राग कान्हड़ा
रात का राग, कृष्ण-भक्ति से जुड़ा।
कान्हड़ा रात का राग है। नाम "कान्ह" (कृष्ण) से उत्पन्न, और कृष्ण-भक्ति की परम्परा से इसका विशेष नाता है। दरबारी कान्हड़ा सबसे प्रसिद्ध स्वरूप है।
ग्रंथ में कान्हड़ा की रचनाएँ कम हैं, अंग बारह-सौ-चौरानवें के क़रीब। मगर जहाँ हैं, वहाँ एक कृष्ण-स्मरण की धुन सुनाई देती है।
"गाईऐ गुण गोपाल क्रिपा निधि ॥" कान्हड़ा M5
इस राग के सब अंग
इस राग के शबद
हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।
महला 4 (61)
- मेरा मनु साध जनां मिलि हरिआ ॥अंग 1294
- मेरा मनु संत जना पग रेन ॥अंग 1294
- जपि मन राम नाम परगास ॥अंग 1295
- मेरै मनि राम नामु जपिओ गुर वाक ॥अंग 1295
- मेरे मन हरि हरि राम नामु जपि चीति ॥अंग 1295
- जपि मन राम नाम जगंनाथ ॥अंग 1296
- मन जापहु राम गुपाल ॥अंग 1296
- हरि गुन गावहु जगदीस ॥अंग 1296
- भजु रामो मनि राम ॥अंग 1297
- सतिगुर चाटउ पग चाट ॥अंग 1297
- जपि मन गोबिद माधो ॥अंग 1297
- हरि जसु गावहु भगवान ॥अंग 1297
- जपि मन राम नामु सुखु पावैगो ॥अंग 1308
- जपि मन हरि हरि नामु तरावैगो ॥अंग 1308
- मनु गुरमति रसि गुन गावैगो ॥अंग 1309
- मनु हरि रंगि राता गावैगो ॥अंग 1310
- मन गुरमति चाल चलावैगो ॥अंग 1310
- मनु सतिगुर सरनि धिआवैगो ॥अंग 1311
- राम नामु निधानु हरि गुरमति रखु उर धारि ॥अंग 1312
- गोविंदु गोविदु गोविदु हरि गोविदु गुणी निधानु ॥अंग 1312
- तूं आपे ही सिध साधिको तू आपे ही जुग जोगीआ ॥अंग 1313
- हरि हरि हरि हरि नामु है गुरमुखि पावै कोइ ॥अंग 1313
- हरि आपे आपि दइआलु हरि आपे करे सु होइ ॥अंग 1313
- सभ जोति तेरी जगजीवना तू घटि घटि हरि रंग रंगना ॥अंग 1313
- हरि हरि नामु धिआइ मन हरि दरगह पावहि मानु ॥अंग 1313
- हरि हरि नामु पवितु है नामु जपत दुखु जाइ ॥अंग 1313
- हरि हरि अंम्रितु नाम रसु हरि अंम्रितु हरि उर धारि ॥अंग 1314
- हरि कीरति उतमु नामु है विचि कलिजुग करणी सारु ॥अंग 1314
- राम नामु वखरु है ऊतमु हरि नाइकु पुरखु हमारा ॥अंग 1314
- हमरी जिहबा एक प्रभ हरि के गुण अगम अथाह ॥अंग 1314
- हरि करहु क्रिपा जगजीवना गुरु सतिगुरु मेलि दइआलु ॥अंग 1314
- हरि तुम॑ वड वडे वडे वड ऊचे सभ ऊपरि वडे वडौना ॥अंग 1315
- हमरे हरि जगजीवना हरि जपिओ हरि गुर मंत ॥अंग 1315
- हरि प्रभु सजणु नामु हरि मै मनि तनि नामु सरीरि ॥अंग 1315
- सुतिआ हरि प्रभु चेति मनि हरि सहजि समाधि समाइ ॥अंग 1315
- हरि इकसु सेती पिरहड़ी हरि इको मेरै चिति ॥अंग 1315
- पंचे सबद वजे मति गुरमति वडभागी अनहदु वजिआ ॥अंग 1315
- भगति सरोवरु उछलै सुभर भरे वहंनि ॥अंग 1316
- हरि हरि नाम असंख हरि हरि के गुन कथनु न जाहि ॥अंग 1316
- हरि अगमु अगोचरु अगमु हरि किउ करि हरि दरसनु पिखा ॥अंग 1316
- हरि हरि नामु अंम्रितु है हरि जपीऐ सतिगुर भाइ ॥अंग 1316
- हरि हरि नामु निधानु है गुरमुखि पाइआ जाइ ॥अंग 1316
- हउ वारिआ तिन कउ सदा सदा जिना सतिगुरु मेरा पिआरा देखिआ ॥अंग 1316
- राम नामु रमु रवि रहे रमु रामो रामु रमीति ॥अंग 1316
- हरि प्रभु सजणु लोड़ि लहु भागि वसै वडभागि ॥अंग 1317
- धनु धनु सुहावी सफल घड़ी जितु हरि सेवा मनि भाणी ॥अंग 1317
- हरि प्रभ रते लोइणा गिआन अंजनु गुरु देइ ॥अंग 1317
- गुरमुखि अंतरि सांति है मनि तनि नामि समाइ ॥अंग 1317
- तुधु आपे जगतु उपाइ कै तुधु आपे वसगति कीता ॥अंग 1317
- मन अंतरि हउमै रोगु है भ्रमि भूले मनमुख दुरजना ॥अंग 1317
- मनु तनु तामि सगारवा जां देखा हरि नैणे ॥अंग 1317
- जगंनाथ जगदीसर करते अपरंपर पुरखु अतोलु ॥अंग 1317
- हरि जन हरि हरि चउदिआ सरु संधिआ गावार ॥अंग 1317
