तुम॑ हरि साह वडे प्रभ सुआमी हम वणजारे रासि देन ॥
जन नानक कउ दइआ प्रभ धारहु लदि वाखरु हरि हरि लेन ॥4॥2॥
जपि मन राम नाम परगास ॥
हरि के संत मिलि प्रीति लगानी विचे गिरह उदास ॥1॥ रहाउ ॥
हम हरि हिरदै जपिओ नामु नरहरि प्रभि क्रिपा करी किरपास ॥
अनदिनु अनदु भइआ मनु बिगसिआ उदम भए मिलन की आस ॥1॥
हम हरि सुआमी प्रीति लगाई जितने सास लीए हम ग्रास ॥
किलबिख दहन भए खिन अंतरि तूटि गए माइआ के फास ॥2॥
किआ हम किरम किआ करम कमावहि मूरख मुगध रखे प्रभ तास ॥
अवगनीआरे पाथर भारे सतसंगति मिलि तरे तरास ॥3॥
जेती स्रिसटि करी जगदीसरि ते सभि ऊच हम नीच बिखिआस ॥
हमरे अवगुन संगि गुर मेटे जन नानक मेलि लीए प्रभ पास ॥4॥3॥
मेरै मनि राम नामु जपिओ गुर वाक ॥
हरि हरि क्रिपा करी जगदीसरि दुरमति दूजा भाउ गइओ सभ झाक ॥1॥ रहाउ ॥
नाना रूप रंग हरि केरे घटि घटि रामु रविओ गुपलाक ॥
हरि के संत मिले हरि प्रगटे उघरि गए बिखिआ के ताक ॥1॥
संत जना की बहुतु बहु सोभा जिन उरि धारिओ हरि रसिक रसाक ॥
हरि के संत मिले हरि मिलिआ जैसे गऊ देखि बछराक ॥2॥
हरि के संत जना महि हरि हरि ते जन ऊतम जनक जनाक ॥
तिन हरि हिरदै बासु बसानी छूटि गई मुसकी मुसकाक ॥3॥
तुमरे जन तुम॑ ही प्रभ कीए हरि राखि लेहु आपन अपनाक ॥
जन नानक के सखा हरि भाई मात पिता बंधप हरि साक ॥4॥4॥
मेरे मन हरि हरि राम नामु जपि चीति ॥
हरि हरि वसतु माइआ गड़ि॑ वेड़॑ी गुर कै सबदि लीओ गड़ु जीति ॥1॥ रहाउ ॥
मिथिआ भरमि भरमि बहु भ्रमिआ लुबधो पुत्र कलत्र मोह प्रीति ॥
जैसे तरवर की तुछ छाइआ खिन महि बिनसि जाइ देह भीति ॥1॥
हमरे प्रान प्रीतम जन ऊतम जिन मिलिआ मनि होइ प्रतीति ॥
परचै रामु रविआ घट अंतरि असथिरु रामु रविआ रंगि प्रीति ॥2॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! मैं संतजनों की वडिआई बयान नहीं कर सकता।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।