैं, तो हे केशव, आप हमें इस घोर कर्म में क्यों लगा रहे हैं?
3.2व्यामिश्रेणैव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे
व्यामिश्रेणैव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥2॥
vyāmiśreṇaiva vākyena buddhiṃ mohayasīva me |
tad ekaṃ vada niścitya yena śreyo ’ham āpnuyām
- व्यामिश्रेण
- मिले जुले
- एव
- ही
- वाक्येन
- वचन से
- बुद्धिम्
- बुद्धि को
- मोहयसि
- मोहित करते हैं
- इव
- मानो
- मे
- हमारी
- तत्
- इसलिए
- एकम्
- एक बात
- वद
- कहिए
- निश्चित्य
- निश्चय करके
- येन
- जिससे
- श्रेयः
- कल्याण
- अहम्
- हम
- आप्नुयाम्
- प्राप्त करें
अन्वय: व्यामिश्रेण एव वाक्येन मे बुद्धिम् मोहयसि इव। तत् निश्चित्य एकम् वद येन अहम् श्रेयः आप्नुयाम्।
आप मिले जुले वचनों से हमारी बुद्धि को मानो मोहित कर रहे हैं। इसलिए निश्चय करके वह एक बात कहिए जिससे हम कल्याण को प्राप्त करें।
3.3लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ
श्रीभगवानुवाच
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥3॥
loke ’smin dvividhā niṣṭhā purā proktā mayānagha |
jñānayogena sāṃkhyānāṃ karmayogena yoginām
- लोके
- लोक में
- अस्मिन्
- इस
- द्विविधा
- दो प्रकार की
- निष्ठा
- निष्ठा
- पुरा
- पहले
- प्रोक्ता
- कही गई
- मया
- मेरे द्वारा
- अनघ
- हे निष्पाप
- ज्ञानयोगेन
- ज्ञानयोग से
- सांख्यानाम्
- सांख्ययोगियों की
- कर्मयोगेन
- कर्मयोग से
- योगिनाम्
- योगियों की
अन्वय: अनघ, अस्मिन् लोके मया पुरा द्विविधा निष्ठा प्रोक्ता, सांख्यानाम् ज्ञानयोगेन, योगिनाम् कर्मयोगेन।
हे निष्पाप, इस लोक में दो प्रकार की निष्ठा मैंने पहले कही है। सांख्ययोगियों की निष्ठा ज्ञानयोग से और योगियों की निष्ठा कर्मयोग से होती है।
3.4न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥4॥
na karmaṇām anārambhān naiṣkarmyaṃ puruṣo ’śnute |
na ca saṃnyasanād eva siddhiṃ samadhigacchati
- न
- नहीं
- कर्मणाम्
- कर्मों के
- अनारम्भात्
- आरम्भ न करने से
- नैष्कर्म्यम्
- निष्कर्मता को
- पुरुषः
- मनुष्य
- अश्नुते
- प्राप्त करता है
- न
- नहीं
- च
- और
- संन्यसनात्
- त्याग से
- एव
- ही
- सिद्धिम्
- सिद्धि को
- समधिगच्छति
- भली भाँति प्राप्त करता है
अन्वय: पुरुषः कर्मणाम् अनारम्भात् नैष्कर्म्यम् न अश्नुते, संन्यसनात् एव च सिद्धिम् न समधिगच्छति।
मनुष्य कर्मों का आरम्भ न करने से निष्कर्मता को नहीं पाता। केवल कर्मों के त्याग से भी वह सिद्धि को नहीं पाता।
3.5न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥5॥
na hi kaś cit kṣaṇam api jātu tiṣṭhaty akarmakṛt |
kāryate hy avaśaḥ karma sarvaḥ prakṛtijair guṇaiḥ
- न
- नहीं
- हि
- निश्चय ही
- कश्चित्
- कोई भी
- क्षणम्
- क्षण
- अपि
- भी
- जातु
- कभी
- तिष्ठति
- रहता है
- अकर्मकृत्
- कर्म न करने वाला
- कार्यते
- कराया जाता है
- हि
- क्योंकि
- अवशः
- परवश होकर
- कर्म
- कर्म
- सर्वः
- सब प्राणी
- प्रकृतिजैः
- प्रकृति से उत्पन्न
- गुणैः
- गुणों द्वारा
अन्वय: हि कश्चित् जातु क्षणम् अपि अकर्मकृत् न तिष्ठति, हि सर्वः प्रकृतिजैः गुणैः अवशः कर्म कार्यते।
निश्चय ही कोई भी कभी क्षण भर भी कर्म किये बिना नहीं रहता। क्योंकि सब प्राणी प्रकृति से उत्पन्न गुणों के द्वारा परवश होकर कर्म में लगाये जाते हैं।
3.6कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥6॥
karmendriyāṇi saṃyamya ya āste manasā smaran |
indriyārthān vimūḍhātmā mithyācāraḥ sa ucyate
- कर्मेन्द्रियाणि
- कर्मेन्द्रियों को
- संयम्य
- रोककर
- यः
- जो
- आस्ते
- बैठा रहता है
- मनसा
- मन से
- स्मरन्
- स्मरण करता हुआ
- इन्द्रियार्थान्
- इन्द्रियों के विषयों का
- विमूढात्मा
- मूढ़ बुद्धि वाला
- मिथ्याचारः
- मिथ्याचारी
- सः
- वह
- उच्यते
- कहा जाता है
अन्वय: यः विमूढात्मा कर्मेन्द्रियाणि संयम्य मनसा इन्द्रियार्थान् स्मरन् आस्ते, सः मिथ्याचारः उच्यते।
जो मूढ़ बुद्धि वाला कर्मेन्द्रियों को रोककर मन से इन्द्रियों के विषयों का स्मरण करता हुआ बैठा रहता है, वह मिथ्याचारी कहा जाता है।
3.7यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥7॥
yas tv indriyāṇi manasā niyamyārabhate ’rjuna |
