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कुरुक्षेत्र का मैदान। दो सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हैं, और उनके बीच वह घड़ी है जिससे पूरी गीता जन्म लेती है। यह पहला अध्याय किसी उपदेश का नहीं है। यह एक इंसान के भीतर से दरकने का अध्याय है, और यही दरार आगे कृष्ण के हर वचन का दरवाज़ा खोलती है। जिस विफलता की यह तस्वीर है, उसे हम सब किसी न किसी रूप में पहचानते हैं।
अंधे राजा का सवाल
दृश्य मैदान में है, पर सुनने वाला महल में बैठा है। धृतराष्ट्र आँखों से देख नहीं सकते, इसलिए वे अपने मंत्री संजय से पूछते हैं, जिन्हें उस पल दूर का सब कुछ देख लेने की दिव्य दृष्टि मिली हुई थी।
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥
धृतराष्ट्र ने पूछा, हे संजय, धर्म की इस भूमि कुरुक्षेत्र में लड़ने की इच्छा से जुटे हुए मेरे बेटों और पांडु के बेटों ने क्या किया? पूरी गीता का पहला ही शब्द धर्म है, और यही शब्द आख़िर तक राह दिखाता रहेगा। पूछने वाला बाहर से अंधा है, बताने वाला भीतर तक देख सकता है।
संजय अपनी उसी दृष्टि से मैदान का हाल कहने लगते हैं। दोनों ओर से शंख गूँज उठे हैं। कृष्ण ने अपना पाञ्चजन्य फूँका, अर्जुन ने अपना देवदत्त, और एक-एक कर सारे महारथियों की हुंकार ने धरती और आकाश को भर दिया। उस नाद से सामने खड़ी सेना के हृदय तक काँप उठे। पर इस सारे शोर के बीच कहानी असल में एक ही रथ पर सिमट आती है, उसी रथ पर जिसका सारथी स्वयं कृष्ण हैं।
दोनों सेनाओं के बीच रथ
ऐन उसी वक़्त अर्जुन अपने सारथी श्रीकृष्ण से एक माँग करते हैं। वे कहते हैं, हे अच्युत, मेरा रथ दोनों सेनाओं के ठीक बीच में ले चलिए, ताकि मैं देख सकूँ कि इस युद्ध में मुझे किन-किन के साथ भिड़ना है। कृष्ण चुपचाप रथ को बीचोंबीच ला खड़ा करते हैं, ठीक भीष्म और द्रोण के सामने, मानो कह रहे हों कि देख लीजिए। अर्जुन ने बस देखने की माँग की थी, और आगे जो उन्होंने देखा, उसी ने उन्हें तोड़ दिया।
अपनों का चेहरा
अर्जुन नज़र दौड़ाते हैं तो दोनों तरफ़ अपने ही लोग खड़े दिखते हैं। यहाँ चचेरे भाई, वहाँ बचपन के साथी। एक ओर पितामह भीष्म, जिनकी गोद में वे कभी खेले थे, दूसरी ओर गुरु द्रोण, जिन्होंने उनके हाथ में पहला धनुष थमाया था। जिनसे राज्य पाना था, वे भी अपने ही थे, और जिनसे लड़ना था, वे भी अपने ही निकले।
इस दृश्य के सामने अर्जुन का सारा योद्धापन बिखर जाता है। शरीर पहले हार मानता है, फिर मन।
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति॥
वे कहते हैं, हे कृष्ण, अपने इन सगों को युद्ध के लिए सामने खड़ा देख कर मेरे अंग ढीले पड़ रहे हैं और मुँह सूखा जा रहा है। यह कोई बहाना नहीं, शरीर का सच्चा हाल है। पैर काँप रहे हैं, हाथ से गांडीव फिसल रहा है, त्वचा जल रही है, और मन जैसे किसी अनदेखे भँवर में घूम रहा है।
कुल का बिखरना
अर्जुन का डर सिर्फ़ अपनों की मौत तक नहीं रुकता, वह उससे आगे तक जाता है। वे कहते हैं कि कुल के नष्ट होते ही उसके पुराने धर्म भी मिट जाते हैं, और धर्म के मिटते ही अधर्म पूरे घराने पर छा जाता है। तब कुल की स्त्रियाँ अपनी मर्यादा खो बैठती हैं, वर्णों का क्रम उलट-पुलट हो जाता है, और जो पितर पिंड और जल की आस में बैठे हैं, वे भी इस टूटन में वंचित रह जाते हैं। अर्जुन को लगता है कि इतने बड़े पाप की जड़ में वही खड़े होंगे, और यही सोच उन्हें भीतर तक झकझोर देती है।
जीत में भी हार
अर्जुन के भीतर तर्क उमड़ते हैं। वे सोचते हैं कि इन अपनों को मार कर जो राज मिलेगा, वह ख़ून से सना होगा। ऐसी जीत से कैसा सुख? कुल टूटेगा, मर्यादाएँ ढहेंगी, और पीछे रह जाएगा सिर्फ़ पछतावा। उन्हें लगता है कि इस पाप से तो भीख माँग कर जी लेना भला। जिस लड़ाई को उन्होंने बरसों टालने की कोशिश की थी, आज उसी के ऐन बीच में खड़े हैं, और अब कोई रास्ता नहीं सूझ रहा।
यह वही घड़ी है जिसे हम सब किसी न किसी रूप में जानते हैं। सामने कर्तव्य साफ़ खड़ा है, पर भीतर से एक आवाज़ बार-बार कहती है कि यह हमसे न होगा। परंपरा इस टूटन को विषाद कहती है, और इसका अर्थ सिर्फ़ उदासी नहीं, वह गहरा ठहराव है जहाँ इंसान को अपना सहारा तक झूठा लगने लगता है।
धनुष का गिरना
और फिर वह पल आता है जिस पर यह पूरा अध्याय टिका है।
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥
संजय बताते हैं कि इतना कह कर अर्जुन ने बीच रण में अपने धनुष और बाण नीचे रख दिए, और शोक से भरे मन के साथ रथ के पिछले भाग में बैठ गए। जिस हाथ ने कभी सबसे कठिन निशाने साधे थे, उसी हाथ से गांडीव छूट गया। पहले अध्याय का पहला और आख़िरी सच यही है।
सार
पहला अध्याय हमें कोई उत्तर नहीं देता, वह सवाल को उसकी पूरी गहराई में खड़ा कर देता है। अर्जुन का यह टूटना ही आगे की सारी सीख का प्रवेश-द्वार है। जब तक भीतर यह दरार न पड़े, कोई ऊँची बात ठहरती नहीं। एक दिन हम सब इसी बीच वाले रथ पर होते हैं, अपने ही अपनों के आमने-सामने, हाथ काँपते हुए, और ठीक वहीं से गीता हमसे बात करना शुरू करती है। यह अध्याय वह आईना है जिसमें अपना डर पहली बार साफ़ दिखता है। और जहाँ अर्जुन का धनुष गिरता है, ठीक वहीं से अगले अध्याय में कृष्ण का पहला उत्तर उठेगा।
