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अंग 1295

अंग
1295
राग कान्हड़ा
राग: कान्हड़ा · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जन की महिमा बरनि न साकउ ओइ ऊतम हरि हरि केन ॥3॥
तुम॑ हरि साह वडे प्रभ सुआमी हम वणजारे रासि देन ॥
जन नानक कउ दइआ प्रभ धारहु लदि वाखरु हरि हरि लेन ॥4॥2॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! मैं संतजनों की वडिआई बयान नहीं कर सकता। परमातमा ने (स्वयं) उनको उच्च जीवन वाला बना दिया है। 3। हे प्रभू ! हे हरी ! हे स्वामी ! आप नाम खजाने का मालिक है। हम जीव उस नाम-धन के व्यापारी हैं हमें अपना नाम-सरमाया दे। हे प्रभू ! अपने दास नानक पर मेहर कर। मैं आपका नाम-सौदा लाद सकूँ। 4। 2।
कानड़ा महला 4 ॥
जपि मन राम नाम परगास ॥
हरि के संत मिलि प्रीति लगानी विचे गिरह उदास ॥1॥ रहाउ ॥
हम हरि हिरदै जपिओ नामु नरहरि प्रभि क्रिपा करी किरपास ॥
अनदिनु अनदु भइआ मनु बिगसिआ उदम भए मिलन की आस ॥1॥
हम हरि सुआमी प्रीति लगाई जितने सास लीए हम ग्रास ॥
किलबिख दहन भए खिन अंतरि तूटि गए माइआ के फास ॥2॥
किआ हम किरम किआ करम कमावहि मूरख मुगध रखे प्रभ तास ॥
अवगनीआरे पाथर भारे सतसंगति मिलि तरे तरास ॥3॥
जेती स्रिसटि करी जगदीसरि ते सभि ऊच हम नीच बिखिआस ॥
हमरे अवगुन संगि गुर मेटे जन नानक मेलि लीए प्रभ पास ॥4॥3॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 4 ॥ हे मन ! परमात्मा का नाम जपा कर। (नाम की बरकति से आत्मिक जीवन की सूझ का) प्रकाश (हो जाता है)। परमात्मा के संत जनों को मिल के (जिनके अंदर परमात्मा का) प्यार बन जाता है। वे गृहस्थ में ही (माया के मोह से) निर्लिप रहते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! कृपालु प्रभू ने (जब हम जीवों पर) मेहर की। हमने हृदय में उसका नाम जपा। (नाम की बरकति से) हर वक्त (हमारे अंदर) आनंद बन गया। (हमारा) मन खिल उठा। (सिमरन का और भी ज्यादा) उद्यम हो गया। (प्रभू को) मिलने की आस बनती गई। 1। हे भाई ! हम जिन जीवों के अंदर परमात्मा का प्यार बना (और) जिन्होंने हरेक सांस के साथ हरेक ग्रास के साथ (नाम जपा। उनके) एक छिन में ही सारे पाप जल गए। माया के फंदे टूट गए। 2। पर। हे भाई ! हम जीवों की क्या बिसात है। हम तो कीड़े हैं। हम क्या कर्म कर सकते हैं। हम मूर्खों की तो वह प्रभू (स्वयं ही) रक्षा करता है। हम अवगुणों से भरे रहते हैं। (अवगुणों के भार से) पत्थर के समान भारे हैं (हम कैसे इस संसार-समुंद्र में से तैर सकते हैं।) साध-संगति में मिल के ही पार लांघ सकते हैं। (वह मालिक) पार लंघाता है। 3। हे भाई ! जगत के मालिक प्रभू ने जितनी भी सृष्टि रची है (इसके) सारे जीव-जंतु (हम मनुष्य कहलवाने वालों से) ऊँचे हैं। हम विषौ-विकारों में पड़ कर नीच हैं। हे दास नानक ! प्रभू हमारे अवगुण गुरू की संगति में मिटाता है। गुरू हमें प्रभू के साथ मिलाता है। 4। 3।
कानड़ा महला 4 ॥
मेरै मनि राम नामु जपिओ गुर वाक ॥
हरि हरि क्रिपा करी जगदीसरि दुरमति दूजा भाउ गइओ सभ झाक ॥1॥ रहाउ ॥
नाना रूप रंग हरि केरे घटि घटि रामु रविओ गुपलाक ॥
हरि के संत मिले हरि प्रगटे उघरि गए बिखिआ के ताक ॥1॥
संत जना की बहुतु बहु सोभा जिन उरि धारिओ हरि रसिक रसाक ॥
हरि के संत मिले हरि मिलिआ जैसे गऊ देखि बछराक ॥2॥
हरि के संत जना महि हरि हरि ते जन ऊतम जनक जनाक ॥
