राग देवगंधारी
दिन के मध्य का शास्त्रीय राग।
देवगन्धारी एक सघन शास्त्रीय राग है, समय में दिन के मध्य के आसपास का। नाम में "देव" और "गन्धार" दोनों शास्त्रीय संगीत-शास्त्र के पुराने शब्द हैं, जो इसकी प्राचीनता का संकेत देते हैं।
दक्षिण-भारतीय कर्नाटक परम्परा में "देवगान्धारी" एक अलग राग है, जो उत्तरी देवगन्धारी से कुछ-कुछ भिन्न है। ग्रंथ में जो स्वरूप मिलता है, वो उत्तरी-परम्परा का है।
"माई गुर चरणी चितु लाईऐ ॥" देवगंधारी M5
इस राग के शबद
हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।
महला 4 (6)
महला 5 (38)
- माई गुर चरणी चितु लाईऐ ॥अंग 528
- माई होनहार सो होईऐ ॥अंग 528
- माई सुनत सोच भै डरत ॥अंग 529
- मन हरि कीरति करि सदहूं ॥अंग 529
- मन जिउ अपुने प्रभ भावउ ॥अंग 529
- प्रभ जी तउ प्रसादि भ्रमु डारिओ ॥अंग 529
- मन सगल सिआनप रही ॥अंग 529
- हरि प्रान प्रभू सुखदाते ॥अंग 529
- देवगंधारी 5 ॥अंग 530
- देवगंधारी 5 ॥अंग 530
- देवगंधारी 5 ॥अंग 530
- देवगंधारी 5 ॥अंग 530
- देवगंधारी 5 ॥अंग 530
- देवगंधारी 5 ॥अंग 531
- देवगंधारी 5 ॥अंग 531
- देवगंधारी 5 ॥अंग 531
- अपुने हरि पहि बिनती कहीऐ ॥अंग 531
- देवगंधारी 5 ॥अंग 531
- माई प्रभ के चरन निहारउ ॥अंग 531
- सुंदर धिआनु धारु दिनु रैनी जीअ प्रान ते पिआरा ॥1॥ रहाउ ॥अंग 532
- तेरा जनु राम रसाइणि माता ॥अंग 532
- माई गुर बिनु गिआनु न पाईऐ ॥अंग 532
- ठाकुर होए आपि दइआल ॥अंग 532
- अपुने सतिगुर पहि बिनउ कहिआ ॥अंग 533
- अनाथ नाथ प्रभ हमारे ॥अंग 533
- प्रभ इहै मनोरथु मेरा ॥अंग 533
- छोडि न जाई सद ही संगे अनदिनु गुर मिलि गाए ॥1॥ रहाउ ॥अंग 533
- देवगंधारी 5 ॥अंग 533
- देवगंधारी 5 ॥अंग 534
- हरि जपि सेवकु पारि उतारिओ ॥अंग 534
- करत फिरे बन भेख मोहन रहत निरार ॥1॥ रहाउ ॥अंग 534
- मै पेखिओ री ऊचा मोहनु सभ ते ऊचा ॥अंग 534
- मै बहु बिधि पेखिओ दूजा नाही री कोऊ ॥अंग 535
- एकै रे हरि एकै जान ॥अंग 535
- देवगंधारी 5 ॥अंग 535
- धिआए गाए करनैहार ॥अंग 535
- उलटी रे मन उलटी रे ॥अंग 535
- सभ दिन के समरथ पंथ बिठुले हउ बलि बलि जाउ ॥अंग 536
महला 9 (3)
- यह मनु नैक न कहिओ करै ॥अंग 536
- सभ किछु जीवत को बिवहार ॥अंग 536
- जगत मै झूठी देखी प्रीति ॥अंग 536