आधार: श्रीमद्भगवद्गीता
यही कथा वहाँ भी
- अध्याय 22 · गीता का क्षण (अर्जुन-विषाद, कृष्ण का उत्तर)
महाभारत (भीष्म पर्व): गीता का क्षण, कथा-रूप में - भगवद् गीता
भगवद्गीता का मूल पाठ, अठारह अध्याय
श्लोक-दर-श्लोक
इस अध्याय के सभी 47 श्लोक: देवनागरी मूल, रोमन लिप्यन्तरण, पदच्छेद, अन्वय और सीधा अर्थ। हर श्लोक की अपनी कड़ी है, जैसे lulla.net/bhagavad-gita/1/1/। ऊपर की कथा-व्याख्या पढ़ने के बाद यहाँ मूल तक उतरिए।
1.1धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥1॥
dharmakṣetre kurukṣetre samavetā yuyutsavaḥ |
māmakāḥ pāṇḍavāś caiva kim akurvata saṃjaya
- धर्मक्षेत्रे
- धर्मभूमि में
- कुरुक्षेत्रे
- कुरुक्षेत्र में
- समवेताः
- एकत्र हुए
- युयुत्सवः
- युद्ध की इच्छा वाले
- मामकाः
- मेरे पुत्रों ने
- पाण्डवाः
- पाण्डु के पुत्रों ने
- च
- और
- एव
- भी
- किम्
- क्या
- अकुर्वत
- किया
- संजय
- हे संजय
अन्वय: संजय, धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेताः युयुत्सवः मामकाः पाण्डवाः च एव किम् अकुर्वत।
हे संजय, धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे पुत्रों और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
1.2दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा
संजय उवाच
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥2॥
dṛṣṭvā tu pāṇḍavānīkaṃ vyūḍhaṃ duryodhanas tadā |
ācāryam upasaṃgamya rājā vacanam abravīt
- दृष्ट्वा
- देखकर
- तु
- और
- पाण्डवानीकम्
- पाण्डवों की सेना को
- व्यूढम्
- व्यूह में खड़ी
- दुर्योधनः
- दुर्योधन
- तदा
- उस समय
- आचार्यम्
- आचार्य द्रोण के पास
- उपसंगम्य
- जाकर
- राजा
- राजा
- वचनम्
- वचन
- अब्रवीत्
- बोला
अन्वय: तदा तु राजा दुर्योधनः व्यूढम् पाण्डवानीकम् दृष्ट्वा आचार्यम् उपसंगम्य वचनम् अब्रवीत्।
उस समय राजा दुर्योधन ने पाण्डवों की सेना को व्यूह में खड़ी देखकर आचार्य द्रोण के पास जाकर यह वचन कहा।
1.3पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥3॥
paśyaitāṃ pāṇḍuputrāṇām ācārya mahatīṃ camūm |
vyūḍhāṃ drupadaputreṇa tava śiṣyeṇa dhīmatā
- पश्य
- देखिए
- एताम्
- इस
- पाण्डुपुत्राणाम्
- पाण्डु के पुत्रों की
- आचार्य
- हे आचार्य
- महतीम्
- विशाल
- चमूम्
- सेना को
- व्यूढाम्
- व्यूह में रची गई
- द्रुपदपुत्रेण
- द्रुपद के पुत्र द्वारा
- तव
- आपके
- शिष्येण
- शिष्य द्वारा
- धीमता
- बुद्धिमान
अन्वय: आचार्य, तव धीमता शिष्येण द्रुपदपुत्रेण व्यूढाम् एताम् पाण्डुपुत्राणाम् महतीम् चमूम् पश्य।
हे आचार्य, पाण्डु के पुत्रों की इस विशाल सेना को देखिए, जिसे आपके बुद्धिमान शिष्य द्रुपद के पुत्र ने व्यूह में रचा है।
1.4अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥4॥
atra śūrā maheṣvāsā bhīmārjunasamā yudhi |
yuyudhāno virāṭaś ca drupadaś ca mahārathaḥ
- अत्र
- इस सेना में
- शूराः
- शूरवीर
- महेष्वासाः
- महान धनुर्धर
- भीमार्जुनसमाः
- भीम और अर्जुन के समान
- युधि
- युद्ध में
- युयुधानः
- युयुधान
- विराटः
- विराट
- च
- और
- द्रुपदः
- द्रुपद
- च
- और
- महारथः
- महारथी
अन्वय: अत्र युधि भीमार्जुनसमाः शूराः महेष्वासाः युयुधानः विराटः च महारथः द्रुपदः च।
इस सेना में युद्ध में भीम और अर्जुन के समान शूरवीर और महान धनुर्धर हैं, जैसे युयुधान, विराट और महारथी द्रुपद।
1.5धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुंगवः ॥5॥
dhṛṣṭaketuś cekitānaḥ kāśirājaś ca vīryavān |
purujit kuntibhojaś ca śaibyaś ca narapuṃgavaḥ
- धृष्टकेतुः
- धृष्टकेतु
- चेकितानः
- चेकितान
- काशिराजः
- काशी का राजा
- च
- और
- वीर्यवान्
- पराक्रमी
- पुरुजित्
- पुरुजित
- कुन्तिभोजः
- कुन्तिभोज
- च
- और
- शैब्यः
- शैब्य
- च
- और
- नरपुंगवः
- मनुष्यों में श्रेष्ठ
अन्वय: धृष्टकेतुः चेकितानः वीर्यवान् काशिराजः च पुरुजित् कुन्तिभोजः च नरपुंगवः शैब्यः च।
धृष्टकेतु, चेकितान, पराक्रमी काशिराज, पुरुजित, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य भी यहाँ हैं।
1.6युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥6॥
yudhāmanyuś ca vikrānta uttamaujāś ca vīryavān |
saubhadro draupadeyāś ca sarva eva mahārathāḥ
- युधामन्युः
- युधामन्यु
- च
- और
- विक्रान्तः
- पराक्रमी
- उत्तमौजाः
- उत्तमौजा
- च
- और
- वीर्यवान्
- बलवान
- सौभद्रः
- सुभद्रा का पुत्र
- द्रौपदेयाः
- द्रौपदी के पुत्र
- च
- और
- सर्वे
- सब
- एव
- ही
- महारथाः
- महारथी
अन्वय: विक्रान्तः युधामन्युः च वीर्यवान् उत्तमौजाः च सौभद्रः द्रौपदेयाः च सर्वे एव महारथाः।
पराक्रमी युधामन्यु, बलवान उत्तमौजा, सुभद्रा का पुत्र और द्रौपदी के पुत्र भी यहाँ हैं, और ये सब महारथी हैं।
