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अंग 1317

अंग
1317
राग कान्हड़ा
राग: कान्हड़ा · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
हरि सुआमी हरि प्रभु तिन मिले जिन लिखिआ धुरि हरि प्रीति ॥
जन नानक नामु धिआइआ गुर बचनि जपिओ मनि चीति ॥1॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: (पर) स्वामी प्रभू उनको ही मिलता है जिनके माथे पर (पिछले किए कर्मों के अनुसार) धुर से ही परमात्मा के साथ प्यार का लेख लिखा होता है। हे दास नानक ! जिन मनुष्यों ने गुरू के वचनों से (गुरू के बताए हुए रास्ते पर चल के) मन में चित्त में नाम जपा है (दरअसल उन्होंने ही) नाम सिमरा है। 1।
मः 4 ॥
हरि प्रभु सजणु लोड़ि लहु भागि वसै वडभागि ॥
गुरि पूरै देखालिआ नानक हरि लिव लागि ॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ (हे भाई !। गुरू की शरण पड़ के) मित्र प्रभू को ढूँढ लो। (वह मित्र प्रभू) किस्मत से बड़ी किस्मत से (हृदय में आ) बसता है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) जिस मनुष्य को पूरे गुरू ने (उसके) दर्शन करवा दिए। उसकी सुरति (हर वक्त) हरी-प्रभू में लगी रहती है। 2।
पउड़ी ॥
धनु धनु सुहावी सफल घड़ी जितु हरि सेवा मनि भाणी ॥
हरि कथा सुणावहु मेरे गुरसिखहु मेरे हरि प्रभ अकथ कहाणी ॥
किउ पाईऐ किउ देखीऐ मेरा हरि प्रभु सुघड़ु सुजाणी ॥
हरि मेलि दिखाए आपि हरि गुर बचनी नामि समाणी ॥
तिन विटहु नानकु वारिआ जो जपदे हरि निरबाणी ॥10॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे भाई ! मनुष्य के लिए वह) घड़ी भाग्यशाली होती है मनुष्य जीवन का मनोरथ पूरा करने वाली होती है। जिस में (मनुष्य को अपने) मन में परमात्मा की सेवा-भक्ति अच्छी लगती है। हे मेरे गुरू के सिखो ! आप मुझे भी अकथ प्रभू की सिफत-सालाह की बातें सुनाओ (और बताओ कि) वह सुंदर समझदार प्रभू कैसे मिल सकता है कैसे उसका दर्शन हो सकता है। हे भाई ! गुरू के वचनों पर चल के जिन मनुष्यों की सुरति परमात्मा के नाम में लीन होती है उनको परमात्मा स्वयं (अपने चरणों में) जोड़ के अपना दर्शन करवाता है। हे भाई ! नानक उनसे सदके जाता है जो निर्लिप परमात्मा (का नाम हर वक्त) जपते हैं। 10।
सलोक मः 4 ॥
हरि प्रभ रते लोइणा गिआन अंजनु गुरु देइ ॥
मै प्रभु सजणु पाइआ जन नानक सहजि मिलेइ ॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ हे नानक ! (कह- हे भाई ! जिन मनुष्यों को) गुरू आत्मिक जीवन की सूझ का सुरमा देता है। उनकी आँखें प्रभू के प्यार में रंगी जाती हैं। उनको प्यारा प्रभू मिल जाता है। वे मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिके रहते हैं।
मः 4 ॥
गुरमुखि अंतरि सांति है मनि तनि नामि समाइ ॥
नामु चितवै नामो पड़ै नामि रहै लिव लाइ ॥
नामु पदारथु पाईऐ चिंता गई बिलाइ ॥
सतिगुरि मिलिऐ नामु ऊपजै त्रिसना भुख सभ जाइ ॥
नानक नामे रतिआ नामो पलै पाइ ॥2॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के बताए हुए राह पर चलता है उसके अंदर शांति बनी रहती है वह मन से तन से (हर वक्त परमात्मा के) नाम में लीन रहता है। वह (सदा) नाम चेते करता है वह सदा नाम ही पढ़ता है। वह हरी-नाम में सुरति जोड़े रखता है। (हे भाई ! अगर गुरू मिल जाए तो परमात्मा का) कीमती नाम हासिल हो जाता है (जिसको हासिल होता है उसके अंदर से) चिंता दूर हो जाती है। अगर गुरू मिल जाए तो (मनुष्य के अंदर) नाम (का बूटा) उग पड़ता है (जिसकी बरकति से माया की) प्यास (माया की) भूख सारी दूर हो जाती है। हे नानक ! अगर परमात्मा के नाम में रंगे रहें तो ही नाम मिलता है। 2।
पउड़ी ॥
तुधु आपे जगतु उपाइ कै तुधु आपे वसगति कीता ॥
इकि मनमुख करि हाराइअनु इकना मेलि गुरू तिना जीता ॥
हरि ऊतमु हरि प्रभ नामु है गुर बचनि सभागै लीता ॥