तिन हरि हिरदै बासु बसानी छूटि गई मुसकी मुसकाक ॥3॥
तुमरे जन तुम॑ ही प्रभ कीए हरि राखि लेहु आपन अपनाक ॥
जन नानक के सखा हरि भाई मात पिता बंधप हरि साक ॥4॥4॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 4 ॥ हे भाई ! मेरे मन ने भी गुरू के बचनों पर चल कर परमात्मा का नाम जपा है। हे भाई ! (जिस मनुष्य पर) जगत के मालिक हरी ने मेहर की (उसने गुरू के बचनों पर चल के प्रभू का नाम जपा। और उसके अंदर से) खोटी बुद्धि दूर हो गई। माया का मोह समाप्त हो गया। (माया वाली) सारी झाक खत्म हो गई। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा के कई किस्मों के रूप हैं। कई किस्मों के रंग हैं। हरेक शरीर में परमात्मा गुप्त बस रहा है। जिन मनुष्यों को परमात्मा के संत-जन मिल जाते हें। उनके अंदर परमात्मा प्रकट हो जाता है। उन मनुष्यों के माया के (मोह वाले बँद) कपाट खुल जाते हैं। 1। हे भाई ! जिन रसिए संतजनों ने अपने हृदय में परमात्मा को बसा लिया। उनकी (जगत में) बहुत शोभा होती है। जिन मनुष्यों को प्रभू के इस तरह के संतजन मिल जाते हैं। उनको परमात्मा मिल जाता है (वे इस तरह प्रसन्न-चित्त रहते हैं) जैसे गाय को देख के उसका बछड़ा। 2। हे भाई ! परमात्मा अपने संतजनों के अंदर (प्रत्यक्ष बसता है)। वे संत-जन और सब मनुष्यों के मुकाबले ऊँचे जीवन वाले होते हैं। उन्होंने अपने दिल में हरी-नाम की सुगन्धि बसा ली होती है (इसलिए उनके अंदर से विकारों की) बदबू समाप्त हो जाती है। 3। हे प्रभू ! अपने सेवकों को आप स्वयं ही (अच्छे) बनाता है; उनको आप खुद ही अपने बना के उनकी रक्षा करता है। हे नानक ! प्रभू जी अपने सेवकों के मित्र हैं। भाई हैं। माँ हैं। पिता हैं। और साक-सन्बन्धी हें। 4। 4।
कानड़ा महला 4 ॥
मेरे मन हरि हरि राम नामु जपि चीति ॥
हरि हरि वसतु माइआ गड़ि॑ वेड़॑ी गुर कै सबदि लीओ गड़ु जीति ॥1॥ रहाउ ॥
मिथिआ भरमि भरमि बहु भ्रमिआ लुबधो पुत्र कलत्र मोह प्रीति ॥
जैसे तरवर की तुछ छाइआ खिन महि बिनसि जाइ देह भीति ॥1॥
हमरे प्रान प्रीतम जन ऊतम जिन मिलिआ मनि होइ प्रतीति ॥
परचै रामु रविआ घट अंतरि असथिरु रामु रविआ रंगि प्रीति ॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 4 ॥ हे मेरे मन ! परमात्मा का नाम सदा अपने अंदर जपा कर। (हे भाई ! आपके अंदर) परमात्मा का नाम एक कीमती चीज़ (है। पर वह) माया के (मोह के) किले में घिरा पड़ा है (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। वह उस) किले को गुरू के शबद के द्वारा जीत लेता है। 1। रहाउ। हे भाई ! (जीव) नाशवंत पदार्थों की खातिर सदा ही भटकता फिरता है। पुत्र स्त्री के मोह-प्यार में फसा रहता है। पर। जैसे वृक्ष की छाया थोड़े ही समय के लिए होती है। वैसे ही मनुष्य का अपना ही शरीर एक छिन में ढह जाता है (जैसे कि कच्ची) दीवार। 1। हे भाई ! परमात्मा के सेवक ऊँचे जीवन वाले होते हैं। वे हमें प्राणों से भी प्यारे लगते हैं। क्योंकि उनको मिल के मन में (परमात्मा के लिए) श्रद्धा पैदा होती है। परमात्मा प्रसन्न होता है। सब शरीरों में बसता दिखता है। उस सदा कायम रहने वाले प्रभू को प्रेम-रंग में सिमरा जा सकता है। 2।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! मैं संतजनों की वडिआई बयान नहीं कर सकता।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।