Lulla Family

अंग 1299

अंग
1299
राग कान्हड़ा
राग: कान्हड़ा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जा कउ सतिगुरु मइआ करेही ॥2॥
अगिआन भरमु बिनसै दुख डेरा ॥
जा कै ह्रिदै बसहि गुर पैरा ॥3॥
साधसंगि रंगि प्रभु धिआइआ ॥
कहु नानक तिनि पूरा पाइआ ॥4॥4॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: उसका ये दुर्लभ मनुष्य-जनम सफल हो जाता है। हे भाई ! जिस मनुष्य पर गुरू जी कृपा करते हैं (वह मनुष्य परमात्मा से साध-संगति का मिलाप और हरी-नाम का सिमरन माँगता है) । 2। उसके अंदर आत्मिक जीवन की ओर से बेसमझी दूर हो जाती है; सारे दुखों का डेरा ही उठ जाता है। हे भाई ! जिस मनुष्य के हृदय में गुरू के चरण बसते हैं।3। (हे भाई !) जिस (मनुष्य) ने गुरू की संगति में (टिक के) प्यार से परमात्मा का सिमरन किया है।
कानड़ा महला 5 ॥
भगति भगतन हूं बनि आई ॥
तन मन गलत भए ठाकुर सिउ आपन लीए मिलाई ॥1॥ रहाउ ॥
गावनहारी गावै गीत ॥
ते उधरे बसे जिह चीत ॥1॥
पेखे बिंजन परोसनहारै ॥
जिह भोजनु कीनो ते त्रिपतारै ॥2॥
अनिक स्वांग काछे भेखधारी ॥
जैसो सा तैसो द्रिसटारी ॥3॥
कहन कहावन सगल जंजार ॥
नानक दास सचु करणी सार ॥4॥5॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह- उसने उस पूरन परमात्मा का मिलाप हासिल कर लिया है। 4। 4। कानड़ा महला 5 ॥ हे भाई ! (परमात्मा की) भगती भक्त-जनों से ही हो सकती है। उनके तन उनके मन परमात्मा की याद में मस्त रहते हैं। उनको प्रभू अपने साथ मिलाए रखता है। 1। रहाउ। हे भाई ! दुनिया रिवाजी तौर पर ही (सिफतसालाह के) गीत गाती है। पर संसार-समुंद्र से पार वही लांघते हैं। जिनके हृदय में बसते हैं। 1। हे भाई ! औरों के आगे (खाना) परोसने वाले ने (तो सदा) स्वादिष्ट खाने देखे हैं। पर तृप्त वही हैं जिन्होंने वह खाए। 2। हे भाई ! भेष धारी (स्वांग रचने वाला) मनुष्य (माया की खातिर) अनेकों मन-इच्छित स्वांग बनाता है। पर जैसा वह (असल में) है। वैसा ही (उनको) दिखता है (जो उसको जानते हैं)। 3। हे भाई ! (हरी-नाम सिमरन के बिना) और-और बातें कहनी-कहलवानी- ये सारे प्रयास माया के मोह के फंदों के मूल हैं।
कानड़ा महला 5 ॥
तेरो जनु हरि जसु सुनत उमाहिओ ॥1॥ रहाउ ॥
मनहि प्रगासु पेखि प्रभ की सोभा जत कत पेखउ आहिओ ॥1॥
सभ ते परै परै ते ऊचा गहिर गंभीर अथाहिओ ॥2॥
ओति पोति मिलिओ भगतन कउ जन सिउ परदा लाहिओ ॥3॥
गुर प्रसादि गावै गुण नानक सहज समाधि समाहिओ ॥4॥6॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे दास नानक ! परमात्मा का नाम सिमरना ही सबसे श्रेष्ठ कर्तव्य है। 4। 5। कानड़ा महला 5 ॥ हे प्रभू ! आपका सेवक आपकी सिफतसालाह सुनते हुए उमाह में आ जाता है। 1। रहाउ। हे भाई ! प्रभू की महिमा देख के (मेरे) मन में (आत्मिक जीवन का) प्रकाश हो जाता है। मैं जिधर-किधर भी देखता हूँ। (मुझे वह हर तरफ) मौजूद (दिखाई देता) है। 1। हे भाई ! परमात्मा सब जीवों से बड़ा और सब जीवों से ऊँचा है; गहरा (समुंद्र) है। बड़े जिगरे वाला है। उसकी थाह नहीं लगाई जा सकती। 2। हे भाई ! (जैसे) ताने में पेटे में (धागा मिला हुआ होता है। वैसे) परमात्मा अपने भगतों को मिला हुआ होता है। हे भाई ! अपने सेवकों से उसने ओहला (पर्दा) दूर किया होता है। 3।
कानड़ा महला 5 ॥
संतन पहि आपि उधारन आइओ ॥1॥ रहाउ ॥
दरसन भेटत होत पुनीता हरि हरि मंत्रु द्रिड़ाइओ ॥1॥