karmendriyaiḥ karmayogam asaktaḥ sa viśiṣyate
- यः
- जो
- तु
- परन्तु
- इन्द्रियाणि
- इन्द्रियों को
- मनसा
- मन से
- नियम्य
- वश में करके
- आरभते
- आरम्भ करता है
- अर्जुन
- हे अर्जुन
- कर्मेन्द्रियैः
- कर्मेन्द्रियों द्वारा
- कर्मयोगम्
- कर्मयोग को
- असक्तः
- अनासक्त
- सः
- वह
- विशिष्यते
- श्रेष्ठ है
अन्वय: अर्जुन, यः तु असक्तः मनसा इन्द्रियाणि नियम्य कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगम् आरभते, सः विशिष्यते।
परन्तु हे अर्जुन, जो अनासक्त मनुष्य मन से इन्द्रियों को वश में करके कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वह श्रेष्ठ है।
3.8नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिध्येदकर्मणः ॥8॥
niyataṃ kuru karma tvaṃ karma jyāyo hy akarmaṇaḥ |
śarīrayātrāpi ca te na prasidhyed akarmaṇaḥ
- नियतम्
- नियत (शास्त्रविहित)
- कुरु
- कीजिए
- कर्म
- कर्म
- त्वम्
- आप
- कर्म
- कर्म
- ज्यायः
- श्रेष्ठ है
- हि
- क्योंकि
- अकर्मणः
- कर्म न करने से
- शरीरयात्रा
- शरीर का निर्वाह
- अपि
- भी
- च
- और
- ते
- आपका
- न
- नहीं
- प्रसिध्येत्
- सिद्ध होगा
- अकर्मणः
- कर्म न करने से
अन्वय: त्वम् नियतम् कर्म कुरु, हि कर्म अकर्मणः ज्यायः। अकर्मणः च ते शरीरयात्रा अपि न प्रसिध्येत्।
आप नियत कर्म कीजिए, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है। कर्म न करने से तो आपके शरीर का निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा।
3.9यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥9॥
yajñārthāt karmaṇo ’nyatra loko ’yaṃ karmabandhanaḥ |
tadarthaṃ karma kaunteya muktasaṅgaḥ samācara
- यज्ञार्थात्
- यज्ञ के लिए किये गये
- कर्मणः
- कर्म से
- अन्यत्र
- भिन्न
- लोकः
- मनुष्य समुदाय
- अयम्
- यह
- कर्मबन्धनः
- कर्म से बँधा हुआ
- तदर्थम्
- उस यज्ञ के लिए
- कर्म
- कर्म
- कौन्तेय
- हे कुन्तीपुत्र
- मुक्तसङ्गः
- आसक्ति से मुक्त
- समाचर
- भली भाँति कीजिए
अन्वय: यज्ञार्थात् कर्मणः अन्यत्र अयम् लोकः कर्मबन्धनः। कौन्तेय, मुक्तसङ्गः तदर्थम् कर्म समाचर।
यज्ञ के लिए किये जाने वाले कर्म के सिवा दूसरे कर्म से यह मनुष्य समुदाय कर्म के बन्धन में बँधता है। इसलिए हे कुन्तीपुत्र, आसक्ति से मुक्त होकर यज्ञ के लिए ही कर्म कीजिए।
3.10सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥10॥
sahayajñāḥ prajāḥ sṛṣṭvā purovāca prajāpatiḥ |
anena prasaviṣyadhvam eṣa vo ’stv iṣṭakāmadhuk
- सहयज्ञाः
- यज्ञ के सहित
- प्रजाः
- प्रजाओं को
- सृष्ट्वा
- रचकर
- पुरा
- सृष्टि के आदि में
- उवाच
- कहा
- प्रजापतिः
- प्रजापति ने
- अनेन
- इस यज्ञ के द्वारा
- प्रसविष्यध्वम्
- वृद्धि को प्राप्त हों
- एषः
- यह यज्ञ
- वः
- आपके लिए
- अस्तु
- हो
- इष्टकामधुक्
- इच्छित भोग देने वाला
अन्वय: पुरा प्रजापतिः सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा उवाच, अनेन प्रसविष्यध्वम्, एषः वः इष्टकामधुक् अस्तु।
सृष्टि के आदि में प्रजापति ने यज्ञ के सहित प्रजाओं को रचकर कहा, आप लोग इस यज्ञ के द्वारा वृद्धि को प्राप्त हों। यह यज्ञ आपके इच्छित भोगों को देने वाला हो।
3.11देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥11॥
devān bhāvayatānena te devā bhāvayantu vaḥ |
parasparaṃ bhāvayantaḥ śreyaḥ param avāpsyatha
- देवान्
- देवताओं को
- भावयत
- पुष्ट कीजिए
- अनेन
- इस यज्ञ से
- ते
- वे
- देवाः
- देवता
- भावयन्तु
- पुष्ट करें
- वः
- आपको
- परस्परम्
- एक दूसरे को
- भावयन्तः
- पुष्ट करते हुए
- श्रेयः
- कल्याण को
- परम्
- परम
- अवाप्स्यथ
- प्राप्त करेंगे
अन्वय: अनेन देवान् भावयत, ते देवाः वः भावयन्तु। परस्परम् भावयन्तः परम् श्रेयः अवाप्स्यथ।
आप लोग इस यज्ञ के द्वारा देवताओं को पुष्ट कीजिए, वे देवता आपको पुष्ट करें। इस प्रकार एक दूसरे को पुष्ट करते हुए आप परम कल्याण को प्राप्त करेंगे।
3.12इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥12॥
iṣṭān bhogān hi vo devā dāsyante yajñabhāvitāḥ |
tair dattān apradāyaibhyo yo bhuṅkte stena eva saḥ
- इष्टान्
- इच्छित
- भोगान्
- भोगों को
- हि
- निश्चय ही
- वः
- आपको
- देवाः
- देवता
- दास्यन्ते
- देंगे