1.7अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥7॥
asmākaṃ tu viśiṣṭā ye tān nibodha dvijottama |
nāyakā mama sainyasya saṃjñārthaṃ tān bravīmi te
- अस्माकम्
- हमारे पक्ष में
- तु
- और
- विशिष्टाः
- प्रधान योद्धा
- ये
- जो
- तान्
- उन्हें
- निबोध
- जान लीजिए
- द्विजोत्तम
- हे द्विजों में श्रेष्ठ
- नायकाः
- नायक
- मम
- मेरी
- सैन्यस्य
- सेना के
- संज्ञार्थम्
- जानकारी के लिए
- तान्
- उन्हें
- ब्रवीमि
- कहता हूँ
- ते
- आपसे
अन्वय: द्विजोत्तम, अस्माकम् तु ये विशिष्टाः मम सैन्यस्य नायकाः तान् निबोध। ते संज्ञार्थम् तान् ब्रवीमि।
हे द्विजश्रेष्ठ, हमारे पक्ष में भी जो प्रधान योद्धा हैं, उन्हें जान लीजिए। आपकी जानकारी के लिए मैं अपनी सेना के उन नायकों के नाम कहता हूँ।
1.8भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः ।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥8॥
bhavān bhīṣmaś ca karṇaś ca kṛpaś ca samitiṃjayaḥ |
aśvatthāmā vikarṇaś ca saumadattis tathaiva ca
- भवान्
- आप स्वयं
- भीष्मः
- भीष्म
- च
- और
- कर्णः
- कर्ण
- च
- और
- कृपः
- कृपाचार्य
- च
- और
- समितिंजयः
- संग्राम में विजयी
- अश्वत्थामा
- अश्वत्थामा
- विकर्णः
- विकर्ण
- च
- और
- सौमदत्तिः
- सोमदत्त का पुत्र
- तथा
- तथा
- एव
- भी
- च
- और
अन्वय: भवान् भीष्मः च कर्णः च समितिंजयः कृपः च अश्वत्थामा विकर्णः च तथा एव सौमदत्तिः च।
आप स्वयं, भीष्म, कर्ण, संग्राम में विजयी कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भी हैं।
1.9अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥9॥
anye ca bahavaḥ śūrā madarthe tyaktajīvitāḥ |
nānāśastrapraharaṇāḥ sarve yuddhaviśāradāḥ
- अन्ये
- दूसरे
- च
- और
- बहवः
- बहुत से
- शूराः
- शूरवीर
- मदर्थे
- मेरे लिए
- त्यक्तजीविताः
- प्राण त्यागने को तैयार
- नानाशस्त्रप्रहरणाः
- अनेक शस्त्रों से प्रहार करने वाले
- सर्वे
- सब
- युद्धविशारदाः
- युद्ध में कुशल
अन्वय: अन्ये च बहवः शूराः मदर्थे त्यक्तजीविताः नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः।
और भी बहुत से शूरवीर हैं जो मेरे लिए अपने प्राण त्यागने को तैयार हैं। वे अनेक प्रकार के शस्त्रों से प्रहार करने वाले हैं और सभी युद्ध में कुशल हैं।
1.10अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥10॥
aparyāptaṃ tad asmākaṃ balaṃ bhīṣmābhirakṣitam |
paryāptaṃ tv idam eteṣāṃ balaṃ bhīmābhirakṣitam
- अपर्याप्तम्
- असीम, अजेय
- तत्
- वह
- अस्माकम्
- हमारी
- बलम्
- सेना
- भीष्माभिरक्षितम्
- भीष्म द्वारा रक्षित
- पर्याप्तम्
- सीमित, जीतने में सुगम
- तु
- परन्तु
- इदम्
- यह
- एतेषाम्
- इन लोगों की
- बलम्
- सेना
- भीमाभिरक्षितम्
- भीम द्वारा रक्षित
अन्वय: भीष्माभिरक्षितम् तत् अस्माकम् बलम् अपर्याप्तम्, भीमाभिरक्षितम् इदम् एतेषाम् बलम् तु पर्याप्तम्।
भीष्म द्वारा रक्षित हमारी वह सेना सब प्रकार से अजेय है, और भीम द्वारा रक्षित इनकी यह सेना जीतने में सुगम है।
1.11अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥11॥
ayaneṣu ca sarveṣu yathābhāgam avasthitāḥ |
bhīṣmam evābhirakṣantu bhavantaḥ sarva eva hi
- अयनेषु
- मोर्चों पर
- च
- और
- सर्वेषु
- सभी
- यथाभागम्
- अपने अपने स्थान पर
- अवस्थिताः
- खड़े हुए
- भीष्मम्
- भीष्म की
- एव
- ही
- अभिरक्षन्तु
- सब ओर से रक्षा करें
- भवन्तः
- आप लोग
- सर्वे
- सब
- एव
- ही
- हि
- निश्चय ही
अन्वय: सर्वेषु अयनेषु च यथाभागम् अवस्थिताः भवन्तः सर्वे एव हि भीष्मम् एव अभिरक्षन्तु।
इसलिए आप सब लोग सभी मोर्चों पर अपने अपने स्थान पर खड़े रहकर निश्चय ही भीष्म की ही सब ओर से रक्षा करें।
1.12तस्य संजनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः
तस्य संजनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ॥12॥
tasya saṃjanayan harṣaṃ kuruvṛddhaḥ pitāmahaḥ |
siṃhanādaṃ vinadyoccaiḥ śaṅkhaṃ dadhmau pratāpavān
- तस्य
- उस दुर्योधन के
- संजनयन्
- उत्पन्न करते हुए
- हर्षम्
- हर्ष
- कुरुवृद्धः
- कुरुवंश के वृद्ध
- पितामहः
- पितामह भीष्म
- सिंहनादम्
- सिंह के समान गर्जना
- विनद्य
- करके
- उच्चैः
- ऊँचे स्वर में
- शङ्खम्
- शंख
- दध्मौ
- बजाया
- प्रतापवान्
- प्रतापी
अन्वय: प्रतापवान् कुरुवृद्धः पितामहः तस्य हर्षम् संजनयन् उच्चैः सिंहनादम् विनद्य शङ्खम् दध्मौ।
कुरुवंश के वृद्ध प्रतापी पितामह भीष्म ने दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए ऊँचे स्वर में सिंह के समान गर्जना की और शंख बजाया।
1.13ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥13॥
tataḥ śaṅkhāś ca bheryaś ca paṇavānakagomukhāḥ |
sahasaivābhyahanyanta sa śabdas tumulo ’bhavat
- ततः
- उसके बाद
- शङ्खाः
- शंख
- च
- और
- भेर्यः
- नगाड़े
- च
- और
- पणवानकगोमुखाः
- ढोल, मृदंग और नरसिंघे
- सहसा
- एक साथ
- एव
- ही
- अभ्यहन्यन्त
- बज उठे
- सः
- वह
- शब्दः
- शब्द
- तुमुलः
- भयंकर