काटे रोग भए मन निरमल हरि हरि अउखधु खाइओ ॥2॥
असथित भए बसे सुख थाना बहुरि न कतहू धाइओ ॥3॥
संत प्रसादि तरे कुल लोगा नानक लिपत न माइओ ॥4॥7॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! गुरू की कृपा से (जो मनुष्य परमात्मा के) गुण गाता रहता है वह आत्मिक अडोलता की समाधि में लीन रहता है। 4। 6। कानड़ा महला 5 ॥ हे भाई ! (जगत के जीवों को) विकारों से बचाने के लिए (परमात्मा) स्वयं संत-जनों के हृदय में बसता है। 1। रहाउ। हे भाई ! (जीव गुरू का) दर्शन करते हुए पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं। (गुरू उनके हृदय में) परमात्मा का नाम दृढ़ कर देता है। 1। हे भाई ! (जो मनुष्य गुरू से) हरी-नाम की दवाई (ले के) खाते हैं (उनके) सारे रोग काटे जाते हैं; (उनके) मन पवित्र हो जाते हैं। 2। हे भाई ! (गुरू से दवाई ले के खाने वाले मनुष्य) अडोल-चित्त हो जाते हैं। आत्मिक आनंद में टिके रहते हैं। (इस आनंद को छोड़ के वे) दोबारा किसी और तरफ़ नहीं भटकते। 3।
कानड़ा महला 5 ॥
बिसरि गई सभ ताति पराई ॥
जब ते साधसंगति मोहि पाई ॥1॥ रहाउ ॥
ना को बैरी नही बिगाना सगल संगि हम कउ बनि आई ॥1॥
जो प्रभ कीनो सो भल मानिओ एह सुमति साधू ते पाई ॥2॥
सभ महि रवि रहिआ प्रभु एकै पेखि पेखि नानक बिगसाई ॥3॥8॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! गुरू की कृपा से (नाम-दवाई खा के वे सिर्फ खुद ही नहीं तैरते। उनकी) कुल के लोग भी (संसार-समुंद्र से पार) लांघ जाते हैं। उन पर माया का प्रभाव नहीं पड़ता। 4। 7। कानड़ा महला 5 ॥ (तब से) दूसरों का सुख देख के अंदर-अंदर से जलने की आदत भूल गई है – हे भाई ! जब से मैंने गुरू की संगति प्राप्त की है। 1। रहाउ। हे भाई ! (अब) मुझे कोई वैरी नहीं दिखता। कोई पराया नहीं दिखता; सबके साथ मेरा प्यार बना हुआ है। 1। हे भाई ! (अब) जो कुछ परमात्मा करता है। मैं उसको (सब जीवों के लिए) भला मानता हूँ। ये सुमति मैंने (अपने) गुरू से सीखी है। 2।
कानड़ा महला 5 ॥
ठाकुर जीउ तुहारो परना ॥
मानु महतु तुम॑ारै ऊपरि तुम॑री ओट तुम॑ारी सरना ॥1॥ रहाउ ॥
तुम॑री आस भरोसा तुम॑रा तुमरा नामु रिदै लै धरना ॥
तुमरो बलु तुम संगि सुहेले जो जो कहहु सोई सोई करना ॥1॥
तुमरी दइआ मइआ सुखु पावउ होहु क्रिपाल त भउजलु तरना ॥
अभै दानु नामु हरि पाइओ सिरु डारिओ नानक संत चरना ॥2॥9॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह- जब से साध-संगति मिली है। मुझे ऐसा दिखता है कि) एक परमात्मा ही सब जीवों में मौजूद है (तभी सबको) देख-देख के खुश होता हूँ। 3। 8। कानड़ा महला 5 ॥ हे प्रभू जी ! (मुझे) आपका ही आसरा है। मुझे आपके ऊपर ही माण है; फखर है। मुझे आपकी ही ओट है। मैं आपकी ही शरण आ पड़ा हूँ। 1। रहाउ। हे प्रभू जी ! मुझे आपकी ही आस है। आपके ऊपर ही भरोसा है। मैंने आपका ही नाम (अपने) हृदय में टिकाया हुआ है। मुझे आपका ही ताण है। आपके चरणों में मैं सुखी रहता हूँ। जो कुछ आप कहता है। मैं वही कुछ कर सकता हूँ। 1। हे प्रभू ! आपकी मेहर से। आपकी कृपा से ही मैं सुख पाता हूँ। अगर आप दयावान हैं। तो मैं इस संसार-समुंद्र को पार लांघ सकता हूँ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उसका ये दुर्लभ मनुष्य-जनम सफल हो जाता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।