- यज्ञभाविताः
- यज्ञ से पुष्ट हुए
- तैः
- उनके द्वारा
- दत्तान्
- दिये हुए भोगों को
- अप्रदाय
- बिना दिये
- एभ्यः
- इन देवताओं को
- यः
- जो
- भुङ्क्ते
- भोगता है
- स्तेनः
- चोर
- एव
- ही
- सः
- वह
अन्वय: यज्ञभाविताः देवाः हि वः इष्टान् भोगान् दास्यन्ते। तैः दत्तान् एभ्यः अप्रदाय यः भुङ्क्ते, सः स्तेनः एव।
यज्ञ से पुष्ट हुए देवता आपको इच्छित भोग देंगे। उनके दिये हुए भोगों को उन्हें अर्पित किये बिना जो भोगता है, वह चोर ही है।
3.13यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥13॥
yajñaśiṣṭāśinaḥ santo mucyante sarvakilbiṣaiḥ |
bhuñjate te tv aghaṃ pāpā ye pacanty ātmakāraṇāt
- यज्ञशिष्टाशिनः
- यज्ञ से बचा हुआ खाने वाले
- सन्तः
- सज्जन
- मुच्यन्ते
- मुक्त हो जाते हैं
- सर्वकिल्बिषैः
- सब पापों से
- भुञ्जते
- खाते हैं
- ते
- वे
- तु
- परन्तु
- अघम्
- पाप को
- पापाः
- पापी
- ये
- जो
- पचन्ति
- पकाते हैं
- आत्मकारणात्
- अपने ही लिए
अन्वय: यज्ञशिष्टाशिनः सन्तः सर्वकिल्बिषैः मुच्यन्ते। ये तु आत्मकारणात् पचन्ति, ते पापाः अघम् भुञ्जते।
यज्ञ से बचा हुआ अन्न खाने वाले सज्जन सब पापों से मुक्त हो जाते हैं। परन्तु जो पापी केवल अपने ही लिए पकाते हैं, वे पाप को ही खाते हैं।
3.14अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसंभवः
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसंभवः ।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥14॥
annād bhavanti bhūtāni parjanyād annasaṃbhavaḥ |
yajñād bhavati parjanyo yajñaḥ karmasamudbhavaḥ
- अन्नात्
- अन्न से
- भवन्ति
- उत्पन्न होते हैं
- भूतानि
- प्राणी
- पर्जन्यात्
- वर्षा से
- अन्नसम्भवः
- अन्न की उत्पत्ति
- यज्ञात्
- यज्ञ से
- भवति
- होती है
- पर्जन्यः
- वर्षा
- यज्ञः
- यज्ञ
- कर्मसमुद्भवः
- कर्म से उत्पन्न
अन्वय: भूतानि अन्नात् भवन्ति, पर्जन्यात् अन्नसम्भवः, पर्जन्यः यज्ञात् भवति, यज्ञः कर्मसमुद्भवः।
प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं और अन्न की उत्पत्ति वर्षा से होती है। वर्षा यज्ञ से होती है और यज्ञ कर्म से उत्पन्न होता है।
3.15कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥15॥
karma brahmodbhavaṃ viddhi brahmākṣarasamudbhavam |
tasmāt sarvagataṃ brahma nityaṃ yajñe pratiṣṭhitam
- कर्म
- कर्म को
- ब्रह्मोद्भवम्
- ब्रह्म (वेद) से उत्पन्न
- विद्धि
- जानिए
- ब्रह्म
- ब्रह्म (वेद) को
- अक्षरसमुद्भवम्
- अक्षर परमात्मा से उत्पन्न
- तस्मात्
- इसलिए
- सर्वगतम्
- सर्वव्यापी
- ब्रह्म
- ब्रह्म
- नित्यम्
- सदा
- यज्ञे
- यज्ञ में
- प्रतिष्ठितम्
- प्रतिष्ठित है
अन्वय: कर्म ब्रह्मोद्भवम् ब्रह्म अक्षरसमुद्भवम् विद्धि। तस्मात् सर्वगतम् ब्रह्म नित्यम् यज्ञे प्रतिष्ठितम्।
कर्म को वेद से उत्पन्न और वेद को अक्षर परमात्मा से उत्पन्न जानिए। इसलिए सर्वव्यापी ब्रह्म सदा यज्ञ में प्रतिष्ठित है।
3.16एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥16॥
evaṃ pravartitaṃ cakraṃ nānuvartayatīha yaḥ |
aghāyur indriyārāmo moghaṃ pārtha sa jīvati
- एवम्
- इस प्रकार
- प्रवर्तितम्
- चलाये हुए
- चक्रम्
- चक्र का
- न
- नहीं
- अनुवर्तयति
- अनुसरण करता
- इह
- इस लोक में
- यः
- जो
- अघायुः
- पापमय जीवन वाला
- इन्द्रियारामः
- इन्द्रियों में रमने वाला
- मोघम्
- व्यर्थ
- पार्थ
- हे पार्थ
- सः
- वह
- जीवति
- जीता है
अन्वय: पार्थ, यः इह एवम् प्रवर्तितम् चक्रम् न अनुवर्तयति, सः अघायुः इन्द्रियारामः मोघम् जीवति।
हे पार्थ, जो मनुष्य इस लोक में इस प्रकार चलाये हुए चक्र का अनुसरण नहीं करता, वह पापमय जीवन वाला और इन्द्रियों में रमने वाला मनुष्य व्यर्थ ही जीता है।
3.17यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥17॥
yas tv ātmaratir eva syād ātmatṛptaś ca mānavaḥ |
ātmany eva ca saṃtuṣṭas tasya kāryaṃ na vidyate
- यः
- जो
- तु
- परन्तु
- आत्मरतिः
- आत्मा में ही रमण करने वाला
- एव
- ही
- स्यात्
- हो
- आत्मतृप्तः
- आत्मा में तृप्त
- च
- और
- मानवः
- मनुष्य
- आत्मनि
- आत्मा में
- एव
- ही
- च
- और
- सन्तुष्टः
- सन्तुष्ट
- तस्य
- उसके लिए
- कार्यम्
- कर्तव्य
- न
- नहीं
- विद्यते
- है