- अभवत्
- हुआ
अन्वय: ततः शङ्खाः च भेर्यः च पणवानकगोमुखाः सहसा एव अभ्यहन्यन्त, सः शब्दः तुमुलः अभवत्।
इसके बाद शंख, नगाड़े, ढोल, मृदंग और नरसिंघे एक साथ बज उठे, और वह शब्द बड़ा भयंकर हुआ।
1.14ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥14॥
tataḥ śvetair hayair yukte mahati syandane sthitau |
mādhavaḥ pāṇḍavaś caiva divyau śaṅkhau pradadhmatuḥ
- ततः
- उसके बाद
- श्वेतैः
- श्वेत
- हयैः
- घोड़ों से
- युक्ते
- जुड़े हुए
- महति
- विशाल
- स्यन्दने
- रथ में
- स्थितौ
- बैठे हुए
- माधवः
- माधव श्रीकृष्ण
- पाण्डवः
- पाण्डुपुत्र अर्जुन
- च
- और
- एव
- भी
- दिव्यौ
- दिव्य
- शङ्खौ
- दोनों शंखों को
- प्रदध्मतुः
- बजाया
अन्वय: ततः श्वेतैः हयैः युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ माधवः पाण्डवः च एव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः।
इसके बाद श्वेत घोड़ों से जुड़े विशाल रथ में बैठे हुए माधव श्रीकृष्ण और पाण्डुपुत्र अर्जुन ने भी अपने दिव्य शंख बजाए।
1.15पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनंजयः
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनंजयः ।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥15॥
pāñcajanyaṃ hṛṣīkeśo devadattaṃ dhanaṃjayaḥ |
pauṇḍraṃ dadhmau mahāśaṅkhaṃ bhīmakarmā vṛkodaraḥ
- पाञ्चजन्यम्
- पाञ्चजन्य नामक शंख
- हृषीकेशः
- हृषीकेश श्रीकृष्ण ने
- देवदत्तम्
- देवदत्त नामक शंख
- धनंजयः
- धनंजय अर्जुन ने
- पौण्ड्रम्
- पौण्ड्र नामक
- दध्मौ
- बजाया
- महाशङ्खम्
- महाशंख
- भीमकर्मा
- भयानक कर्म करने वाले
- वृकोदरः
- वृकोदर भीम ने
अन्वय: हृषीकेशः पाञ्चजन्यम्, धनंजयः देवदत्तम्, भीमकर्मा वृकोदरः पौण्ड्रम् महाशङ्खम् दध्मौ।
हृषीकेश श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य, धनंजय अर्जुन ने देवदत्त और भयानक कर्म करने वाले वृकोदर भीम ने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया।
1.16अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥16॥
anantavijayaṃ rājā kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ |
nakulaḥ sahadevaś ca sughoṣamaṇipuṣpakau
- अनन्तविजयम्
- अनन्तविजय नामक शंख
- राजा
- राजा
- कुन्तीपुत्रः
- कुन्ती के पुत्र
- युधिष्ठिरः
- युधिष्ठिर ने
- नकुलः
- नकुल
- सहदेवः
- सहदेव ने
- च
- और
- सुघोषमणिपुष्पकौ
- सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख
अन्वय: कुन्तीपुत्रः राजा युधिष्ठिरः अनन्तविजयम्, नकुलः सहदेवः च सुघोषमणिपुष्पकौ।
कुन्ती के पुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक शंख बजाया, और नकुल तथा सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाए।
1.17काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥17॥
kāśyaś ca parameṣvāsaḥ śikhaṇḍī ca mahārathaḥ |
dhṛṣṭadyumno virāṭaś ca sātyakiś cāparājitaḥ
- काश्यः
- काशी का राजा
- च
- और
- परमेष्वासः
- श्रेष्ठ धनुर्धर
- शिखण्डी
- शिखण्डी
- च
- और
- महारथः
- महारथी
- धृष्टद्युम्नः
- धृष्टद्युम्न
- विराटः
- विराट
- च
- और
- सात्यकिः
- सात्यकि
- च
- और
- अपराजितः
- कभी न हारने वाले
अन्वय: परमेष्वासः काश्यः च महारथः शिखण्डी च धृष्टद्युम्नः विराटः च अपराजितः सात्यकिः च।
श्रेष्ठ धनुर्धर काशिराज, महारथी शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, विराट और कभी न हारने वाले सात्यकि ने भी शंख बजाए।
1.18द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक् ॥18॥
drupado draupadeyāś ca sarvaśaḥ pṛthivīpate |
saubhadraś ca mahābāhuḥ śaṅkhān dadhmuḥ pṛthak pṛthak
- द्रुपदः
- द्रुपद
- द्रौपदेयाः
- द्रौपदी के पुत्र
- च
- और
- सर्वशः
- सब ओर से
- पृथिवीपते
- हे पृथ्वीपति
- सौभद्रः
- सुभद्रा का पुत्र
- च
- और
- महाबाहुः
- महाबाहु
- शङ्खान्
- शंखों को
- दध्मुः
- बजाया
- पृथक् पृथक्
- अलग अलग
अन्वय: पृथिवीपते, द्रुपदः द्रौपदेयाः च महाबाहुः सौभद्रः च सर्वशः पृथक् पृथक् शङ्खान् दध्मुः।
हे पृथ्वीपति, द्रुपद, द्रौपदी के पुत्रों और महाबाहु सुभद्रापुत्र ने भी सब ओर से अलग अलग अपने शंख बजाए।
1.19स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ॥19॥
sa ghoṣo dhārtarāṣṭrāṇāṃ hṛdayāni vyadārayat |
nabhaś ca pṛthivīṃ caiva tumulo vyanunādayan
- सः
- वह
- घोषः
- घोष
- धार्तराष्ट्राणाम्
- धृतराष्ट्र के पुत्रों के
- हृदयानि
- हृदयों को
- व्यदारयत्
- विदीर्ण कर दिया
- नभः
- आकाश
- च
- और
- पृथिवीम्
- पृथ्वी को
- च
- और
- एव
- भी
- तुमुलः
- भयंकर
- व्यनुनादयन्
- गुँजाते हुए
अन्वय: सः तुमुलः घोषः नभः च पृथिवीम् च एव व्यनुनादयन् धार्तराष्ट्राणाम् हृदयानि व्यदारयत्।
उस भयंकर घोष ने आकाश और पृथ्वी को गुँजाते हुए धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदय विदीर्ण कर दिए।
1.20अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥20॥
