लुल्ला परिवारLulla Family
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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

राग तिलंग

राग · M1-M5

राग तिलंग

शाम का राग, सूफ़ी-संगीत-परम्परा से जुड़ा।

तिलंग शाम का राग है। मुस्लिम-संगीत-परम्परा से इसका विशेष नाता रहा है, ग़ज़ल और क़व्वाली के स्वरों से इसका रिश्ता है। नाम का अरबी या फ़ारसी से सम्बन्ध हो सकता है।

एक आँगन में खुलता मेहराबदार द्वार: राग तिलंग

ग्रंथ में तिलंग की कुछ रचनाएँ हैं जिनकी भाषा-शैली में फ़ारसी-अरबी शब्दों का असर है, विशेष रूप से कबीर और फ़रीद की कुछ रचनाओं में।

"यक अरज गुफतम पेसि तो दर गोस कुन करतार ॥" तिलंग M1 (फ़ारसी रंग)
इस राग के सब अंग

इस राग के शबद

हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।

महला 1 (6)
  1. यक अरज गुफतम पेसि तो दर गोस कुन करतार ॥अंग 721
  2. भउ तेरा भांग खलड़ी मेरा चीतु ॥अंग 721
  3. इहु तनु माइआ पाहिआ पिआरे लीतड़ा लबि रंगाए ॥अंग 721
  4. इआनड़ीए मानड़ा काइ करेहि ॥अंग 722
  5. पाप की जंञ लै काबलहु धाइआ जोरी मंगै दानु वे लालो ॥अंग 722
  6. जिनि कीआ तिनि देखिआ किआ कहीऐ रे भाई ॥अंग 724
महला 4 (3)
  1. सभि आए हुकमि खसमाहु हुकमि सभ वरतनी ॥अंग 723
  2. नित निहफल करम कमाइ बफावै दुरमतीआ ॥अंग 723
  3. हरि कीआ कथा कहाणीआ गुरि मीति सुणाईआ ॥अंग 725
महला 5 (5)
  1. खाक नूर करदं आलम दुनीआइ ॥अंग 723
  2. तुधु बिनु दूजा नाही कोइ ॥अंग 723
  3. मिहरवानु साहिबु मिहरवानु ॥अंग 724
  4. करते कुदरती मुसताकु ॥अंग 724
  5. मीरां दानां दिल सोच ॥अंग 724
महला 9 (3)
  1. चेतना है तउ चेत लै निसि दिनि मै प्रानी ॥अंग 726
  2. जाग लेहु रे मना जाग लेहु कहा गाफल सोइआ ॥अंग 726
  3. हरि जसु रे मना गाइ लै जो संगी है तेरो ॥अंग 727
भगत कबीर जी (1)
  1. बेद कतेब इफतरा भाई दिल का फिकरु न जाइ ॥अंग 727
भगत नामदेव जी (2)
  1. मै अंधुले की टेक तेरा नामु खुंदकारा ॥अंग 727
  2. हले यारां हले यारां खुसिखबरी ॥अंग 727

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