अन्वय: यः तु मानवः आत्मरतिः एव आत्मतृप्तः च आत्मनि एव च सन्तुष्टः स्यात्, तस्य कार्यम् न विद्यते।
परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला, आत्मा में ही तृप्त और आत्मा में ही सन्तुष्ट हो, उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं रहता।
3.18नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥18॥
naiva tasya kṛtenārtho nākṛteneha kaś cana |
na cāsya sarvabhūteṣu kaś cid arthavyapāśrayaḥ
- न
- नहीं
- एव
- ही
- तस्य
- उसका
- कृतेन
- कर्म करने से
- अर्थः
- प्रयोजन
- न
- नहीं
- अकृतेन
- कर्म न करने से
- इह
- इस लोक में
- कश्चन
- कोई
- न
- नहीं
- च
- और
- अस्य
- इसका
- सर्वभूतेषु
- सब प्राणियों में
- कश्चित्
- कोई
- अर्थव्यपाश्रयः
- स्वार्थ का सम्बन्ध
अन्वय: इह तस्य कृतेन अर्थः न एव, अकृतेन कश्चन न। सर्वभूतेषु च अस्य कश्चित् अर्थव्यपाश्रयः न।
इस लोक में उस मनुष्य का कर्म करने से कोई प्रयोजन नहीं रहता और कर्म न करने से भी कोई प्रयोजन नहीं रहता। सब प्राणियों में भी उसका कोई स्वार्थ का सम्बन्ध नहीं रहता।
3.19तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥19॥
tasmād asaktaḥ satataṃ kāryaṃ karma samācara |
asakto hy ācaran karma param āpnoti pūruṣaḥ
- तस्मात्
- इसलिए
- असक्तः
- अनासक्त होकर
- सततम्
- निरन्तर
- कार्यम्
- कर्तव्य
- कर्म
- कर्म
- समाचर
- भली भाँति कीजिए
- असक्तः
- अनासक्त
- हि
- क्योंकि
- आचरन्
- करता हुआ
- कर्म
- कर्म
- परम्
- परम को
- आप्नोति
- प्राप्त करता है
- पूरुषः
- मनुष्य
अन्वय: तस्मात् असक्तः सततम् कार्यम् कर्म समाचर। हि असक्तः कर्म आचरन् पूरुषः परम् आप्नोति।
इसलिए आप अनासक्त होकर निरन्तर कर्तव्य कर्म भली भाँति कीजिए। क्योंकि अनासक्त होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परम को प्राप्त करता है।
3.20कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि ॥20॥
karmaṇaiva hi saṃsiddhim āsthitā janakādayaḥ |
lokasaṃgraham evāpi saṃpaśyan kartum arhasi
- कर्मणा
- कर्म से
- एव
- ही
- हि
- निश्चय ही
- संसिद्धिम्
- परम सिद्धि को
- आस्थिताः
- प्राप्त हुए
- जनकादयः
- जनक आदि
- लोकसंग्रहम्
- लोकसंग्रह को
- एव
- ही
- अपि
- भी
- सम्पश्यन्
- देखते हुए
- कर्तुम्
- कर्म करने के
- अर्हसि
- योग्य हैं
अन्वय: जनकादयः हि कर्मणा एव संसिद्धिम् आस्थिताः। लोकसंग्रहम् एव अपि सम्पश्यन् कर्तुम् अर्हसि।
जनक आदि कर्म के द्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए। लोकसंग्रह को देखते हुए भी आपको कर्म करना ही चाहिए।
3.21यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥21॥
yad yad ācarati śreṣṭhas tat tad evetaro janaḥ |
sa yat pramāṇaṃ kurute lokas tad anuvartate
- यत् यत्
- जो जो
- आचरति
- आचरण करता है
- श्रेष्ठः
- श्रेष्ठ पुरुष
- तत् तत्
- वही वही
- एव
- ही
- इतरः
- दूसरे
- जनः
- लोग
- सः
- वह
- यत्
- जो
- प्रमाणम्
- प्रमाण
- कुरुते
- करता है
- लोकः
- लोक
- तत्
- उसका
- अनुवर्तते
- अनुसरण करता है
अन्वय: श्रेष्ठः यत् यत् आचरति, तत् तत् एव इतरः जनः। सः यत् प्रमाणम् कुरुते, लोकः तत् अनुवर्तते।
श्रेष्ठ पुरुष जो जो आचरण करता है, दूसरे लोग भी वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण मान लेता है, समस्त लोक उसका अनुसरण करता है।
3.22न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किं चन
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किं चन ।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥22॥
na me pārthāsti kartavyaṃ triṣu lokeṣu kiṃ cana |
nānavāptam avāptavyaṃ varta eva ca karmaṇi
- न
- नहीं
- मे
- मेरा, मुझे
- पार्थ
- हे पार्थ
- अस्ति
- है
- कर्तव्यम्
- कर्तव्य
- त्रिषु
- तीनों
- लोकेषु
- लोकों में
- किञ्चन
- कुछ भी
- न
- नहीं
- अनवाप्तम्
- अप्राप्त
- अवाप्तव्यम्
- प्राप्त करने योग्य
- वर्ते
- लगे रहते हैं
- एव
- ही
- च
- और
- कर्मणि
- कर्म में
अन्वय: पार्थ, त्रिषु लोकेषु मे किञ्चन कर्तव्यम् न अस्ति, अनवाप्तम् अवाप्तव्यम् न, कर्मणि च एव वर्ते।
हे पार्थ, तीनों लोकों में मेरे लिए कुछ भी कर्तव्य नहीं है और कोई प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त नहीं है। फिर भी मैं कर्म में ही लगा रहता हूँ।