- अखी प्रेमि कसाईआ हरि हरि नामु पिखंनि॑ ॥अंग 1318
- जलि थलि महीअलि पूरनो अपरंपरु सोई ॥अंग 1318
- गुरमुखि मिले सि सजणा हरि प्रभ पाइआ रंगु ॥अंग 1318
- हरि तूहै दाता सभस दा सभि जीअ तुम॑ारे ॥अंग 1318
- इछा मन की पूरीऐ जपीऐ सुख सागरु ॥अंग 1318
- हउ ढूंढेंदी सजणा सजणु मैडै नालि ॥अंग 1318
- नानक प्रीति लाई तिनि सचै तिसु बिनु रहणु न जाई ॥अंग 1318
- कोई गावै को सुणै को उचरि सुनावै ॥अंग 1318
महला 5 (51)
- गाईऐ गुण गोपाल क्रिपा निधि ॥अंग 1298
- आराधउ तुझहि सुआमी अपने ॥अंग 1298
- कीरति प्रभ की गाउ मेरी रसनां ॥अंग 1298
- ऐसी मांगु गोबिद ते ॥अंग 1298
- भगति भगतन हूं बनि आई ॥अंग 1299
- तेरो जनु हरि जसु सुनत उमाहिओ ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1299
- संतन पहि आपि उधारन आइओ ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1299
- बिसरि गई सभ ताति पराई ॥अंग 1299
- मानु महतु तुम॑ारै ऊपरि तुम॑री ओट तुम॑ारी सरना ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1299
- साध सरनि चरन चितु लाइआ ॥अंग 1300
- हरि के चरन हिरदै गाइ ॥अंग 1300
- कथीऐ संतसंगि प्रभ गिआनु ॥अंग 1300
- साधसंगति निधि हरि को नाम ॥अंग 1300
- साधू हरि हरे गुन गाइ ॥अंग 1300
- पेखि पेखि बिगसाउ साजन प्रभु आपना इकांत ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1300
- साजना संत आउ मेरै ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1301
- चरन सरन गोपाल तेरी ॥अंग 1301
- धनि उह प्रीति चरन संगि लागी ॥अंग 1301
- कुचिल कठोर कपट कामी ॥अंग 1301
- नाराइन नरपति नमसकारै ॥अंग 1301
- न जानी संतन प्रभ बिनु आन ॥अंग 1302
- कहन कहावन कउ कई केतै ॥अंग 1302
- हीए को प्रीतमु बिसरि न जाइ ॥अंग 1302
- आनद रंग बिनोद हमारै ॥अंग 1302
- साजन मीत सुआमी नेरो ॥अंग 1302
- बिखै दलु संतनि तुम॑रै गाहिओ ॥अंग 1303
- बूडत प्रानी हरि जपि धीरै ॥अंग 1303
- सिमरत नामु मनहि सुखु पाईऐ ॥अंग 1303
- मेरे मन प्रीति चरन प्रभ परसन ॥अंग 1303
- कुहकत कपट खपट खल गरजत मरजत मीचु अनिक बरीआ ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1303
- जीअ प्रान मान दाता ॥अंग 1303
- अविलोकउ राम को मुखारबिंद ॥अंग 1304
- प्रभ पूजहो नामु अराधि ॥अंग 1304
- जगत उधारन नाम प्रिअ तेरै ॥अंग 1304
- ऐसी कउन बिधे दरसन परसना ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1305
- रंगा रंग रंगन के रंगा ॥अंग 1305
- तिख बूझि गई गई मिलि साध जना ॥अंग 1305
- तिआगीऐ गुमानु मानु पेखता दइआल लाल हां हां मन चरन रेन ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1305
- प्रभ कहन मलन दहन लहन गुर मिले आन नही उपाउ ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1305
- पतित पावनु भगति बछलु भै हरन तारन तरन ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1306
- चरन सरन दइआल ठाकुर आन नाही जाइ ॥अंग 1306
- वारि वारउ अनिक डारउ ॥अंग 1306
- अहं तोरो मुखु जोरो ॥अंग 1306
- तां ते जापि मना हरि जापि ॥अंग 1306
- मान मोही पंच दोही उरझि निकटि बसिओ ताकी सरनि साधूआ दूत संगु निवारि ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1307
- सहज सुभाए आपन आए ॥अंग 1307
- गोबिंद ठाकुर मिलन दुराइंी ॥अंग 1307
- माई सिमरत राम राम राम ॥अंग 1307
- जन को प्रभु संगे असनेहु ॥अंग 1307
- करत करत चरच चरच चरचरी ॥अंग 1308
- से उधरे जिन राम धिआए ॥अंग 1312
भगत नामदेव जी (1)
- ऐसो राम राइ अंतरजामी ॥अंग 1318
अन्य भगत (1)
- छका 1 ॥अंग 1311