राग तिलंग
शाम का राग, सूफ़ी-संगीत-परम्परा से जुड़ा।
तिलंग शाम का राग है। मुस्लिम-संगीत-परम्परा से इसका विशेष नाता रहा है, ग़ज़ल और क़व्वाली के स्वरों से इसका रिश्ता है। नाम का अरबी या फ़ारसी से सम्बन्ध हो सकता है।

ग्रंथ में तिलंग की कुछ रचनाएँ हैं जिनकी भाषा-शैली में फ़ारसी-अरबी शब्दों का असर है, विशेष रूप से कबीर और फ़रीद की कुछ रचनाओं में।
“यक अरज गुफतम पेसि तो दर कून हरि निगहदार ।” तिलंग M1 (Persian-influenced)