दुखु दालदु सभो लहि गइआ जां नाउ गुरू हरि दीता ॥
सभि सेवहु मोहनो मनमोहनो जगमोहनो जिनि जगतु उपाइ सभो वसि कीता ॥11॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू ! तूने स्वयं ही जगत पैदा करके (इसको) स्वयं ही तूने (अपने) वश में रखा हुआ है। हे भाई ! कई जीवों को मन का मुरीद बना के उस (परमात्मा) ने (जीवन-खेल में) हार दे दी है। पर कईयों को गुरू मिला के (उसने ऐसा बना दिया है कि) उन्होंने (जीवन की बाज़ी) जीत ली है। हे भाई ! परमात्मा का नाम (मनुष्य के जीवन को) ऊँचा करने वाला है। पर किसी भाग्यशाली ने (ही) गुरू के उपदेश से (यह नाम) सिमरा है। जब गुरू ने परमात्मा का नाम (किसी भाग्यशाली को) दिया। तो उसका सारा दुख सारा दरिद्र दूर हो गया। हे भाई ! आप सभी उस मन-मोहन प्रभू का जग-मोहन प्रभू का नाम सिमरा करो। जिसने जगत पैदा करके यह सारा अपने वश में रखा हुआ है। 11।
सलोक मः 4 ॥
मन अंतरि हउमै रोगु है भ्रमि भूले मनमुख दुरजना ॥
नानक रोगु वञाइ मिलि सतिगुर साधू सजना ॥1॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले दुराचारी मनुष्य भटकना के कारण गलत राह पर पड़े रहते हैं (क्योंकि) उनके मन में अहंकार (का) रोग (टिका रहता) है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) साधू-सज्जन गुरू को मिल के (ही यह) रोग दूर (दूर किया जा सकता है)। 1।
मः 4 ॥
मनु तनु तामि सगारवा जां देखा हरि नैणे ॥
नानक सो प्रभु मै मिलै हउ जीवा सदु सुणे ॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 4। हे भाई ! (मेरा यह) मन और शरीर तब ही आदर-योग हो सकता है। जब मैं (अपनी) आँखों से परमात्मा के दर्शन कर सकूँ। हे नानक ! (कह- हे भाई ! जब) वह प्रभू मुझे मिलता है। तब मैं उसकी सिफत-सालाह की बात सुन के आत्मिक जीवन हासिल करता हूँ। 2।
पउड़ी ॥
जगंनाथ जगदीसर करते अपरंपर पुरखु अतोलु ॥
हरि नामु धिआवहु मेरे गुरसिखहु हरि ऊतमु हरि नामु अमोलु ॥
जिन धिआइआ हिरदै दिनसु राति ते मिले नही हरि रोलु ॥
वडभागी संगति मिलै गुर सतिगुर पूरा बोलु ॥
सभि धिआवहु नर नाराइणो नाराइणो जितु चूका जम झगड़ु झगोलु ॥12॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे जगत के नाथ ! हे जगत के मालिक ! हे बेअंत करतार ! आप सर्व-व्यापक है। आपकी हस्ती का अंदाजा नहीं लग सकता। हे मेरे गुरू के सिखो ! परमात्मा का नाम सिमरा करो। परमात्मा का नाम जीवन को ऊँचा करने वाला है (पर) वह नाम किसी मूल्य से नहीं मिलता। जिन मनुष्यों ने दिन-रात (हर वक्त) अपने हृदय में हरी-नाम सिमरा। वे मनुष्य परमात्मा के साथ एक-रूप हो गए। इसमें कोई शक नहीं। (पर) बड़े भाग्यों से मनुष्य गुरू की संगति में मिलता है (और संगति में से उसको) गुरू का पूर्ण उपदेश मिलता है (जिसकी बरकति से वह हरी-नाम सिमरता है)। (सो। हे भाई ! गुरू की संगति में मिल के) सभी परमात्मा का नाम सिमरा करो जिसकी बरकति से जम का रगड़ा-झगड़ा समाप्त हो जाता है। 12।
सलोक मः 4 ॥
हरि जन हरि हरि चउदिआ सरु संधिआ गावार ॥
नानक हरि जन हरि लिव उबरे जिन संधिआ तिसु फिरि मार ॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ मूर्ख मनुष्य ही परमात्मा का नाम जपने वाले संत-जनों पर तीर चलाते हैं। पर। हे नानक ! वे संत-जन तो परमात्मा में सुरति जोड़ के बच निकलते हैं। जिस (मूर्ख) ने (तीर) चलाया होता है। उसको ही पलट के मौत आती है (भाव। संत से वैर करने वाले मनुष्य आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं)। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(पर) स्वामी प्रभू उनको ही मिलता है जिनके माथे पर (पिछले किए कर्मों के अनुसार) धुर से ही परमात्मा के साथ प्यार का लेख लिखा होता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।