3.23यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥23॥
yadi hy ahaṃ na varteyaṃ jātu karmaṇy atandritaḥ |
mama vartmānuvartante manuṣyāḥ pārtha sarvaśaḥ
- यदि
- यदि
- हि
- निश्चय ही
- अहम्
- मैं
- न
- नहीं
- वर्तेयम्
- लगे रहें
- जातु
- कभी
- कर्मणि
- कर्म में
- अतन्द्रितः
- सावधान होकर
- मम
- मेरा
- वर्त्म
- मार्ग का
- अनुवर्तन्ते
- अनुसरण करते हैं
- मनुष्याः
- मनुष्य
- पार्थ
- हे पार्थ
- सर्वशः
- सब प्रकार से
अन्वय: पार्थ, यदि हि अहम् जातु अतन्द्रितः कर्मणि न वर्तेयम्, मनुष्याः सर्वशः मम वर्त्म अनुवर्तन्ते।
हे पार्थ, यदि मैं कभी सावधान होकर कर्म में न लगा रहूँ, तो मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करेंगे।
3.24उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।
संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥24॥
utsīdeyur ime lokā na kuryāṃ karma ced aham |
saṃkarasya ca kartā syām upahanyām imāḥ prajāḥ
- उत्सीदेयुः
- नष्ट हो जाएँ
- इमे
- ये
- लोकाः
- लोक
- न
- नहीं
- कुर्याम्
- करें
- कर्म
- कर्म
- चेत्
- यदि
- अहम्
- मैं
- सङ्करस्य
- संकरता के
- च
- और
- कर्ता
- कर्ता
- स्याम्
- हों
- उपहन्याम्
- नष्ट करने वाले हों
- इमाः
- इन
- प्रजाः
- प्रजाओं को
अन्वय: चेत् अहम् कर्म न कुर्याम्, इमे लोकाः उत्सीदेयुः, सङ्करस्य च कर्ता स्याम्, इमाः प्रजाः उपहन्याम्।
यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब लोक नष्ट हो जाएँ। मैं संकरता का कर्ता होऊँ और इन प्रजाओं का नाश करने वाला बनूँ।
3.25सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥25॥
saktāḥ karmaṇy avidvāṃso yathā kurvanti bhārata |
kuryād vidvāṃs tathāsaktaś cikīrṣur lokasaṃgraham
- सक्ताः
- आसक्त
- कर्मणि
- कर्म में
- अविद्वांसः
- अज्ञानी लोग
- यथा
- जैसे
- कुर्वन्ति
- करते हैं
- भारत
- हे भारत
- कुर्यात्
- करे
- विद्वान्
- ज्ञानी
- तथा
- वैसे ही
- असक्तः
- अनासक्त
- चिकीर्षुः
- करने की इच्छा वाला
- लोकसंग्रहम्
- लोकसंग्रह
अन्वय: भारत, कर्मणि सक्ताः अविद्वांसः यथा कुर्वन्ति, असक्तः लोकसंग्रहम् चिकीर्षुः विद्वान् तथा कुर्यात्।
हे भारत, कर्म में आसक्त अज्ञानी लोग जैसे कर्म करते हैं, वैसे ही अनासक्त ज्ञानी भी लोकसंग्रह की इच्छा से कर्म करे।
3.26न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥26॥
na buddhibhedaṃ janayed ajñānāṃ karmasaṅginām |
joṣayet sarvakarmāṇi vidvān yuktaḥ samācaran
- न
- नहीं
- बुद्धिभेदम्
- बुद्धि में भ्रम
- जनयेत्
- उत्पन्न करे
- अज्ञानाम्
- अज्ञानियों की
- कर्मसङ्गिनाम्
- कर्म में आसक्त
- जोषयेत्
- प्रवृत्त करे
- सर्वकर्माणि
- सब कर्मों में
- विद्वान्
- ज्ञानी
- युक्तः
- योगयुक्त
- समाचरन्
- भली भाँति करता हुआ
अन्वय: युक्तः विद्वान् कर्मसङ्गिनाम् अज्ञानाम् बुद्धिभेदम् न जनयेत्, समाचरन् सर्वकर्माणि जोषयेत्।
ज्ञानी पुरुष कर्म में आसक्त अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम उत्पन्न न करे। वह योगयुक्त होकर स्वयं भली भाँति कर्म करता हुआ उन्हें सब कर्मों में प्रवृत्त करे।
3.27प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥27॥
prakṛteḥ kriyamāṇāni guṇaiḥ karmāṇi sarvaśaḥ |
ahaṃkāravimūḍhātmā kartāham iti manyate
- प्रकृतेः
- प्रकृति के
- क्रियमाणानि
- किये जाते हुए
- गुणैः
- गुणों द्वारा
- कर्माणि
- कर्म
- सर्वशः
- सब प्रकार से
- अहङ्कारविमूढात्मा
- अहंकार से मोहित अन्तःकरण वाला
- कर्ता
- कर्ता
- अहम्
- मैं
- इति
- ऐसा
- मन्यते
- मानता है
अन्वय: सर्वशः प्रकृतेः गुणैः क्रियमाणानि कर्माणि अहङ्कारविमूढात्मा अहम् कर्ता इति मन्यते।
सब कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं। अहंकार से मोहित अन्तःकरण वाला मनुष्य मानता है कि मैं ही कर्ता हूँ।
3.28तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥28॥
tattvavit tu mahābāho guṇakarmavibhāgayoḥ |
guṇā guṇeṣu vartanta iti matvā na sajjate
- तत्त्ववित्
- तत्त्व को जानने वाला
- तु
- परन्तु
- महाबाहो
- हे महाबाहु
- गुणकर्मविभागयोः
- गुण और कर्म के विभाग का
- गुणाः
