रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: सारी आशा और तृष्णा बिसर गई। मन में (टिका हुआ) घर का मोह (भी) खत्म हो गया। हे भाई ! प्रसन्न हुए गुरू ने परमात्मा का नाम (हमारे मन में) पक्का कर दिया। अपने शबद से हमें (उसने) निहाल कर दिया। (गुरू की कृपा से) दास नानक ने परमात्मा का नाम-धन हासिल कर लिया है जो कभी खत्म होने वाला नहीं। 2।
पउड़ी ॥ हरि तुम॑ वड वडे वडे वड ऊचे सभ ऊपरि वडे वडौना ॥ जो धिआवहि हरि अपरंपरु हरि हरि हरि धिआइ हरे ते होना ॥ जो गावहि सुणहि तेरा जसु सुआमी तिन काटे पाप कटोना ॥ तुम जैसे हरि पुरख जाने मति गुरमति मुखि वड वड भाग वडोना ॥ सभि धिआवहु आदि सते जुगादि सते परतखि सते सदा सदा सते जनु नानकु दासु दसोना ॥5॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे हरी ! आप बड़ों से (भी) बड़ा है बहुत ऊँचा है सबसे ऊपर बड़ा है। (हे भाई !) हरी परमात्मा बेअंत है। जो मनुष्य उसका ध्यान धरते हैं। वे लोग उस हरी को सदा सिमर के उसका रूप ही हो जाते हैं। हे स्वामी ! जो मनुष्य आपकी सिफत-सालाह का गीत गाते हैं सुनते हैं। वे (अपने) करोड़ों पाप नाश कर लेते हैं। हे सर्व-व्यापक हरी ! वे मनुष्य बहुत भाग्यशाली गिने जाते हैं (सब मनुष्यों में) मुखी माने जाते हैं। सतिगुरू की मति पर चल के वे मनुष्य आपके जैसे ही जाने जाते हैं। हे भाई ! जो परमात्मा आदि से जुगादि (जुगों के आदि) से अस्तित्व वाला है; जो (अब भी) प्रत्यक्ष कायम है और सदा ही कायम रहने वाला है। आप सारे उसका सिमरन करते रहो। दास नानक उस (हरी के) दासों का दास है। 5।
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ हे भाई ! (जो) हरी (सारे) जगत की जिंदगी का आसरा (है वह) हमारे हृदय में भी बसता है; हमने गुरू के उपदेश पर चल के उसे जपा है। वह है तो अपहुँच और ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से परे (पर। गुरू की शिक्षा के अनुसार सिमरन की बरकति से) वह हरी हमें अपने आप आ मिला है। हे भाई ! वह हरी स्वयं ही हरेक शरीर में बसता है। (हर जगह) वह स्वयं ही स्वयं है और उसकी हस्ती का अंत नहीं पाया जा सकता। वह हरी स्वयं ही (सब जीवों में व्यापक हो के) सारे रस भोग रहा है। वह स्वयं ही माया का मालिक है। हे भाई ! यह सारी दुनिया उसने स्वयं पैदा की है। ये सारे जीव-जंतु उसने खुद ही पैदा किए हुए हैं। और। (सब जीवों को रिजक का) ख़ैर भी वह खुद ही डालता है। हे दया के श्रोत हरी-प्रभू (हमें भी वह नाम-) दान दे। जो (आपके) संत जन (सदा आपसे) माँगते (रहते) हैं। हे दास नानक के (मालिक) प्रभू ! (हमें) आ के मिल। (मेहर कर) हम आपकी सिफत-सालाह के गीत गाते रहें। 1।