atha vyavasthitān dṛṣṭvā dhārtarāṣṭrān kapidhvajaḥ |
pravṛtte śastrasaṃpāte dhanur udyamya pāṇḍavaḥ
- अथ
- इसके बाद
- व्यवस्थितान्
- व्यूह में खड़े हुए
- दृष्ट्वा
- देखकर
- धार्तराष्ट्रान्
- धृतराष्ट्र के पुत्रों को
- कपिध्वजः
- कपि की ध्वजा वाले अर्जुन
- प्रवृत्ते
- आरम्भ होने पर
- शस्त्रसंपाते
- शस्त्र चलने की तैयारी
- धनुः
- धनुष
- उद्यम्य
- उठाकर
- पाण्डवः
- पाण्डुपुत्र
अन्वय: अथ शस्त्रसंपाते प्रवृत्ते कपिध्वजः पाण्डवः व्यवस्थितान् धार्तराष्ट्रान् दृष्ट्वा धनुः उद्यम्य।
इसके बाद शस्त्र चलने की तैयारी होने पर कपिध्वज पाण्डुपुत्र अर्जुन ने धृतराष्ट्र के पुत्रों को व्यूह में खड़े देखकर अपना धनुष उठाया।
1.21हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥21॥
hṛṣīkeśaṃ tadā vākyam idam āha mahīpate |
senayor ubhayor madhye rathaṃ sthāpaya me ’cyuta
- हृषीकेशम्
- हृषीकेश श्रीकृष्ण से
- तदा
- उस समय
- वाक्यम्
- वाक्य
- इदम्
- यह
- आह
- कहा
- महीपते
- हे पृथ्वीपति
- सेनयोः
- सेनाओं के
- उभयोः
- दोनों
- मध्ये
- बीच में
- रथम्
- रथ को
- स्थापय
- खड़ा कीजिए
- मे
- मेरे
- अच्युत
- हे अच्युत
अन्वय: महीपते, तदा हृषीकेशम् इदम् वाक्यम् आह। अच्युत, उभयोः सेनयोः मध्ये मे रथम् स्थापय।
हे पृथ्वीपति, उस समय उन्होंने हृषीकेश से यह वाक्य कहा। हे अच्युत, मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए।
1.22यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे ॥22॥
yāvad etān nirīkṣe ’haṃ yoddhukāmān avasthitān |
kair mayā saha yoddhavyam asmin raṇasamudyame
- यावत्
- जब तक
- एतान्
- इन
- निरीक्षे
- भली प्रकार देख लूँ
- अहम्
- मैं
- योद्धुकामान्
- युद्ध की इच्छा वालों को
- अवस्थितान्
- खड़े हुए
- कैः
- किन किन के
- मया
- मुझे
- सह
- साथ
- योद्धव्यम्
- युद्ध करना है
- अस्मिन्
- इस
- रणसमुद्यमे
- युद्ध के उद्योग में
अन्वय: यावत् अहम् अवस्थितान् एतान् योद्धुकामान् निरीक्षे, अस्मिन् रणसमुद्यमे मया कैः सह योद्धव्यम्।
जब तक मैं युद्ध की इच्छा से खड़े हुए इन लोगों को भली प्रकार देख लूँ, कि इस युद्ध के उद्योग में मुझे किन किन के साथ युद्ध करना है।
1.23योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥23॥
yotsyamānān avekṣe ’haṃ ya ete ’tra samāgatāḥ |
dhārtarāṣṭrasya durbuddher yuddhe priyacikīrṣavaḥ
- योत्स्यमानान्
- युद्ध करने वालों को
- अवेक्षे
- देख लूँ
- अहम्
- मैं
- ये
- जो
- एते
- ये
- अत्र
- यहाँ
- समागताः
- एकत्र हुए हैं
- धार्तराष्ट्रस्य
- धृतराष्ट्र के पुत्र का
- दुर्बुद्धेः
- दुर्बुद्धि
- युद्धे
- युद्ध में
- प्रियचिकीर्षवः
- भला चाहने वाले
अन्वय: दुर्बुद्धेः धार्तराष्ट्रस्य युद्धे प्रियचिकीर्षवः ये एते अत्र समागताः, अहम् योत्स्यमानान् अवेक्षे।
धृतराष्ट्र के दुर्बुद्धि पुत्र का युद्ध में भला चाहने वाले जो ये लोग यहाँ एकत्र हुए हैं, मैं उन युद्ध करने वालों को देख लूँ।
1.24एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥24॥
evam ukto hṛṣīkeśo guḍākeśena bhārata |
senayor ubhayor madhye sthāpayitvā rathottamam
- एवम्
- इस प्रकार
- उक्तः
- कहे जाने पर
- हृषीकेशः
- हृषीकेश श्रीकृष्ण ने
- गुडाकेशेन
- गुडाकेश अर्जुन द्वारा
- भारत
- हे भरतवंशी
- सेनयोः
- सेनाओं के
- उभयोः
- दोनों
- मध्ये
- बीच में
- स्थापयित्वा
- खड़ा करके
- रथोत्तमम्
- उत्तम रथ को
अन्वय: भारत, गुडाकेशेन एवम् उक्तः हृषीकेशः उभयोः सेनयोः मध्ये रथोत्तमम् स्थापयित्वा।
हे भरतवंशी, गुडाकेश अर्जुन के इस प्रकार कहने पर हृषीकेश श्रीकृष्ण ने उस उत्तम रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कर दिया।
1.25भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति ॥25॥
bhīṣmadroṇapramukhataḥ sarveṣāṃ ca mahīkṣitām |
uvāca pārtha paśyaitān samavetān kurūn iti
- भीष्मद्रोणप्रमुखतः
- भीष्म और द्रोण के सामने
- सर्वेषाम्
- सभी
- च
- और
- महीक्षिताम्
- राजाओं के सामने
- उवाच
- कहा
- पार्थ
- हे पार्थ
- पश्य
- देखिए
- एतान्
- इन
- समवेतान्
- एकत्र हुए
- कुरून्
- कुरुवंशियों को
- इति
- ऐसा
अन्वय: भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषाम् च महीक्षिताम् उवाच, पार्थ, एतान् समवेतान् कुरून् पश्य इति।
भीष्म, द्रोण और सभी राजाओं के सामने रथ खड़ा करके उन्होंने कहा, हे पार्थ, इन एकत्र हुए कुरुवंशियों को देखिए।
1.26तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॢनथ पितामहान्
तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॢनथ पितामहान् ।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातॢन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥26॥
tatrāpaśyat sthitān pārthaḥ pitḷn atha pitāmahān |
ācāryān mātulān bhrātḷn putrān pautrān sakhīṃs tathā
- तत्र
- वहाँ
- अपश्यत्
- देखा
- स्थितान्
- खड़े हुए
- पार्थः
- पार्थ अर्जुन ने
- पितॢन्
- पिता तुल्य ताऊ चाचाओं को