- गुण (इन्द्रियाँ)
- गुणेषु
- गुणों (विषयों) में
- वर्तन्ते
- बरत रहे हैं
- इति
- ऐसा
- मत्वा
- मानकर
- न
- नहीं
- सज्जते
- आसक्त होता
अन्वय: महाबाहो, गुणकर्मविभागयोः तत्त्ववित् तु गुणाः गुणेषु वर्तन्ते इति मत्वा न सज्जते।
परन्तु हे महाबाहु, गुण और कर्म के विभाग का तत्त्व जानने वाला मनुष्य यह मानकर कि गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, आसक्त नहीं होता।
3.29प्रकृतेर्गुणसंमूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु
प्रकृतेर्गुणसंमूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥29॥
prakṛter guṇasaṃmūḍhāḥ sajjante guṇakarmasu |
tān akṛtsnavido mandān kṛtsnavin na vicālayet
- प्रकृतेः
- प्रकृति के
- गुणसम्मूढाः
- गुणों से मोहित
- सज्जन्ते
- आसक्त होते हैं
- गुणकर्मसु
- गुणों और कर्मों में
- तान्
- उन
- अकृत्स्नविदः
- अपूर्ण ज्ञान वाले
- मन्दान्
- मन्दबुद्धियों को
- कृत्स्नवित्
- पूर्ण ज्ञानी
- न
- नहीं
- विचालयेत्
- विचलित करे
अन्वय: प्रकृतेः गुणसम्मूढाः गुणकर्मसु सज्जन्ते। कृत्स्नवित् तान् अकृत्स्नविदः मन्दान् न विचालयेत्।
प्रकृति के गुणों से मोहित हुए लोग गुणों और कर्मों में आसक्त होते हैं। पूर्ण ज्ञानी उन अपूर्ण ज्ञान वाले मन्दबुद्धियों को विचलित न करे।
3.30मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥30॥
mayi sarvāṇi karmāṇi saṃnyasyādhyātmacetasā |
nirāśīr nirmamo bhūtvā yudhyasva vigatajvaraḥ
- मयि
- मुझमें
- सर्वाणि
- सब
- कर्माणि
- कर्मों को
- संन्यस्य
- अर्पण करके
- अध्यात्मचेतसा
- अध्यात्म में लगे चित्त से
- निराशीः
- आशा रहित
- निर्ममः
- ममता रहित
- भूत्वा
- होकर
- युध्यस्व
- युद्ध कीजिए
- विगतज्वरः
- सन्ताप रहित
अन्वय: अध्यात्मचेतसा सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य निराशीः निर्ममः विगतज्वरः भूत्वा युध्यस्व।
अध्यात्म में लगे चित्त से सब कर्मों को मुझमें अर्पण करके, आशा रहित, ममता रहित और सन्ताप रहित होकर युद्ध कीजिए।
3.31ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥31॥
ye me matam idaṃ nityam anutiṣṭhanti mānavāḥ |
śraddhāvanto ’nasūyanto mucyante te ’pi karmabhiḥ
- ये
- जो
- मे
- मेरा, मुझे
- मतम्
- मत का
- इदम्
- इस
- नित्यम्
- सदा
- अनुतिष्ठन्ति
- अनुसरण करते हैं
- मानवाः
- मनुष्य
- श्रद्धावन्तः
- श्रद्धा वाले
- अनसूयन्तः
- दोषदृष्टि से रहित
- मुच्यन्ते
- मुक्त हो जाते हैं
- ते
- वे
- अपि
- भी
- कर्मभिः
- कर्मों से
अन्वय: ये मानवाः श्रद्धावन्तः अनसूयन्तः मे इदम् मतम् नित्यम् अनुतिष्ठन्ति, ते अपि कर्मभिः मुच्यन्ते।
जो मनुष्य श्रद्धा से युक्त और दोषदृष्टि से रहित होकर मेरे इस मत का सदा अनुसरण करते हैं, वे भी कर्मों से मुक्त हो जाते हैं।
3.32ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥32॥
ye tv etad abhyasūyanto nānutiṣṭhanti me matam |
sarvajñānavimūḍhāṃs tān viddhi naṣṭān acetasaḥ
- ये
- जो
- तु
- परन्तु
- एतत्
- इस
- अभ्यसूयन्तः
- दोष देखते हुए
- न
- नहीं
- अनुतिष्ठन्ति
- अनुसरण करते
- मे
- मेरा, मुझे
- मतम्
- मत का
- सर्वज्ञानविमूढान्
- सम्पूर्ण ज्ञान में मोहित
- तान्
- उनको
- विद्धि
- जानिए
- नष्टान्
- नष्ट हुए
- अचेतसः
- विवेकहीन
अन्वय: ये तु अभ्यसूयन्तः मे एतत् मतम् न अनुतिष्ठन्ति, तान् सर्वज्ञानविमूढान् अचेतसः नष्टान् विद्धि।
परन्तु जो दोष देखते हुए मेरे इस मत का अनुसरण नहीं करते, उन विवेकहीनों को सम्पूर्ण ज्ञान में मोहित और नष्ट हुए जानिए।
3.33सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥33॥
sadṛśaṃ ceṣṭate svasyāḥ prakṛter jñānavān api |
prakṛtiṃ yānti bhūtāni nigrahaḥ kiṃ kariṣyati
- सदृशम्
- अनुसार
- चेष्टते
- चेष्टा करता है
- स्वस्याः
- अपनी
- प्रकृतेः
- प्रकृति के
- ज्ञानवान्
- ज्ञानी
- अपि
- भी
- प्रकृतिम्
- प्रकृति को
- यान्ति
- प्राप्त होते हैं
- भूतानि
- प्राणी
- निग्रहः
- हठ
- किम्
- क्या
- करिष्यति
- करेगा
अन्वय: ज्ञानवान् अपि स्वस्याः प्रकृतेः सदृशम् चेष्टते। भूतानि प्रकृतिम् यान्ति, निग्रहः किम् करिष्यति।
ज्ञानी भी अपनी प्रकृति के अनुसार ही चेष्टा करता है। सब प्राणी प्रकृति का अनुसरण करते हैं, फिर हठ क्या करेगा?