मः 4 ॥ हरि प्रभु सजणु नामु हरि मै मनि तनि नामु सरीरि ॥ सभि आसा गुरमुखि पूरीआ जन नानक सुणि हरि धीर ॥2॥ पउड़ी ॥ हरि ऊतमु हरिआ नामु है हरि पुरखु निरंजनु मउला ॥ जो जपदे हरि हरि दिनसु राति तिन सेवे चरन नित कउला ॥ नित सारि सम॑ाले सभ जीअ जंत हरि वसै निकटि सभ जउला ॥ सो बूझै जिसु आपि बुझाइसी जिसु सतिगुरु पुरखु प्रभु सउला ॥ सभि गावहु गुण गोविंद हरे गोविंद हरे गोविंद हरे गुण गावत गुणी समउला ॥6॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 4॥ हे भाई ! हरी प्रभू (ही असल) मित्र है। हरी का नाम ही (साथ निभने वाला) मित्र है; मेरे मन में मेरे तन में मेरे दिल में (हरी का) नाम बस रहा है। हे दास नानक ! (कह- हे भाई !) गुरू की शरण पड़ के (हरी-नाम सिमरते हुए) सारी आशाऐ पूरी हो जाती है। हरी का नाम सुन के (मन में) शांति पैदा होती है। 2। पउड़ी॥ हे भाई ! परमात्मा सबमें व्यापकि है सबमें मिला हुआ है और निर्लिप (भी) है। उसका नाम श्रेष्ठ है (ऊँचा जीवन बनाने वाला है) और आत्मिक जीवन देने वाला है। जो मनुष्य दिन-रात हर वक्त परमात्मा (का नाम) जपते हैं। लक्ष्मी (भी) हर वक्त उसके चरणों की सेवा करती है (उन पर अपना प्रभाव नहीं डाल सकती)। हे भाई ! परमात्मा सब जीवों की अच्छी तरह संभाल करता है। वह (सब जीवों के) नजदीक बसता है। (फिर सबसे) अलग भी है। पर ये बात वह मनुष्य समझता है जिसको परमात्मा स्वयं समझ देता है जिस पर गुरू मेहर करता है जिस पर सर्व-व्यापक प्रभू किरपा करता है। हे भाई ! आप सारे। धरती की सार लेने वाले उस हरी के गुण सदा गाते रहो। गुण गाते-गाते उस गुणों के मालिक प्रभू में लीन हुआ जाता है। 6।
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ (हे भाई ! जागते हुए किरत-कार करते हुए सिमरन की ऐसी आदत बना कि) सोए हुए भी (अपने) मन में परमात्मा को याद कर (याद करता रहे)। (इस तरह) सदा आत्मिक अडोलता में (आत्मिक अडोलता की) समाधि में टिका रहे। हे माँ ! दास नानक के मन में भी परमात्मा को मिलने की तमन्ना है। गुरू (ही) प्रसन्न हो के मेल कराता है। 1।
मः 4 ॥ हरि इकसु सेती पिरहड़ी हरि इको मेरै चिति ॥ जन नानक इकु अधारु हरि प्रभ इकस ते गति पति ॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 4॥ हे दास नानक ! (कह- हे भाई !) सिर्फ एक परमात्मा के साथ ही मेरा सुंदर प्यार है। एक परमात्मा ही (सदा) मेरे चित्त में बसता है। एक प्रभू ही (मेरी जिंदगी का) आसरा है। एक प्रभू से ही ऊँची आत्मिक अवस्था मिलती है (और लोक-परलोक की) इज्जत हासिल होती है। 2।
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे भाई ! जिस बड़े भाग्यशाली मनुष्य की मति में गुरू का उपदेश बस जाता है उसके अंदर (आत्मिक आनंद का) एक-रस बाजा बज जाता है (उसके अंदर। मानो) पाँचों ही किस्मों के साज़ बज उठते हैं। गुरू के शबद की बरकति से (उसके अंदर) परमात्मा गरज उठता है और वह हर जगह आनंद के श्रोत परमात्मा को (बसता) देखता है। (हे भाई ! जो मनुष्य) गुरू की मति ले के परमात्मा का भजन करता है (उसको यह निश्चय आ जाता है कि सृष्टि के) आदि से जुगादि से परमात्मा की एक ही अटल हस्ती है। हे हरी ! हे दया के श्रोत प्रभू ! आप अपने दासों को (अपने नाम का) दान देता है। (और। इस तरह विकारों के मुकाबले में उनकी) लाज रखता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।