मः 4 ॥ अखी प्रेमि कसाईआ हरि हरि नामु पिखंनि॑ ॥ जे करि दूजा देखदे जन नानक कढि दिचंनि॑ ॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 4॥ (हे भाई ! वही लोग हर जगह) परमात्मा का नाम देखते हैं। जिनकी आँखों को प्रेम ने कसक डाली होती है। पर। हे नानक ! जो मनुष्य (प्रभू को छोड़ के) और-और को देखते हैं वे प्रभू की हजूरी में से निकाल दिए जाते हैं। 2।
पउड़ी ॥ जलि थलि महीअलि पूरनो अपरंपरु सोई ॥ जीअ जंत प्रतिपालदा जो करे सु होई ॥ मात पिता सुत भ्रात मीत तिसु बिनु नही कोई ॥ घटि घटि अंतरि रवि रहिआ जपिअहु जन कोई ॥ सगल जपहु गोपाल गुन परगटु सभ लोई ॥13॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे भाई !) वह बेअंत (परमात्मा) ही जल में धरती में आकाश में (हर जगह) व्यापक है। वह सारे जीवों की पालना करता है। जो कुछ वह करता है वही होता है। (हे भाई ! सदा साथ निभने वाला) माता-पिता-पुत्र-भाई-मित्र उस (परमात्मा) के बिना और कोई नहीं। हे संत जनो ! कोई पक्ष भी जप के देख लो (जो भी जपता है उसको निश्चय हो जाता है कि वह परमात्मा) हरेक शरीर में (सबके) अंदर व्यापक है। हे भाई ! सारे उस गोपाल प्रभू के गुण याद करते रहो। वह प्रभू सारी सृष्टि में प्रत्यक्ष (बसता दिखाई दे रहा) है। 13।
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ हे दास नानक ! (कह- हे भाई !) जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर (प्रभू की याद में) जुड़े रहते हैं (और इस तरह जिन्होंने) परमात्मा का प्रेम हासिल कर लिया। वह अच्छे जीवन वाले बन जाते हैं। हे भाई ! आप भी प्रभू की सिफतसालाह (सदा) करता रह। परमात्मा की हजूरी में बेफिक्र हैं के जाएगा। 1।
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: महला 4॥ हे प्रभू ! आप ही सारे जीवों को दातें देने वाला है। सारे जीव आपके ही (पैदा किए हुए) हैं। सारे जीव (दुनिया के पदार्थों के लिए) आपको ही याद करते हैं। और। हे प्यारे ! आप (सबको) दान देता है। (हे भाई !) हरी दाते ने हरी दातार ने (जब अपनी मेहर का) हाथ निकाला तब जगत में (गुरू के उपदेश की) वर्षा हुई। (जो मनुष्य गुरू की शरण आता है) प्रेम- (रूप) खेती करने से (उसके अंदर परमात्मा का नाम-) फसल उग जाती है। (वह हर वक्त) परमात्मा का नाम (हृदय में) बसाता है। हे प्रभू ! (आपका) दास नानक (भी आपके नाम की) ख़ैर (आपसे) माँगता है। आपका नाम (दास नानक की जिंदगी का) आसरा (बना रहे)। 2।
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (सिमरन-आराधना की बरकति से) मन की (हरेक) इच्छा पूरी हो जाती है (मन की वासनाएं समाप्त हो जाती हैं)। (हे भाई !) सुखों के समुंद्र परमात्मा का नाम जपना चाहिए गुरू के शबद से रत्नों की खान प्रभू की आराधना करनी चाहिए। प्रभू के चरणों की आराधना करनी चाहिए। हे भाई ! गुरू की संगति में मिल के (नाम-जपने से संसार-समुंद्र से) पार-उतारा हो जाता है। यमराज का (लेखे वाला) कागज़ फट जाता है। प्यार के श्रोत परमात्मा का नाम जप के कीमती मनुष्य-जनम की बाज़ी जीत ली जाती है। हे भाई ! सभी गुरू की शरण पड़े रहो (गुरू की शरण पड़ कर नाम जपने से मन में) दुखों का निशान ही मिट जाता है। 14।