- अथ
- और
- पितामहान्
- पितामहों को
- आचार्यान्
- आचार्यों को
- मातुलान्
- मामाओं को
- भ्रातॢन्
- भाइयों को
- पुत्रान्
- पुत्रों को
- पौत्रान्
- पौत्रों को
- सखीन्
- मित्रों को
- तथा
- तथा
अन्वय: तत्र पार्थः स्थितान् पितॢन् अथ पितामहान् आचार्यान् मातुलान् भ्रातॢन् पुत्रान् पौत्रान् सखीन् तथा अपश्यत्।
वहाँ पार्थ अर्जुन ने खड़े हुए पिता तुल्य ताऊ चाचाओं, पितामहों, आचार्यों, मामाओं, भाइयों, पुत्रों, पौत्रों और मित्रों को देखा।
1.27श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ॥27॥
śvaśurān suhṛdaś caiva senayor ubhayor api |
tān samīkṣya sa kaunteyaḥ sarvān bandhūn avasthitān
- श्वशुरान्
- ससुरों को
- सुहृदः
- हितैषियों को
- च
- और
- एव
- भी
- सेनयोः
- सेनाओं में
- उभयोः
- दोनों
- अपि
- भी
- तान्
- उन
- समीक्ष्य
- भली प्रकार देखकर
- सः
- वह
- कौन्तेयः
- कुन्तीपुत्र अर्जुन
- सर्वान्
- सब
- बन्धून्
- बान्धवों को
- अवस्थितान्
- खड़े हुए
अन्वय: उभयोः अपि सेनयोः श्वशुरान् सुहृदः च एव, सः कौन्तेयः तान् सर्वान् अवस्थितान् बन्धून् समीक्ष्य।
उन्होंने दोनों ही सेनाओं में ससुरों और हितैषियों को भी देखा। उस कुन्तीपुत्र ने उन सब खड़े हुए बान्धवों को भली प्रकार देखा।
1.28कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।
दृष्ट्वेमान्स्वजनान्कृष्ण युयुत्सून्समवस्थितान् ॥28॥
kṛpayā parayāviṣṭo viṣīdann idam abravīt |
dṛṣṭvemān svajanān kṛṣṇa yuyutsūn samavasthitān
- कृपया
- करुणा से
- परया
- अत्यन्त
- आविष्टः
- भरा हुआ
- विषीदन्
- शोक करता हुआ
- इदम्
- यह
- अब्रवीत्
- बोला
- दृष्ट्वा
- देखकर
- इमान्
- इन
- स्वजनान्
- अपने ही लोगों को
- कृष्ण
- हे कृष्ण
- युयुत्सून्
- युद्ध की इच्छा वाले
- समवस्थितान्
- सामने खड़े हुए
अन्वय: परया कृपया आविष्टः विषीदन् इदम् अब्रवीत्। कृष्ण, इमान् स्वजनान् युयुत्सून् समवस्थितान् दृष्ट्वा।
अत्यन्त करुणा से भरकर शोक करते हुए वे यह बोले। हे कृष्ण, मैं युद्ध की इच्छा से सामने खड़े इन अपने ही लोगों को देख रहा हूँ।
1.29सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥29॥
sīdanti mama gātrāṇi mukhaṃ ca pariśuṣyati |
vepathuś ca śarīre me romaharṣaś ca jāyate
- सीदन्ति
- शिथिल हो रहे हैं
- मम
- मेरे
- गात्राणि
- अंग
- मुखम्
- मुख
- च
- और
- परिशुष्यति
- सूख रहा है
- वेपथुः
- कम्पन
- च
- और
- शरीरे
- शरीर में
- मे
- मेरे
- रोमहर्षः
- रोमांच
- च
- और
- जायते
- हो रहा है
अन्वय: मम गात्राणि सीदन्ति, मुखम् च परिशुष्यति, मे शरीरे वेपथुः च रोमहर्षः च जायते।
मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है। मेरे शरीर में कम्पन और रोमांच हो रहा है।
1.30गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥30॥
gāṇḍīvaṃ sraṃsate hastāt tvak caiva paridahyate |
na ca śaknomy avasthātuṃ bhramatīva ca me manaḥ
- गाण्डीवम्
- गाण्डीव धनुष
- स्रंसते
- गिर रहा है
- हस्तात्
- हाथ से
- त्वक्
- त्वचा
- च
- और
- एव
- भी
- परिदह्यते
- जल रही है
- न
- नहीं
- च
- और
- शक्नोमि
- समर्थ हूँ
- अवस्थातुम्
- खड़े रहने में
- भ्रमति
- घूम रहा है
- इव
- जैसे
- च
- और
- मे
- मेरा
- मनः
- मन
अन्वय: गाण्डीवम् हस्तात् स्रंसते, त्वक् च एव परिदह्यते, अवस्थातुम् च न शक्नोमि, मे मनः च भ्रमति इव।
गाण्डीव धनुष हाथ से गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है। मैं खड़ा रहने में समर्थ नहीं हूँ और मेरा मन जैसे घूम रहा है।
1.31निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥31॥
nimittāni ca paśyāmi viparītāni keśava |
na ca śreyo ’nupaśyāmi hatvā svajanam āhave
- निमित्तानि
- शकुनों को
- च
- और
- पश्यामि
- देखता हूँ
- विपरीतानि
- विपरीत
- केशव
- हे केशव
- न
- नहीं
- च
- और
- श्रेयः
- कल्याण
- अनुपश्यामि
- देखता हूँ
- हत्वा
- मारकर
- स्वजनम्
- अपने ही लोगों को
- आहवे
- युद्ध में
अन्वय: केशव, निमित्तानि च विपरीतानि पश्यामि, आहवे स्वजनम् हत्वा च श्रेयः न अनुपश्यामि।
हे केशव, मैं शकुनों को भी विपरीत देख रहा हूँ। युद्ध में अपने ही लोगों को मारकर मुझे कोई कल्याण नहीं दिखता।
1.32न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ॥32॥
na kāṅkṣe vijayaṃ kṛṣṇa na ca rājyaṃ sukhāni ca |
kiṃ no rājyena govinda kiṃ bhogair jīvitena vā
- न
- नहीं
- काङ्क्षे
- चाहता हूँ
- विजयम्
- विजय
- कृष्ण
- हे कृष्ण
- न
- नहीं
- च
- और
- राज्यम्
- राज्य
- सुखानि
- सुख
- च
- और
- किम्
- क्या प्रयोजन
- नः
- हमें
- राज्येन
- राज्य से
- गोविन्द
- हे गोविन्द
- किम्
- क्या प्रयोजन
- भोगैः
- भोगों से
- जीवितेन
- जीवन से
- वा
- अथवा
अन्वय: कृष्ण, विजयम् न काङ्क्षे, राज्यम् च सुखानि च न। गोविन्द, नः राज्येन किम्, भोगैः जीवितेन वा किम्।
हे कृष्ण, मैं विजय नहीं चाहता, राज्य और सुख भी नहीं चाहता। हे गोविन्द, हमें राज्य से, भोगों से या जीवन से भी क्या प्रयोजन है?
