लुल्ला परिवारLulla Family
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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

राग देवगंधारी

राग · M4-M5

राग देवगंधारी

दिन के मध्य का शास्त्रीय राग।

देवगन्धारी एक सघन शास्त्रीय राग है, समय में दिन के मध्य के आसपास का। नाम में "देव" और "गन्धार" दोनों शास्त्रीय संगीत-शास्त्र के पुराने शब्द हैं, जो इसकी प्राचीनता का संकेत देते हैं।

दक्षिण-भारतीय कर्नाटक परम्परा में "देवगान्धारी" एक अलग राग है, जो उत्तरी देवगन्धारी से कुछ-कुछ भिन्न है। ग्रंथ में जो स्वरूप मिलता है, वो उत्तरी-परम्परा का है।

"माई गुर चरणी चितु लाईऐ ॥" देवगंधारी M5
इस राग के सब अंग

इस राग के शबद

हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।

महला 4 (6)
  1. सेवक जन बने ठाकुर लिव लागे ॥अंग 527
  2. मेरो सुंदरु कहहु मिलै कितु गली ॥अंग 527
  3. मेरे मन मुखि हरि हरि हरि बोलीऐ ॥अंग 527
  4. अब हम चली ठाकुर पहि हारि ॥अंग 527
  5. हरि गुण गावै हउ तिसु बलिहारी ॥अंग 528
  6. हरि के नाम बिना सुंदरि है नकटी ॥अंग 528
महला 5 (38)
  1. माई गुर चरणी चितु लाईऐ ॥अंग 528
  2. माई होनहार सो होईऐ ॥अंग 528
  3. माई सुनत सोच भै डरत ॥अंग 529
  4. मन हरि कीरति करि सदहूं ॥अंग 529
  5. मन जिउ अपुने प्रभ भावउ ॥अंग 529
  6. प्रभ जी तउ प्रसादि भ्रमु डारिओ ॥अंग 529
  7. मन सगल सिआनप रही ॥अंग 529
  8. हरि प्रान प्रभू सुखदाते ॥अंग 529
  9. देवगंधारी 5 ॥अंग 530
  10. देवगंधारी 5 ॥अंग 530
  11. देवगंधारी 5 ॥अंग 530
  12. देवगंधारी 5 ॥अंग 530
  13. देवगंधारी 5 ॥अंग 530
  14. देवगंधारी 5 ॥अंग 531
  15. देवगंधारी 5 ॥अंग 531
  16. देवगंधारी 5 ॥अंग 531
  17. अपुने हरि पहि बिनती कहीऐ ॥अंग 531
  18. देवगंधारी 5 ॥अंग 531
  19. माई प्रभ के चरन निहारउ ॥अंग 531
  20. सुंदर धिआनु धारु दिनु रैनी जीअ प्रान ते पिआरा ॥1॥ रहाउ ॥अंग 532
  21. तेरा जनु राम रसाइणि माता ॥अंग 532
  22. माई गुर बिनु गिआनु न पाईऐ ॥अंग 532
  23. ठाकुर होए आपि दइआल ॥अंग 532
  24. अपुने सतिगुर पहि बिनउ कहिआ ॥अंग 533
  25. अनाथ नाथ प्रभ हमारे ॥अंग 533
  26. प्रभ इहै मनोरथु मेरा ॥अंग 533
  27. छोडि न जाई सद ही संगे अनदिनु गुर मिलि गाए ॥1॥ रहाउ ॥अंग 533
  28. देवगंधारी 5 ॥अंग 533
  29. देवगंधारी 5 ॥अंग 534
  30. हरि जपि सेवकु पारि उतारिओ ॥अंग 534
  31. करत फिरे बन भेख मोहन रहत निरार ॥1॥ रहाउ ॥अंग 534
  32. मै पेखिओ री ऊचा मोहनु सभ ते ऊचा ॥अंग 534
  33. मै बहु बिधि पेखिओ दूजा नाही री कोऊ ॥अंग 535
  34. एकै रे हरि एकै जान ॥अंग 535
  35. देवगंधारी 5 ॥अंग 535
  36. धिआए गाए करनैहार ॥अंग 535
  37. उलटी रे मन उलटी रे ॥अंग 535
  38. सभ दिन के समरथ पंथ बिठुले हउ बलि बलि जाउ ॥अंग 536
महला 9 (3)
  1. यह मनु नैक न कहिओ करै ॥अंग 536
  2. सभ किछु जीवत को बिवहार ॥अंग 536
  3. जगत मै झूठी देखी प्रीति ॥अंग 536
अन्य भगत (2)
  1. छके 2 ॥अंग 530
  2. छके 3 ॥अंग 531

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