सभि धंनु कहहु गुरु सतिगुरू गुरु सतिगुरू जितु मिलि हरि पड़दा कजिआ ॥7॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! आप सभी गुरू को धन्य-धन्य कहो। गुरू को धन्य-धन्य कहो जिससे परमात्मा को मिल के (विकारों के मुकाबले में) इज्जत बच जाती है। 7।
सलोकु मः 4 ॥ भगति सरोवरु उछलै सुभर भरे वहंनि ॥ जिना सतिगुरु मंनिआ जन नानक वड भाग लहंनि ॥1॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ हे भाई ! गुरू (एक ऐसा) सरोवर है जिसमें भक्ति उछाले मार रही है। (गुरू एक ऐसी नदी है जिसमें परमात्मा की सिफत-सालाह के) लबा-लब भरे हुए बहाव चल रहे हैं। हे दास नानक ! (कह- हे भाई !) जो मनुष्य गुरू में श्रद्धा बनाते हैं वे बहुत भाग्यों से (परमात्मा के गुणों के मोती) ढूँढ लेते हैं। 1।
मः 4 ॥ हरि हरि नाम असंख हरि हरि के गुन कथनु न जाहि ॥ हरि हरि अगमु अगाधि हरि जन कितु बिधि मिलहि मिलाहि ॥ हरि हरि जसु जपत जपंत जन इकु तिलु नही कीमति पाइ ॥ जन नानक हरि अगम प्रभ हरि मेलि लैहु लड़ि लाइ ॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 4॥ हे भाई ! परमात्मा के नाम अनगिनत हैं। परमात्मा के गुण (भी बेअंत हैं)। बयान नहीं किए जा सकते। परमात्मा अपहुँच है। (मानो) अथाह (समुंद्र) है। उसके सेवक भगत उसको कैसे मिलते हैं। (औरों को) कैसे मिलाते हैं। हे भाई ! (परमात्मा के सेवक) परमात्मा की सिफत-सालाह के गीत गाते हुए (स्वयं भी उसको मिलते हैं। और औरों को भी) जपाते हुए (उनकी भी उससे मुलाकात करवाते हैं)। (पर। परमात्मा के गुणों की) कीमत रक्ती भर भी नहीं पड़ सकती। (हे भाई ! उसके दर पर अरदास ही करनी चाहिए कि) हे अपहुँच हरी प्रभू ! अपने दास नानक को अपने लड़ लगा के (अपने चरणों में) मिला ले। 2।
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे भाई ! मैं परमात्मा के दर्शन कैसे कर सकता हूँ। वह तो अपहुँच है। उसतक इन्द्रियों की पहुँच नहीं हो सकती। अगर कोई खरीदे जा सकने वाला पदार्थ हो तो (उसकी रूप-रेखा) बयान की जा सकती है। पर उस परमात्मा का ना कोई रूप है ना रेखा है। वही मनुष्य उसके दर्शन कर सकता है जिसको प्रभू स्वयं मति दे के समझाता है। (और। यह मति मिलती है साध-संगति में) साध-संगति सतिगुरू की पाठशाला है जिसमें परमात्मा के गुण सीखे जा सकते हैं। हे भाई ! धन्य है वह जीभ (जो परमात्मा का नाम जपती है) धन्य हैं वह हाथ (जो साध-संगति में पंखे आदि की सेवा करते हैं) धन्य है वह पांधा (शिक्षक) गुरू जिसके माध्यम से परमात्मा को मिल के उसकी सिफत-सालाह की बातें की जाती हैं। 8।
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम आत्मिक जीवन देने वाला जल है। (पर यह नाम) गुरू के अनुसार रह के जपा जा सकता है। प्रभू का नाम जीवन को पवित्र करने वाला है। इसको जपते हुए-सुनते हुए (हरेक) दुख दूर हो जाता है। (पर यह) हरी-नाम उन मनुष्यों ने ही सिमरा है जिन्होंने (पिछले किए कर्मों के अनुसार) माथे पर धुर दरगाह से लिखे हुए लेख प्राप्त किए हैं। जिनके मन में परमात्मा आ बसता है। परमात्मा की हजूरी में उनको आदर मिलता है। हे दास नानक ! (कह- हे भाई !) जिन मनुष्यों ने प्रेम से अपने मन में परमात्मा (का नाम) सुना है वह (लोक-परलोक में) सुर्खरू होते हैं। 1।
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: महला 4॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम (सारे सुखों का) खजाना है। (पर) यह मिलता है गुरू की शरण पड़ने से। और। गुरू मिलता है उन मनुष्यों को। जिनके माथे पर (पिछले किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार गुरू-मिलाप का) लेख लिखा होता है। उनके मन में शांति बनी रहती है उनका मन उनका तन ठंडा-ठार टिका रहता है (उनके अंदर विकारों की तपश नहीं होती)। हे नानक ! (गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा का नाम जपते हुए हरेक दरिद्र दूर हो जाते हैं। 2।
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे भाई ! मैं सदके जाता हूँ सदा ही उन (मनुष्यों) पर से। जिन्होंने मेरे प्यारे गुरू का दर्शन (सदा) किया है। (पर) प्यारा गुरू उनको ही मिलता है। जिनके माथे पर (उनके पिछले किए कर्मों के अनुसार) धुर-दरगाह से (गुरू मिलाप का) लेख लिखा होता है। वह मनुष्य गुरू की शिक्षा पर चल कर उस अपहुँच परमात्मा का सिमरन करते रहते हैं जिसकी कोई रूप-रेखा बयान नहीं की जा सकती। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के हुकम में चल के उस अपहुँच परमात्मा का ध्यान करते हैं। परमात्मा के वह सेवक (परमात्मा में) मिल के (उसके साथ) एक-रूप हो जाते हैं। हे भाई ! आप सभी (अपने) मुँह से सदा परमात्मा का नाम उचारते रहो। परमात्मा का नाम जपने का यह फायदा और सारे फायदों से बढ़िया है। 9।
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: शलोक महला 4॥ उसका नाम सदा सिमर। सदा सिमर। हे भाई ! जिस प्रभू ने अपनी मौज में अपने ही ढंग से यह जगत खेल बनाई है। जो परमात्मा हरेक शरीर में मौजूद है। जो हर जगह रमा हुआ है। (हे भाई ! जिस मनुष्य के अंदर) मित्र-गुरू ने सूझ-बूझ पैदा की (उसको समझ आ जाती है कि) जगत का जीवन प्रभू (हरेक के) नजदीक बसता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! आप सभी गुरू को धन्य-धन्य कहो।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।