1.33येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥33॥
yeṣām arthe kāṅkṣitaṃ no rājyaṃ bhogāḥ sukhāni ca |
ta ime ’vasthitā yuddhe prāṇāṃs tyaktvā dhanāni ca
- येषाम्
- जिनके
- अर्थे
- लिए
- काङ्क्षितम्
- इच्छा की गई
- नः
- हमें
- राज्यम्
- राज्य
- भोगाः
- भोग
- सुखानि
- सुख
- च
- और
- ते
- वे
- इमे
- ये
- अवस्थिताः
- खड़े हैं
- युद्धे
- युद्ध में
- प्राणान्
- प्राणों की
- त्यक्त्वा
- आशा छोड़कर
- धनानि
- धन की
- च
- और
अन्वय: येषाम् अर्थे नः राज्यम् भोगाः सुखानि च काङ्क्षितम्, ते इमे प्राणान् धनानि च त्यक्त्वा युद्धे अवस्थिताः।
जिनके लिए हमें राज्य, भोग और सुख की इच्छा थी, वे ही ये लोग प्राणों और धन की आशा छोड़कर युद्ध में खड़े हैं।
1.34आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः स्यालाः संबन्धिनस्तथा ॥34॥
ācāryāḥ pitaraḥ putrās tathaiva ca pitāmahāḥ |
mātulāḥ śvaśurāḥ pautrāḥ syālāḥ saṃbandhinas tathā
- आचार्याः
- आचार्य
- पितरः
- पिता तुल्य ताऊ चाचा
- पुत्राः
- पुत्र
- तथा
- तथा
- एव
- ही
- च
- और
- पितामहाः
- पितामह
- मातुलाः
- मामा
- श्वशुराः
- ससुर
- पौत्राः
- पौत्र
- स्यालाः
- साले
- संबन्धिनः
- सम्बन्धी
- तथा
- तथा
अन्वय: आचार्याः पितरः पुत्राः तथा एव च पितामहाः मातुलाः श्वशुराः पौत्राः स्यालाः तथा संबन्धिनः।
यहाँ आचार्य, पिता तुल्य ताऊ चाचा, पुत्र, पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले और अन्य सम्बन्धी खड़े हैं।
1.35एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥35॥
etān na hantum icchāmi ghnato ’pi madhusūdana |
api trailokyarājyasya hetoḥ kiṃ nu mahīkṛte
- एतान्
- इनको
- न
- नहीं
- हन्तुम्
- मारना
- इच्छामि
- चाहता हूँ
- घ्नतः
- मारने पर
- अपि
- भी
- मधुसूदन
- हे मधुसूदन
- अपि
- भी
- त्रैलोक्यराज्यस्य
- तीनों लोकों के राज्य के
- हेतोः
- लिए
- किम्
- क्या
- नु
- फिर
- महीकृते
- पृथ्वी के लिए
अन्वय: मधुसूदन, घ्नतः अपि एतान् त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः अपि हन्तुम् न इच्छामि, महीकृते किम् नु।
हे मधुसूदन, ये मुझे मार भी डालें तो भी मैं तीनों लोकों के राज्य के लिए भी इनको मारना नहीं चाहता, फिर इस पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या।
1.36निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ॥36॥
nihatya dhārtarāṣṭrān naḥ kā prītiḥ syāj janārdana |
pāpam evāśrayed asmān hatvaitān ātatāyinaḥ
- निहत्य
- मारकर
- धार्तराष्ट्रान्
- धृतराष्ट्र के पुत्रों को
- नः
- हमें
- का
- क्या
- प्रीतिः
- प्रसन्नता
- स्यात्
- होगी
- जनार्दन
- हे जनार्दन
- पापम्
- पाप
- एव
- ही
- आश्रयेत्
- लगेगा
- अस्मान्
- हमें
- हत्वा
- मारकर
- एतान्
- इन
- आततायिनः
- आततायियों को
अन्वय: जनार्दन, धार्तराष्ट्रान् निहत्य नः का प्रीतिः स्यात्। एतान् आततायिनः हत्वा अस्मान् पापम् एव आश्रयेत्।
हे जनार्दन, धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर हमें पाप ही लगेगा।
1.37तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्सबान्धवान्
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्सबान्धवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥37॥
tasmān nārhā vayaṃ hantuṃ dhārtarāṣṭrān sabāndhavān |
svajanaṃ hi kathaṃ hatvā sukhinaḥ syāma mādhava
- तस्मात्
- इसलिए
- न
- नहीं
- अर्हाः
- योग्य
- वयम्
- हम
- हन्तुम्
- मारने के
- धार्तराष्ट्रान्
- धृतराष्ट्र के पुत्रों को
- सबान्धवान्
- बान्धवों सहित
- स्वजनम्
- अपने ही लोगों को
- हि
- क्योंकि
- कथम्
- कैसे
- हत्वा
- मारकर
- सुखिनः
- सुखी
- स्याम
- होंगे
- माधव
- हे माधव
अन्वय: तस्मात् वयम् सबान्धवान् धार्तराष्ट्रान् हन्तुम् न अर्हाः। माधव, स्वजनम् हत्वा हि कथम् सुखिनः स्याम।
इसलिए बान्धवों सहित धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारना हमारे लिए उचित नहीं है। हे माधव, अपने ही लोगों को मारकर हम कैसे सुखी होंगे?
1.38यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥38॥
yady apy ete na paśyanti lobhopahatacetasaḥ |
kulakṣayakṛtaṃ doṣaṃ mitradrohe ca pātakam
- यदि
- यदि
- अपि
- भी
- एते
- ये लोग
- न
- नहीं
- पश्यन्ति
- देखते
- लोभोपहतचेतसः
- लोभ से भ्रष्ट चित्त वाले
- कुलक्षयकृतम्
- कुल के नाश से होने वाले
- दोषम्
- दोष को
- मित्रद्रोहे
- मित्रों से द्रोह में
- च
- और
- पातकम्
- पाप को
अन्वय: यदि अपि लोभोपहतचेतसः एते कुलक्षयकृतम् दोषम् मित्रद्रोहे च पातकम् न पश्यन्ति।
लोभ से भ्रष्ट चित्त वाले ये लोग कुल के नाश से होने वाले दोष को और मित्रों से द्रोह में होने वाले पाप को भले ही नहीं देखते।
1.39कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥39॥
kathaṃ na jñeyam asmābhiḥ pāpād asmān nivartitum |
kulakṣayakṛtaṃ doṣaṃ prapaśyadbhir janārdana
- कथम्
- क्यों
- न
- नहीं
- ज्ञेयम्
- जानना चाहिए
- अस्माभिः
- हमें
- पापात्
- पाप से
- अस्मात्
- इस
- निवर्तितुम्
- बचने के लिए
- कुलक्षयकृतम्
- कुल के नाश से होने वाले
- दोषम्
- दोष को
- प्रपश्यद्भिः
- भली प्रकार देखने वाले
- जनार्दन
- हे जनार्दन
अन्वय: जनार्दन, कुलक्षयकृतम् दोषम् प्रपश्यद्भिः अस्माभिः अस्मात् पापात् निवर्तितुम् कथम् न ज्ञेयम्।
हे जनार्दन, कुल के नाश से होने वाले दोष को भली प्रकार देखने वाले हम लोग इस पाप से बचने का उपाय क्यों न जानें?