3.34इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥34॥
indriyasyendriyasyārthe rāgadveṣau vyavasthitau |
tayor na vaśam āgacchet tau hy asya paripanthinau
- इन्द्रियस्य इन्द्रियस्य
- प्रत्येक इन्द्रिय के
- अर्थे
- विषय में
- रागद्वेषौ
- राग और द्वेष
- व्यवस्थितौ
- स्थित हैं
- तयोः
- उन दोनों के
- न
- नहीं
- वशम्
- वश में
- आगच्छेत्
- आए
- तौ
- वे दोनों
- हि
- क्योंकि
- अस्य
- इस मनुष्य के
- परिपन्थिनौ
- मार्ग के शत्रु
अन्वय: इन्द्रियस्य इन्द्रियस्य अर्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ। तयोः वशम् न आगच्छेत्, हि तौ अस्य परिपन्थिनौ।
प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग और द्वेष स्थित हैं। मनुष्य उन दोनों के वश में न आए, क्योंकि वे दोनों ही उसके मार्ग के शत्रु हैं।
3.35श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥35॥
śreyān svadharmo viguṇaḥ paradharmāt svanuṣṭhitāt |
svadharme nidhanaṃ śreyaḥ paradharmo bhayāvahaḥ
- श्रेयान्
- श्रेष्ठ है
- स्वधर्मः
- अपना धर्म
- विगुणः
- गुणरहित भी
- परधर्मात्
- दूसरे के धर्म से
- स्वनुष्ठितात्
- भली भाँति आचरण किये हुए
- स्वधर्मे
- अपने धर्म में
- निधनम्
- मरना
- श्रेयः
- कल्याणकारक है
- परधर्मः
- दूसरे का धर्म
- भयावहः
- भय देने वाला
अन्वय: विगुणः स्वधर्मः स्वनुष्ठितात् परधर्मात् श्रेयान्। स्वधर्मे निधनम् श्रेयः, परधर्मः भयावहः।
भली भाँति आचरण किये हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारक है, दूसरे का धर्म भय देने वाला है।
3.36अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः
अर्जुन उवाच
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥36॥
atha kena prayukto ’yaṃ pāpaṃ carati pūruṣaḥ |
anicchann api vārṣṇeya balād iva niyojitaḥ
- अथ
- तो फिर
- केन
- किससे
- प्रयुक्तः
- प्रेरित होकर
- अयम्
- यह
- पापम्
- पाप का
- चरति
- आचरण करता है
- पूरुषः
- मनुष्य
- अनिच्छन्
- न चाहता हुआ
- अपि
- भी
- वार्ष्णेय
- हे वार्ष्णेय
- बलात्
- बलपूर्वक
- इव
- मानो
- नियोजितः
- लगाया हुआ
अन्वय: वार्ष्णेय, अथ अयम् पूरुषः अनिच्छन् अपि बलात् इव नियोजितः केन प्रयुक्तः पापम् चरति।
हे वार्ष्णेय, तो फिर यह मनुष्य न चाहता हुआ भी किससे प्रेरित होकर, मानो बलपूर्वक लगाया हुआ, पाप का आचरण करता है?