सलोक मः 4 ॥ हउ ढूंढेंदी सजणा सजणु मैडै नालि ॥ जन नानक अलखु न लखीऐ गुरमुखि देहि दिखालि ॥1॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ (हे सहेलिए !) मैं सज्जन (प्रभू) को (बाहर) ढूँढ रही थी (पर। गुरू के माध्यम से समझ आई है कि वह) सज्जन (प्रभू तो) मेरे साथ ही है (मेरे अंदर ही बसता है)। हे दास नानक ! (कह- हे सहेलिए !) वह प्रभू अलख है उसका सही स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। गुरू के सन्मुख रहने वाले (संत जन उसके) दर्शन करवा देते हैं। 1।
मः 4 ॥ नानक प्रीति लाई तिनि सचै तिसु बिनु रहणु न जाई ॥ सतिगुरु मिलै त पूरा पाईऐ हरि रसि रसन रसाई ॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 4॥ हे नानक ! (कह- हे भाई ! जिस मनुष्य के अंदर) उस सदा कायम रहने वाले परमात्मा ने (अपना) प्यार (स्वयं ही) पैदा किया है (वह मनुष्य) उस (की याद) के बिना रह नहीं सकता। (जिस गुरू की) जीभ परमात्मा के नाम-रस में सदा रसी रहती है (जब वह) गुरू मिलता है तब वह पूरन प्रभू भी मिल जाता है। 2।
पउड़ी ॥ कोई गावै को सुणै को उचरि सुनावै ॥ जनम जनम की मलु उतरै मन चिंदिआ पावै ॥ आवणु जाणा मेटीऐ हरि के गुण गावै ॥ आपि तरहि संगी तराहि सभ कुटंबु तरावै ॥ जनु नानकु तिसु बलिहारणै जो मेरे हरि प्रभ भावै ॥15॥1॥ सुधु ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे भाई ! जो कोई मनुष्य (परमात्मा के सिफत-सालाह के गीत) गाता है अथवा सुनता है अथवा बोल के (औरों को) सुनाता है। उसके अनेकों जन्मों की (विकारों की) मैल उतर जाती है वह मन-इच्छित फल पा लेता है। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा के गुण गाता है उसका पैदा होने मरने का चक्कर समाप्त हो जाता है। (हे भाई ! परमात्मा के सिफतसालाह के गीत गाने वाले मनुष्य) स्वयं (संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाते हैं। साथियों को पार लंघा लेते हैं। (हे भाई ! सिफत-सालाह करने वाला मनुष्य अपने) सारे परिवार को पार लंघा लेता है। हे भाई ! दास नानक उस मनुष्य से सदा सदके जाता है जो (सिफत-सालाह करने की बरकति से) प्यारे प्रभू को प्यारा लगता है। 15। 1। सुधु।
रागु कानड़ा बाणी नामदेव जीउ की ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ ऐसो राम राइ अंतरजामी ॥ जैसे दरपन माहि बदन परवानी ॥1॥ रहाउ ॥ बसै घटा घट लीप न छीपै ॥ बंधन मुकता जातु न दीसै ॥1॥ पानी माहि देखु मुखु जैसा ॥ नामे को सुआमी बीठलु ऐसा ॥2॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: रागु कानड़ा बाणी नामदेव जीउ की सतिगुर प्रसादि ॥ शुद्ध स्वरूप परमात्मा ऐसा है कि वह हरेक जीव के अंदर बैठा हुआ है (पर। हरेक के अंदर बसता भी ऐसे) प्रत्यक्ष (निर्लिप रहता है) जैसे शीशे में (शीशा देखने वाले का) मुँह। 1। रहाउ। शुद्ध स्वरूप परमात्मा ऐसा है कि वह हर एक जीव के अंदर है (पर) उस पर माया का कोई असर नहीं होता। वह माया के बंधनों में फसा हुआ नहीं नजर आता। 1। आप जैसे पानी में (अपना) मुँह देखते हैं। (मुँह पानी में टिका हुआ दिखाई देता है पर उस पर पानी का कोई असर नहीं होता)। इसी तरह है नामे का मालिक (जिसको नामा) बीठल (कहता) है। 2। 1।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “महला 4॥ (हे भाई ! वही लोग हर जगह) परमात्मा का नाम देखते हैं।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।