1.40कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥40॥
kulakṣaye praṇaśyanti kuladharmāḥ sanātanāḥ |
dharme naṣṭe kulaṃ kṛtsnam adharmo ’bhibhavaty uta
- कुलक्षये
- कुल के नाश होने पर
- प्रणश्यन्ति
- नष्ट हो जाते हैं
- कुलधर्माः
- कुल के धर्म
- सनातनाः
- सनातन
- धर्मे
- धर्म
- नष्टे
- नष्ट होने पर
- कुलम्
- कुल को
- कृत्स्नम्
- सम्पूर्ण
- अधर्मः
- अधर्म
- अभिभवति
- दबा लेता है
- उत
- भी
अन्वय: कुलक्षये सनातनाः कुलधर्माः प्रणश्यन्ति। धर्मे नष्टे कृत्स्नम् कुलम् उत अधर्मः अभिभवति।
कुल के नाश से सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं। धर्म नष्ट होने पर सम्पूर्ण कुल को अधर्म दबा लेता है।
1.41अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ॥41॥
adharmābhibhavāt kṛṣṇa praduṣyanti kulastriyaḥ |
strīṣu duṣṭāsu vārṣṇeya jāyate varṇasaṃkaraḥ
- अधर्माभिभवात्
- अधर्म के बढ़ने से
- कृष्ण
- हे कृष्ण
- प्रदुष्यन्ति
- दूषित हो जाती हैं
- कुलस्त्रियः
- कुल की स्त्रियाँ
- स्त्रीषु
- स्त्रियों के
- दुष्टासु
- दूषित होने पर
- वार्ष्णेय
- हे वृष्णिवंशी
- जायते
- उत्पन्न होता है
- वर्णसंकरः
- वर्णसंकर
अन्वय: कृष्ण, अधर्माभिभवात् कुलस्त्रियः प्रदुष्यन्ति। वार्ष्णेय, स्त्रीषु दुष्टासु वर्णसंकरः जायते।
हे कृष्ण, अधर्म के बढ़ने से कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं। हे वृष्णिवंशी, स्त्रियों के दूषित होने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है।
1.42संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च
संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥42॥
saṃkaro narakāyaiva kulaghnānāṃ kulasya ca |
patanti pitaro hy eṣāṃ luptapiṇḍodakakriyāḥ
- संकरः
- वर्णसंकर
- नरकाय
- नरक में ले जाने वाला
- एव
- ही
- कुलघ्नानाम्
- कुल का नाश करने वालों को
- कुलस्य
- कुल को
- च
- और
- पतन्ति
- गिर जाते हैं
- पितरः
- पितर
- हि
- क्योंकि
- एषाम्
- इनके
- लुप्तपिण्डोदकक्रियाः
- पिण्ड जल क्रिया से वंचित
अन्वय: संकरः कुलघ्नानाम् कुलस्य च नरकाय एव। एषाम् पितरः हि लुप्तपिण्डोदकक्रियाः पतन्ति।
वर्णसंकर कुल का नाश करने वालों को और कुल को नरक में ले जाने वाला ही होता है। पिण्ड और जल की क्रिया से वंचित इनके पितर भी गिर जाते हैं।
1.43दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः ।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥43॥
doṣair etaiḥ kulaghnānāṃ varṇasaṃkarakārakaiḥ |
utsādyante jātidharmāḥ kuladharmāś ca śāśvatāḥ
- दोषैः
- दोषों से
- एतैः
- इन
- कुलघ्नानाम्
- कुल का नाश करने वालों के
- वर्णसंकरकारकैः
- वर्णसंकर उत्पन्न करने वाले
- उत्साद्यन्ते
- नष्ट हो जाते हैं
- जातिधर्माः
- जाति के धर्म
- कुलधर्माः
- कुल के धर्म
- च
- और
- शाश्वताः
- सदा से चले आए
अन्वय: कुलघ्नानाम् एतैः वर्णसंकरकारकैः दोषैः शाश्वताः जातिधर्माः कुलधर्माः च उत्साद्यन्ते।
कुल का नाश करने वालों के इन वर्णसंकर उत्पन्न करने वाले दोषों से सदा से चले आए जातिधर्म और कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं।
1.44उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥44॥
utsannakuladharmāṇāṃ manuṣyāṇāṃ janārdana |
narake niyataṃ vāso bhavatīty anuśuśruma
- उत्सन्नकुलधर्माणाम्
- जिनके कुलधर्म नष्ट हो गए
- मनुष्याणाम्
- मनुष्यों का
- जनार्दन
- हे जनार्दन
- नरके
- नरक में
- नियतम्
- निश्चित
- वासः
- निवास
- भवति
- होता है
- इति
- ऐसा
- अनुशुश्रुम
- हमने सुना है
अन्वय: जनार्दन, उत्सन्नकुलधर्माणाम् मनुष्याणाम् नरके नियतम् वासः भवति इति अनुशुश्रुम।
हे जनार्दन, जिनके कुलधर्म नष्ट हो गए हैं, ऐसे मनुष्यों का नरक में निश्चित निवास होता है, ऐसा हमने सुना है।
1.45अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥45॥
aho bata mahat pāpaṃ kartuṃ vyavasitā vayam |
yad rājyasukhalobhena hantuṃ svajanam udyatāḥ
- अहो
- अहो
- बत
- खेद है
- महत्
- बड़ा
- पापम्
- पाप
- कर्तुम्
- करने का
- व्यवसिताः
- निश्चय कर लिया
- वयम्
- हमने
- यत्
- जो
- राज्यसुखलोभेन
- राज्य और सुख के लोभ से
- हन्तुम्
- मारने के लिए
- स्वजनम्
- अपने ही लोगों को
- उद्यताः
- तैयार हो गए
अन्वय: अहो बत, वयम् महत् पापम् कर्तुम् व्यवसिताः, यत् राज्यसुखलोभेन स्वजनम् हन्तुम् उद्यताः।
अहो, बड़े खेद की बात है कि हमने बड़ा पाप करने का निश्चय कर लिया है। राज्य और सुख के लोभ से हम अपने ही लोगों को मारने के लिए तैयार हो गए हैं।
1.46यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥46॥
yadi mām apratīkāram aśastraṃ śastrapāṇayaḥ |
dhārtarāṣṭrā raṇe hanyus tan me kṣemataraṃ bhavet
- यदि
- यदि
- माम्
- मुझे
- अप्रतीकारम्
- प्रतिकार न करते हुए
- अशस्त्रम्
- शस्त्रहीन
- शस्त्रपाणयः
- हाथ में शस्त्र लिए हुए
- धार्तराष्ट्राः
- धृतराष्ट्र के पुत्र
- रणे
- युद्ध में
- हन्युः
- मार डालें
- तत्
- वह
- मे
- मेरे लिए
- क्षेमतरम्
- अधिक कल्याणकारी
- भवेत्
- होगा
अन्वय: यदि शस्त्रपाणयः धार्तराष्ट्राः अप्रतीकारम् अशस्त्रम् माम् रणे हन्युः, तत् मे क्षेमतरम् भवेत्।
यदि हाथ में शस्त्र लिए धृतराष्ट्र के पुत्र मुझ शस्त्रहीन और प्रतिकार न करने वाले को युद्ध में मार भी डालें, तो वह मेरे लिए अधिक कल्याणकारी होगा।
1.47एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्
एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥47॥
evam uktvārjunaḥ saṃkhye rathopastha upāviśat |
visṛjya saśaraṃ cāpaṃ śokasaṃvignamānasaḥ
- एवम्
- इस प्रकार
- उक्त्वा
- कहकर
- अर्जुनः
- अर्जुन
- संख्ये
- युद्धभूमि में
- रथोपस्थे
- रथ के पिछले भाग में
- उपाविशत्
- बैठ गए
- विसृज्य
- त्यागकर
- सशरम्
- बाण सहित
- चापम्
- धनुष को
- शोकसंविग्नमानसः
- शोक से व्याकुल मन वाले
अन्वय: शोकसंविग्नमानसः अर्जुनः संख्ये एवम् उक्त्वा सशरम् चापम् विसृज्य रथोपस्थे उपाविशत्।
युद्धभूमि में इस प्रकार कहकर शोक से व्याकुल मन वाले अर्जुन बाण सहित धनुष को त्यागकर रथ के पिछले भाग में बैठ गए।