3.37काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः
श्रीभगवानुवाच
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥37॥
kāma eṣa krodha eṣa rajoguṇasamudbhavaḥ |
mahāśano mahāpāpmā viddhy enam iha vairiṇam
- कामः
- काम
- एषः
- यह
- क्रोधः
- क्रोध
- एषः
- यह
- रजोगुणसमुद्भवः
- रजोगुण से उत्पन्न
- महाशनः
- बहुत खाने वाला
- महापाप्मा
- महापापी
- विद्धि
- जानिए
- एनम्
- इसको
- इह
- इस विषय में
- वैरिणम्
- शत्रु
अन्वय: एषः रजोगुणसमुद्भवः कामः, एषः क्रोधः, महाशनः महापाप्मा। इह एनम् वैरिणम् विद्धि।
रजोगुण से उत्पन्न यह काम ही क्रोध है, यह बहुत खाने वाला और महापापी है। इस विषय में इसी को शत्रु जानिए।
3.38धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च ।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥38॥
dhūmenāvriyate vahnir yathādarśo malena ca |
yatholbenāvṛto garbhas tathā tenedam āvṛtam
- धूमेन
- धुएँ से
- आव्रियते
- ढक जाती है
- वह्निः
- अग्नि
- यथा
- जैसे
- आदर्शः
- दर्पण
- मलेन
- मैल से
- च
- और
- यथा
- जैसे
- उल्बेन
- झिल्ली से
- आवृतः
- ढका हुआ
- गर्भः
- गर्भ
- तथा
- वैसे ही
- तेन
- उस काम से
- इदम्
- यह (ज्ञान)
- आवृतम्
- ढका हुआ है
अन्वय: यथा धूमेन वह्निः आव्रियते, मलेन च आदर्शः, यथा उल्बेन गर्भः आवृतः, तथा तेन इदम् आवृतम्।
जैसे धुएँ से अग्नि और मैल से दर्पण ढक जाता है, जैसे झिल्ली से गर्भ ढका रहता है, वैसे ही उस काम से यह ज्ञान ढका हुआ है।
3.39आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥39॥
āvṛtaṃ jñānam etena jñānino nityavairiṇā |
kāmarūpeṇa kaunteya duṣpūreṇānalena ca
- आवृतम्
- ढका हुआ है
- ज्ञानम्
- ज्ञान
- एतेन
- इस
- ज्ञानिनः
- ज्ञानी का
- नित्यवैरिणा
- नित्य शत्रु से
- कामरूपेण
- काम रूपी
- कौन्तेय
- हे कुन्तीपुत्र
- दुष्पूरेण
- कभी न भरने वाले
- अनलेन
- अग्नि के समान
- च
- और
अन्वय: कौन्तेय, ज्ञानिनः ज्ञानम् एतेन दुष्पूरेण अनलेन च कामरूपेण नित्यवैरिणा आवृतम्।
हे कुन्तीपुत्र, ज्ञानी का ज्ञान इस काम रूपी नित्य शत्रु से ढका हुआ है, जो कभी न भरने वाला और अग्नि के समान है।
3.40इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥40॥
indriyāṇi mano buddhir asyādhiṣṭhānam ucyate |
etair vimohayaty eṣa jñānam āvṛtya dehinam
- इन्द्रियाणि
- इन्द्रियाँ
- मनः
- मन
- बुद्धिः
- बुद्धि
- अस्य
- इस काम का
- अधिष्ठानम्
- निवास स्थान
- उच्यते
- कहा जाता है
- एतैः
- इनके द्वारा
- विमोहयति
- मोहित करता है
- एषः
- यह काम
- ज्ञानम्
- ज्ञान को
- आवृत्य
- ढककर
- देहिनम्
- देहधारी को
अन्वय: इन्द्रियाणि मनः बुद्धिः अस्य अधिष्ठानम् उच्यते। एषः एतैः ज्ञानम् आवृत्य देहिनम् विमोहयति।
इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इस काम के निवास स्थान कहे जाते हैं। यह काम इनके द्वारा ज्ञान को ढककर देहधारी को मोहित करता है।
3.41तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
पाप्मानं प्रजहिह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥41॥
tasmāt tvam indriyāṇy ādau niyamya bharatarṣabha |
pāpmānaṃ prajahihy enaṃ jñānavijñānanāśanam
- तस्मात्
- इसलिए
- त्वम्
- आप
- इन्द्रियाणि
- इन्द्रियों को
- आदौ
- पहले
- नियम्य
- वश में करके
- भरतर्षभ
- हे भरतश्रेष्ठ
- पाप्मानम्
- पापी
- प्रजहि
- त्याग दीजिए
- हि
- निश्चय ही
- एनम्
- इस काम को
- ज्ञानविज्ञाननाशनम्
- ज्ञान विज्ञान का नाशक
अन्वय: भरतर्षभ, तस्मात् त्वम् आदौ इन्द्रियाणि नियम्य ज्ञानविज्ञाननाशनम् पाप्मानम् एनम् हि प्रजहि।
इसलिए हे भरतश्रेष्ठ, आप पहले इन्द्रियों को वश में करके ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले इस पापी काम को अवश्य त्याग दीजिए।
3.42इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥42॥
indriyāṇi parāṇy āhur indriyebhyaḥ paraṃ manaḥ |
manasas tu parā buddhir yo buddheḥ paratas tu saḥ
- इन्द्रियाणि
- इन्द्रियों को
- पराणि
- श्रेष्ठ (सूक्ष्म)
- आहुः
- कहते हैं
- इन्द्रियेभ्यः
- इन्द्रियों से
- परम्
- श्रेष्ठ
- मनः
- मन
- मनसः
- मन से
- तु
- और
- परा
- श्रेष्ठ
- बुद्धिः
- बुद्धि
- यः
- जो
- बुद्धेः
- बुद्धि से
- परतः
- परे
- तु
- भी
- सः
- वह (आत्मा)
अन्वय: इन्द्रियाणि पराणि आहुः, इन्द्रियेभ्यः मनः परम्, मनसः तु बुद्धिः परा, यः तु बुद्धेः परतः सः।
इन्द्रियों को श्रेष्ठ कहते हैं, इन्द्रियों से श्रेष्ठ मन है और मन से भी श्रेष्ठ बुद्धि है। जो बुद्धि से भी परे है, वह आत्मा है।
3.43एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥43॥
evaṃ buddheḥ paraṃ buddhvā saṃstabhyātmānam ātmanā |
jahi śatruṃ mahābāho kāmarūpaṃ durāsadam
- एवम्
- इस प्रकार
- बुद्धेः
- बुद्धि से
- परम्
- परे (आत्मा) को
- बुद्ध्वा
- जानकर
- संस्तभ्य
- भली भाँति वश में करके
- आत्मानम्
- मन को
- आत्मना
- बुद्धि से
- जहि
- मार डालिए
- शत्रुम्
- शत्रु को
- महाबाहो
- हे महाबाहु
- कामरूपम्
- काम रूपी
- दुरासदम्
- दुर्जय
अन्वय: महाबाहो, एवम् बुद्धेः परम् बुद्ध्वा आत्मना आत्मानम् संस्तभ्य कामरूपम् दुरासदम् शत्रुम् जहि।
हे महाबाहु, इस प्रकार बुद्धि से परे आत्मा को जानकर और बुद्धि के द्वारा मन को भली भाँति वश में करके, इस काम रूपी दुर्जय शत्रु को मार डालिए।